Category: एतिहासिक

दास्तान ए दंगल सिंह

दास्तान-ए-दंगल सिंह (105)

 

(समापन किस्त)

 बिटिया के ब्याह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों में केवल एक बाकी रह गयी थी। माई की सेवा करने का अधिक मौका परिस्थितिवश मुझे मिल रहा था। भैया के आकस्मिक निधन के बाद गाँव में माई के रहने के अनुकूल माहौल नहीं रह गया था। भैया माई का खूब ख्याल रखते थे। उनकी मृत्यु से परिवार का ताना-बाना बुरी तरह बिखर गया। उनकी मौत बहुत रहस्यमय तरीके से हुई थी। प्रौढ़ावस्था तक वे बिल्कुल सात्विक विचार और व्यवहार के रहे थे। उन्हें सुपाड़ी से भी नशा आ जाता था। रिटायरमेंट के कुछ साल पहले अपने एक पियक्कड़ सहकर्मी की संगति में पड़कर जीवन भर निभाये व्रत को न जानें क्यों और कैसे तोड़ बैठे।

एक कहावत है, ‘नया मियाँ प्याज अधिक खाता है।’ पीने की बुरी लत लग गयी। रोज पीने लगे। सेवा निवृति के बाद घर पर रहने लगे, फिर भी आदत नहीं छूट सकी। गाँव के जो ‘शौकीन’ लोग कभी उनकी छाया से भी डरते व परहेज करते थे, उनकी तो जैसे निकल पड़ी। भुक्खड़ पियक्कड़ों ने उन्हें ऐसा घेर लिया कि समय-कुसमय और लिकर की क्वालिटी तक की मर्यादा नहीं रह गयी। इसी क्रम में एक रात कुछ षड्यंत्र अथवा हादसा हो गया और भैया हमें छोड़ गये। लालबहादुर शास्त्री की तरह मौत के बाद उनका शरीर नीला पड़ गया था।

  भैया के गुजर जाने के बाद बड़े भतीजे सर्वेश ने अपनी नयी लगी नौकरी छोड़कर घर पकड़ लिया। कुछ दिनों बाद मैंने उसे नौकरी पर जाने को कहा तो उसने यह कहकर मुझे निरुत्तर कर दिया कि “गाँव का जमीन-जायदाद कौन देखेगा? नौकरी में जितना वेतन मिलता है, उससे ज्यादा तो खेती में उपजा लेंगे चाचा।” सो उसने गाँव की गृहस्थी सँभाल ली। छोटा भतीजा सौरभ पहले ही से रेलवे पुलिस में काम कर रहा था।

  अब माई को अपने साथ रखने का संकल्प लेकर कहलगाँव ले आया। कुछ दिनों के लिए उन्हें छोटी बहन अंजू अपने साथ मुम्बई ले गयी थी, जहाँ वे बीमार हो गयीं; शरीर से उतना नहीं, जितना मन से। वे भावनात्मक रूप से कमजोर हो गयी थीं। पता नहीं मुम्बई में वे किन लोगों से मिलती रही थीं, जिन्होंने उनके जेहन में कचरा भर दिया था। उनके मन में गहरी असुरक्षा की भावना घर कर गयी थी। उन्हें लगने लगा था कि शरीर गिर जाने पर सभी उन्हें त्याग देंगे। परंपरावादी सोच के कारण बहुओं के प्रति वे शुरू से ही शंकालु रही थीं, अब अपनी संतानों पर भी उनका भरोसा नहीं रह गया था। वस्तुतः माई मनोरोगी हो गयी थीं। उनकी बोली बहुत कड़वी हो गयी थी। स्नेह और अपनापन उनके व्यवहार से विलुप्त हो गया था।

उनके अविश्वास का यह आलम था कि वे बहुओं पर तोहमत लगातीं कि उनके बेटों को वे ठीक से खाना भी नहीं देती हैं। शंका निवारण के लिए वे हमारे खाने की थाली और बहू की थाली की जाँच करने लग गयी थीं। साल के आठ-नौ महीने मेरे साथ और शेष दिनों छोटे भाई संजय के पास बोकारो में रह रही थीं। हम दोनों भाई उनकी मानसिक दशा से अवगत थे, इसलिए उनकी कड़वी बातों को हँसकर टाल देते थे, किन्तु बहुएँ सबकुछ जानते-समझते हुए भी बुरा मान जाती थीं। घर में काम करने वाली नौकरानी का तो और भी बुरा हाल हो गया था। काम करके लौटते समय माई उस गरीब की कभी-कभी जामातलाशी लेने लगी थीं। उसे हम दोनों समझाते रहते थे।

