रामपुर की रामकहानी

ये जीभ मानती नहीं इसको मैं क्या करूँ?

रामपुर की रामकहानी-17

       सुखदेव काका को नहारी ( नाश्ता) पहुँचाने का काम मेरा था। स्कूल जाने से पहले मुझे नहारी लेकर खेत में जाना पड़ता था। माँ उनके लिए उबला हुआ चना या अरहर या मसूर या चावल का भूजा थमा देती थी। कभी-कभी हरे मिर्च व लहसुन की चटनी के साथ एक मोटी रोटी भी। यह रोटी वह चौकी-बेलन पर नहीं, हथेलियों के सहारे बनाती और तवे पर एक दो बार पलटने के बाद चूल्हे के मुहाने पर लकड़ियों के आँच के सहारे धीरे-धीरे सेंकती। गोल-मटोल रोटी फूलकर जब तैयार होती तो उसकी सोंधी गंध मुझे पागल कर देती। माँ मेरे लिए भी उसके आधे आकार की एक रोटी उसी पैटर्न पर पकाती और मैं उसे खाने के बाद ही नहारी पहुँचाने जाता।

       आज भी बच्चे जब पिज्जा या इस तरह का कुछ घर में मँगाते हैं तो मैं अपने लिए अपने हाथ से ही एक मोटी रोटी बना लेता हूँ और उसे धनिया के पत्ते, लहसुन व हरे मिर्च की चटनी के साथ खाता हूँ। मुझे पिज्जा की तुलना में यह ज्यादा स्वादिष्ट लगता है, यद्यपि सेँकने के लिए अब न मिट्टी का चूल्हा उपलब्ध है और न लकड़ी की आग की धीमी आँच। मेरे इस व्यंजन का स्वाद मेरी पोतियों को भी भाने लगा है और वे भी समय-समय पर ‘रोटंग’ (मेरा दिया हुआ नाम) की फरियाद करती रहती हैं। सच है, स्वाद का भी संस्कार बचपन में ही पड़ जाता है। पिज्जा और बर्गर का पदार्पण हमारे देश में वैश्वीकरण के बाद हुआ। नई पीढ़ी भले इनपर लट्टू हो, हमारे जैसे बूढ़ों को इनका स्वाद लुभा न सका।

       चूल्हे वाली रोटी की आँशिक क्षतिपूर्ति तो ‘रोटंग’ से हो जाती है किन्तु तरह-तरह के उन अनेक स्वादों का क्या करूँ जिनकी अब सिर्फ यादें बचीं हैं और जो रह-रह कर मन मसोसने के लिए आती रहती हैं। अब तो गाँव में भी वही सब मिलता है जो शहर में। हाँ शहर में आसानी से मिल जाता है और गाँव में उसके लिए भी बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं।

 सुखदेव काका जाति के चमार थे और गाँव के दक्खिन टोले पर उनका छोटा सा मिट्टी की दीवालों वाला छप्पर का घर था। काकी जितनी लम्बी, छरहरी और गँठीली थीं सुखदेव काका उतने ही नाटे कद के और गोल मटोल थे। किन्तु मेहनती बहुत थे। सुखदेव काका ने पूरे बीस साल तक हमारी हलवाही की थी। उन्हें मैने कभी बीमार पड़ते नहीं देखा।

बाऊजी कभी कोई नगदी फसल नहीं बोते थे–गन्ना (ईंख) को छोड़कर और अधिकतम दो लढ़िया (बैलगाड़ी) गन्ना ही मिल पर भेजते थे। बाकी गन्ना कोल्हुआड़ में आ जाता था और उसकी भेली बनती थी। बड़ी सी हाँड़ी में बाऊजी एक हाँड़ी राब भी ढलवाते थे, जो गर्मी भर रस बनाकर पीने और रोटी से खाने के काम आता था। राब के रस में अमूमन दही फेटकर मिलाया जाता और हर व्यक्ति भरपेट रस पीता। किसी मेहमान के आने पर भी रस पिलाने में किसी तरह का संकोच नहीं होता। दही की अनुपलब्धता पर कागजी नीबू का रस उममें निचोड़ दिया जाता। कागजी नीबू के पेड़ अमूमन हमारे दरवाजे पर लगे रहते और भरपूर फल देते। कुछ माह बीतने के बाद राब में दाने पड़ जाते और उन्हें काटकर खाने में खास मजा आता।

