रामपुर की रामकहानी

गाँव में ग्रंथालय? शर्मा जी पगला गये हैं

 

रामपुर की रामकहानी-20

     गाँव में ग्रंथालय खोलने की बात जब मैंने अपने पड़ोसी तपन बाबू से की तो वे ठठाकर हँस पड़े। “ग्रामे लाइब्रेरी? कोलकाता शहरेर लाइब्रेरीगुलोर अवस्था की आपनी जानेन? पाठकरा आश्छे ना। बई बिक्री होच्छे ना। लोगरा मोबाइल थेके समय पाच्छे ना आर आपनी ग्रामे लाइब्रेरी खुलबेन? अद्भुत ब्यापार।”

       साहित्य और संगीत में गहरी रुचि रखने वाले तपन भट्टाचार्य की पहली प्रतिक्रिया ने मेरा उत्साह ठंढा कर दिया। किन्तु इसके बाद भी मैं अपने निर्णय पर अडिग था। हाँ, उसके बाद लोगों से मैं लाइब्रेरी की जगह ट्रस्ट के निर्माण की बात करने लगा।

      दरअसल मैं कभी-कभी बुद्धि से नहीं, अंतरात्मा की आवाज सुनकर भी काम करता हूँ और मेरी अंतरात्मा कहती है कि मेरे गाँव की जमीन हमारी पैतृक संपत्ति है, मुझे वह विरासत में मिली है, वह मेरी कमाई नहीं है। ऐसी दशा में उसे बेंचने का मुझे नैतिक अधिकार नहीं है। मुझे इस विरासत को सँभालकर रखना है और उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को सुपुर्द कर देना है। मैं सिर्फ इसका संरक्षक हूँ, ट्रस्टी हूँ। जब मैं अपने शुभचिन्तकों से यह सब कहता हूँ तो उनकी राय सकारात्मक तो होती है किन्तु वे यह सुझाव देना नहीं भूलते कि यदि नहीं बेच सकते तो न बेचें किन्तु गाँव में अपनी ओर से कुछ खर्च न करें क्योंकि वहाँ से हमें कुछ मिलने वाला नहीं है। जो भी हम खर्च करेंगे वह सब डूबेगा। बदले में हमें बदनामी ही मिलेगी। किन्तु मैं हूँ कि गाँव का मोह छोड़ता ही नहीं।

      मेरी अंतरात्मा यह भी कहती है कि मेरे जिन माता-पिता ने मुझे जन्म दिया है, भरण-पोषण किया है, वे किसान थे। खेत से अनाज और शाक-भाजी पैदा करते थे और उसी से हमारा पेट भरता था। सिर्फ पेट ही नहीं भरता था, नौकरी पाने तक का सारा जीवन-यापन भी इसी खेती से हुआ। मेरे लिए हमारी खेती भी हमारे मां-बाप जैसी ही है। उसे भला बिकने के लिए कैसे यूँ ही छोड़ दें? अपने को ही अपनी जड़ों से कैसे विच्छिन्न कर लें? हम दोनों भाइयों की ग्रेजुएशन तक की शिक्षा और तीनो बहनों की परवरिश गाँव से ही हुई है। जो संस्कार गाँव ने हमें दिए हैं, उन्ही के बल पर तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए हम आज भी सम्मान के साथ जी रहे हैं और दोनों भाई देश के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अध्यापन, शोध और प्रशासनिक उत्तरदायित्वों का भी सफलतापूर्वक निर्वहन करने में सक्षम हो सके हैं। तो क्या इस गाँव के प्रति हमारा कोई दायित्व नहीं है? क्या हमारा दायित्व सिर्फ अपने उन्हीं बच्चों तक है जिन्हें हमने जन्म दिया है? यदि हम पढ़-लिख कर शहर में इन प्रतिष्ठित पदों पर न पहुँचे होते तो क्या हमारे बच्चों को इससे आगे जाने के अवसर मिल पाते?

