रामपुर की रामकहानी

माई : जब जिन्दा लौट आई

 

रामपुर की रामकहानी-14

   1976 के नवंबर की दूसरी तारीख। शिक्षकों में सूचना फैल गयी कि इस माह का वेतन भी पंद्रह से पहले नहीं मिलेगा। डेढ़ सौ रूपये महीने की सैलरी, वह भी समय से नहीं। अगस्त और सितंबर को मिलाकर ठीक दो सौ रूपये सैलरी मिली थी, वह भी अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में। पचास रूपये से ज्यादा की तो मित्रों ने मिठाइयाँ खा लीं थीं। किन्तु इन दिनों पैर जमीन पर नहीं पड़ता था। इतनी जल्दी किसी को नौकरी मिलती है क्या ? पंद्रह दिन ही तो हुए थे रेजल्ट निकले और मैंने प्रोफेसरी ज्वायन कर ली, भले ही एडहॉक हो।

 पॉकेट में सिर्फ बीस रूपये बचे थे। जगन्नाथ भैया ही सहारा थे। अगस्त में ही उनसे पचास रूपये उधार लिया था जब उन्हें पवित्रा डिग्री कॉलेज, मानीराम, गोरखपुर में ज्वायन करने की खुशखबरी देने गया था। किन्तु आगे के पंद्रह दिन कैसे कटेंगे? भैया को सैलरी कल मिली होगी। भैया ऑफिस से निकल गये तो उधार नहीं मिलेगा। घर पर भाभी के सामने उनकी एक नहीं चलती है। भैया के बोलने से पहले ही भाभी बहाना बना लेती हैं।  कॉलेज से रोडवेज जी.एम.ऑफिस की कम से कम पंद्रह किलोमीटर की दूरी मैंने अपनी पुरानी सायकिल से सिर्फ एक घंटे में तय कर ली थी, वह भी ऑफिस टाईम पर। जगन्नाथ भैया यानी मेरे ममेरे भाई, गोरखपुर में मेरे अभिभावक, रोडवेज  जी.एम. ऑफिस में क्लर्क।

शाम के छ: बज चुके थे। जगन्नाथ भैया अभी भी ऑफिस में ही थे। मुझे पता था कि वे छ: बजे से पहले कभी ऑफिस छोड़ते ही नहीं हैं। काबिल क्लर्क हैं। जी.एम. साहब जब तक रहते हैं उन्हें भी रुकना पड़ता है। पता नहीं, कब किस काम के लिए साहब का बुलावा आ जाय।

 “पाय लागी भैया,” कहते हुए पैर छुआ और अभी बैठा भी नहीं था कि उन्होंने चिट्ठी पकड़ा दी, जिसे किसी कंडक्टर ने कुछ देर पहले ही उन्हें लाकर थमाया था। “माई की हालत अत्यंत खराब है। वह मुँह देखने के लिए आप को बुलायी है। पत्र पाते ही चले आइए।” गाँव से विश्वंभर ( प्रो. विश्वंभरनाथ शर्मा, भूगोल विभाग, बीएचयू) ने सिर्फ ये तीन वाक्य लिखकर किसी कंडक्टर के माध्यम से भिजवाया था।

माँ को हम ‘माई’ कहते थे। मैंने पत्र देखा।  भैया उसे पढ़ चुके थे। कुछ क्षण के लिए मैं गंभीर हो गया। भैया कोई कागज तैयार करने में इतने व्यस्त थे कि मुझसे बात करने की भी फुर्सत नहीं थी। ‘बैठो’ कहकर उन्होंने हाथ से संकेत किया और काम में लग गए।  काम खत्म हो जाने के बाद मुझसे बात करने का उनका इरादा था। किन्तु मेरी आँखों में तो माँ का चेहरा नाच रहा था, कानों में उसी की पुकार सुनाई दे रही थी। मेरे लिए एक- एक पल काटना कठिन था।  मैंने उन्हें बीच में रोका और इलाज के लिए माँ को गोरखपुर ले आने की उनसे राय माँगी। उन्होंने स्पष्ट कहा, “मैं तो आज ही ससुराल जा रहा हूँ। तुम्हारी भाभी की चाची का निधन हो गया है। मैं चार दिन बाद लौटूँगा। तुम्हारी भाभी वहीं रहेंगी। यहाँ और किसके भरोसे लाओगे ?  वहीँ महाराजगंज में इलाज कराओ।”

