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‘भारत बदल गया है’ पर एक नोट

 

जो अपने विषाद के क्षण में कहते पाए जाते हैं कि ‘भारत बदल गया है’, वे हमारे जीवन के यथार्थ के विश्लेषण में बड़ी चूक करते हैं। सच यह है कि भारत नहीं, भारत का शासन बदल गया है और वह संगठित रूप में बहुत सी चीजें कर रहा है और अपने लोगों से करवा रहा है, जो हमारे संविधान और भारत के मूलभूत चरित्र के विरुद्ध हैं। इसीलिए, इतना ही बड़ा सच यह भी है कि इस शासन की राजनीतिक पराजय के साथ ही परिस्थिति फिर पूरी तरह से बदल जाएगी। सही शासन आने पर अभी के अपराधी शासन के लोग जेलों में भी पाए जा सकते हैं।

दरअसल, कुछ लोगों को लगता है कि इस शासन ने भारत के लोगों के मन को बदल कर उन्हें मनुष्यों के बजाय ‘दरिंदों’ में तब्दील कर दिया है। इसे वे अपने तरीक़े से मनुष्य के ‘अवचेतन’ को बदलना बताया करते हैं। यह मनुष्य के ‘अवचेतन’ के बारे में उनकी एक पूरी तरह से भ्रांत धारणा है। अवचेतन की शास्त्रीय फ्रायडीय अवधारणा में, इसका संघटन उन तत्त्वों से ही होता है जिनका किसी न किसी रूप में दमन किया जाता है। अवचेतन उन दमित भावों का संसार है जो मानव प्रकृति और सामाजिक शील के नाना कारणों से सामान्यत: प्रकट नहीं हो पाते हैं।

एक प्रकट रूप में दरींदा शासन किसी तबके विशेष के किन्हीं दमित भावों को उत्प्रेरित करके सामने लाने का कारण हो सकता है, पर वह उन्हीं भावों के दमन से मनुष्यों के ‘अवचेतन’ के गठन का स्रोत नही होता। संघ का फ़ासिस्ट शासन उसके विचारों की गोपनीय असभ्यताओं को सिर्फ़ बेपर्द कर सकता हैं, उनकी इनके बारे में किन्हीं दमित वासनाओं के जन्म की संभावनाओं को नहीं बना सकता है।फ्रायड ने मनोविश्लेषण के अपने अनुभवों के आधार पर भी कहा था कि किसी भी मनोरोगी के इलाज की विश्लेषणात्मक प्रक्रिया में मनोरोगी का अवचेतन कभी भी चेतन रूप में किसी बाधा की भूमिका अदा नहीं करता है और न मनोरोगी की क्रियाओं से अपने को प्रकट करता है।

विश्लेषण की इसी प्रक्रिया के रूप में राजनीतिक परिवर्तन की सामाजिक प्रक्रिया को भी देखा जाना चाहिए। जनता का कोई भी दमित भावों से बना ‘अवचेतन’ उसकी नागरिक सत्ता और मानवीय प्राणीसत्ता की भूमिका को, अर्थात् उसके चेतन को अपसारित नहीं कर सकता है। वह उत्तेजनाओं के ख़ास मौक़ों पर ही प्रकट होता है। जब भी कथित अवचेतन किसी की प्राणीसत्ता पर हावी हो जाता है, तभी तो वह पागल होता है। किसी भी सभ्य राष्ट्र के जीवन में ऐसे उन्माद के दौरों का इलाज राजनीतिक परिवर्तन के ज़रिए होता है। पागलपन जब भी किसी राष्ट्र का स्थायी भाव बनता है तो वह उसके समूल आत्म-विनाश का सूचक होता है। हिटलर का जर्मनी इसी का एक चरम उदाहरण है, जहां सभ्यता और राजनीति का ही अंत हो चुका था।

हमें नहीं लगता है कि आज की तेज़ी से बदलती विश्व परिस्थिति में भारत में हिटलर का उदय आसान होगा। और जब तक राजनीति की संभावनाएँ मौजूद रहेगी, सभ्यता के नियम बचे रहेंगे, अभी के शासन की सारी बुराइयों का निदान संभव बना रहेगा। कहने का तात्पर्य यही है कि हमारे राज्य की अभी की मोदी नामक बीमारी का निदान राजनीतिक परिवर्तन में है। सत्रह आम चुनावों में अब तक भारत के लोग आठ बार सरकार बदल चुके हैं। आगे भी यह सिलसिला जारी न रहने का कोई कारण नहीं है। हम अपनी सारी बातों के प्रमाण के तौर पर बंगाल में 34 साल के वाम शासन में ‘बदले’ हुए इंसानों की सच्चाई का भी उल्लेख कर सकते हैं। और, व्यापक रूप में देखें तो, सत्तर साल के ‘नये सोवियत इंसान’ के हश्र को भी लिया जा सकता है। जर्मनी में तो हिटलर की तारीफ़ क़ानूनन अपराध है।
सच यह है कि मनुष्य का मन विषाद से मुक्ति के आनंद सिद्धांत से चालित होता है। वह हर विपरीत परिस्थिति से अपना समायोजन करता है। आज अगर लोग कुछ भिन्न व्यवहार कर रहे हैं तो इसीलिए कि उनके सामने ऐसी परिस्थिति खड़ी कर दी जा रही है। पर, खून और हत्या मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति नहीं है। इसी प्रकार, वैविध्यपूर्ण भारत में सांप्रदायिक नफ़रत भी स्वाभाविक प्रकृति नहीं हो सकती है। मनुष्य की स्वातंत्र्य चेतना और सभ्यता तथा नागरिकों के संविधान का सार्वलौकिक परिप्रेक्ष्य ही अंततः निर्णायक होते हैं

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