      निश्चित तौर पर हर माता-पिता का यह दायित्व बनता है कि वह अपनी संतान को अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षा दे, संस्कार दे और उसे इस योग्य बनाने में मदद करे कि उसकी संतान अपने पैरों पर खड़ी हो सके। किन्तु इसी के साथ हमारा अपने गाँव के प्रति, पड़ोस के प्रति और अपने उस परिवेश के प्रति भी एक दायित्व बनता है-उसे भी बेहतर बनाने और सँवारने का, क्योंकि हमारी निर्मिति में उनका भी योगदान है।

     बाऊजी के निधन के बाद घर में स्थाई ताला लग गया था और उसके तीन वर्ष बाद यानी, 1994 में मैंने कलकत्ता की राह ली। उसके बाद गाँव लगभग छूट ही गया। गाँव जाने का समय न मैं निकाल पाता था और न विश्वंभर। मंठें और बागापार घाट के खेत कई वर्षों से परती थे। पाँच-छ: वर्ष तक हम खेत देखने तक न जा सके थे। इसी बीच मेरे पास सोनरा के मोहन गुप्ता का पत्र आया। वे हमारे खेत खरीदने के इच्छुक थे। मैंने पत्र का हवाला देते हुए विश्वंभर को लिखा कि जब हमारे पास खेत देखने तक की फुर्सत नहीं है तो उन्हें रखने से क्या लाभ? दोनों बड़े चक छोड़कर बाकी हमें बेंच देने चाहिए। विश्वंभर तैयार हो गए और इस तरह हमारे कुछ खेत माटी के मोल बिक गए।

      इधर गाँव जाता हूँ तो मंठें के अपने उस खेत के किनारे तक रोज सुबह टहलने जाता हूँ। नदी के किनारे खड़े होकर कुछ क्षण अपने खेत में लहलहाती फसलें निहारता हूँ, कुछ यादें ताजा करता हूँ और मुँह लटकाए लौट आता हूँ। एक किसान के लिए उसके खेत की कीमत कोई दूसरा आँक सकता है क्या? बागापार घाट वाले खेत के बगल में तो अनेक मकान बन चुके हैं।

     कोलकाता जाने के बाद से लगभग दो दशक तक गाँव में शायद ही हमने कोई रात बितायी हो। किन्तु बीच-बीच में मुझे गाँव की सुधि सताने लगती थी। कभी-कभी तो कलकत्ता से आता और घर का ताला खोलकर देख लेता, झाड़ू लगवा देता मगर रात महाराजगंज में गुजारता, किसी दूसरे के घर।

     आखिर इस तरह कब तक चलेगा? अपने दोनों बड़े चक और घर हम अपने जीते जी भले न बेचें, हमारे बाद बच्चे इन्हें निश्चित रूप से बेंच देंगे। हम दोनों भाइयों के बच्चे गाँव में आने वाले नहीं हैं। वे भी देख रहे हैं कि खेती करना अब घाटे का सौदा है। ग्राम-स्वराज का सपना तो गाँधी ने देखा था। हम तो उसके विपरीत दिशा में चलते हुए अब इतनी दूर आ चुके हैं कि जहाँ से पीछे मुड़कर देखना भी डरावना लगता है। भारत के गाँव अब दुनिया को लेबर सप्लाई करने के कारखाने बन चुके हैं। ऐसी दशा में हमारे बच्चों के सामने रास्ता ही क्या है? मैं उस दिन के बारे में सोचकर भी सिहर उठता हूँ जब मेरे गाँव का घर और खेत बिक जाएगा और हमारे बच्चे पूरी तरह जड़ विहीन हो जाएंगे।

