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संताली गीत
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संताली गीतों में हूल की विरासत

 

 हूल वह स्थाई सन्दर्भ है जो संतालों के जीवन और उनके गीतों में मौजूद दिखाई पड़ता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि हूल से पहले संताल समुदाय अपने शांति-सौहार्द्रपूर्ण जीवन पद्धति की वजह से शोषकों के सामने निरीह बना रहने वाला समुदाय समझा जाता था। यह हूल की आग ही थी जिसने उन्हें तपाकर एक ऐसी जाति में तब्दील कर दिया जो अपनी ज़मीन और ज़मीर के लिए पीछे हटने वालों में से नहीं थे। सिर्फ संतालों के लिए नहीं बल्कि 30 जून 1855 ई. का दिन, वह दिन था जिसके बाद संताल परगना के साथ-साथ झारखण्ड और देश का इतिहास भी वैसा नहीं रहा जैसा उससे पहले था। महाजनों और अंग्रेजों के शोषण से उपजी इतिहास के गर्भ की छटपटाहट, हूल का रूप लेकर जंगल की आग की तरह फ़ैल गई थी। जिसने अंग्रेजों को अपनी साम्राज्यवादी नीतियों पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। भारतीयों को कमजोर और डरपोक मानने की उनकी सोच को संताल हूल से बड़ा झटका लगा था। चार भाई और दो बहनों के नेतृत्व में संतालों के साहस और जज़्बे ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला डाली थी। इसी हूल ने बाद में उलगुलान का रूप लिया और फिर आज़ादी की लड़ाई के मजबूत रास्तों की बुनियाद रची।

साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखें तो संताली गीतों-कथाओं में सिदो, कानू, चाँद, भायरो, फूलो और झानो के साथ-साथ हूल के कई अन्य लड़ाकों-लड़ाकिनों से सम्बंधित साहित्य दिखाई पड़ता है। आधुनिक संताली साहित्य में भी हूल और उनके शहीदों को लेकर रचनाएँ दिखाई पड़ती हैं। हिन्दी कविता या हिन्दी साहित्य पर अगर विचार किया जाए तो इस दृष्टि से निराशा हाथ लगती है। हिन्दी साहित्य में सिदो-कानू और उनके हूल पर आधारित लेखन बहुत कम दिखाई पड़ता है। ऐसा नहीं है कि हूल पर आधारित या हूल से प्रेरित साहित्य बिलकुल नहीं है। हिन्दी कविता में झारखण्ड के जिन कवियों ने अपनी मजबूती से जगह बनाई है, उन्होंने अपनी कविताओं में हूल की क्रांतिधर्मिता को जगह दिया है। जसिंता केरकेट्टा, कृष्ण चन्द्र टुडू, चंद्रमोहन किस्कू आदि कुछ ऐसे ही नाम हैं। बिनोद सोरेन संताली के एक समकालीन कवि हैं। जिनकी कविताएँ संताली के साथ हिन्दी में भी प्रकाशित होती हैं। उनकी कविता ‘कुल्ही के धूल में हूल’ में वह बच्चों के खेल के माध्यम से यह बताते हैं कि आज भी संताल परगना की मिट्टी और धूल तक में हूल की आग बरकरार है और लगातार जल रही रही है।

हूल का एक प्रमुख कारण सामाजिक एवं आर्थिक शोषण के साथ प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ और इससे आदिवासियों के जीवन का प्रभावित होना था। इस दृष्टि से हूल की प्रासंगिकता पर विचार किया जाना अभी शेष है परन्तु कई इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि राजमहल की पहाड़ियों में रेल की पटरी के निर्माण और और उससे होने वाले प्रकृति के विनाश का सम्बन्ध भी हूल से था। हूल सिर्फ बरहेट के भोगनाडी गाँव या सिदो-कानू और उनके भाई बहनों तक सीमित कोई आंदोलन नहीं था। इसमें पूरा संताल परगना और इसके लोग शामिल थे। इसलिए हूल की आग 1855 तक भी महदूद नहीं है बल्कि विकास के लिए होने वाले विनाश के प्रतिकार के रूप में आज भी जीवित है। चंद्रमोहन किस्कू अपनी एक कविता में लिखते हैं कि हूल की आग तब भी जली, ‘जब छीन रहे थे/ विकास के नाम पर/ लोगों का हक़ और अधिकार/ जब कुचल रहे थे/ निर्धन-गरीब लोगों को/ चौड़ी सड़क पर’।