         पोस्टमैन कोई डाक दे जाता तो माई की जिज्ञासा का समाधान करना पड़ता था कि वह डाक किस सिलसिले में है। एक दिन कॉलेज की छुट्टी से सम्बंधित एक पत्र फाइल के बाहर टेबल पर पड़ा हुआ उन्हें मिल गया था। पढ़ना उन्हें आता था, किन्तु कार्यालयी भाषा की समझ तो बिल्कुल ही नहीं थी। उनके मन में बैठ गया कि मैंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है। दुश्चिंता के मारे वे उन्मादग्रस्त हो गयीं और बड़बड़ाने लगीं कि अब मैं परिवार कैसे चलाऊँगा? उनका भरण-पोषण कैसे करूँगा? ऐसे ही, नीचे गेट खोलकर कोई फुलवारी में घुसता तो हड़बड़ाकर दरवाजा खोल देतीं और आगंतुक से जवाबतलब करतीं। अब उनसे साड़ी नहीं सँभलती थी। हमने काफी सोच-विचार करने के बाद उन्हें नाइटी पहनाने का निश्चय किया। लेकिन इसके लिए उन्हें मनाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।

उनके लिए यह मानना अत्यंत कठिन था कि कोई स्त्री सिर पर आँचल लिये बिना कैसे रह सकती है! उनसे समझौता किया गया था कि घर से बाहर के लोग आयें तो उन्हें चुन्नी ओढ़ा दी जायेगी। घर के जिस बिचले तल में हम रहते हैं, उसमें कहीं ठेस-ठोकर लगने की गुंजाइश नहीं छोड़ी गयी है, फिर भी हमें इस बात का डर था कि माई कहीं कपड़े में उलझकर गिर न पड़े। सुधा ने उनकी सभी नाइटी को नीचे से मोड़कर एड़ी से तीन इंच ऊपर कर दिया था। कई बुजुर्गों का हाल देखा हुआ था कि जो गिरकर चोटिल हो जाते हैं, भले ही हड्डियाँ सही सलामत हों, फिर उठ नहीं पाते हैं। चोटिल होने के बाद उनकी शैय्या मरण-शैय्या बन जाती है।

  सावधानी खूब बरती जा रही थी, पर होनी को कौन टाल सकता है! एक दोपहर में माई को खिलाकर हम दोनों खाना खाने बैठे ही थे कि पोस्टमैन ने एक डाक पहुँचा दिया। बैंक का चेकबुक आया था। मैंने उसे सामने ही शोकेस पर रख दिया। मेरे वहाँ से हटते ही माई हड़बड़ाकर उसे देखने उठीं और वही हो गया जिसका डर था। उनके पैर में पैर लड़ गया या जानें क्या हुआ कि वे धड़ाम से गिर गयीं और फिर अपने से नहीं उठ सकीं। पहली बार माई को गोद में उठाकर बिछावन तक ले जाने का मौका मिला। दुबली हो जाने के बावजूद उनका वजन मेरी क्षमता के बाहर लगा था। मुझे महसूस हुआ कि अब मैं बूढ़ा और कमजोर हो गया हूँ। चिकित्सक ने बताया कि माई की हड्डी नहीं टूटी है, केवल चोट है।

उम्मीद थी कि आराम और दवा के सेवन से कुछ दिनों में वे पहले जैसी स्थिति में आ जायेंगी। पर वैसा नहीं हो सका। केवल कुर्सी या कमोड पर बैठ सकने लायक रिकवरी हो पायी थी। दुर्भाग्यवश उसी समय कोविड 19 की पहली लहर शुरू हो गयी और लॉकडाउन लगा दिया गया। अब जो भी होना था, वह घर में ही होता। हम दोनों उनकी सेवा-सुश्रुषा में अपने को अशक्त महसूस कर रहे थे। सहयोग के लिए कोई महिला नर्स या प्रशिक्षित दाई की जरूरत थी, जो इस वैश्विक आपदा में असम्भवप्राय था। दर्जनों हितैषियों के प्रयास से तीन महीने बाद एक प्रशिक्षित दाई मिल सकी थी। इस बीच दिन-रात माई की सेवा करते हम दोनों लगभग बीमार हो चले थे। लॉक डाउन के कारण किसी भाई-बहन को बुलाना भी सम्भव नहीं था।

       इन दिनों टॉयलेट से आने, नाश्ता-भोजन करने के बाद माई घंटा- दो घंटा कुर्सी पर बैठती थीं और मैं प्रायः उनके पैरों के पास फर्श पर बैठकर उनके मन के लायक बातें किया करता था। कभी कुछ ज्यादा मक्खनबाजी कर देता तो हँसकर कहतीं, “लबड़ा कहीं के! बात बनाके भरमाता है हमको।”

एक रात सोने से पहले बुलाकर बोलीं, “आओ, बैठो। एक बात कहते हैं, सुनो!”

“हाँ माई, कहो।”

“गाँव में बाप-बाबा के छोड़ल जमीन-जगह है। उसको कौन देखेगा?”