      ट्रस्ट के निर्माण की अपनी इच्छा को सबसे पहले मैंने अपने अनुज विश्वंभर के सामने जाहिर किया क्योंकि उनकी सहमति और सहयोग के बगैर कुछ भी संभव नहीं था। उनकी सहमति मिल गई। उन्होंने मुझे गाँव में कुछ भी करने के लिए पूरी आजादी दे रखी है। किन्तु हमारे मित्रों और शुभचिन्तकों ने आगाह किया। उनका कहना था कि गाँव के लोग अब इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि लोक-हित की बात वे सोच भी नहीं सकते। वे हमारे कार्यों में बाधा ही डालेंगे और पीठ पीछे हमारी खिल्ली भी उड़ायेंगे। उनका सहयोग तो हर्गिज नहीं मिलेगा। लोग कहते हैं कि गाँव का मेरा यह घर यदि शहर में होता तो इसका अच्छा खासा भाड़ा मिलता। ऐसी राय देने वाले निश्चित रूप से मेरे शुभचिन्तक तो हैं ही, वे व्यावहारिक भी हैं और जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले हैं। किन्तु जीवन के प्रति उनका और मेरा दृष्टिकोण एक जैसा होना जरूरी तो नहीं।

     श्री चंद्रिका शर्मा फूला देवी स्मृति सेवा ट्रस्ट, रामपुर बुजुर्ग, जनपद-महाराजगंज (उ.प्र.) का रजिस्ट्रेशन 23 फरवरी 2012 को हो गया और उसकी ओर से पहली बार 26-27 अक्टूबर 2013 को रामपुर उत्सव’ का आयोजन भी हुआ। शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कार के महत् उद्देश्यों के लिए समर्पित ट्रस्ट के इस दो दिवसीय आयोजन में ग्राम-वासियों सहित क्षेत्र तथा देश के दूसरे हिस्सों से आए अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने उत्साह के साथ भाग लिया था। इसके बाद से ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष अक्टूबर-नवंबर में दो दिवसीय ‘रामपुर उत्सव’ का नियमित आयोजन होता है जिसके उद्घाटन के लिए महाराजगंज जनपद के जिलाधिकारी को आमंत्रित किया जाता है। ट्रस्ट की ओर से प्रतिवर्ष गाँव के दो प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को समारोह पूर्वक पुरस्कृत और सम्मानित किया जाता है, उन्हें पुरस्कार के रूप में नकद धनराशि के अलावा पुस्तकें तथा प्रमाण पत्र दिए जाते हैं। प्रतिवर्ष प्रदेश के किसी एक शिक्षक को ‘आदर्श शिक्षक सम्मान से अलंकृत किया जाता है। इसी के साथ प्रतिवर्ष ग्राम स्वराज व्याख्यानमाला का आयोजन होता है।

     छात्र-छात्राओं तथा लोक कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं और इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वाले सभी विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र के साथ श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ देकर पुरस्कृत किया जाता है। इस अवसर पर फुटबाल, वालीबाल और कबड्डी जैसी कम खर्च वाली खेल-प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। गरीब किन्तु प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को यथासंभव आर्थिक सहयोग दिया जाता है। जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी की देख-रेख में नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन होता है जिसमें जिला चिकित्सालय के डॉक्टरों के अलावा क्षेत्र के अन्य विशेषज्ञ डॉक्टर अपनी सेवाएं नि:शुल्क देते हैं। इन चिकित्सा-शिविरों में मरीजों की जाँच के साथ ही आर्थिक दष्टि से कमजोर मरीजों को दवाएं और नि:शुल्क चश्मे वितरित किए जाते हैं। अब तक ट्रस्ट द्वारा लगभग दो हजार जरूरतमंद रोगियों को नि:शुल्क चश्में वितरित किये जा चुके हैं। इस अवसर पर ज्ञान वर्धक व लोकहितकारी फिल्में भी दिखाई जाती हैं। इसी के साथ प्रतिवर्ष गाँव’ नाम की पत्रिका का प्रकाशन भी होता है जिसमें गाँव से संबंधित विषय तो प्रकाशित होते ही हैं पत्रिका में ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाओं को प्रकाशन का अवसर देकर उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। क्या ट्रस्ट द्वारा किये गये लोक हित के इन सारे कार्यों का कोई मूल्य नहीं?