कोल्हुआड़ में जब भेली पकती तो पूरा वातावरण मिठास से भर जाता। भेली पकाने के लिए बड़ा सा चूल्हा बनाया जाता। उसके ऊपर बड़ा सा कड़ाहा होता। कड़ाहे में गन्ने का रस भरा जाता जिसे कोल्हू में गन्ने को पेरकर निकाला जाता। गन्ना पेरने के लिए कोल्हू में बैल चलते। बैलों के पीछे-पीछे चलकर उन्हें हाँकना पड़ता। चार-चार पाँच-पाँच घंटों तक बैलों को निरंतर हाँकते हुए उनके पीछे चलते रहना सामान्य बात थी। कोल्हुआड़ तो रातभर चलता रहता। कड़ाहे में पकने वाली भेली की गंध फिज़ा में ऐसे सनी होती कि हम कहीं भी होते, समय पर कोल्हुआड़ की ओर खिंचे चले आते।

दरअसल कड़ाहे में पकती भेली जब तैयार होने को होती, उसके कुछ मिनट पहले ही ‘महिया’ तैयार हो जाती। महिया तैयार होने की सूचना मिलते ही दूर-दूर से बच्चे धमाचौकड़ी मचाते हुए कड़ाहा के किनारे घेर कर इकट्ठे हो जाते। भभूती फूफा भेली बनाने में उस्ताद थे। वे गाँव भर के बच्चों के फूफा थे। जनका बुआ से उनकी शादी हुई थी और वे ससुराल में ही रहते थे। हर कोई उनसे मजाक करता था। करिया भुजट्ट भभूती फूफा को एक बार नंगे बदन बँसवारी की ओर से आते देखकर मैंने भूत समझ लिया था और चिल्लाकर भागा था।

महिया तैयार होने के समय बच्चों की भीड़ लग जाती। महिया के स्वाद में आकर्षण ही कुछ ऐसा होता था कि बच्चे क्या, जवान भी खिंचे चले आते थे। लोग डाँटते रहते कि कहीं कोई बच्चा कड़ाह में गिर न जाए। इसके बावजूद कभी-कभी इस तरह की घटनाएं हो ही जातीं। जगन्नाथ भैया के शरीर का दायाँ हिस्सा ऐसे ही उबलते हुए कड़ाहा में गिर जाने से जल गया था और चेहरे पर उसका दाग आजीवन बना रहा।

 महिया खाने के लिए हम बाँस के निचले हिस्से से सूखकर गिरने के लिए तैयार कोपल का इस्तेमाल करते थे। बच्चे हाथों में कोपल लिए एक साथ कड़ाहा के सामने खड़े हो जाते। भेली तैयार होने के ठीक दस-बारह मिनट पहले महिया तैयार होती और उसकी अवधि सिर्फ तीन-चार मिनट होती। कड़ाहा में किनारे-किनारे सुनहले रंग के झाग के रूप में महिया ऊपरी परत पर फैल जाती। भभूती फूफा छन्नी से छानकर महिया हमारे कोपलों पर थोड़ा-थोड़ा गिरा देते। महिया खाने के लिए हम गन्ने के ऊपरी पतले और मुलायम हिस्से को दाँत से कूँचकर कूँची बनाते और उससे मजे ले लेकर खाते।

 महिया खाए कई दशक हो गए। स्वाद जीभ पर अटका रह गया है। महिया का स्वाद लेने के साथ-साथ हम कड़ाहा में पके आलू और सेम की फलियों का भी स्वाद प्राय: लेते रहते। असल में हम आलू अथवा सेम को धागे में पिरोकर और उसका माला जैसा बनाकर आधे घंटे पहले खदकते हुए कड़ाहा में डाल देते और महिया के तैयार होने के साथ वह भी पककर तैयार हो जाता जिसमें भेली की मिठास और उसका सोंधापन पूरे आलू और सेम की फलियों में भिन जाता। उसके स्वाद के क्या कहने ?