“माई अभी जैसे सर्वेश देखता है। वही देखेगा।”

“न! ऊ बात नहीं। पैसा का काम लगे तो बेचना नहीं। पुरखा-पती के निशानी है। बचाके रखना।”

“माई, काहे बेचेंगे। अब हमको पैसा का कौन काम है? बेटी-बेटा ब्याह लिये, घर बना लिये। एगो तुम हो तो इसके लिए वेतन-पेंशन काफी है।”

“सो ही कहे। बेचना मत!” माई ने इस तरह मुझे उस दिन वचनबद्ध कर दिया।

       चरणबद्ध तरीके से लॉक डाउन खोला जाने लगा था। तयशुदा रूटीन के अनुसार सबकुछ चल रहा था कि एक दिन लगभग चार बजे माई की तबीयत बिगड़ गयी। लक्षण के हिसाब से उर्ध्वसाँस चलने लगी थी। मैंने एक तरफ से सभी रिश्तेदारी में खबर कर दी। आसपास वाले तो उसी रात आकर देख गये; अगली सुबह से रात तक लोगों का ताँता लगा रहा। लगभग 36 घंटे माई की स्थिति यथावत बनी रही। न सुधार और न गिरावट। पिछले कई महीने से रोज रात में मैं ही उनके साथ सोता था; उन दो रातों में सिरहाने में गंगाजल रखकर सोया था कि अंतिम समय पिलाने का सौभाग्य मिल जाये। किन्तु, तीसरी सुबह अचानक उनकी चेतना लौट आयी। वे उसी हालत में आ गयीं, जैसी दो दिन पहले थीं। छोटा भाई सपरिवार और एक बहन मीना कुछ दिन रुक गयी थी। फिर एक पखवाड़े बाद सभी चले गये थे।

  एक रात सोने से पहले उन्होंने बैठाकर बात करने की इच्छा व्यक्त की। बोलीं, “रे बउआ, सुन! तुमको पाप लिखेगा।”

“काहे माई! सेवा में कुछ त्रुटि हुई क्या, जो ऐसा श्राप देती हो?”

“नहीं, सराप नहीं देते हैं। तू हमको गिरफदार करके रखे हो। हम खाली तुमको ही जनमाए हैं क्या? तेरे आउर भाई-बहिन को भी तो सेवा का अधिकार है की नहीं?”

“माई, इतना इंतजाम और कहाँ होगा? कहाँ पहुँचा दें तुमको? जिसको सेवा करना है, यहीं आकर करे।”

“नहीं, हमको गाँव पहुँचा दो। जिसको आकर सेवा करने का मन होगा, ऊहें आयेगा। हम वहीं तोरे बाबूजी के घर में मरना चाहते हैं।”

अधिक ना-नुकुर की गुंजाइश नहीं थी। यह ईश्वरीय आदेश ही था मेरी दृष्टि में। सुधा को आपत्ति थी। वहाँ इतनी व्यवस्था कैसे होगी; फिर लोग क्या कहेंगे! मुझे लोगों की परवाह नहीं थी। केवल व्यवस्था देखनी थी। वहाँ भौजी थीं, बड़ी बहू थी और सर्वेश था देखने के लिए। केवल माई का बोझ उठा सकने के लायक मजबूत कद-काठी वाली एक नौकरानी की आवश्यकता थी। संजय ने कहा कि वह सोनाली को माँ के साथ रहने के लिए छोड़ देगा। सर्वेश ने नौकरानी ठीक कर ली। 14 सितम्बर 2020 को हमने माई को गाँव पहुँचा दिया था। तीन दिन दवा, रूटीन आदि समझाकर मैं वापस कहलगाँव लौट आया था। कई बार मन में आशंका पनपी थी कि माई को गाँव पहुँचाने का निर्णय कहीं गलत तो नहीं था?

        बेटा-बहू और बेटी-जमाई नोएडा में एक ही सोसायटी के अलग-अलग फ्लैट में रह रहे थे। बहू चिकित्सारत थी। उसे सासु माँ की जरूरत थी। हम माई की बीमारी के कारण दो साल से बच्चों के पास नहीं जा सके थे। सो माई के गाँव में रहते हमारे नोएडा जाने का कार्यक्रम बन गया। ट्रेन से यात्रा करने का साहस नहीं था। पटना तक कार से जाकर वहाँ से फ्लाइट लेने का विचार हुआ और हम नोएडा पहुँच गये। इस दौरान मेरे पहले सफल शोधार्थी मनोज के ऑनलाइन वायवा की तिथि 12 अक्टूबर को निश्चित हो गयी थी। उसके लिए मुझे 10 तक कहलगाँव लौट आना था। बच्चों की जिद पर सुधा को वहीं छोड़कर मैं पटना होते अपनी कार लिये 10 तारीख को कहलगाँव आ गया था।

       12 अक्टूबर को ऑनलाइन वायवा में एक्सपर्ट विश्वभारती की प्रो0 मंजू रानी सिंह ने अस्वस्थता के बावजूद सहयोग किया, जिसके चलते मनोज को पीएचडी उपाधि मिल गयी। 13-14 अक्टूबर की मध्य रात्रि में सर्वेश का फोन आया, “चाचा, ईया नहीं रहीं। अभी 10 मिनट पहले साँस रुकी है।” मैंने उसी समय उसे कह दिया कि सारी व्यवस्था करके रखे। मैं 10 बजे तक घर पहुँच जाऊँगा। आधी रात को किसी को जगाकर दुखद खबर देना मुनासिब नहीं था। सुबह प्रस्थान करने की तैयारी के क्रम में लगातार फोन करके रिश्तेदारों को सूचना देता रहा था। 11 बजे घर पहुँचा तो दरवाजे पर हितैषियों की भीड़ लगी थी और सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी।