   भैया पर उनकी बुआ अपनी जान छिड़कती हैं। इतनी बेरुखी क्यों ? उन्हें तो पता है कि अब तक महाराजगंज से ही दवा होती रही है। अस्पताल के नाम पर वहाँ एक मात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है जहाँ ढंग का कोई डॉक्टर तक नहीं। अस्पताल से सिर्फ मिक्सचर मिलता है और दो-तीन तरह की नीली-पीली बिटामिन की गोलियाँ, चाहे रोगी को उल्टी- दस्त हो रहा हो या मियादी बुखार।  

भैया से कुछ पैसे माँगने की बात जबान के भीतर दबी रह गयी। तीन महीने पहले उनसे 50 रूपये उधार लिया था, उसे ही वापस न कर सका था। मैं वहीं से अपने क्वार्टर अलीनगर चला आया। अपने पार्टनर राजकिशोर तिवारी की प्रतीक्षा करने लगा। वे ऑफिस से घूमते हुए आराम से सात-आठ बजे तक लौटते हैं।

परीक्षा देने के साथ ही मैं संत कबीर छात्रावास छोड़ चुका था और उन दिनों अलीनगर मोहल्ले में तिवारी जी के साथ एक कमरे में शेयर करके रहता था।  फार्मासिस्ट की नौकरी करने वाले राजकिशोर तिवारी अकेले रहते थे और हर शनिवार को अपने घर फाजिलनगर चले जाते थे। सब्जी चावल उनका प्रिय भोजन था। मैं केवल सब्जी काट देता और जरूरत पड़ने पर आटा सान देता। भोजन वही बनाते। उनके साथ रहने से मुझे पढ़ने का भरपूर समय मिलता। हाँ, सोने से पहले वे बाँसुरी जरूर बजाते। बाँसुरी से विद्यापति के गीतों की धुन जब वे निकालते तो उतनी देर के लिए मेरी पढ़ाई बंद हो जाती।

तिवारी जी के आने पर मैंने सारी घटना उन्हें सुनायी, उनसे पचास रूपये उधार लिया, झोला उठाया और बस स्टेशन। महाराजगंज पहुँचा तो रात के दस बज चुके थे। उन दिनों सूरज डूबते ही महाराजगंज से गाँव आना- जाना बंद हो जाता था। बेलहिया पोखरी पर कई बार डाकुओं ने लोगों के कपड़े तक उतरवा लिये थे।

मेरे पाँव मऊपाकड़ कुटी (राम जानकी मंदिर मऊपाकड़) की ओर मुड़ गये। महंथ जी (बाबा रघुनाथ दास जी) अभी सोये नहीं थे। इतनी रात मुझे देखकर चौंके। मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया। उन्होंने बताया कि चौके में रोटियाँ बची होंगी। लेकर खा लीजिए और मंदिर के बगल के स्टोर रूम में चौकी पड़ी है, उस पर सो जाइए। ओढ़ने के लिए उन्होंने एक कंबल भी दिया। जब मैं बी।ए। कर रहा था तो पढ़ाई के लिए कुछ महीने कुटी पर ही रुका था।  महंथ जी मुझे बहुत मानने लगे थे। किसी अनहोनी की आशंका में मैं रातभर करवटें बदलता रहा। चौकी के नीचे राशन वाले कनस्तरों के बीच चूहों का एक जोड़ा रह- रह कर धमाचौकड़ी मचाता और चिंचिआने लगता। अपने साम्राज्य में मेरी अहेतुक उपस्थिति उन्हें बिल्कुल पसंद न थी। वैसे तो मेरी आँखें माई को देखने लिए उतावली थीं हीं। नींद कैसे आती ?

