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दलित आत्मकथाओं में आजादी
सामयिक

दलित आत्मकथाओं के आईने में आजादी

 

 वास्तव में देखा जाए तो साहित्य की निर्मिति हमारी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और सामूहिक अस्मिताओं के रचनात्मक पहलू के साथ मुल्क की गतिविधियों और परिस्थितियों का आख्यान होता है। जब लेखक रचनात्मक परियोजना के अंतर्गत अनुभव और अनुभूतियाँ के आधार पर साहित्य का उत्पाद करता है, तो उसका लेखन साहित्य अध्ययन के दायरे से आगे इतिहास और समाज विज्ञान के विश्लेषण की विषय वस्तु बन जाता है। किसी भी समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का आंकलन साहित्यिक संदर्भ से बड़ी आसानी से किया जा सकता है।

औपनिवेशिक भारत में दलितों की सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक स्थिति क्या थी? फुले-आंबेडकर और स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ सरीखे बहुजन चिंतकों के विपुल लेखन में देखा जा सकता है। औपनिवेशिक भारत के दलित विचारक और लेखक स्वराज को बड़ी शंका भरी नज़रों से देख रहे थे। इसके पीछे उनकी दलील थी कि स्वराज का अर्थ चंद उच्च श्रेणी के हिंदुओं का शासन और वर्चस्व क़ायम होना है। दलित चिंतक स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ की पहल से 27 दिसंबर 1927 को प्रयाग में अछूतों की एक विशाल सभा का आयोजन हुआ। इस अछूत सम्मेलन के सभापति के आसन से अछूत नेता मिस्टर जी.ए.गवई ने स्वराज को लेकर अपनी शंका व्यक्त करते हुए कहा कि, ‘प्राचीन हिन्दू-राज्य के अनुभव यही सिद्ध करते हैं कि स्वराज्य मिलने पर हम लोग और भी अधिक गुलाम बना लिए जायेंगे। जब तक हम लोगों के कष्ट दूर नहीं हो जाते, तब तक स्वराज्य हमें और भी दृढ़ता से गुलामी के बन्धनों में बाँध देगा।’

यह बड़ी विचारणीय बात है कि आजादी की सात दशक की यात्रा के दौरान दलित समाज को भयमुक्त वातावरण प्रदान नहीं कर सकें। इस समय स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर भारत का जो नक्शा पेश किया जा रहा है, उसमे दलितों पर हो रहे अत्याचार की स्थिति साफ नहीं है। दलित लेखकों ने अपने अनुभव और अनुभूतियों से आपबीती बताने के सिलसिले में आत्मकथाएं लिखी। आजादी के बाद लिखी गयी दलित आत्मकथाएं, यह तसदीक़ करती हैं कि स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ के आ जाने पर भी जातिवादी गतिविधियों ने दलित को स्वाधीन होने का यहसास नहीं होने दिया है। वास्तव में यह लेख हिन्दी दलित आत्मकथाओं के हवाले से आजादी के बाद दलितों पर क्या गुजर रही है, उसका जायज़ा लेता है।

आज़ादी और जनतन्त्र

 जब आजादी का प्रथम दशक अंगड़ाई ले रहा था, उसी समय उत्तर भारत में ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950-2013), डॉ. तुलसीराम (1949-201), डॉ. धर्मवीर (1950-2017), सूरजपाल चौहान (1955-2021), मोहनदास नैमिशराय (1949) और डॉ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’(1960) जैसे दिग्गज दलित साहित्यकारों का जन्म होता है। यह स्वाधीन भारत की पहली ऐसी पीढ़ी थी जिसने अभाव और गरीबी के समाशास्त्र की पटारियों पर चलते हुए पढ़ने और लिखने के मर्म को समझा। इस संघर्ष पथ पर डॉ. आंबेडकर ऊर्जा का पुंज बने। दलित लेखकों ने अपनी बौद्धिकता का इस्तेमाल कर, बिना किसी झीझक के अपनी अनुभूतियों और अनुभव को हवाले से आत्मवृतांत लिखकर, स्वाधीन भारत की प्रचलित प्रतिमानों से एक अलग तस्वीर प्रस्तुत कर, इतिहासकारों, समाज विज्ञानियों और राजनीतिक बौद्धिकों को झकझोर कर रख दिया।