      बिना विलम्ब के शवयात्रा शुरू हो गयी। छोटी नौकाओं से नेशनल हाईवे पर जाकर फिर ट्रैक्टर ट्रॉली से पुल तक गये थे। वहाँ से बड़ी मोटर बोट से कोसी-गंगा के संगम पर जाकर माई का दाह संस्कार किया गया था। मुखाग्नि मैंने दी थी और श्मशान में सम्पूर्ण कर्मकाण्ड के दौरान मन में एक पछतावा था कि सब दिन यथासंभव सेवा की, किन्तु देह त्यागने के समय मैं माई के पास नहीं रह सका! माई को गंगाजल भी नहीं दे सका! बाबूजी के देहावसान की तरह इस बार भी मैं रो नहीं रहा था। लगता था कि यह मृत्यु हमारे लिए जो भी हो, माई के लिए तो अच्छी थी। वे लगभग एक साल से बहुत कष्ट में थीं। उन्हें तकलीफ से मुक्ति मिल गयी थी।

       हमारे खानदान में ‘कर्ता’ 24 घंटे में केवल एक बार मीठी खीर खा सकता है वह भी बिना नमक के। सेंधा नमक भी अनुमत नहीं है। मैं निम्न रक्तचाप का मरीज हूँ। प्रतिदिन अतिरिक्त नमक का सेवन जरूरी है। तीसरे दिन ही मेरी हालत खराब होने लगी। संजय को कह दिया था कि श्राद्धकर्म की जिम्मेवारी उसे सौंप दूँगा, पर वह चौथे दिन आया था, जिसके कारण बाधा उत्पन्न हो गयी। कर्ता की जिम्मेवारी ‘तीन नहान’ अथवा ‘सत नहान’ के दिन ही सौंपी जा सकती है। मैं झेलने की सीमा पार कर चुका था। शरीर में ताकत का यह आलम था कि आवाज तक बैठ गयी थी। मैं कह रहा था कि “मुझे माई का श्राद्ध कर्म करना है। माई के पीछे-पीछे स्वर्ग नहीं सिधारना है।” बुजुर्गों और पंडित से विशेष अनुमति लेकर सेंधा नमक खाना शुरू किया, पर एक ही दिन में महसूस हो गया कि सेंधा नमक किसी भी हाल में साधारण नमक का विकल्प नहीं है।

      सत नहान के दिन अनुज संजय को विधिवत उत्तरीय सौंप देने के बाद मेरे प्राण लौटे थे। पंद्रह दिवसीय श्राद्ध के सम्पूर्ण कर्मकाण्ड में हमने खानदानी परम्पराओं का अक्षरशः पालन किया था। बाबा के कुनबे के सभी सदस्यों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया गया। लगभग सभी लोग जुट भी गये थे। वे भी, जिन्होंने एक दशक पहले से घर का नाम लेना तक छोड़ दिया था। मरकर अपने पूरे कुनबे को अपनी जड़ों से जोड़ गयीं थीं माई। अब शायद कभी वैसी जुटान का कोई अवसर परिवार में नहीं आ पायेगा।

       माई का अंतिम आशीर्वाद तो कह सकते हैं कि मनोज को ही मिला कि उसकी पीएचडी पूरी हो गयी। पहले के मेरे दो शोधार्थी भगोड़ा व लेटलतीफ निकल गये। यदि उन दोनों ने काम कर लिया होता तो मैं पिछले साल सम्पन्न हुई प्रोन्नति प्रक्रिया में सफल होकर यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बन गया होता। ऐसी धांसू प्रोन्नति हुई थी कि योग्य लोगों के साथ-साथ कुछ ‘कुर्सी-टेबल’ तक वैतरणी पार हो गये थे। मेरे साढ़ू भाई प्रो0 प्रताप नारायण सिन्हा कहा करते हैं, “काम हो जाए तो अच्छा, और न हो तो और भी अच्छा!” अपने दुखों को कम करने और असंतोष से बचने के लिए मैं इस सिद्धांत को मानता हूँ कि ‘ईश्वर जो भी करते हैं, अच्छे के लिए ही करते हैं।’ मैं यूनिवर्सिटी प्रोफेसर नहीं बन सका, इसमें केवल एक हानि है कि बीसेक हजार रुपये वेतन कम मिल रहा है। बाकी सब लाभ ही लाभ है।

आमदनी की कमी की भरपाई इच्छाओं को सीमित करके और फिजूलखर्ची में कटौती करके की जा सकती है, किन्तु प्रोन्नति के कारण जो तनाव मिलता, वह जानलेवा हो सकता था। प्रोमोशन मिलने के बाद मुझे या तो अपने कॉलेज में प्रभारी प्राचार्य का दायित्व लेना होता अथवा विश्विद्यालय में विभागाध्यक्ष बनना पड़ता। आज के दौर में सरकारी कार्यालयों की कार्यसंस्कृति में मैं किसी भी संस्था के प्रधान पद के लिए अनफिट व्यक्ति हूँ। जिस प्रकार सरकारी सेवकों में से अधिकांश लोग काम नहीं करने का वेतन लेते हैं और काम करने के लिए घूस लेते हैं, वैसे में या तो मार-पिटाई करके निलंबित हो जाता अथवा तनावग्रस्त होकर किसी गम्भीर बीमारी का मरीज हो जाता। आयु क्षीण होने में तो कोई शक ही नहीं है। सो संतुष्ट और स्वस्थ हूँ इसलिए कि यूनिवर्सिटी प्रोफेसर नहीं हो सका।