सुबह कानों में मफलर लपेटा, झोला उठाया और सूरज उगने से पहले ही घर पहुँच गया। ओसारे में माँ लेटी थी। धौंकनी की तरह साँसें चल रही थीं। किन्तु आँखें बंद थीं। आँखें खोलने की ताकत भी नहीं बची थी। मैने उसके पाँव छुए और ललाट सहलाने लगा। उसकी आँखें खुलीं और झर- झर आँसू बहने लगे। मुझे देखकर गद्गद थी किन्तु उठकर बैठने की शक्ति उसमें नहीं रह गयी थी। उसे पता था कि अब वह बचेगी नहीं। अन्तिम समय वह मुझे देखना चाहती थी और मैं उसके सामने खड़ा था। उसकी पलकें रह- रह कर उठतीं और फिर कुछ क्षण के लिए शान्त। रह -रह कर होंठ भी फड़फड़ाते किन्तु बिना आवाज के।  मगर आँसू थे कि रुकने को तैयार ही नहीं। ज्ञान्ती ने बताया कि “अन्न छोड़े उसे बाईस दिन हो चुके हैं। सिर्फ तुलसी के पत्ते का काढ़ा एक -दो घूँट लेती है।”

माँ वर्षों से बीमार थी। कई बीमारियाँ थीं उसे, लेकिन दमा प्रमुख थी। उसे जब साँस फूलता तो देखने वालों की भी हिम्मत छूट जाती।  शरीर में अब केवल हड्डियाँ बची थीं। दवा से सभी लोग थक चुके थे। आगे दवा की चर्चा ही व्यर्थ थी। पैसे के नाम पर घर में कच्ची कौड़ी नहीं बची थी। सभी लोग उसके अन्तिम साँस की प्रतीक्षा कर रहे थे। 

विश्वंभर ने बताया कि बाऊजी खेत में नहर से पानी चलाने गये हैं। खेत उन दिनों बिखरे हुए थे। किस खेत में गये हैं पता करना मुश्किल था। ढूँढते- ढूँढते मैं नदी के किनारे तक चला गया। देखा कँधे पर कुदाल रखे लंगड़ाते हुए बाऊजी आरहे हैं। उनके पैर में घाव था किन्तु काफी दिन बाद नहर में पानी आया था और सिंचाई के बिना गेंहूँ सूख रहा था।

पाँव छुआ। बाऊजी की बनावटी मुस्कान मानो मेरा हौसला आफजाई कर रही थी।

“कब अइल S ह S ?”

“सबेरवें अइलींह S।” कहते हुए मैंने संक्षेप में सारी कहानी कह दी। रास्ते में ही माँ को गोरखपुर ले जाने की बात मैंने उठायी तो उन्होंने पैसे के अभाव और बीमारी के लाइलाज होने की ओर संकेत करते हुए न ले जाने का सुझाव दिया। दवा करते- करते हम थक चुके थे और वे अब निराश हो चुके थे।

मैंने जिद की। उनसे किसी तरह माँ को महाराजगंज तक पहुँचाने के लिए कहा। झिंगुरी काका आये और राम बिरिछ भैया को मैं बुला लाया।  जिस चारपाई पर माँ सोई थी उसी के चारो पायों में रस्सी बाँधी गयी और बीच में एक बाँस का भंडा। महाराजगंज तक ले जाने वालों की कमी नहीं थी। राम बिरिछ भैया, झिंगुरी काका, गामा काका, सुखदेव काका और शंकर भैया भी आ गये। इन लोगों ने माँ को महाराजगंज बस स्टेशन तक तो पहुँचाया ही, बस आने पर उठाकर उसमें बैठाया भी।