देखा जाए तो बीसवीं सदी के अंतिम दौर और इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में ‘अपने-अपने पिंजरे’,‘तिरस्कृत’, मेरी पत्नी और भेड़िया, ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ और ‘मुर्दहिया’ जैसी आत्मकथाओं का प्रकाशन हिन्दी लोकवृत में एक बड़ी परिघटना थी। वास्तव में दलित साहित्यकारों की आत्मकथाएं स्वाधीन मुल्क की दर्पण लगती हैं। इस आत्मकथा रूपी दर्पण में स्वाधीन भारत के दलितों खदबदाता हुआ यथार्थ देखा और महसूस किया जा सकता हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि स्वाधीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक राजनीतिक और जातिवादी गतिविधियों का जायज़ा लेने वाले विलक्षण दलित साहित्यकार थे। वह मूल रूप से बरला, मुजफ्फरनगर,उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती

औपनिवेशिक भारत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आर्य समाजियों का गढ़ हुआ करता था। इस इलाक़े में स्वामी दयानन्द सरस्वती का आवागमन भी होता रहा है। आर्य समाजियों की अस्पृश्यता निवावरण परियोजना के बावजूद भी इस इलाक़े में ब्राह्मणवादी के किले में खरोच तक नहीं आई। यह बड़ी हैरान करने वाली बात है कि औपनिवेशिक सत्ता से आजादी मिलने के बाद सवर्ण पृष्ठभूमि वाला समाज ब्राह्मणवादी चेतना से मुक्त नहीं हो सका। उसके चेतन और अवचेतन मन में कुलीनता का विस्तार होता रहा। सन 1997 में ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। यह आत्मकथा बताती है कि आजादी के सात दशक खिसक जाने बाद भी दलितों के सार्वजनिक और सामाजिक जीवन में बहुत ज़्यादा तब्दीलियाँ नहीं आईं। डॉ. आंबेडकर ने जिस दलित समाज को केन्द्र में लाने का स्वप्न देखा था, उसे आजादी के उस तक मूलभूत सुविधाएं तक नहीं पहुंची। यहाँ की कुलीन जातियों का दलितों पर सामाजिक और भौतिक अन्याय जारी है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी आत्मकथा के हावले से रोशनी डाली है कि स्वधीनता के बाद भी दलित सवर्णों का मैला और जूठन उठाने के लिए मजबूर हैं।

सवर्णवादी ताकते आजादी के दौरान से ही वंचित समाज को हाशिये पर ढकेलती आ रही हैं। देखा गया है कि दलित बस्तियाँ गाँव और शहर की परिधि के बाहर किसी दुर्गंध भरे नालों के पास होती हैं। यहाँ ओमप्रकाश वाल्मीक अपने गाँव के सामाजिक परिवेश के बारे में बताते हैं कि जोहड़ी के किनारे दलितों के मकान थे। चारों तरफ इतनी दुर्गंध और बदबू थी कि मिनट भर में सांस घुट जाए। ऐसे माहौल में ओमप्रकाश वाल्मीकि और उनका परिवार रहता था। ओमप्रकाश वाल्मीकि का कहना था कि ऐसे वातावरण में यदि वर्ण-व्यवस्था को आदर्श-व्यवस्था को कहने वालों को दो दिन गुज़रना पढ़ जाए तो निश्चित उनकी राय बदल जाएगी। स्वाधीन भारत में दलितों को पशुओं से भी गया-गुजरा समझा गया। सवर्णों की चौखट पर कुत्ता बिल्ली और गाय, बैल जैसे जानवर तो सम्मान के हक़दार हैं लेकिन दलित नहीं। ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, ‘अस्पृस्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली,गाय-भैंस को छूना बुरा नहीं था,लेकिन यदि चूहड़े का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर इनसानी दर्जा नहीं थी।’