इस साल पुनः प्रोन्नति प्रक्रिया शुरू हुई है। सारी अहर्ताएँ पूरी हो चुकी हैं। आवेदन पत्र जमा कर चुका हूँ। सबकुछ ठीक रहा तो प्रोन्नति मिल जायेगी। भूतलक्षी प्रभाव से, उस दिन से जब मनोज की मौखिकी सम्पन्न हुई यानी माई की पुण्यतिथि के दिन से। माई के आशीर्वाद से अपना और मित्रों का यह अरमान भी पूरा हो जायेगा। हालाँकि अपने करियर में इस कमी को मैं किसी सुंदर चेहरे को बुरी नजर से बचाने वाले दिठौना के समान मानता हूँ। आखिर एक आदमी के जीवन में कितना कुछ अच्छा-अच्छा चाहिए। बड़े और ऊँचे ओहदेदार खानदान में जन्म हुआ, आदर्श पूर्वज मिले, अच्छे भाई-बहन मिले, बचपन से जवानी तक सुख में बीता, कई जीवन निर्माता गुरुजन मिले, जीवन पर्यन्त जुड़े रहने वाले सुख-दुख के साथी दर्जनों अच्छे दोस्त मिले, मनोरमा पत्नी मिलीं, संस्कारवान बच्चे मिले, श्रद्धा और आदर देने वाले सैकड़ों योग्य शिष्य मिले, स्वस्थ और सक्रिय काया बनी हुई है। किसी की बुरी नजर न लग जाये, इसी कारण यह कमी विधाता ने छोड़ दी है, जिसमें मेरा कल्याण छिपा है, ऐसा विश्वास है।

       दो साल पहले एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में भाई लोगों ने मुझे भागलपुर विवि शिक्षक संघ (भूटा) का महासचिव बना दिया। इसके पूर्व तिलकामांझी भागलपुर विवि का विभाजन करके मुंगेर विवि की स्थापना की गयी थी। अविभाजित विवि में कुल 29 अंगीभूत कॉलेज थे। 17 कॉलेज मुंगेर को और 12 भागलपुर को मिले। विभाजन के बाद कोसी कॉलेज खगड़िया में पूर्व महासचिव प्रो0 आनंद कुमार ने परिनियमित अधिवेशन में दोनों विवि के संघों का पुनर्गठन करवा दिया था। भागलपुर के लिए मेरा और मुंगेर के लिए मित्र डॉ0 हरिश्चंद्र शाही का महामंत्री पद पर सर्वसम्मति से चयन किया गया। भागलपुर के अध्यक्ष पद पर डॉ0 मिहिर मोहन मिश्र को दुबारा चुना गया। दरअसल मेरे चयन की पृष्ठभूमि अपने कॉलेज में किये गये संघर्ष में तैयार हुई थी। मेरे कॉलेज में सीनियर होने के कारण प्रभारी प्राचार्य के पद पर एक सर्वथा अयोग्य, दुश्चरित्र, अहंकारी व अत्याचारी व्यक्ति काबिज हो गये थे।

इस कारण चमचों के सिवा अधिकांश शिक्षकों का दम घुट रहा था। छः माह तो जैसे-तैसे चलता रहा, किन्तु उसके बाद उन्होंने सहकर्मियों को प्रताड़ित व अपमानित करना शुरू कर दिया, जिसकी गम्भीर प्रतिक्रिया हुई। मैं कॉलेज संघ का सचिव और विवि संघ का प्रक्षेत्रीय मंत्री था, सो मुझे संघर्ष की राह चुनने की अनिवार्यता आ गयी थी। नेतृत्व मुझे ही करना था, सो पूरे  दम-खम से किया। संघर्ष चार महीने तक चला जिसमें कई लोग पाला बदलते गये। संघ को कॉलेज से विश्वविद्यालय तक सत्याग्रह करना पड़ा था। अन्ततः कुलपति प्रो0 रमाशंकर दुबे को प्रभारी बदलने का निर्णय लेना पड़ गया था। नये प्रधानाचार्य के योगदान के दिन हाईवोल्टेज ड्रामा हुआ था। वह ढीठ कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं था। मुझे कुलपति जी ने फोन पर आदेश दिया कि उसे कालर पकड़कर कुर्सी से उतार दूँ। मैंने वैसा न करके प्रशासन की मदद ली और पुलिस ने बलपूर्वक उस निर्लज्ज को उठाया था।

           इस बहुचर्चित कांड में मेरी निर्णायक भूमिका को देखकर सदस्यों ने मुझे संघ चलाने का दायित्व सौंपा है। इस माध्यम से अब मैं AIFUCTO का कार्यकारिणी सदस्य हूँ। नवम्बर 2019 में महासंघ के भुवनेश्वर सम्मेलन में भाग लेकर बिहार के शिक्षकों की ओर से बोलने का दायित्व निभाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बिहार के विश्वविद्यालयों की समस्याओं की कथा तो अंतहीन है। सबसे बड़ी समस्या शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों की कमी है। सभी विश्वविद्यालयों में 60 प्रतिशत स्वीकृत पद रिक्त पड़े हैं। वर्षों से नियमित प्रधानाचार्यों की नियुक्ति नहीं हुई है। बिना योग्यता के केवल भाग्य भरोसे प्रभारी बन जाने पर आचार्यगण आग मूतने लगते हैं। साधनहीनता के सम्बंध में अधिक कहने की जरूरत नहीं है, ‘सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठा’।