संताली गीत

संताली हूल के इतिहासकार कल्याण हाड़ाम ने पश्चिम बंगाल संताली अकादेमी से प्रकाशित अपनी किताब ‘होड़कोरेन मारी हापड़ामको रेयाक् कथा’ में संताल हूल को याद करते हुए लिखा है कि सिदो-कान्हू का यह नारा कि ‘राजा-महाराजा को ख़त्म करो’, ‘दिकुओं को गंगा पार भेजो’ और हमारा राज्य हमारा शासन’(आबुआ राज आबुआ दिसोम) का नारा संताल परगना के जंगल-पहाड़ में चारों तरफ गूँज रहा था। संताली पुरखा गीतों में हूल की प्रतिध्वनि अपनी पूरी मार्मिकता के साथ मौजूद भी है।

     आदिवासी समाज में गीतों की केन्द्रीय भूमिका है। गीतों के बिना आदिवासी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। गीतों -कहानियों से भरा उनका मौखिक साहित्य जीवन के अनुभवों से भरा साहित्य है, जो आनंद के साथ जीने की ज़रूरी सीख से भी भरा होता है। एक तरफ़ जहाँ कथित मुख्यधारा लगातार इस दुःख से गलता रहता है कि आज की पीढ़ी कविताओं-लोकगीतों से विमुख हो गई है या आज के हिन्दी कवि विद्यापति-तुलसीदास की तरह नहीं रच पाते, जिससे लोग उन्हें गाते हुए याद रख सकें। दूसरी तरफ आदिवासी गीत हैं, कहानियाँ हैं जो लिपिबद्ध किए जाने के कभी मोहताज नहीं रहे। रमेश हेम्ब्रम बताते हैं, संताल समाज में एक मान्यता है कि ‘हापड़ामको दो पुथी खोन युतीगे सोरोसाक्को मेतावादा’ यानी हमारे पुरखों ने किताबों से मौखिक उद्धरणों को बेहतर बताया है।[1]

यहाँ एक बात पर विचार कर लेना ज़रूरी प्रतीत होता है कि आदिवासी गीतों और कथित मुख्यधारा के लोकगीतों में क्या फ़र्क़ है? फ़र्क़ बहुत बारीक़ है पर यह जीवन जीने के तरीक़े का भी फ़र्क़ है। एक तरफ जहाँ लोकगीतों की बैठ कर रचना की जा सकती है, उसका सुर बनाया जा सकता है, आदिवासी गीत बैठ कर बनाए ही नहीं जा सकते। यह जीते हुए, काम करते हुए अपना रूप ख़ुद अख्तियार करते जाते हैं। यह ज़िन्दगी की तरह सच्चे होते हैं। इन्हें अलग से गाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, ये अपने जन्म के साथ ही अपना सुर ले कर पैदा होते हैं। एक मार्के की बात और है और इसे ठीक से समझा जाना चाहिए कि जहाँ कथित मुख्यधारा में सुरीला होना एक उपलब्धि है, यश का साधन है वहीं आदिवासियों में सुरीला होने की अवधारणा ही नहीं है। यहाँ मिलजुलकर गाने को महत्त्व दिया जाता है। सभी एक लय में होते हैं, सभी अपनी आवाज़ के साथ शामिल होते हैं और सुर में होते हैं। यहाँ कोई एक गाने वाला या नृत्य करने वाला हो और बाकी उसका आनंद लेने हो; की अवधारणा ही नहीं है। यहाँ सबको शामिल होना पड़ता है, सबको साथ होना होता है। गीत इनकी सामुदायिकता से पैदा भी होते हैं और उनकी सामुदायिकता को मजबूत भी करते हैं।

इस गीत को देखिए जो संताली भाषा का एक गीत है। इसमें बेहतरीन तरीके से गीतों की खासियत को बताया गया है-

“सेरेञ दोम जोमासेम ञूया,

सेरेञ दोम लादासेम रापागा,

सेरेञ दो मोने रेगे सेबेला,

सेरेञ दो सेरेञ हापाटिञ।“[2]