ओमप्रकाश वाल्मीकि

ओमप्रकाश वाल्मीकि

 शिक्षक राष्ट्र निर्माण की धुरी माने जाते हैं। उनके बारे में आम जनमानस की राय है कि वह राग और द्वेष से परे होते हैं। सोचने वाली बात यह कि सवर्ण शिक्षकों का रवैया दलितों के प्रति जातिवादी पूर्वग्रह से भरा रहा है। जूठन आत्मकथा में सवर्ण अध्यापकों का जो चरित्र उभर कर सामने आया है, वह सर्वसमावेशी मूल्यों तो बिलकुल नहीं है। इस में कोई दो राय नहीं है कि स्वाधीन भारत में शैक्षिक संस्थाओं पर उच्च श्रेणी के हिन्दुओं का बोलबाला रहा है। बड़ी दिलचस्प बात यह कि जिन अध्यापकों को जाति विनाश के खिलाफ मुहिम चलनी थी, वही जातिवाद का परचम लहराते दिखे। तथाकथित सवर्ण अध्यापक श्रेष्ठता बोध के दंभ में दलित छात्रों के सामने ही चूहड़ा-चमार जैसे शब्दों का प्रयोग कर देते हैं। इस तरह की जातिवादी टिप्पणियों का दलित छात्रों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी आत्मकथा एक शिक्षक की भाषा बारे में लिखते हैं कि‘अबे,साले,चूहड़े की औलाद,जब मर जाएगा बता देना।’ वह फिर से एक सवर्ण शिक्षक के आचरण के संबंध में बताते हैं कि मास्टर हम लोगों को देखकर लगातार गालिया बक रहा था। ऐसी गालियाँ जिन्हें यदि शब्द बद्ध करूँ तो हिन्दी कि अभिजात्यता पर धब्बा लग जाएगा। शिक्षकों के इस जातिवादी व्यवहार का नतीजा यह हुआ कि सभी विषयों में अच्छे अंक लाने के बाद उनके विज्ञान शिक्षक ने उन्हें प्रैक्टिकल में फेल कर दिया था। इस जातिवादी व्यवहार के चलते ओमप्रकाश वाल्मीकि इंटर की परीक्षा में फेल हो गए थे। ऐसे शिक्षकों के चलते न जाने कितने छात्र आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं।

श्यौराज सिंह ‘बेचैन’

श्यौराज सिंह ‘बेचैन’

 प्रसिद्ध दलित लेखक श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ के लेखन में स्वाधीन भारत की दृश्यवलिया विचलित और हैरान कर देती हैं। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ की आत्मकथा ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ स्वाधीन भारत में दलितों की उपेक्षा और दुश्वारीयों को सिल-सिलेवार रखती है। आजादी का पहला दशक सामाजिक,राजनीतिक, शैक्षिक सहित तमाम क्षेत्र में बदलाव का था।श्यौराज सिंह बेचैन अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि इस बदलाव की रोशीन दलित समाज तक नहीं पहुँची। जैसे, आजादी के पहले दलित सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक परिसर से दूर थे, कमोबेश आजादी मिलने पर वही सिलसिला जारी रहा। श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा इस बात की तसदीक करती है कि 75 साल की आज़ादी के दौरान दलितों के हिस्से में अपमान और गरीबी के सिवा कुछ और नहीं आया। देश को आजादी मिलने पर दलितों के बीच इस आशा का संचार हुआ था कि लोकतन्त्र वाली व्यवस्था उन्हें हाशिये से उठाकर केंद्र में लाया जाएगा। स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर दलित केंद्र के बजाय हाशिये पर खड़े दिखायी दे रहे हैं। श्यौराज सिंह बेचैन अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि ब्राह्मणवादियों ने लोकतन्त्र की धज्जियां उड़ते हुए सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और आर्थिक संस्थानों में दलितों की भागीदारी के बजाए बाहर का रास्ता दिखा दिया।