ऐसा है कि सरकारें प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था का तो सत्यानाश कर ही चुकी हैं, अब लगभग चार दशकों से बड़े ही सुनियोजित ढंग से उच्च शिक्षा की जड़ों में मट्ठा ढारने का एक सूत्री कार्यक्रम चल रहा है। इस मामले में अपवाद कोई राजनेता या पार्टी नहीं है। आखिर सभी को तो अपने पीछे झोला-झंडा लेकर डफली बजाने वाले उन्मादी मूर्खों की भीड़ चाहिए। सभी इस बात के लिए सचेष्ट हैं कि जनता भूल से भी कहीं शिक्षित न हो जाए! शिक्षा को बचाने की जिम्मेवारी हम शिक्षकों की है, किन्तु शिक्षक सुविधाभोगी और आलसी हो गये हैं। छठा वेतनमान मिलने के बाद संघ के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कुछ गिने-चुने लोग ही कर रहे हैं।

आम शिक्षक यह नहीं जानते-मानते हैं कि आज जो भी मिल रहा है, वह संघ के लम्बे संघर्ष का परिणाम है। सातवें वेतनमान की प्राप्ति के पश्चात स्थिति और भी शोचनीय हो गयी है। संघ के प्रति कर्तव्य की उन्हें कोई परवाह नहीं है। हाँ, अधिकार के लिए वे जरूर चिंतित रहते हैं और तभी संघ की याद आती है। शिक्षकों की नयी पीढ़ी इस रोग से ज्यादा ग्रस्त है। शायद वे इस बात से अवगत नहीं हैं कि नयी शिक्षा नीति के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद उनकी दशा बहुत खराब हो जाने वाली है। लगातार चोट करते-करते एक तो विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लगभग खत्म कर दिया गया है, आगे और भी बुरे दिन आने वाले हैं। यह भी नौबत आ सकती है कि विश्वविद्यालय के आचार्यों के आचरण का प्रमाणपत्र कोई अँगूठा छाप मुखिया या सरपंच लिखेगा।

          कोरोना काल सम्पूर्ण मानवता के लिए बहुत भयावह और पीड़ाजनक बीता। ज्ञात इतिहास में मानव समाज को इतनी बड़ी कोई अन्य आपदा नहीं झेलनी पड़ी थी। इस आफत ने संसार के सभी मनुष्यों को कमोबेश जरूर प्रभावित किया है। व्यक्तिगत रूप से 2020 का लॉकडाउन हमारे लिए उतना डरावना नहीं रहा था। संक्रमित हो जाने का भय अवश्य था किंतु अपने किसी नजदीकी व्यक्ति को खोने की पीड़ा भोगने की नौबत नहीं आयी थी। 2021 के अप्रैल में जो दूसरी लहर आयी, उसने तो जीवन पर से भरोसा ही उठा दिया। इस बार शायद ही कोई हो जो बीमार न पड़ा हो अथवा जिसने किसी अपने को न खोया हो। इस वैश्विक महामारी ने मानव-चरित्र की गिरावट और ऊँचाई दोनों की चरमावस्था के दर्शन करा दिये।

कहीं मनुष्य गिद्ध के रूप में नजर आया तो कहीं देवदूत के रूप में। भुक्तभोगी मानव समुदाय को कोविड ने उसकी असली औकात भी बता दी और मौत ने धरती पर गरीब-अमीर का भेद मिटा दिया। सारे सरंजाम और संसाधनों के रहते हुए भी मनुष्य की बेबसी और लाचारी जीवन की क्षणभंगुरता को परिभाषित कर रही थी। देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से सोशल मीडिया के माध्यम से इतनी दर्दनाक और विचलित कर देने वाली तस्वीरें और खबरें आ रही थीं कि जिन्हें कोई कभी याद करना नहीं चाहेगा और चाहकर भी भूल नहीं सकेगा। मानवता, विकास और विज्ञान के चेहरे पर लगे गहरे जख्म का कभी न मिट सकने वाले निशान जैसे! बाहरहाल, मौत के बीच भी जीवन चलता ही रहता है। भूलना तो असम्भव है, किन्तु इस त्रासदी को एक दुःस्वप्न मानकर इससे मिली सीख के साथ हमें आगे बढ़ते जाना होगा।