       ट्रस्ट की ओर से ग्राम स्वराज पुस्तकालय का भी संचालन होता है। इस पुस्तकालय का औपचारिक शुभारंभ 22 अक्टूबर 2016 को हुआ था। आरंभ में हमने अपने निजी मकान के प्रथम तल पर एक बड़ा कमरा बनवाकर उसमें पुस्तकालय आरंभ कर दिया। 2018 में हमने पुस्तकालय के लिए स्वतंत्र भवन निर्मित करने का निर्णय लिया। इसके लिए हम दोनों भाइयों ने अपनी भूमि ‘ग्राम स्वराज पुस्तकालय भवन’ के निमित्त दान कर दी जिसपर दो हजार वर्गफुट का दो मंजिला पुस्तकालय भवन बनकर तैयार है। हम शीघ्र ही इस भवन में पुस्तकालय को शिफ्ट करेंगे। इस भवन के निर्माण में किसी सरकारी अथवा गैरसरकारी संगठन से हमने कोई आर्थिक सहायता नहीं ली है। सारा खर्च हमारे परिवार के सदस्यों और कुछ गिने-चुने मित्रों ने ही वहन किया है। इतना ही नहीं, ट्रस्ट को हम पूरी तरह राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हैं इसीलिए हमने न तो कभी किसी राजनेता से कोई आर्थिक सहयोग लिया और न कभी किसी राजनेता को अपने कार्यकर्मों में आमंत्रित किया।

     जबसे ट्रस्ट की नींव पड़ी हम इसी बहाने गाँव में आने और आयोजनों को संपन्न करने के लिए रहने को भी बाध्य हो गए। अब हमने यहाँ रुकने के लिए आवश्यक संसाधन भी जुटा लिये हैं।

     रामपुर उत्सव का आयोजन जब भी होता है, गाँव में रौनक बढ़ जाती है। अनुज प्रो। विश्वंभरनाथ शर्मा, दोनों बेटे, बेटी, दोनों बहनें, भांजे और भांजियाँ सभी सपरिवार आयोजन में शामिल होने की कोशिश करते हैं। इस तरह रामपुर उत्सव के बहाने वर्ष में एक बार मेरे परिवार का भी मिलन हो जाता है। गाँव-क्षेत्र के लोग भी जुटते हैं। डॉ. घनश्याम पाण्डेय स्थानीय अभिभावक की तरह आरंभ से ही सहयोग करते रहे। आज वे नहीं हैं। उनके अभाव की क्षतिपूर्ति संभव नहीं हैं। इसी तरह मेरे गुरु डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय प्रतिवर्ष रामपुर उत्सव में शामिल होकर हमें आशीर्वाद देते हैं। सी।जे। थामस, डॉ. एस.के.वर्मा, विमल पाण्डेय, के.के. शुक्ल, जगदीश नारायण शर्मा जैसे लोगों का भरपूर स्नेह और सहयोग आज भी यथावत मिलता है।

     किसी भी व्यक्ति या संस्था के न रहने पर ही उसके महत्व का आकलन हो पाता है। कल्पना कीजिए कि यदि ट्रस्ट न बना होता तो अब तक क्या हुआ होता? हम अधिक से अधिक साल में एकाध बार गाँव जाकर देख आते। वहाँ ठहरने लायक व्यवस्था न होने से रात कहीँ अन्यत्र बिताते। ऐसी दशा में आजिज आकर और बच्चों के दबाव में या तो हम जमीन बेंच चुके होते या आस-पास के लोग उसके कुछ हिस्सों पर कब्जा कर चुके होते। जमीन और घर बेंचने के लिए हम दोनों भाइयों का आपस में बँटवारा हुआ होता और जैसा अमूमन होता है, बँटवारे के दौरान हमारे बीच ईर्ष्या-द्वेष की गाँठें पड़ी होतीं।

