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ये आपदाएं हमारी करतूतों का ही परिणाम है

 

पिछले कुछ दिनों से भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त हैं। बारिश, बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात, सूखा, ग्लेशियर टूटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देश बेहाल हैं। अभी कुछ दिन पहले ही भारत ने दो बड़े समुद्री चक्रवात की भीषणता और उसके विनाश को झेल और अब बारिश और उसके बाद आए बाढ़ और भूस्खलन ने देश के बड़े भूभाग में कोहराम मचा रखा है।

मई में आए दो चक्रवाती तूफान ताउते और यास ने कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और फिर बंगाल, उड़ीसा, झारखण्ड, बिहार आदि राज्यों में भारी तबाही मचाया। चक्रवात से हुए जान-माल के नुकसान से देश उबर ही नहीं पाया था कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मानसूनी बारिश ने अपना तांडव देश के बड़े हिस्से में मचाना शुरु कर दिया। बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, बंगाल, झारखण्ड जैसे पूर्वी राज्यों के बाद अब देश के पश्चिमी तथा पहाड़ी राज्यों महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, हिमाचल, उत्तराखण्ड में भरी बारिश के बाद आए बाढ़ और भूस्खलन से सैकड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ी हैं तो वहीं हजारों को अपने घर-बार से हाँथ धोना पड़ा।

महाराष्ट्र, हिमाचल, उत्तराखण्ड, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर जान-माल को नुकसान पहुंचा है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम छोटे-बड़े देश जूझ रहे हैं। चीन में जहाँ बारिश का हज़ार वर्षों का रिकार्ड टूटा है तो वहीं यूरोपीय देश जर्मनी, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड में सौ सालों का। इंग्लैंड की राजधानी लंदन में भी बारिश के बाद बाढ़ जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं। जापान, फिलीपींस, तिमोर में भी बाढ़ ने तबाही मचा रखी है।

अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देश भीषण गर्मी और सूखे की विभीषिका झेल रहे हैं तो वहीं अफ्रीका और एशिया के कई देश जल संकट से। ऐसा नहीं है कि ये आपदाएँ इसी वर्ष आई हैं बल्कि अब तो यह हर वर्ष आती हैं और अपने साथ विनाश की निशानी छोड़ जाती हैं। यह बात अलग हैं कि हम इन आपदाओं को प्राकृतिक मान कर बहुत जल्द भूल भी जाते हैं।

यह देखने में आया है कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की गति कई गुणा बढ़ गयी है और दुनिया के तमाम बड़े मौसम वैज्ञानिक इसका कारण जलवायु परिवर्तन को मान रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी के तापमान में बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है जिसकी वजह से तमाम पर्यावरणीय उथल-पुथल हो रहे हैं लेकिन हम यह जानते हुए भी अंजान बने बैठे हैं कि ये पर्यावरणीय बदलाव मानव जाति ही नहीं बल्कि समूचे पृथ्वी के विनाश का कारण बनने वाले हैं। पिछली कुछ शताब्दियों में दुनिया के तमाम पूंजीवादी देशों ने जिस प्रकार से विकास के नाम पर अंधाधुंध औद्योगिकरण को बढ़ावा दिया और उन उद्योगों से निकलने वाली जहरीली रसायनिक गैसों एवं ख़तरनाक अपशिष्टों ने जिस गति से धरती के तापमान को बढ़ाया है आज ये प्राकृतिक आपदाएँ उसी का परिणाम हैं।

आज एक तरफ दुनिया के तमाम तटीय इलाके डूब रहे हैं या फिर डूबने के कगार पर हैं तो वहीं दूसरी तरफ दर्जनों देश भीषण बाढ़, सूखा, गर्मी और ठंड का सामना कर रहे हैं। सुनामी, हिमनद पिघलने जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोत्तरी भी जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम है। प्रति वर्ष हजारों लोगों को इन प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवानी पड़ती है तो वहीं अरबों-खरबों की संपत्ति इसकी भेंट चढ़ जाती हैं।

खाद्द संकट के साथ-साथ कृषि आधारित आजीविका के क्षेत्र में भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं साथ ही कुपोषण की स्थिति और भी विकराल होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2008-2018 के बीच प्राकृतिक आपदाओं के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कृषि क्षेत्र में फ़सल उत्पादन और मवेशी जीवन को क्षति पहुँचने से 108 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का नुकसान हुआ है।

पिछली सदी के आखिरी दशक में जलवायु परिवर्तन के इन्हीं खतरों को भांपते हुए और इससे दुनिया को बचाने के लिए 170 से भी अधिक देशों ने पृथ्वी शिखर सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें यूएनएफसीसीसी (यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन्स ऑन क्लाइमेट चेंज) का गठन हुआ और यह तय किया गया कि यूएनएफसीसीसी के सदस्य राष्ट्र जलवायु संबंधित चिंताओं और उनके समाधान के लिए कार्ययोजनाओं पर चर्चा करेंगे। और इसी के बाद सन् 1995 ई. से कोप (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़) सम्मेलन की शुरुआत हुई और सन् 2015 में इसके 21वें (कोप-21) सम्मेलन में पेरिस समझौता किया गया जिस पर एक साथ 177 देशों ने हस्ताक्षर किए (आज इनकी संख्या 190 हैं)।

इस समझौते के चार प्रावधान हैं जिसमें 1. वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना। 2. मानवीय कार्यों से होने वाले ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना कि पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोख लें। 3. प्रत्येक पाँच वर्षों में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना। और 4. विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाना है।

आज पाँच वर्ष से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद भी दुनिया ने पेरिस सौमझौते को गंभीरता से नहीं लिया है। इस समझौते को लेकर दुनिया कितनी गंभीर है उसे हम इसी से समझ सकते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश अमेरिका इस समझौते से अलग हो गया (अब ट्रंप के इस फैसले को भले ही बाइडन ने वापस ले लिया है।) कुछ देश भलें ही इसे अमल में ला रहे हैं लेकिन उनकी ये कोशीशे अधूरी ही रह जाएंगी जब तक कि दुनिया के सभी देश एक साथ मिलकर कोशिश नहीं करेंगे। जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी को बचाना किसी एक देश के बस की बात नहीं है बल्कि पूरी दुनिया को एक साथ मिलकर इससे निपटना होगा।

सामूहिक तथा जन भागीदारी से ही पृथ्वी के तापमान को कम करके विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जा सकता है। इसके लिए दुनिया के उन देशों को आगे आना होगा जो सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं। विकसित देशों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना होगा। भारत, जापान, जर्मनी जैसे देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने और हरित क्षेत्र को अधिक से अधिक विकसित करने पर ज़ोर दे रहे हैं लेकिन जिस गति से वो आगे बढ़ रहे हैं वह नाखाफी सिद्ध हो रही है। अब समय निकलता जा रहा है। अब करो या मरो की स्थिति है

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