(गीत को न तो आप खा सकते हैं और न पी सकते हैं,

गीत को न तो आप पका सकते हैं, न सिंझा सकते हैं,

गीत का आस्वादन मन ही में किया जाता है,

गीत को मिलजुलकर गाना चाहिए।)

संताली गीत

     मिलजुलकर गाए जाने वाले गीतों में पूरे समाज की चिंता होती है। न यह व्यक्तिगत उपलब्धि है और न ही किसी एक की चिंता इनमें शामिल होती है। आदिवासी गीतों में सिर्फ इंसानों की चिंता नहीं होती बल्कि इसमें आस-पास की प्रकृति, पशुओं, नदियों, पहाड़ों, चट्टानों तक की चिंता की जाती है। साथ ही इन गीतों में उस समाज की ख़ूबसूरत बातों के साथ, सम्मुख खड़े चुनौतियों को भी गीतबद्ध किया जाता है। इसी सन्दर्भ में रमेश हेम्ब्रम तालकारी (साहिबगंज) की डेबोरा टुडू के हवाले से एक गीत का ज़िक्र करते हैं जिसमें हूल के घटित होने से पहले की ज़मीनी हकीकत का पता चलता है। हूल के जन्म लेने और तेजी से फ़ैल जाने के वास्तविक कारणों को इस गीत के माध्यम से समझा जा सकता है –

“एरा होपान को सांता वेतले सिदो कानू

 जुमी-जामगा को लिला मेत् कान

आखे मे सिदो कानू

घोड़ोम घोड़ोम बेन बिचार काताले”

(यानी शोषित लोग सिदो-कानू से गुहार लगाते हैं कि हमारे बेटे बहुओं को सताया जा रहा है हमारी जमीन नीलाम की जा रही हैं। अब तुम्ही धर्म और सच्चाई से इसका विचार करो। )

इस पर सिदो-कानू जवाब देते हैं –

“आलो मानेवापे राग मानेवा

आलो मानेवापे हो मोर मानेवा

आलिमगे सिदो कानू

धोरोम धोरोम विचार कानालापे” [3]

(यानी आपलोग अपनी सिसकियाँ और रोने की आवाज़ रोक लीजिए, हम आपका पूरी निष्ठा से विचार करेंगे।)

इन गीतों से यह बात भी निकलकर आती है कि डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर ने अपनी एक रिपोर्ट में हूल के उदय का जो आकाशीय कारण बताया था उसका ज़मीन से कोई लेना देना नहीं था । हंटर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है “एक पवित्र किताब आसमान से कागजों के पन्ने रूप में बरसी, यह किताब गुप्त रूप से पूरे संताली देश में फैलाई गई। हर गाँव को किताब के काग़ज़ का एक टुकड़ा मिला, जिस पर लिखे शब्द शायद ही समझे जा सकते थे, लेकिन इससे ग्रामीणों में यह धारणा पुष्ट होती थी कि वे इससे देवता के कोप से बच सकेंगे। इस काग़ज़ को पुनः अगले या सुदूरवर्ती गाँवों में बढ़ा दिया जाता था। इन नेताओं ने ऐसे कदमों के द्वारा संताली लोगों के मन में एक भावना भर दी थी कि आगे कोई बहुत बड़ी घटना घटने वाली है।“[4]

एक वजह यह भी बताई जाती है और जिसे ज्यादातर लोग स्वीकार भी करते हैं कि सिदो को उनके ईश्वर ने सपने में आकर राजा घोषित किया था और उसे अपने लोगों को दुःख से निजत दिलाने के लिए लड़ने के लिए कहा था। अब यह दोंनों ही बातों को अगर इस गीत के सन्दर्भ में देखें तो पता चलेगा कि हंटर की बात बिल्कुल आधारहीन है। एक ऐसे इलाके में जहाँ अभी ठीक से लोग दूसरों की भाषा भी बोल-समझ नहीं पाते थे वहाँ किताब के पन्नों का क्या काम? क्या हूल के आधार में भी बाइबिल के पन्नों को ढूंढने और उसके ,महत्त्व को स्थापित करने की कोई कोशिश है? यह विचार का प्रश्न है। दूसरी बात अगर सही भी है कि सिदो ने खुद को राजा घोषित कर दिया था, तब भी यह गीत उसके पीछे के असली वजहों को बताती है। वहाँ शोषण भीषण से भीषणतर होता गया था।