      ट्रस्ट बना तो गाँव में हमारा आना-जाना बढ़ गया। हमने घर में बिजली का कनेक्शन लिया। गृहस्थी की जरूरी चीजें इकट्ठी कीं और आने पर उसे ठहरने लायक बनाया। ट्रस्ट में होने वाले आयोजनों के नाते जिले में अपनी प्रतिष्ठा भी बढ़ी और मैत्री-संबंधों में इजाफा हुआ। आखिर व्यक्ति तो सामाजिक प्राणी है न ! बहुत ज्यादा संपत्ति हो किन्तु दो चार मित्र न हों, शुभचिन्तक न हों तो उस धन से क्या फायदा?

     यह सही है कि ट्रस्ट में हमारे लाखों रूपए खर्च हुए और आज भी हो रहे हैं। ट्रस्ट न रहता तो यह धन बचाकर हम किसी महानगर में एक फ्लैट खरीद सकते थे। उससे कुछ किराया मिलता और उस धन से हमारे बच्चों के सुख के साधनों का और भी विस्तार होता। किन्तु मुझे तो विनोबा भावे की चेतावनी याद रहती है, “सुख के साधनों का बढ़ जाना दुख का सबसे बड़ा कारण है।”

     गाँव में ट्रस्ट का भवन बनाने के लिये जमीन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। पुस्तकालय-भवन में लगभग अस्सी लोगों को बैठने लायक सभागार, कार्यालय, किचेन के साथ ही अतिथियों को ठहरने के लिए आवास भी बन गया है। छुट्टियाँ होने पर कहीं बाहर घूमने की जगह परिवार के सदस्य या ट्रस्ट के हमसफर यहाँ आ सकते हैं, दो-चार दिन अतिथि-कक्ष में ठहर सकते हैं, सामाजिक कार्यों में हिस्सा ले सकते हैं, गाँव की शुद्ध हवा, शुद्ध दूध-दही, खेत की ताजी सब्जियाँ और फल-फूल का आनंद उठा सकते हैं और गाँव से जुड़कर अपनी संवेदना में थोड़ा सा इजाफा करके अपने-अपने शहर लौट सकते हैं। अगर ट्रस्ट न होता तो बच्चे गाँव देखने के लिए तरस जाते।

     एक दिन मेरी पाँच वर्षीय पोती आशी ने घर के सामने के खेत में धान की बाली को देखकर पूछा था, “बाबा, ये क्या है?” मैंने बाली से एक दाना तोड़कर उसका छिलका छुड़ाया और दिखाया, “यह धान है जिसमें से चावल निकलता है।” उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। अब हमारे बच्चे शहर की उस दुनिया में पहुँच चुके हैं जहाँ किसानों, फसलों और पशुओं को वे कम्प्यूटर के स्क्रीन या किताब के पन्नों पर ही देख सकेंगे।

     हमारा यह ट्रस्ट लंबे समय तक अपने परिवार की आने वाली पीढ़ी को जोड़े रखने का सबसे महत्वपूर्ण उपक्रम साबित होगा। जैसे माता-पिता अपनी संतान को एकजुट रखने के लिए नींव का काम करते हैं, उसी तरह हमारा यह ट्रस्ट हमारे परिवार को जोड़ने के लिये माता-पिता की भूमिका निभायेगा।

      किसी भी सामान्य परिवार के व्यक्ति से उसके परिवार की चार-पाँच पीढ़ी पहले के किसी पूर्वज का नाम पूछिए तो उसे भी बता पाने में वह सक्षम नहीं हो सकेगा। यानी, जिसकी विरासत हम ढो रहे हैं, जिनके हम वंशज हैं, जिनसे हमारा वजूद है, उनका नाम तक हम भूल चुके हैं। हमारे इस ट्रस्ट के माध्यम से हमारी आने वाली पीढ़ियाँ सदियों तक अपने पुरखों को याद रखेंगी और गर्व के साथ लोगों को बता सकेंगी कि उनकी जड़ें कहाँ हैं। उनके पुरखे कैसे थे और कौन थे। यह ट्रस्ट और यह गाँव उनके लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं होगा।

