कथित अकथित

अमरीका और ईरान: कल के दोस्त आज के दुश्मन

 

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो विश्व का सत्ता समीकरण उभरा उसमें अमरीका एक महाशक्ति के रूप में सामने आया। एक ऐसी महाशक्ति जिसने विश्व के अधिकांश देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित किया एवं अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक शक्ति का लोहा मनवाया। लेकिन इस वैश्विक सत्ता समीकरण का दिलचस्प पक्ष भी सामने आया। अमरीका को जहाँ सोवियत संघ जैसी एक अन्य महाशक्ति से चुनौती मिली वहीं अनेक अपेक्षाकृत छोटे और सामरिक दृष्टि से कमजोर देश भी उसके सामने डट कर खड़े हो गए। इन देशों में हम वियतनाम, क्यूबा, उत्तर कोरिया, ईराक और ईरान को शामिल कर सकते हैं। इनमें ईरान की कहानी सबसे दिलचस्प है। एक दौर वह भी था जब ईरान और अमरीका एक दूसरे के पक्के दोस्त थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब अमरीका एक महाशक्ति के रूप में उभरा तो उसकी अपनी वैश्विक कार्य योजना में ईरान का एक महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसका एक कारण था ईरान के पास उपलब्ध तेल का विशाल भंडार। दूसरा कारण अमरीका और सोवियत संघ के बीच की आपसी प्रतिद्वंदिता थी। चूंकि ईरान और सोवियत संघ की सीमाएँ आपस में मिलती थी, सोवियत संघ भी ईरान में एक लंबे अर्से से अपनी दिलचस्पी रखता आया था। अत: अमरीका के लिए यह आवश्यक था कि ईरान को वह पूरे तौर पर अपने प्रभाव क्षेत्र में रखे।

बीसवीं सदी के प्रारंभ में ब्रिटेन ने ईरान के साथ साझीदारी में एंग्लो ईरानियन ऑयल कंपनी की स्थापना की थी। 1951 में ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादिक ने ईरानी संसद के समर्थन से इस कंपनी के राष्ट्रीयकरण का निर्णय लिया। यह बात ब्रिटेन को पसंद नहीं आई। उसने अमरीकी जासूसी संस्था सी.आई. ए. से मिलकर ईरान में सैन्य विद्रोह करा दिया और मोहम्मद मोसादिक को अपने पद से हटना पड़ा।

मोसादिक के हटने के बाद देश की पूरी बागडोर ईरान के राजा शाह मुहम्मद रजा पहलवी के हाथों में आ गई। शाह और अमरीका की मित्रता खूब जमी। शाह सोवियत विरोधी और पश्चिम समर्थक थे। ऐसे में शीत युद्ध के उस दौर में दोनों के बीच प्रगाढ़ मित्रता स्वाभाविक थी। शाह के ज़माने में ईरान और अमरीका की दोस्ती लगातार फलती फूलती रही। 1957 में दोनों देशों के बीच परमाणु शक्ति के शान्तिपूर्ण उपयोग को लेकर एक समझौता भी हुआ। 1967 में अमरीका ने ईरान को एक परमाणु रिएक्टर दिया और ईन्धन के रूप में यूरेनियम भी। मगर आम ईरानी जनता शाह के शासन से नाखुश थी। शासन में अत्यधिक भ्रष्टाचार था एवं निरंकुशता तथा तानाशाही का बोलबाला था। आम लोगों में अमरीका को लेकर काफी गुस्सा था क्योंकि अमरीका की वजह से ही मोसादिक की लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता हुआ था और शाह के हाथ में देश की वास्तविक सत्ता आ गई थी।

आमलोगों के गुस्से की परिणति 1979 की इस्लामी क्रान्ति में हुई। शाह पदच्युत कर दिए गये और उन्होंने ईरान से भाग कर अमरीका में शरण ली। इस्लामी क्रान्ति के नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी ने नए इस्लामी गणराज्य की स्थापना की। इस गणराज्य का रवैया प्रारंभ से ही अमरीका और पश्चिम विरोधी था।