देशी महाजनों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर शांतिप्रिय संताल कृषक समुदाय की ज़िन्दगी में तबाही मचा दी थी। अगर किसी तरह संताल अपनी फ़रियाद लेकर आला अधिकारियों तक पहुँच भी जाते, तब भी उन्हें कोई राहत नहीं मिलती, उलटे उन पर ही मुक़दमा कर दिया जाता था। के. के. दत्ता ने उस समय की वस्तुस्थिति के बारे में बताया है कि “अगर साहूकार उस पर मुक़दमा करता था तो अदालत में पेश करने के लिए संताल के पास मात्र एक गाँठ लगी रस्सी होती थी, जिसमें लगी हुई गाँठें उसे कर्ज में मिले रुपयों की संख्या को सूचित करती थीं और उनके बीच की दूरियाँ कर्ज लेने के बाद बीते हुए वर्ष होते थे। दूसरी तरफ सूदखोर बाकायदा अपने बही खातों में हिसाब-किताब लिख कर तैयार रहता था और बहुत संभव था कि उसमें कोई जाली इकरारनामा या बिक्री-पत्र या बंधकी बना कर तैयार रखता हो।…इसलिए दामिन-ए-कोह में सरकार न अदालतों के माध्यम से कुछ करती थी और न ही कार्यपालिका के माध्यम से।“[5]

संताल विद्रोह

ऐसे में संतालों के पास लड़ने-मरने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा था। सिदो-कानू ने अपने लोगों की आवाज़ सुनी और उन्हें नेतृत्व दिया। इस सच्चाई को सबसे बेहतर उनके गीतों के माध्यम से ही समझा जा सकता है।

     गीतों का आदिवासियों की ज़िन्दगी में दैनंदिन महत्त्व है। संताल आदिवासी अपने परब-त्यौहार की शुरुआत, अपने पुरखों को याद करने के साथ करते हैं। वह जब गीत गाते हैं तब भी पुरखों को याद करते हुए उनके योगदान और उनकी सीख को याद करते हैं। ऐसे ही एक गीत में अपने प्रियतम से कहा जा रहा है –

सेदाय मारे हापड़ाम को,

दिसा कोम से मैरी हो,

जानाम दिसाम रोफाय लागित् नालाय लेन को।

सिदो कान्हू चान्द भायरो,

नुयहार कोम से मैरी हो,

जात ञुतुम दिसाम दो को दोहोवात् बोन।

(अपने पुराने पूर्वजों को,

प्रियतम, याद करो,

माँ-भूमि की रक्षा के लिए उन्होंने अपने को न्यौछावर कर दिया था।

सिदो, कानू, चाँद और भायरो,

प्रियतम ! इन सबों का स्मरण करो,

वे लोग अपनी जाति के नाम देश छोड़ गए।)

सिर्फ चारों भाइयों ही नहीं बल्कि फूलो-झानो को भी उसी आदर और प्यार से याद किया जाता है, संताली भाषा के एक गीत की पंक्तियां हैं ‘फूलो झानो आम दो तीर रे तलरार रेम साअकिदा’ अर्थात फूलो झानो तुमने हाथों में तलवार उठा लिया।

     कहने का अर्थ यह है कि गीत किसी भी अवसर के हों, शुरुआत में वे अपने पुरखों को याद करते हैं। वे यह समझते हैं कि उनके होने की वजह से वे बचे हुए हैं, उत्सव मना पाते हैं, खुश रह पाते हैं। आदिवासियों में लोगों के मर कर भूत बनने की प्रथा नहीं है, उनका मानना है कि उनके पुरखे उनके आस-पास ही रहते हैं, उन्हें देखते हैं और उनका ख़याल रखते हैं। इसलिए किसी भी उत्सव में सबसे पहले पुरखों को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है। उनके सम्मान में हँड़िया का पहला दोना उनके नाम से परोसा जाता है। हूल और उसके लड़ाके तो उनके जिए गए इतिहास का हिस्सा रहे हैं।