      आज लोग कहते जरूर हैं कि जब पुस्तकालय में पढ़ने के लिए लोग नहीं आते तो ऐसे पुस्तकालय पर इतना पैसा खर्च करने से क्या लाभ? तात्कालिक तौर पर उनकी बातें सही लगती हैं किन्तु सचाई यह है कि हमारे पूरे जनपद में यह अकेला सार्वजनिक पुस्तकालय है। इसके अलावा जिला मुख्यालय पर एक सरकारी पुस्तकालय भी है किन्तु वहाँ बाहर के लोगों की पहुँच मुश्किल है क्योंकि वह मुख्यालय के प्रशासनिक क्षेत्र की परिधि के भीतर है। अब यदि किसी व्यक्ति को वेद देखने की लालसा हो, महाभारत पढ़ने की इच्छा हो या कोई भी ऐसी पुस्तक पढ़ना या देखना चाहता हो जो बाजार में आसानी से सुलभ न हो तो उसके पास क्या विकल्प है? वह कहाँ जाएगा देखने? यहाँ रोज भले ही पर्याप्त संख्या में पाठक न आते हों किन्तु कोई विशिष्ट अध्येता, कोई पाठक, हफ्तों क्या महीनों में ही आ जाए तो मैं समझता हूँ कि मेरी योजना सफल है, क्योंकि उसके पास और दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

      पुस्तकालय के अलावा हमारी योजना इस भवन को आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों को नि:शुल्क चिकित्सकीय सुविधा दिलाने एवं सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में विकसित करने की है। गाँवो के लोग अंधविश्वासों में जन्म लेते हैं, अंधविश्वासों में पलते-बढ़ते हैं और अंधविश्वासों के भँवर में डूबते-उतराते मर जाते हैं। यह ट्रस्ट गाँव के लोगों को अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने और उनमें वैज्ञानिक चेतना विकसित करने का प्रयास करेगा। ट्रस्ट हर प्रकार की नशा के विरुद्ध व्यापक जनजागरण अभियान चलाएगा, सुयोग्य विधि-वेत्ताओं व समाजसेवियों की मदद से गाँवों में बढ़ते पारिवारिक झगड़ों और अनावश्यक मुकदमेबाजी को सुलझाने का प्रयास करेगा, कुशिक्षा, जातिवाद, सांप्रदायिकता आदि समाज के विकास में अवरोधक मूल्यों के उन्मूलन का प्रयास करेगा, योग शिविरों का आयोजन करेगा, युवाओं में कबड्डी, फुटबाल, वालीबाल, हाकी जैसे ग्राम आधारित खेलों के प्रसार में मदद करेगा। बालक-बालिकाओं में समान शिक्षा और रोजगार के लिए उनका मार्ग-दर्शन करेगा, दहेज-प्रथा के खिलाफ व्यापक जनजागरण अभियान चलाएगा। इसके साथ गाँव के सर्वांगीण विकास के लिए जो भी उचित होगा उसे करेगा।

    ट्रस्ट ने गाँव के कई बच्चों के भीतर आत्मविश्वास पैदा किया है, उन्हें अपना लक्ष्य चुनने में मदद पहुँचाया है। ट्रस्ट के आयोजनों से जनपद के बाहर भी अनेक लोगों को प्रेरणाएं मिली हैं। दूसरे प्रदेशों में भी अनेक प्रबुद्ध व्यक्तियों ने अपने-अपने गाँवों में इस तरह के आयोजन शुरू किये हैं।