थोड़ी देर बाद भेली भी तैयार हो जाती थी। भेली बाँधने के लिए आस-पास से लोग आ ही जाते। भेली बाँधना एक–दो आदमियों के बस की बात नहीं। विलंब होने पर जब उसके भीतर की ऊष्मा कम हो जाती तो भेली बँधने की जगह छितराने लगती। लोग दूसरे काम छोड़कर भेली बाँधने में लग जाते। पूरे कड़ाहे का भेली बाँधने में अधिकतम बीस मिनट का समय लगता। बाँधने वालों को गरमा-गरम एक-एक भेली सोगहग मिलता और आस-पास के लोगों के हाथों पर प्रसाद की तरह। लोग मजे लेकर खाते। हम बच्चे तो महिया का स्वाद लेकर ही तृप्त हो जाते, भेली की ओर देखते भी नहीं।

मेरे घर में मिट्टी की एक धुनकी थी भेली रखने के लिए। माँ ने अपने हाथ से उसे बनाया था। ज्यादा छोटी और गोलाकार होने पर उसे धुनकी कहा जाता था और आकार में बड़ी और चौकोर होने पर डेहरी। उसके ऊपर उसी आकार का मिट्टी का ढक्कन भी बनाया जाता था। डेहरी की मिट्टी की पहचान आसान नहीं होती थी। पारखी महिलाएं ही उसकी पहचान कर पाती थीं। उपयुक्त मिट्टी के लिए काफी मसक्कत करनी पड़ती थी। अमूमन गड्ढा खोदकर नीचे से चिकटी मिटटी निकालनी पड़ती थी। उचित मात्रा मे पुरकेसा मिलाकर उसे साना जाता था। अन्त में उस मिट्टी से रोज-रोज डेहरी का एक–एक हिस्सा बनाया जाता था। एक डेहरी तैयार होने में पन्द्रह से तीस दिन तक लग जाता था। डेहरी मुख्य रूप से अनाज रखने के काम आती थी, किन्तु बाऊजी भेली को भी धुनकी में ही रखवाते थे और वह साल भर तक खराब नहीं होती थी। हाँ, नया साल आते-आते उसका रंग जरूर काला पड़ जाता था।

 कोल्हुआड़ में गन्ने का ताजा रस सबके लिए सहज सुलभ था। इसे हम कचरस कहते थे। किसी के भी वहाँ पहुँचने पर उनसे कचरस पीने की ख्वाहिश जरूर पूछी जाती थी और उनकी तनिक भी इच्छा होने पर भरपेट कचरस पीने को दिया जाता था। कचरस का मजा तब आता था जब मटर की उबली हुई छिमी और नमक मिर्च की चटनी भी साथ में हो। कभी-कभी हम गन्नों के भीतर पुदीने की पत्तियाँ डालकर कोल्हू में पेरने के लिए लगा देते। पुदीने का पूरा रस निचुड़कर कचरस में मिल जाता और कचरस के स्वाद और सुगन्ध में चार चांद लग जाता। सयाने लोग गिलास में नहीं, लोटे में कचरस पीते। अब तो गाँवो मे भी लोटा कम दिखने लगा है। हम ज्यादा सभ्य जो होते जा रहे हैं।