जब हम माँ को लेकर जाने की तैयारी कर रहे थे तब तक गाँव की कई महिलाएं भी आ चुकी थीं।  सबकी आँखों में आँसू थे। कई मुँह पर आंचल लगाये सुबक रही थीं। उन्हें लग रहा था, शायद यह उनकी अन्तिम यात्रा है। ज्ञान्ती ने सीधा छुवाया और संध्या दौड़कर तुलसी का पत्ता ले आयी। मुँह में तुलसी दल के साथ गंगाजल भी डाला गया। कंधे से भंडा लगाते ही विश्वंभर और दोनो बहनें फफक- फफक कर रोने लगीं। माँ की चारपाई को लोगों ने कंधों पर पालकी की तरह उठा लिया और ईश्वर का नाम लेकर आगे बढ़े। 

पैसे की व्यवस्था बिल्कुल न हो सकी। हाँ, बाऊजी ने बाद में धान बेचकर 50 रूपये भेजने का आश्वासन दिया था और दस दिन बाद उसे विश्वंभर के हाथों भेजा भी। बस से गोरखपुर और वहाँ से रिक्शे से जगन्नाथ भैया के क्वार्टर पर पहुँचते -पहुँचते मुझे रात के नौ बज गये। महाराजगंज के बाद माँ को सँभालने वाला मैं अकेला बचा था किन्तु जब भी जरूरत होती कोई न कोई सहारा देने वाला मिल जाता। उन दिनों गरीबी बहुत थी। क्या गरीबी का मनुष्यता से कोई अनिवार्य रिश्ता है ? अगर गरीबों में मनुष्यता अधिक होती है तो अमीरी किस काम की ? क्वार्टर के सामने रिक्शा रुकते ही शैलेन्द्र को पुकारा, पड़ोस के काशी भैया भी आ गये। रिक्शे से उतारकर माँ को हम कमरे तक ले आये।

इस्माईलपुर में भैया का एक कमरे का क्वार्टर था। हाँ, कमरा बड़ा था। उसी में दो चारपाई लगी थी और दीवाल के किनारे गृहस्थी के सामान। खाना चूल्हे पर बनता था, वरामदे में। भाभी के साथ भैया अपनी ससुराल जा चुके थे। घर में सिर्फ शैलेन्द्र था- उनका दर्जा सात में पढ़ने वाला भतीजा। संतान-विहीन भैया- भाभी का वही सहारा था और भविष्य भी। किन्तु भैया उससे सीधे मुँह बात न करते थे। टेढ़ा बोलना, बात- बात पर हाथ उठाना, मारते समय उसके सिर के बाल पकड़कर जोर- जोर से हिलाना उनका स्वभाव था। दूसरों से मधुर व्यवहार करने वाले भैया इस बच्चे को देखते ही कठोर क्यों हो जाते हैं ? समझ नहीं सका। अपने फूफा से वह सहमा- सहमा रहता था। उसकी बुआ भी अपने पति का ही साथ देती थीं। मुझे देखते ही शैलेन्द्र के चेहरे पर खुशी छलकने लगती थी।

मैंने बड़े सबेरे शैलेन्द्र को जगाया। दो मोटी रोटियाँ पकाईं। हरा मिर्च लहसुन और नमक की चटनी से हम एक-एक रोटी खाये, रिक्शा बुलाया और माँ को लेकर जिला चिकित्सालय पहुँचा। जिला चिकित्सालय में इलाज कराने के लिये जाने का मेरा यह पहला अनुभव था। बहिरंग विभाग में दिखाने के लिए आठ आने की पर्ची बनी। जल्दी ही नंबर आ गया। डॉ। अवस्थी ने देखा और भर्ती कर लिया। एक रूपया बहिरंग से भीतरी विभाग तक पहुँचाने का देना पड़ा। मुझे फीमेल वार्ड के इमरजेंसी में 5 नंबर बेड मिल गया। शैलेन्द्र को माँ के पास बैठाकर मैं बक्शीपुर मोदी ( मोदी विश्वविद्यालय बुक स्टाल) के यहाँ अपने एक दूसरे ममेरे भाई  (रामदरस भैया) को फोन करने गया। वे गोरखपुर में ही राजघाट थाने पर सिपाही के रूप में तैनात थे। पता चला कि वे भी पंद्रह दिन की छुट्टी पर चले गये हैं। मैं हताश होकर पैदल ही लौट रहा था तब तक सड़क के दूसरे किनारे से आवाज आयी,

 “ऐ बबवा! कहाँ जा रहा है ?”