इसलिए सिदो के वंश की पांचवी पीढ़ी के रूपचंद मुर्मू बताते हैं कि सिदो-कानू की हत्या के बाद उनकी राख को अंग्रेजों ने सामने रख कर जब गोली मारी तब उससे खून निकल पड़ा और उस खून से कई सिदो-कानू पैदा हुए। सच भी है कि हूल के बाद लगातार यह क्षेत्र आन्दोलनरत रहा, सिदो-कानू की बलिदानी ने संतालों को एक साहसी और अपने अधिकार के लिए खड़े होने वाले समुदाय में तब्दील कर दिया। आप हिन्दी के किसी गीत में नहीं पाएंगे कि प्रिय या प्रिया अपने प्यार करने वाले से अपने किसी पुरखे को या उसकी बलिदानी को याद करने के लिए कह रहे हों। आदिवासी गीतों की दो बातें मुझे बहुत प्रभावित करती हैं एक, प्रेम अलग से यहाँ किया जाने वाला कार्य नहीं है इसलिए यहाँ प्रेम और संघर्ष दो अलग चीजें नहीं हैं। दूसरा इन गीतों की ऐतहासिक चेतना। आदिवासी अपने इतिहास और उसके सबक को हमेशा नए-नए तरीके से संजो कर रखते हैं और अपनी अगली पीढ़ी को सौंपते जाते हैं। इस नजरिए से इनका इतिहासबोध आपको चौंका सकता है।

इन चार भाइयों और बहनों के अलावा भी इनके गीतों में बहुत से नायक-नायिकाओं को याद किया जाता है, जिन्होंने अपने ‘आबुआ दिसोम’ की रक्षा के लिए, संतालों के सम्मान और स्वाभिमान के लिए शहीदी दी। वह चाहे साम परगना हों या बाजाल हेम्ब्रम। बाजाल हेम्ब्रम तो खुद एक बहुत अच्छे गीत गाने वाले और नाचने वाले कलाकार थे, संताली भाषा में जिन्हें रसिया कहा जाता है। वह लड़े भी और अपने गीतों के माध्यम से सिदो -कानू का हुलगारिया बन हूल के संघर्ष को दामिन -ए-कोह में आगे भी बढ़ाया। इसलिए आप संताल परगना में जहाँ भी बाजाल हेम्ब्रम की प्रतिमा देखेंगे उनके हाथ में कोई वाद्य यंत्र ही दिखाई पड़ेगा। लड़ाई के साथ गीतों की क्या भूमिका होती है उसे समझने के लिए हमें बहुत दूर जाने की जरुरत नहीं हैं।

आप किसी भी आदिवासी प्रतिरोध में शामिल होइए, वह आपको गाते हुए दीख जायेंगे।सत्ता इसी बात से तो हैरान रहती है कि ये लड़ने भी आते हैं तो गीत गाते हुए आते हैं। ऐसे लोगों को पछाड़ना सचमुच बहुत मुश्किल काम है। इसलिए आज़ादी के बहुत पहले से आज तक अगर कोई लड़ रहा है, जिसने साम्राज्यवादी शक्ति हो या पूँजीवादी शक्ति उसके सामने हथियार नहीं डाले तो वह आदिवासी समुदाय ही है। बाजाल हेम्ब्रम से सम्बंधित एक दिलचस्प क़िस्सा रमेश कुमार हेम्ब्रम डेबार टुडू के हवाले से सुनाते है। वैसे यह क़िस्सा संताल परगना के हर अंचल में सुनने को मिलता है। यह घटना 1855 ई. के हूल के कुछ दिनों बाद की है जब सुन्दरपहाड़ी (गोड्डा) के एक युवक बाजाल ने एक और क्रूर महाजन की हत्या कर दी थी। जब पुलिस उनके हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल कर बीरभूम के सिउड़ी जेल ले जा रही होती थी, तब रास्ते के किनारे मौजूद गाँव की स्त्रियाँ उनसे गीत गाते हुए पूछती हैं बताओ बाजाल तुमने किसके कहने पर रूप सिंह तम्बोली को मारा है, सिदो के कहने पर या कानू के कहने पर।

“तोकोय हुकूमते बाजाल तोकोय बोलेते

रूप सिंह ताम्बोली दोम माक् केदेया

सिदो हुकूमते नायगो कानू बोलेते

रूपु सिंह ताम्बोली दोम माक् केदेया

तेरेताम हाड़ी बाजाल जागातेराम बाड़ी

आमदोम चालाकूकान बाजाल सिउड़ी थाना ते”

