कविताघर

कविता का जो घर मुक्तिबोध बनाते हैं

 

कविता के घर का परिसर बहुत बड़ा होता है। इसमें सारी दुनिया समाई होती है। इसमें कई आवाजें  बसती हैं। कुछ आवाजें हम बहुत आसानी से पहचान लेते हैं। कुछ आवाजें बड़ी सहजता से अपनी बात कह जाती हैं। लेकिन कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो एक बार अबूझ लगती हैं लेकिन उन्हें समझने के बाद लगता है कि दुनिया को देखने-जानने की जो कुंजियाँ हैं, उनमें एक कुंजी और जुड़ गई है।

मुक्तिबोध एक ऐसी ही आवाज हैं। उन्हें बहुत ध्यान से सुनना पड़ता है। कुंजियों में जो सरलीकरण होता है, वह उनकी कविता में कहीं नहीं है। वह बल्कि कुंजी की जगह एक ऐसा ताला लगते हैं जिसे पहले से चली आ रही कविता की अपनी समझ पर लगा कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। वे अपने प्रथम पाठ में ही नहीं, तमाम पाठों में बहुत जटिल हैं। उनको पढ़ना आसान नहीं है।

लेकिन जब मुक्तिबोध इतने जटिल, इतने रहस्यमय, इतने अबूझ हैं तो उन्हें हम पढ़ना छोड़ क्यों नहीं देते? क्यों हिन्दी की लगातार आगे बढ़ती दुनिया में मुक्तिबोध पीछे नहीं छूटते, बल्कि अनुपेक्षणीय ढंग से उपस्थित दिखाई पड़ते हैं? इसलिए कि मुक्तिबोध में अंततः कुछ है जो जीवन की और कविता की हमारी समझ को समृद्ध करता है। जी तो हम मुक्तिबोध और कविताओं के बिना भी सकते हैं, लेकिन मुक्तिबोध जीने के अर्थों में कुछ नया जोड़ते चलते हैं।

हालाँकि यह वाक्य जितना रूमानी लगता है, फिर कहना होगा कि मुक्तिबोध की कविता उतनी रुमानी नहीं है। वह बल्कि ऐसा रहस्यमय जंगल है जिसके अंधेरे में अघोरी जैसे वृक्ष आपको डरा सकते हैं। उनकी बहुत सारी कविता अंदेशों और उम्मीदों के बीच लगातार चलते अंतर्द्वंद्व की फंतासी से बनती है। वे अभेद्य अंधेरे में देखते हैं, उनको दूर चमकती रोशनी दिखती है, वे चांद देखते हैं, उसका मुंह टेढ़ा नजर आता है, वे पहाड़ों के नीचे दबी हुई धुकधुकियों को सुनते हैं। वे जैसे किसी अभिशप्त प्रमथ्यु की तरह यातना का एक पहाड़ अपने कंधों पर लिए चलते हैं, लगातार चढ़ते और उतरते हैं- और उसे लिखने के जतन में दुबारा उन सबको जीते हैं। उनके लिए कविता अनुभव का अंतिम उत्पाद नहीं है, बल्कि वह घर है जिसमें किसी अनुभव से जन्म, उसके विकसित होने की प्रक्रिया, उससे जुड़े अंदेशे और उल्लास और अंततः उसके पर्यावसान- सबकी जगह होनी है। उनको पढ़ने से पहले कुछ उनकी तरह सोचने और जीने की कोशिश करनी पड़ती है। उनको पढ़ते हुए कुछ उनकी तरह जीने की थरथराहट पैदा होती है।

लेकिन मुक्तिबोध में जो यातना है क्या वह निजी है? इस यातना का क्या मोल है? जिस अंधेरे में उनकी कविता बनती है, क्या वह सिर्फ एक फंतासी है? फिर मुक्तिबोध के भीतर यह अंधेरा ही नहीं है, इससे निकलने की छटपटाहट भी है। निकलने का जो रास्ता वे चुनते हैं वह भी कोई पलायन का नहीं, एक वैचारिक रास्ता है जिसमें सामूहिकता का आह्वान है।