आवाज सदानंद ( प्रो।सदानंद प्रसाद गुप्त, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष, उ।प्र।हिन्दी संस्थान) की थी। मुझे वह ‘बाबा’ की जगह ‘बबवा’ कहता है। उन दिनों मैं घंटों पूजा करता था, चुटिया में गाँठ बाँधता था और विश्वविद्यालय में पढ़ने भी लाल  टीका लगाकर जाता था।  दोस्त मुझे ‘टीका बाबा’ कहते थे।  सदानंद को देखकर मेरी बाछें खिल गयीँ। वह अपने छोटे भाई के साथ डीएवी कॉलेज की ओर जा रहा था। मैंने सारी कथा संक्षेप में बता दी। अपने भाई को वहीं छोड़कर वह मेरे साथ हास्पीटल आ गया। मैंने शैलेन्द्र को छुट्टी दे दी ताकि वह घर जाकर कुछ भोजन पका ले। सायं सात बजे तक सदानंद माँ के पास ही बैठा रहा। मैं इधर- उधर व्यवस्था में लगा रहा। सायं सात बजे जब शैलेन्द्र आया तब जाकर सदानंद को छुट्टी मिली। उन दिनों अस्पताल में मरीज के साथ एक तीमारदार हमेशा रह सकता था।

इस बीच पता चला कि डॉ। अवस्थी सायं पाँच बजे राउन्ड पर आये थे और माँ को तिरछी नजर से देखते हुए चले गये थे। कोई दवा नहीं लिखी।  इतना ही नहीं, माँ की बगल में एक ठाकुर परिवार की महिला भर्ती थीं, उन्हें ध्यान से देखा था, दवाएं लिखी थीं, नसीहत दी थी। उस महिला के घरवाले मेरी माँ की उपेक्षा पर व्यंग कसे थे। मैं तिलमिलाकर रह गया था।

सुबह साढ़े सात बजे सदानंद आ गया। हम दोनो उसी समय डॉ। अवस्थी के घर गये जो कैम्पस में ही रहते थे। एक घंटे की प्रतीक्षा के बाद डॉ। अवस्थी बाहर निकले। मैंने संक्षेप में अपनी परिस्थिति उन्हें बता दी और उन्हें पंद्रह रूपये दक्षिणा कहकर दिया। वहीं से नौतनवा के लिए ट्रेन पकड़ा। सदानंद खाना खाकर बारह बजे तक आने का आश्वासन देकर क्वार्टर गया। उन दिनों सदानंद गीतावाटिका में रहता था और वहीं बासे में भोजन करता था।

नौतनवा के पास लोहसी गाँव है जहाँ मेरी बड़ी बहन की ससुराल है।  अपनी दीदी को लेकर जब मैं हास्पीटल पहुँचा तो रात के बारह बजने वाले थे। शैलेन्द्र माँ के बेड के नीचे सो रहा था। मैंने उसी समय शैलेन्द्र को क्वार्टर पहुँचाया।  दीदी के भरोसे छोड़कर अब मैं माँ की देखभाल से निश्चिन्त हो चुका था। शैलेन्द्र ने बताया कि सायं माँ को देखने डॉ। अवस्थी आये थे। उन्होंने बाजार से खरीदने के लिए दवाएं भी लिखी थीं। सदानंद ने खुद दवाएं खरीदी भी थीं और दो खुराक दवा दी जा चुकी थी।  सदानंद भी अपने वादे के अनुसार दोपहर बारह बजे तक आ गया था और शैलेन्द्र के आने पर रात आठ बजे घर गया।