       दूसरी लहर के दरम्यान बचाव के लिए स्वदेशी टीके का जनता के लिए उपलब्ध हो जाना हम देशवासियों के लिए गौरव की बात रही। हम दोनों ने ससमय कोवैक्सिन के दोनों डोज ले लिये। इसके बाद निश्चित रूप से भय कम हुआ और आत्मविश्वास में गुणात्मक वृद्धि हुई है। दूसरी लहर में हम दोनों के साथ बिटिया भी बीमार हुई। जाँच में भारी गोलमाल चल रहा था, इस कारण हमने जाँच नहीं करवायी। सारे लक्षण स्पष्ट थे। शंका की गुंजाइश बिल्कुल नहीं थी। कुछ एलोपैथी, होम्योपैथी और घरेलू उपचारों के सहारे हमने कोविड को हरा दिया। मुझे अंदेशा था कि यदि सुधा जान जाती कि पॉजिटिव हैं तो शायद हदसकर दम तोड़ देती। बैंगलोर में बेटे और बहू को भी कोरोना हुआ तो हमें बहुत डर नहीं लगा, यह सोचकर कि जब हमने झेल लिया तो वे भी पार पा जायेंगे।

      कोरोना की दूसरी लहर में लगे लॉकडाउन का मेरे लिए एक सकारात्मक पक्ष भी रहा। बैठे-ठाले पहले रेणु रचनावली को लगभग नब्बे प्रतिशत पढ़ गया। पिछले साल रेणु का जन्मशती वर्ष मनाया गया था। कई संस्थाओं ने मेरे इस प्रिय लेखक पर वेबिनार का आयोजन किया था, कुछ में मैंने भागीदारी की। अपने विवि के हिन्दी विभाग में विभागाध्यक्ष प्रो0 योगेंद्र ने सेमिनार कराया, जिसमें सक्रिय सहयोग करने का अवसर मिला। इसमें अपने शिक्षक और विख्यात समीक्षक प्रो0 रविभूषण सहित मित्र प्रो0 सुरेंद्र नारायण यादव, प्रो0 बहादुर मिश्र, प्रो0 आशुतोष, संपादक किशन कालजयी, कथाकार डॉ0 रविशंकर सिंह आदि को सुनने का अवसर मिला। सुरेंद्र जी ने रेणु साहित्य के मर्मज्ञ के रूप में पहचान बना ली है।

दर्जनों साहित्यिक पत्रिकाओं के रेणु विशेषांक पिछले साल निकाले गये, जिनमें निर्विवाद रूप से किशन जी के ‘संवेद’ का विशेषांक सर्वोत्तम रहा। इसका परायण भी बंदी के दरम्यान कर गया। हाल में भारत यायावर की लिखी रेणु की जीवनी का पहला खंड मंगवाया और पढ़ गया। इतना कुछ पढ़ते-सुनते मेरा लेखक बेचैन हो रहा था। एक दशक से टेबल के दराज में पड़ा मेरा लैपटॉप अपने उद्धार की बाट जोह रहा था। दृढ़ संकल्प के साथ उसपर हाथ साफ करने का उद्यम शुरू किया। कम्प्यूटर के जानकार चेलों की मदद से उसमें अपने काम के कुछ सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करवाये और युवावस्था से स्थगित पड़े कई कथानकों पर एक ही साथ काम शुरू कर दिया। रोज सुबह चार-पाँच घंटे बैठने का अभ्यास कठिन था, पर इच्छाशक्ति प्रबल थी सो इसे साध लिया। दिनानुदिन कीबोर्ड पर उंगलियाँ तेज चलने लग गयीं।

        ‘दास्तान-ए-दंगल सिंह’ शृंखला को पढ़कर कई साहित्यकार मित्रों ने निरंतर मेरा मनोबल बढ़ाने और प्रेरित करने का अथक प्रयास किया है। मुझे भी यह भरोसा हो गया है कि सृजनात्मक लेखन में किसी हद तक सफलता मिल सकती है। वर्षों से लम्बित पड़ी योजनाएँ तो हैं ही; इधर कोरोनाकाल में घटित होने वाली कुछ लोमहर्षक घटनाओं ने इतना उद्वेलित कर दिया कि यदि मैं कवि होता तो कालिदास की तरह विवश कविता फूट पड़ती। खैर, कविता तो नहीं फूटी, एक कहानी बन गयी। युवावस्था में एकाध बार कोशिश की थी। रेणु से प्रभावित होकर एक उपन्यास ‘कोसी का कछार’ नाम से शुरू किया था पर पूरा नहीं कर पाया। इस बार 65 की उम्र में पहली परिपक्व कहानी गढ़ सका ‘पवन बहे उनचास’। संवेद के वेब पोर्टल पर कहानी छपी तो काफी चर्चा हुई। साहित्यकार मित्रों ने सराहना करके लिखते रहने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकरण के कारण मन बढ़ गया है और लिखने में मजा आने लगा है। लगभग रोज ही दो-चार पन्ने लिख रहा हूँ। अब जबतक आयु और स्वास्थ्य साथ है, सृजन चलता रहेगा।