कोल्हू अमूमन मेरे बगइचा के एक छोर पर ‘इद्दी आला पेड़’ के नीचे गाड़ा जाता। बगइचा में ज्यादातर बीजू आम के बड़े-बड़े पेड़ थे, किन्तु फल अमूमन छोटे-छोटे लगते थे, अलग-अलग रूप, रंग और गुण के। कोई बहुत मीठा होता तो कोई खट्टा, किसी की गुठली पतली होती तो किसी का बोकला, किसी में रेसा अधिक होता तो किसी में गूदा, किसी की गंध लहसुन की तरह होती तो किसी की टटके गुड़ की तरह। सबके आकार भी अलग–अलग होते। कोई समय से पहले पक जाता तो कोई बाद में। कितना वैविध्य था उनमें। उसी के अनुरूप हमने उनका नामकरण भी कर रखा था। मिठउआ, खटउवा, गुरहवा, लिटिअहवा, कोनहवा, लहसुनहवा, सेनुरिअहवा, बुदबुदिअहवा, मल्दहवा, छिहुलवा, किरहवा, गुठलिहवा आदि। नदुआ, रेहाव और बागापार जाने वाले पैदल यात्री अमूमन हमारे बाग के बीच से होकर गुजरते थे। हम बच्चे बाल्टी में पानी भरकर उसमें पका आम डाल देते थे और जो भी यात्री आते-जाते उन्हें बाँह पकड़कर खटिया पर बैठाते और आग्रह पूर्वक बैठाकर भरपेट आम खिलाते।

उन दिनों प्रतिष्ठित घरों के लोग आम नहीं बेचते। ज्यादा होने पर गाँव के लोगों में बाँट देते। हम लोग तो आम के दिनों में भोजन कम करते और आम खाकर ही पेट भर लेते। मुझे आम का गाद (गूदा) और भूजा मिलाकर खाना बहुत अच्छा लगता और खूब खाता। देशी आम नुकसान तो करता नहीं, हाँ, जुलाई आते-आते हमारा शरीर जरूर निखर आता। वैविध्य में कितना सौन्दर्य होता है इसका अनुमान हम आमों की विविधता देखकर ही कर सकते हैं। अब बाजार में लंगड़ा, दशहरी, चौसा, सफेदा आदि तीन-चार किस्म के आम ही दिखायी देते हैं और उनमें भी अधिकाँश बाहर से आते हैं।

मटर की फलियाँ उबाल कर तो खायी ही जातीं, हम खेतों में उसका होरहा भी लगाते और एक साथ कई लोग मिल-बैठकर गरम-गरम सोंधी भुनी हुई मटर की फलियाँ खाते। एक बार नदी के किनारे होसिला भैंस चरा रहे थे। शाम हो रही थी और लौटने की बेला थी। मैं भी मन्ठें के खेत से नदी पार करके निकल रहा था कि होसिला पर नजर पड़ी। बगल के खेत में होरहा लायक मटर हुआ था। उन्होंने अपने पॉकेट में रखे माचिस की ओर संकेत किया। मैंने पूछा, “केकर हS”

“गबड़ुआ वालन कS” उन्होंने कहकर आश्वस्त किया।

दरअसल गबड़ुआ गाँव काफी दूर था और यहाँ उनके खेत में हमारा होरहा लगाना निरापद था। मैंने पास के गन्ने के खेत से गन्ने की सूखी पत्तियाँ बटोर लायीं। पत्तियों के ऊपर मटर की बेलें रखी गईं और आग लगा दी गई। हवा के झोंके से आग की लपटें खेत में लगी मटर की फसल तक पहुँच गईं। पास में नदी तो थी किन्तु पानी लाने के लिए कोई बर्तन नहीं था। हम आग कैसे बुझाते ? होसिला के पास भैंस चराने वाला डंडा था जिससे वे आग को पीटने लगे किन्तु उसका प्रभावी असर नही पड़ रहा था। आग फैलने लगी थी। होसिला ने भैंस की पीठ पर दो-तीन डंडा जोर से जमाया और मुझसे कहा, “भागS”

 डंडे की चोट खाकर डेकरती हुई भैंस भागने लगी और होसिला उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। मैं भी जल्दी-जल्दी नदी पार करके अपने खेत में चला गया और वहाँ से अपनी करनी का फल देखने लगा। देखते-देखते मेरे सामने खेत की आधी फसल जल गयी। मैं दूसरे रास्ते मन मारे घर लौट आया था। किन्तु होरहा खाने की आदत तभी छूटी जब गाँव छूटा। चने के पौधों का भी होरहा लगाया जाता था और वह भी उतना ही स्वादिष्ट होता था। साथ में सोआ-धनिया की चटनी हो तो फिर क्या कहने ?