उनकी बातों का जवाब देते हुए बाजाल जवाब देते हैं –

“तिरेतिञ तिरिके नायगो जांगारे तिञ लोपुरे

 इञ दोञ चालक्कान नायको सिउड़ी मेला ञेल”[6]

मतलब, देखो मेरे हाथों में हथकड़ियाँ नहीं बाँसुरी है और मेरे पैरों में बेड़ियाँ नहीं घुँघरू बंधे हैं, मैं तो सिउड़ी मेला का आनंद लेने जा रहा हूँ।“

अपनी ज़मीन और अपने लोगों के लिए शहीदी का यह जज़्बा बहुत मुश्किल से ही दिखाई देता है। आदिवासियों में यह जज़्बा नैसर्गिक रूप से मौजूद होता है क्योंकि उन्हें न सिर्फ अपने लोगों बल्कि अपनी प्रकृति और पुरखों से भी लगाव होता है। यह गीत बाजाल जैसे लड़ाकों की न सिर्फ कभी न भूलने वाली दास्ताँ को ज़ाहिर करता है बल्कि स्मृतियों में उनके बने रहने की भी बानगी है। हर पीढ़ी इन गीतों को गाती है, उनके उत्सर्ग को जानती है और अपनी भूमिका को पहचानती है। ये दूसरी भाषा और दुसरे समुदायों के भरोसे नहीं होते, अपने गीतों में वे अपनों को ख़ुद जीते हैं।

     यह भी सच है कि आज आदिवासियों पर होने वाले हमले सिर्फ बाहरी प्रभाव तक सीमित नहीं हैं। आज यह ज्यादा जटिल, भयानक और अंदरूनी भी हैं। षड्यंत्रकारी अब सिर्फ बाहर से नहीं आ रहे, उनके बीच से भी पैदा किए जा रहे हैं। बावजूद इसके इस समुदाय ने लड़ना नहीं छोड़ा है, गीत गाना, उत्सव मनाना नहीं छोड़ा है।

मैक्सिको की सुसाना देवाले ने अपनी किताब ‘डिस्कोर्स ऑफ़ एथनिसिटी : कल्चर एण्ड प्रोटेस्ट इन झारखण्ड’ में एक संताली गीत को उद्धृत किया है –

“सिदो तुम खून से सने हुए क्यों हो?

कानू! तुम हूल-हूल क्यों चिल्लाते हो?

-हम अपने लोगों के लिए खून से नहाये हुए हैं,

जब से व्यापारी चोरों ने हमारी ज़मीन लूट ली है”[7]

सिदो कानू ने यह तब कहा था जब इस देश पर अंग्रेजों का आधिपत्य था। आज इस देश में लोकतंत्र है और जनता के द्वारा सरकारें चुनी जाती हैं फिर ऐसा क्यों है कि आज भी आदिवासी इलाकों में व्यापारी चोरों का ही राज़ है? उस समय का भी निजाम उन्हीं व्यापारियों के साथ था और आज का भी। हाँ जटिल होती परिस्थितियों के बावजूद एक चीज़ आज भी नहीं बदली है, तब भी आदिवासी गीत गा रहे थे और लड़ रहे थे और आज भी वे गीत गा रहे हैं और लड़ रहे हैं। हमारे लिए तब देश को बचा रहे थे आज हमारी साँसों को बचा रहे हैं

.

[1] सं. हरिवंश, फैसल अनुराग, रमेश हेम्ब्रम का लेख -1855 संताल हूल : आदिवासी प्रतिरोध संस्कृति, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली,2018

[2] सोहराय सेरेञ और दोङ सेरेञसंकलन और अनुवाद स्व भागवत मुरमू ‘ठाकुर’; देवघर, 1963.

[3] सं. हरिवंश, फैसल अनुराग, रमेश हेम्ब्रम का लेख -1855 संताल हूल : अधिकारों की पहली लड़ाई, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली,2018

[4] वही, डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर की रिपोर्ट का एक अंश

[5] K. k. Datta, The Santal Insurrection of 1855-1857, Gyan Publishing House, New Delhi,2017

[6] 1855 संताल हूल : आदिवासी प्रतिरोध संस्कृति. रमेश हेम्ब्रम का लेख

[7] उद्धृत, वही , सोसना देवेला का लेख

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