इस क्रान्ति के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने दोनों देशों के हित के रिश्तों में असाधारण कड़ुआह‌ट घोल दी। इस्लामी क्रान्ति के बाद ईरान ने अमरीका से शाह को वापस ईरान भेजने की मांग की ताकि अपने शासन काल के दौरान शाह द्वारा किए गये अपराधों के लिए उन पर मुकदमा चलाया जाए। अमरीका ने इससे साफ इन्कार कर दिया। इससे आम लोगों के बीच यह संदेश गया कि शाह के तथाकथित कुकृत्यों के लिए अमरीका भी उत्तरदायी था। चार नवंबर 1979 के दिन क्रान्ति के समर्थक छात्रों की एक भीड़ ने अमरीकी दूतावास पर आक्रमण कर दूतावास में मौजूद 53 अमरीकी राजनयिकों और नागरिकों को बंधक बना लिया। बंधकों को  444 दिनों तक कैद में रहना पड़ा और 20 जनवरी 1981 के दिन वे मुक्त हो पाए। अमरीका का इस घटना पर शुब्ध होना स्वाभाविक था। अमरीका का मानना था कि राजनयिकों से इस प्रकार का व्यवहार अन्तर्राष्ट्रीय कानून का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था और विद्यार्थियों की इस कारवाई के पीछे नई सत्ता का हाथ था। तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर ने इसे ब्लैकमेल की संज्ञा दी और बंधकों को आतंकवाद और अराजकता का शिकार बताया। अप्रैल 1980 में अमरीका ने ईरान से अपने राजनयिक संबंध समाप्त कर लिए। अभी तक यथास्थिति बनी हुई है और रिश्ते बहाल होने की फिलहाल कोई सूरत नज़र नहीं आती।

आगे की घटनाएँ भी बिगड़ चुके रिश्तों की आग में घी डालने का काम करती रहीं। 1983 में बेरुत स्थित एक बहुराष्ट्रीय सैनिक ठिकाने पर हुए एक हमले में 241 अमरीकी सैनिक मारे गए थे। अमरीका ने आरोप लगाया था कि यह ईरान समर्थित आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह की करतूत थी। अगले ही साल यानि 1984 में अमरीका ने ईरान को आतंकवाद के प्रायोजक देशों की सूची में डाल दिया।

1988 में एक अत्यंत ही दर्दनाक हादसा हुआ। फारस की खाड़ी में तैनात एक अमरीकी युद्धपोत ने ईरान के एक नागरिक विमान को मार गिराया। इस विमान में 290 यात्री थे जो हज के लिए मक्का जा रहे थे। सभी यात्रियों की मृत्यु हो गई। विमान अपनी पूर्व निर्धारित उड़ान पर था और ईरानी समुद्री सीमा के भीतर था। अमरीका ने सफाई दी कि उसने नागरिक विमान को सैनिक लड़ाकू विमान समझ लिया था। उन दिनों ईराक ईरान के बीच युद्ध चल रहा था और अमरीका अपना समर्थन ईराक को दे रहा था। अमरीका के अनुसार उसे अपने युद्ध‌पोत पर ईरानी हमले की आशंका थी। अमरीका की सारी सफाई के बावजूद दोनों देशों की आपसी दुश्मनी और भी गहरी हो गयी.

पिछली सदी के नब्बे के दशक की शुरुआत के दौरान अमरीका ने ईरान के ऊपर कई प्रतिबंधों को लगाने की घोषणा की जिनका उद्देश्य ईरान को विकसित हथियार हासिल करने से वंचित रखना था।

2002 में 11 सितम्बर के आतंकवादी हमले के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने यह बयान दिया कि ईराक, ईरान और उत्तर कोरिया ‘दुष्टता की धुरी’ (ऐक्सिस ऑफ एविल) का निर्माण करते हैं। इस शताब्दी के पहले दशक के प्रारंभ में ही यह खबर सामने आई कि ईरान अपनी परमाणु क्षमता विकसित कर रहा है। ईरान का कहना था कि यह क्षमता परमाणु हथियारों के निर्माण के लिए नहीं अपितु शान्तिपूर्ण असैनिक उपयोगों के लिए विकसित की जा रही है। मगर अमरीका ईरान कीइस सफाई पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। लिहाजा अमरीका ने मुहिम छेड़ दी कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी द्वारा ईरान पर कठोर आर्थिक तथा अन्य पाबंदियाँ लगा दी जाएँ ताकि ईरान परमाणु हथियारों को विकसित करने के अपने लक्ष्य को हासिल न कर पाए।