अब माँ के स्वास्थ्य में धीरे- धीरे सुधार होने लगा। मेरे एक अन्य ममेरे भाई के सुपुत्र कृष्ण मोहन भी उन दिनो गोरखपुर में ही सिपाही थे।  उन्होंने अपने अधिकारियों से कहकर अपनी ड्यूटी हास्पीटल में ही लगवा ली। जगन्नाथ भैया भी आ गये। 20 दिन तक अस्पताल में रहने के बाद माँ बाहर निकली। गाँव वालों को मेरी माँ के जिन्दा लौट आने पर आश्चर्य था।

 जबतक अस्पताल में भर्ती रही, डॉक्टर के निर्देशानुसार माँ को दोनो वक्त का भोजन और नाश्ता नि:शुल्क मिलता था। एक्स-रे सहित खून की जाँच अस्पताल की ओर से ही मुफ्त हुई। कुछ ऐसी दवाएं जो अस्पताल में सुलभ नहीं थीं, उन्हें ही बाहर से खरीदना पड़ता था। इस तरह माँ की बीमारी में तीन सौ रुपये से ज्यादा खर्च नहीं हुए थे। सोचता हूँ कि आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, माँ बीमार पड़ती तो कितना खर्च होता ? और क्या सरकारी अस्पताल में ऐसा इलाज हो पाता ?

लोहिया ने लिखा है, “निजी स्कूलों को बंद कर देना चाहिए और सरकारी स्कूलों को ही सुधारना चाहिए ताकि सभी जाति और वर्ग के बच्चे सामान शिक्षा प्राप्त कर सकें।”

 ऐसा ही सुझाव मुंशी प्रेमचंद ने भी दिया है, “मैं चाहता हूँ ऊँची से ऊँची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊँची से ऊँची लियाकत हासिल कर सके और ऊँचे से ऊँचा ओहदा पा सके। यूनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सबके लिए खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिए।”

 यही सुझाव क्या अस्पतालों के लिए भी उचित नहीं है ? आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे आजाद भारत की जनता को गुणवत्ता युक्त मुफ्त शिक्षा और मुफ्त उत्तम इलाज की सुविधा क्यों नहीं मिल सकी ? स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के नाम पर जनता का जो धन बीमा कंपनियों को बाँटा जा रहा है उसी धन से यदि सरकारी अस्पतालों को साधन संपन्न बना दिया जाता, सुयोग्य डॉक्टर और अच्छे स्टाफ नियुक्त कर दिए जाते तो जनता को गली- गली खुले प्राइवेट अस्पताल- रूपी कसाईबाड़ों के चंगुल में फँसकर जबह क्यों होना पड़ता ?   

सदानंद का उधार चुकाने में मुझे पाँच महीने लग गये थे। किन्तु उसने कभी माँगा नहीं,  यद्यपि उसकी भी आर्थिक दशा मुझसे कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी।

       प्रो. भगवती प्रसाद सिंह जैसे संत प्रकृति और संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान के निर्देशन में भाई जी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार और ‘कल्याण’ जैसी पत्रिका पर शोध कार्य करने वाला मेरा यह सबसे अज़ीज़ दोस्त धीरे- धीरे हिन्दुत्व का प्रबल आग्रही हो गया और दूसरी ओर हॉस्टल में भी खड़ाऊँ पहनने वाला, घंटो पूजा करने और उसके बाद ही अन्न ग्रहण करने वाला मेरे जैसा कर्मकाण्डी, बुद्ध, मार्क्स और गाँधी की सम्मिलित भूमि पर भारत के भविष्य की खोज करने लगा। समय के प्रवाह में बढ़ती हमारी वैचारिक दूरी ने दोस्ती में भी खटास पैदा कर दी। सच है, राजनीति अपनी धुन पर सबको नचाती है। हम ही कहाँ बँच सके ? 

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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