होरहा खाए लगभग तीन दशक हो चुके हैं। अब तो मटर और चने की फसलें हमारे गाँव में बोई ही नहीं जातीं। कहते हैं जमीन अब उस लायक नहीं रही। मटर और चने में अब फलियाँ ही नहीं लगतीं। ऐसा क्यों हुआ ? हाँ, सोआ-धनिया की चटनी मैं आज भी बनवाता हूँ किन्तु खाते समय उसका बचपन वाला स्वाद नहीं मिलता। इस बार परभंस ने खेत से काटकर ताजा सोआ-पालक भेजा था। मुझे इसका साग बहुत पसंद है, किन्तु तनिक भी अच्छा नहीं लगा। मैंने उनसे शिकायत की तो उन्होंने बताया,

 “चाचा! सोआ-पालक होखे चाहे चौंराई, बिना कीटनाशक डरले कुच्छू ना होला। कई-कई बेर यूरिया आ कीटनाशक डारेके पड़ेला। एही से साग बेस्वाद हो जाला।”

यही कारण है कि आजकल अमीर लोग अपने लिए आर्गनिक खेती कराने लगे हैं।

चकबंदी से पहले यानी, नवें दशक के पूर्व हमारे खेत विखरे हुए थे। हमारे कुछ खेत रेहाव नदी के उस पार तट पर ही थे। इन्हें हम मन्ठें का खेत कहकर पुकारते थे। बरसात के दिनों में जब नदी उफनती थी तो उस खेत की फसलें भी पानी में डूब जातीं। इसीलिए इन खेतों में बाऊजी अगहनी धान बोते, खास तौर पर कनकजीर या कालानमक। इनपर पर बाढ़ का असर कम पड़ता। ये फसलें हफ्तों डूबे रहने के बावजूद गल कर खराब नहीं होती। लेकिन बाढ़ आने का एक फायदा भी होता था। बाढ़ का पानी अपने साथ दूर-दूर से उर्वरा शक्ति से भरी हुई मिट्टी अपने साथ बहाकर ले आता और पूरा एक परत हमारे खेतों में छोड़ जाता। इसे बाऊजी ‘पाँक’ कहते थे। जाहिर है ‘पंक’ से ही ‘पाँक‘ बना होगा। उस पाँक में इतनी उर्वरा शक्ति होती थी कि इन खेतों में कभी किसी तरह की खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ती थी। रबी की हर फसल बहुत अच्छी होती थी। सिर्फ सिंचाई करनी पड़ती थी और सिंचाई का एकमात्र आधार था नदी का जल और साधन होती थी बेड़ी। बाँस की खाँचीनुमा बनी होती थी बेड़ी, जिसमें चार डोरियाँ लगी होती थीं और जिन्हें पकड़कर दो आदमी, दोनो हाथों से नदी का जल खेतों में उलीचते थे। इस काम में मैं बाऊजी का हाथ बँटाता था। हम प्रात:काल बेंड़ी लेकर खेत में पहुँच जाते और दिनभर पानी उलीचते रहते। इस तरह दो दिन में पूरे खेत की सिंचाई हो जाती।