अमरीका तथा इसके प्रभाव के कारण अन्य देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान को आर्थिक रूप से काफी क्षति पहुँचाई लेकिन उसका परमाणु कार्यक्रम जारी रहा। बराक ओबामा के शासन काल में यह महसूस किया गया कि अगर ईरान का परमाणु कार्यक्रम इसी प्रकार चलता रहा तो वह किसी दिन परमाणु हथियार बना सकने की स्थिति में आ जाएगा और उसके बाद मध्य पूर्व का पूरा शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। उधर सउदी अरब का भी कहना था कि अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है तो फिर उसे भी ऐसे हथियार हासिल करने का हक है। ऐसे में यह तय पाया गया कि अगर ईरान परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने पर राजी हो जाता है तो उस पर लगाए गये आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी।

2015 में परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंधों को लेकर अमरीका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और जर्मनी ने संयुक्त रूप से ईरान से समझौता किया। ऐसा कहा जाता है कि ईरान ने इन प्रतिबंधों पर ईमानदारी से अमल भी किया और पुरस्कार स्वरूप उस पर लगे प्रतिबंधों को शिथिल भी किया गया लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के शासन काल के दौरान अमरीका ने दावा किया कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रमों को बदस्तूर जारी रख रहा है। इस दावे के साथ अमेरिका ने समझौते से स्वयं को अलग करने की घोषणा की। अमरीका के अलग होते ही समझौते का कोई मतलब  ही नहीं रह गया। उधर ट्रंप के ही शासन काल के दौरान 3 जनवरी 2020 के दिन ईरान के एक प्रमुख सैन्य कमान्डर मेजर जेनरल कासिम सुलेमानी पर  बगदाद इंटर नेशनल एयरपोर्ट  पर ड्रोन द्वारा आक्रमण हुआ जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी। अमरीकी प्रतिरक्षा विभाग ने हमले की जवाबदेही लेते हुए कहा कि यह कारवाई राष्ट्रपति के आदेश पर की गई थी। इस घटना के बाद ईरान ने बदले की कारवाई की घोषणा तो की ही, अपने परमाणु कार्यक्रम को भी अधिक गतिशील बना दिया। ऐसा कहा जाता है कि ईरान परमाणु हथियार के निर्माण के काफी करीब पहुँच चुका है।

ईरान और अमरीका के आपसी रिश्तों में सुधार की कोई गुंजाइश फिलहाल नहीं लगती। ईरान अमरीका को शैतान कहता है और उसके द्वारा समर्थित इसराइल को छोटा शैतान। गनीमत यही है कि दोनों देशों के नेताओं ने यह सावधानी हमेशा बरती है कि उनकी सेनाएँ औपचारिक युद्ध में सीधे आमने सामने न आ जाएँ। मौजूदा राष्ट्रपति बाइडन के शासन काल में यह कोशिश अवश्य हुई कि 2015 के परमाणु समझौते में फिर से जान फूँकी जाए मगर कोशिश में गंभीरता का अभाव रहा। इतना सच है कि अमरीका मध्यपूर्व के अपने झमेलों से बाहर आना चाहता है क्यों कि अब उसका ध्यान चीन को नियंत्रण में रखने की ओर है। ऐसे में वह मध्य पूर्व में फँसे अपने सैनिकों तथा सैन्य संसाधनों को यहाँ से हटा कर दक्षिणी चीन सागर के इलाकों में ले जाना चाहता है। अमरीका की आगे की रणनीति क्या होती हैं इसके लिए हमें वहाँ राष्ट्रपति चुनाव संपन्न होने तक प्रतीक्षा करनी होगी

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धीरंजन मालवे

लेखक प्रसिद्द मीडियाकर्मी हैं। सम्पर्क +919810463338, dhiranjan@gmail.com
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