      कभी-कभी पीड़ा जरूर होती है जब मुझे अपने गाँव के लोगों की प्रतिकूल टिप्पणियाँ सुनने को मिलती हैं। सामने कोई नहीं कहता, किन्तु पीठ पीछे योजनाबद्ध ढंग से दुष्प्रचार किया जाता है। ये वे लोग हैं जिनके स्वार्थ की पूर्ति मैं नहीं कर सका। कोई कहता है कि “टैक्स बचाने के लिये ये सब कर रहे हैं।” कोई कहता है “इससे मुझे क्या मिलेगा? मैं क्यों उनके यहाँ जाऊँ?।” कोई कहता है कि “इतना पैसा है तो गाँव वालों को खिलाते-पिलाते, गरीबों में ही बाँट देते।” आदि आदि। कई लोग बीच-बीच में आते हैं पैसे माँगने। कोई उधार माँगता है तो कोई सहयोग।

     कोई कहता है कि “बेटी की शादी है, सहयोग कर दीजिए,” कोई कहता है, “घर की छत ढलवानी है, सहयोग कर दीजिए,” कोई कहता है, “बेटे को सऊदी भेजना है उधार दे दीजिए,” कोई कहता है “बेटे को अमुक कोर्स में एडमीशन लेना है उधार दे दीजिए।” आरंभ में कुछ लोगों की मैंने मदद भी की किन्तु मैंने देखा कि जिनकी भी मैंने मदद की उनसे रिश्ते खराब हुए। ज्यादातर लोगों ने वापस न करने की इच्छा से दूरी बना ली, पैसे वापस माँगने पर भी नहीं दिया और कुछ ने वापस किया भी तो दुखी होकर।

     यह बहुत पीड़ादायक प्रसंग है। आज गाँव के अनेक लोग हमसे नाराज हो चुके हैं और वे निन्दा-अभियान में लगे हैं, किन्तु बड़ी संख्या में गाँव के लोगों से हमें मदद भी मिल रही है। ऐसे ही लोगों के सहयोग से हम गाँव में सफलतापूर्वक आयोजन करते आ रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि देर सबेर बाकी लोगों की समझ में जब आयेगी कि ट्रस्ट की ओर से होने वाले सामाजिक कार्यों के लिये हम गाँव वालों से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लेते और यह सब बड़े त्याग और कष्ट से संचित धन तथा अपने पेंशन के बचाए हुए पैसे से कर रहे हैं तो उनका प्यार हमें जरूर मिलेगा।

     इस्लाम में ज़कात देने की परंपरा है। कोलकाता में मैंने देखा है कि बड़े-बड़े व्यवसायी अपनी कमाई का एक हिस्सा लोक-कल्याण के कार्यों में खर्च करने के लिए सुरक्षित रख देते हैं। मेरी भी आकांक्षा है कि हमारे परिवार के सदस्य अपनी क्षमतानुसार अपनी कमाई का कुछ अंश नियमित रूप से ट्रस्ट के खाते में जमा करते रहें जिससे ट्रस्ट की गतिविधियाँ सुचारु रूप से चलती रहें। इससे एक तो उनके भीतर लोक-हित के लिए कुछ न कुछ दान देने की प्रवृति बनी रहेगी, उनके भीतर की मनुष्यता परिमार्जित होती रहेगी और दूसरे, जिस ट्रस्ट को वे दान दे रहे हैं उसके प्रति भी अपनत्व का भाव बना रहेगा। वे यह भी देखना चाहेंगे कि उनके दान के धन का समुचित इस्तेमाल हो रहा है या नहीं। अपने ट्रस्ट के प्रति उनका लगाव उन्हें बार-बार गाँव की ओर आने के लिए प्रेरित करता रहेगा। ट्रस्ट की प्रेरणा से हमारे परिवार के सदस्यों तथा गाँव की आने वाली पीढ़ी के भीतर यदि कुछ मनुष्यता बची रहेगी तो ट्रस्ट की सार्थकता खुद प्रमाणित होती रहेगी वर्ना, बाजारवाद का उद्देश्य तो हमारी नई पीढ़ी को सिर्फ उपभोक्ता बनाने का है

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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