 औपनिवेशिक भारत में भी दलित गुलामी की चक्की में पीसा जा रहा था और आज़ादी के बाद भी अभाव, गरीबी और जातिगत प्रताड़ना की मर झेल रहा है। आजादी के बाद भी उन्हें गरीबी और आभाव से मुक्त नहीं किया गया। श्यौराज सिंह बेचैन की स्थिति आजाद मुल्क में एक बल श्रमिक और मरे जानवरों की खाल उतरने वाली थी। उनके परिवार पर गरीबी और भुखमरी का साम्राज्य छाया हुआ था। भुखमरी की पराकष्ठा ऐसी की ढड़ायन नाम का एक जहरीला अनाज तक खाना पढ़ा। श्यौराज सिंह बेचैन अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि आज़ादी के आलोक में भी दलितों का जीवन भयंकर अभाव और गरीबी के बीच झूल रहा है। अभाव और गरीबी वंचित वर्ग की स्थायी विरासत है।

श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ लिखते हैं कि,‘यूं तो हम गुलाम थे, जबकि देश उन्नीस सौ सैंतालीस में ही आजाद हो गया था।’ लेखक का यह वक्तव्य जहां दलित उत्पीड़न और सामाजिक अत्याचार की अंतहीन दास्तान की ओर इशारा करता है, वहीं आज़ादी के बाद दलितों की हौलनाक स्थिति पर भी रोशनी डालता है। श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ का दावा है कि आज़ादी के बाद ऐसी योजनाएँ नहीं बनी, जिससे दलित के सार्वजनिक जीवन में तब्दीली आती। लेखक सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र के बौद्धिकों से सवाल करते हैं कि, ‘ऐसी योजनाओं पर काम नहीं किया। क्यों नहीं गया आजाद देश की किसी योजना का ध्यान हमारी ओर। मैं कोई अकेला नहीं, हजारों-लाखों में से एक हूँ। मैं उन्हीं में से हूँ जो आज भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उनकी अस्मिता के लिए आजादी भी कितनी कम और कितनी सीमित है कि हमारी मेहनत का फल हमें नहीं दिला सकती। सामाजिक गुलामी की कारा में पड़े हमारे लिए स्वयं को आजाद कहना क्या बेमानी नहीं है? क्या दलितों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक बदतरी तुलनात्मक विकास की दृष्टि से बढ़ती नहीं जा रही?’यह एक दलित के ऐसे मारक सवाल हैं जिनके जवाब स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ पर सवर्ण बौद्धिकों को तलाशने होंगे।

दलित आत्मकथाओं में आजादी

मोहनदास नैमिशराय

 वरिष्ठ लेखक मोहनदास नैमिशराय अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘रंग कितने संग मेरे’ (2019) शीर्षक से लिखा है। इस आत्मकथा में यह सवाल उभर कर आया कि उच्च शिक्षित और पढ़े लिखें सवर्ण जाति के जामे से अपने आप को मुक्त नहीं कर पाए हैं। एक लेखक और दलित के तौर नैमिशराय जैसे बुद्धिजीवी को दलित होने का अहसास सवर्ण सम्पादकों और बुद्धिजीवियो की ओर से करवाया गया। विद्यानिवास मिश्र हिन्दी के बड़े लेखक और सम्पादक के तौर पर जाने जाते हैं। हिन्दी साहित्य में उनकी बड़ी प्रतिष्ठता रही है। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि विद्यानिवास मिश्र अपनी उच्च श्रेणी वाली मानसिकता से मुक्त नहीं थे। मोहनदास नैमिशराय बताते है कि जब वे ‘नवभारत टाइम्स’ के लिये पत्रकारिता करते थे तो उनका जातिवादी चरित्र बड़ी करीब से देखा था।

मोहनदास नैमिशराय एक अनुबंध के तहत उन्हें गया शहर के ब्राह्मणों और पंडो पर एक फीचर लेख तैयार करना था। जब वह बोधगया से लौटे तो पता चला कि ‘नवभारत टाइम्स’ का सम्पादक विद्यानिवास मिश्र को बना दिया गया है। जब उन्होंने बोधगया के पुरोहितों और पंडों पर लिखा फीचर लेख सम्पादक विद्यानिवास मिश्र को दिखाया तो उनका पर चढ़ गया। मोहनदास नैमिशराय ने इस फीचर लेख में पुरोहितों और पंडों के पाखण्ड को उजागर किया था। विद्यानिवास मिश्र जैसे सम्पादक पुरोहितों और पंडों की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सके थे। दरअसल, इस सोच के तथाकथित ब्राह्मणवादी सम्पादक किसी भी संस्था को लोकत्रंतिक बनने में बड़ी बाधा होते हैं। ऐसे ही सम्पादकों की जाति मानसिकता के चलते दलित उत्पीड़न की खबरें समाचार पत्रों से दरकिनार कर दी जाती हैं। मोहनदास नैमिशराय का दावा है कि अमीर और गरीब दोनों प्रकार के उच्च श्रेणी के हिन्दू, दलित चेतना के सूरज पर ग्रहण बन जाते हैं।