दोपहर में हमारा भोजन होता लिट्टी चोखा। हम घर से आटा, आलू, बैगन तथा आवश्यकतानुसार नमक हरी मिर्च आदि साथ ले जाते। वहाँ गाय व भैंसे चरती रहतीं जिनका गोइंठा (सूखा गोबर) भरपूर मात्रा में और आसानी से मिल जाता। हम बड़ा सा अहरा लगाते और आटे को नदी के जल से सानकर लिट्टी बनाते। गोंइठा की आग में पकने वाला आलू-बैगन का चोखा और लिट्टी जब हम केले के पत्ते पर रखकर खाते और नदी की धारा से अंजुरी में भर-भर कर उसका जल पी लेते तो हमारी सारी थकान हवा हो जाती। उन दिनों नदी का जल बिलकुल साफ होता था और लगातार बहता रहता था। अब हमारी वह प्यारी रेहाव नदी गन्दा नाला बन चुकी है और गर्मियों में सूख जाती है।

जब हम घर पर होते और बरसात का मौसम होता तो बाऊजी खुद पहल करके कचूर के पत्ते की लिट्टी लगवाते और अहरा का दाल बनवाते। कचूर एक तरह का पौधा होता है जिसकी पत्तियाँ हल्दी की पत्तियों तरह की होती हैं किन्तु उसकी गंध निराली होती है। हम लोग कचूर की एक बड़ी पत्ती पर मोटी रोटी बनाते और उसके ऊपर से भी कचूर की एक पत्ती रख देते। सके बाद उसे अहरा की आग में धीरे-धीरे पकाते। रोटी का आकार भी पत्तियों का होता। पकने के साथ रोटी के ऊपर की पत्तियाँ लगभग जल जातीं किन्तु पत्तियों की गंध रोटी में समाकर ऐसी सुगंध बिखेरतीं की उसका बयान करना संभव नहीं है। हम अहरा पर ही अरहर की दाल भी बनाते, कभी-कभी मिट्टी के बर्तन में। धीमी-धीमी आँच में पकने वाली दाल अब भी कल्पना में बसी हुई हैं। अब तो गाँव में अहरा के लिए गोइंठा ही बड़ी मुश्किल से मिलता है।

कोलकाता के अपोलो हास्पीटल में एक दिन डॉक्टर से मिलने गया। डॉक्टर की लिखी दवांएं लेने डिस्पेंसरी पर गया तो देखा सामने कुछ आम स्वास्थ्यवर्धक चीजें सजाकर रखी गई हैं। मैने उसमें देखा कि तीसी (अलसी) के बीज का भी एक सुन्दर पैक किया हुआ डब्बा रखा था। उसमें शायद एक सौ ग्राम तीसी थी जिसका मूल्य था साठ रूपए। मैंने उसे खरीद लिया, लगा कि इसे कुछ खास तरह से तैयार किया गया होगा जिससे और भी स्वादिष्ट हो सके। किन्तु घर आने के बाद जब डिब्बा खोला तो उसमें अपने स्वाभाविक रूप में तीसी रखी हुई थी। हाँ, उसके लाभ जरूर कलात्मक ढंग से बताए गए थे। मुझे अपने बचपन का स्वाद याद आ गया। हमारे घर में भुना हुआ महुआ और भुनी हुई तीसी को मिलाकर और उसे ढेंकी में कूटकर लट्टा बनाया जाता था और हम खूब मन से उसे गरमा गरम खाते।

बाऊजी मकई, बजड़ा, साँवाँ, टाँगुन, मड़ुआ, कोदो सब बोते थे। दस्त होने पर मड़ुआ की रोटी खिला दी जाती थी और रामबाण समझ लिया जाता था। बजड़े का लावा मुझे खास पसंद था। कोदो का भात और भूजा दोनो होता था। कभी-कभी कोदो मताने वाला भी होता था। खाने के बाद सिर घूमने लगता था।

भादो के महीने में दही खाने को वर्जित किया गया है, बाऊजी एक कहावत कहते थे,

“चैत के गुर बैसाख के तेल, जेठ के पंथ असाढ़ के बेल।

सावन सैंया साग न खइहौ, भादो दही के लग जनि जैहो।

क्वार मास चिउरा परिहरा, कातिक फरा अलग करि धरा

तेरह दिन जब अगहन जाय, जो जो भावे सो सो खाय।”