      इधर कॉलेज में प्रभारी प्राचार्य के पद पर जल्दी-जल्दी बदलाव होता रहा है। कोई छः महीने तो कोई एक साल के लिए पदभार ग्रहण करते हैं। मेरी बारी न आनी थी, न आयी। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में प्रभारी डॉ0 संगीता झा को विवि में विभागाध्यक्ष बना दिया गया। उनकी इच्छा के विपरीत उन्हें वहाँ योगदान करना पड़ा। फिर डॉ0 मीना कुमारी साह प्रभारी बनीं। कुछ ही दिनों बाद वे गम्भीर रूप से बीमार हो गयीं। उन्हें लम्बा चिकित्सावकाश लेना पड़ा। वही बात हो गयी, ‘तेरे मन कुछ और है बिधना के कुछ और’। चाहता था कि सेवानिवृति के पहले पेंशन आदि से सम्बंधित कागजात जमा करके बची हुई जमा छुट्टियों का सदुपयोग करते हुए दोनों प्राणी बच्चों के पास चले जायें। किन्तु मैडम की अस्वस्थता ने फँसा दिया। प्रभारी के रूप में वह भोग भोगना पड़ गया, जिससे अबतक बचता आया था। एक बड़ी बात यह हुई कि सुधा की एक मुराद पूरी हो गयी। मेरी भावनाओं के साथ रहते हुए भी इनकी इच्छा थी कि भले ही मुझे प्राचार्य की कुर्सी पर बैठना न पड़े, किन्तु एक बार भी राष्ट्रीय त्योहार में राष्ट्रध्वज फहरा लूँ। 2021 के स्वतंत्रता दिवस समारोह में मैंने तिरंगा फहराने की उनकी कामना पूरी कर दी।

       31 जनवरी 2022 को अवकाश ग्रहण कर रहा हूँ। जैसे-जैसे वह दिन निकट आ रहा है, कॉलेज के प्रति मोह बढ़ता जा रहा है। जिस संस्थान की सेवा की उसके विकास के लिए चिंतित हूँ, क्योंकि चिंता करने वाले लोग अब अपवाद स्वरूप ही बचे हैं। चिंता करने वाले लोगों को अब अधिकांश निश्चिंत लोग पसंद भी नहीं करते हैं। यह देखकर व्यथित रहता हूँ, पर विद्यार्थियों की पढ़ाई की फिक्र भी बढ़ गयी है। अधिक पढ़ाने का मन होता है। हिन्दी ऑनर्स के विद्यार्थियों को आवंटित वर्गों के अतिरिक्त भी पढ़ा रहा हूँ। बच्चे दूर-दराज से अपेक्षाकृत अधिक संख्या में आ भी रहे हैं, जिनमें 95 प्रतिशत लड़कियाँ हैं।

सम्पूर्ण सेवाकाल में यह इच्छा बलवती रही है कि प्रत्येक बैच में दो-एक ऐसे विद्यार्थी जरूर निकलें जो स्वेच्छा और अपनी रुचि से हिन्दी के शिक्षक बनें। मैं मानता हूँ कि बच्चों के भविष्य के निर्माण में भाषा और गणित के अच्छे शिक्षक का महत्वपूर्ण योगदान होता है। भाषा सभी प्रकार के ज्ञान का स्रोत और आधार है। वर्तनी और व्याकरण के प्रति आज की नयी पीढ़ी में उपेक्षा का भाव है। साहित्यकार भी इसकी परवाह नहीं करते हैं। ऐसा ही चलता रहा तो भाषा में अराजकता फैल जायेगी। इसी चिंता के कारण विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम से अधिक भाषा की बारीकियाँ सिखाने का प्रयास करता रहता हूँ। उन्हें अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने के मोह में लगता है कि छुट्टियाँ बची ही रह जायेंगी।

         बिना वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार के कॉलेज का प्रभार मानसिक यातना ही है। विश्वविद्यालय प्रशासन को कॉलेज की समस्याओं से कोई मतलब नहीं है। विश्वविद्यालय में भी एक ‘इंडिया’ और एक ‘भारत’ वाली स्थिति है। तथाकथित प्रीमियर कॉलेजों को चमकाने और आगे बढ़ाने के लिए मुफस्सिल के कॉलेजों के हितों की बलि चढ़ाई जाती है। मुख्यालय से बाहर के कॉलेजों को अपनी मौत आप मर जाने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। इधर मुझ जैसे बिना अधिकार के प्रभारी तनाव से बीमार हो जाने के कगार पर हैं। सारी कमियों के लिए प्रभारी को दोषी ठहराया जाता है और चाहकर भी वह कुछ नहीं कर पाता है।

       अवकाश प्राप्त करने के बाद के जीवन की योजना पर बहुत दिनों से विचार कर रहा हूँ। पहले गाँव की जमीन बेचकर वहाँ से निकल लेने का मन था, किन्तु जबसे बटेश्वर स्थान में पुल बनने की बात आयी और बाद में माई ने वचन ले लिया, तबसे विचार बदल गया है। सर्वे सेटलमेंट के बाद  गाँव में फार्म हाउस बनाने की इच्छा हो रही है। कहलगाँव वाले घर में शिशुओं के लिए ‘संस्कारशाला’ अथवा वरिष्ठ नागरिकों के लिए ‘होम फॉर होमलेस’ खोलने का इरादा है। सक्रिय रहने के लिए उक्त में से कोई काम चुनना ही पड़ेगा। इस बहाने अपना भी सहारा बन जायेगा। समाज की यथासंभव सेवा और साहित्य-सृजन चलता रहेगा, ऐसा संकल्प है। बाकी विधाता की मर्ज़ी!

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