दलित आत्मकथाओं में आजादी

सूरजपाल चौहान

सूरजपाल चौहान स्वाधीन भारत में दलित जीवन के यथार्थ को उकेरने वाले एक नायाब लेखक थे। सूरजपाल चौहान की आत्मकथा ‘तिरस्कृत’ दावा करती है कि आजादी की रोशनी दलितों के दरवाजे तक नहीं पहुँची है। स्वाधीन भारत में दलितों के पास जमापूंजी के नाम पर सवर्णों की बर्बरता और गुलामी के सिवा और क्या है? ब्राह्मणवादी बर्बरता के बीहड़ों इलाक़ों से परचित करती उनकी आत्मकथा का तर्क है कि आजादी के बाद भी दलित समाज का मैला और जूठन जैसी घृणित प्रथा से पीछा नहीं छूट सका है। इससे बड़ी दारुण स्थिति क्या होगी कि स्वाधीन भारत में सवर्णों का मल-मूत्र दलितों को अपने सिर पर तक ढोना पड़ रहा है। सूरजपाल चौहान का परिवार आजादी के बाद भी सवर्णों का मल-मूत्र ढोने के लिए अभिशप्त था। यह तक उनकी माँ भी मैला उठाने का काम करती थीं। इस काम के बदले उन्हें जातिगत अपमान और जूठन मिलती थी। यह सिर्फ सूरजपाल चौहान की आपबीती नहीं थी बल्कि स्वाधीन भारत के लगभग हर दलित की कहानी है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि अब भी दलितों को बदबू भरे नालों और सीवरों को साफ करना पड़ रहा है। जो आजाद भारत के माथे पर कलंक का टीका जैसा है।

वास्तव में दलित आत्मकथाओं के अनुष्ठान से आजाद भारत की सच्ची तस्वीर निकल हमारे सामने आती है। ब्राह्मणवाद की शोषणकारी संरचना के चलते दलितों के सामाजिक,राजनैतिक और शैक्षिक दायरे का विस्तार नहीं हो सका। इस ब्राह्मणवाद ने न सिर्फ दलितों की अस्मिता को कुचला बल्कि आजादी और लोकतन्त्र के लिए आहुति देने वाले, उन तमाम रहनुमाओं और सुधारकों के स्वप्न को चकना चूर किया जो जाति और शोषण मुक्त भारत की परिकल्पना करते थे। दलित आत्मकथाएं इस बात की गवाह है कि आजादी के बाद ब्राह्मणवाद कमजोर होने के बजाए और मजबूत दिख रहा है। आज भी आजाद मुल्क में दलितों को बराती घोड़ी पर चढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। तथाकथित उच्च श्रेणी के हिन्दू दलित द्वारा मूछें रखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाते! आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर दलितों को यह मनुकाल की याद दिलाना नहीं तो और क्या? दलित लेखकों का तर्क है कि ग़रीबी और अभाव से पर पाया जा सकता है लेकिन जाति से छुटकारा पाना बेहद मुश्किल है। आज ‘जाति’ एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण घटक है। जब तक यह पता नहीं होता कि आप दलित हैं तो सब कुछ ठीक रहता है, जाति मालूम होते ही सब कुछ बदल जाता है। दलित आत्मकथाओं से निकला स्वर तो यही कहता कि दलितों को आजादी के बाद जाति के नाम पर जो अपमान और घाव मिले हैं, शायद उन्हें भरने के लिए युग भी कम पड़ जाएगा

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