किन्तु, हम इस कहावत के ठीक उल्टा करते थे। भादो के महीने में सरया और पाउस धान तैयार हो जाता था। गरीबों के लिए ये दोनो किस्म के धान बड़े ही उपयोगी होते थे, क्योंकि भादो तक आते-आते बहुतेरे घरों में अनाज खत्म हो जाता था। ऐसे मैं जल्दी पकने वाली किस्म होने के कारण सरया धान का तात्कालिक महत्व बहुत अधिक था। लोग सरया के बल पर भादो का महीना काट लेते थे। तब गाँव में चिउड़ा-मिलें नहीं थीं। चिउड़ा भी घर में ही ढेंकी से कूटा जाता था। हाँ, ढेकी का मूसर थोड़ा भिन्न होता था। चिउड़ा कूटने से पहले धान को पानी में भिगोकर फिर उसे भूना जाता था और इसीलिए घर में बने नए सरया धान के चिउड़े का स्वाद कुछ अलग ही होता था।

इसी तरह भादो में चारो तरफ हरियाली होने के कारण पशुओं को अच्छा चारा मिल जाता था। वैसे भी पहले लोग गाय–भैंस को नदियों के किनारे तथा परती पड़े खेतों में चराया करते थे। दुधारू पशुओं को नाद पर कम खिलाया जाता था। भरपूर चरागाह उपलब्ध थे। अच्छा और ताजा चारा मिलने से गाय-भैंस भी काफी स्वस्थ हो जाती थीं और उनका दूध भी अधिक स्वादिष्ट हो जाता था। हमें दूध भी पसंद था और दही भी। नये सरया धान का चिउड़ा सजाव दही के साथ खाने का अलग ही आनंद था। वह स्वाद अब दुबारा नसीब नहीं होगा क्योंकि दही जमाने का न तो वह साधन उपलब्ध है और न वह रुचि ही है। आजकल जिनके घर दुधारू भैंस बची हैं, उन लोगों ने दही जमाने के लिये स्टील या आल्मोनियम की कहँतरी खरीद रखा है। पहले मिट्टी की कहँतरी होती थी। लोग प्राण की तरह उसे सम्हाल कर रखते थे। कई-कई बरस वह चलती थी। उसमें जमाए गए दही में मिट्टी का सोंधापन आ जाता था। दही खा लेने के बाद भी सितुही (सीपी) से कहँतरी की खखोरी खखोर कर खाने में मैं आगे रहता था।

दही जमाने के लिए भी खास तैयारी की जाती थी। उसकी पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता था। शाम को ही कहँतरी में दूध डालकर बोरसी पर रख दिया जाता था। खूब धीमी आँच में तीन-चार घंटे तक तपने के बाद दूध का पानी धीरे-धीरे कम हो जाता था और दूध गाढ़े लाल रंग का हो जाता था। बिलकुल सटीक समय पर और उचित मात्रा में जोरन डाला जाता था। जोरन की गुणवत्ता की परख भी भली-भाँति कर ली जाती थी। जोरन ज्यादा होने पर दही खट्टा हो सकता था और कम होने पर जमने में समस्या। जोरन डालने की निपुणता पर दही का स्वाद निर्भर करता था। सुबह जब दही जमकर तैयार हो जाता था तो उसका ऊपरी परत लाल रंग की मोटी साढ़ी से भर जाता था। यह सजाव दही था। किनारे से काट-काट कर लोगों को खाने के लिए दिया जाता था। मैं साढ़ी के सोंधेपन पर जान छिड़कता था। यह दही इतना मीठा होता कि इसको खाने वालों को भेली या चीनी की जरूरत नहीं पड़ती। नए सरया धान का चिउड़ा और सजाव दही। वाह, क्या कहने!

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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