फिर दुहराने की जरूरत है कि इस कविता को पढ़ना आसान नहीं है। कभी ‘अंधेरे में’ कविता के संदर्भ में शायद प्रभाकर माचवे ने टिप्पणी की थी कि यह कविता पिकासो के चित्र गुएर्निका की याद दिलाती है। लेकिन सच यह है कि इस कविता में एक ‘हॉरर फिल्म’ दिखती है। कविता शुरू ही यहाँ से होती है- ‘जिंदगी के../ कमरों में अंधेरे / लगाता है चक्कर / कोई एक लगातार; / आवाज़ पैरों की देती है सुनाई / बार-बार…बार-बार / वह नहीं दीखता…नहीं ही दीखता / किंतु वह रहा घूम / तिलिस्मी खोह में गिरफ़्तार कोई एक;।’ मुक्तिबोध इसे कहाँ से जोड़ते हैं? कौन है वह जिसकी आहट सुनाई पड़ रही है लेकिन वह दीख नहीं रहा? मुक्तिबोध के मुताबिक ‘वह रहस्यमय व्यक्ति / अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है / पूर्ण अवस्था वह / निज संभावनाओं, निहित प्रभाओं, प्रतिभाओं की / मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव;।’

यह कहा जाता है कि मुक्तिबोध जीवन भर एक ही कविता लिखते रहे। उनकी समूची काव्य यात्रा ‘अंधेरे में’ तक पहुंचने की जद्दोजहद है। यह सच है कि उनकी कविता में एक नैरंतर्य है, लेकिन क्या वह वाकई एक ही कविता है? एक ही मनोभूमि पर चलती हुई? एक ही वैचारिक संसार में विचरती हुई?

यह सवाल हमें बताता है कि कविता की आलोचना भी कविता के साथ इस तरह नाभिनालबद्ध हो जाती है कि हम सारी कविता एक ही ढंग से पढ़ने के आदी हो जाते हैं। सच तो यह है कि मुक्तिबोध में जितना अंधेरा है, उतनी ही रोशनी भी है, जितना अकेलेपन की छटपटाहट है, उतना ही सामूहिकता का उल्लास भी है, जितना व्यक्तिगत आत्मसंघर्ष है, उतनी ही वैचारिक मुठभेड़ भी है। उनके पास ‘सहर्ष स्वीकारा है’ जैसी कविता है जिसमें वे ‘गरबीली गरीबी’, ‘पानी के मीठे सोते’ और सबकुछ को सहर्ष स्वीकार करने की बात करते हैं, उनके पास ‘मुझे कदम-कदम पर’ जैसी कविता है जिसमें वे लिखते हैं- ‘मुझे कदम-कदम पर / चौराहे मिलते हैं / बाँहें फैलाए !! / एक पैर रखता हूं / कि सौ राहें फूटतीं / व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूं…।’

मुक्तिबोध

तो यह भी मुक्तिबोध हैं- इसे भ्रम की तरह ही प्रस्तुत करते हुए कि ‘प्रत्येक पत्थर में / चमकता हीरा है / और हर एक छाती में आत्मा अधीरा है…।

इन सबके बीच उनकी एक बहुत कोमल कविता भी मिलती है- ‘मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से / बहुत-बहुत सी बातें तुमसे / चाह रहा था कहना / और कि साथ-साथ यों साथ-साथ / फिर बहना-बहना-बहना।‘

बेशक, शब्दों का अर्थ वे समझते हैं और इन अर्थों को व्यर्थ बनाते चले जाने वाली सभ्यता का खोखलापन भी उन्हें दीखता है। उनके पास ‘शब्दों का अर्थ जब’ जैसी तीखी कविता है जिसमें विवेकहीन अनुभव और संवेदनहीन ज्ञान की बात करते हुए, जनता को ढोर समझने की विडम्बना पर चोट करते हुए, नोच-खसोंट और लूटपाट की संस्कृति को तार-तार करते हुए जैसे वे किसी क्रांति का उद्घोष कर रहे होते हैं- बेशक किसी सपाट लहजे में नहीं। यह लहजा उनके पास है भी नहीं। उनके यहाँ तो ‘मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई’ वाली उलटबांसी है- जो इसलिए जरूरी है कि इस विषम यथार्थ को उलट-पलट कर देखा-समझा जा सके।

इस टिप्पणी का मकसद मुक्तिबोध की कविता को समझना या समझाना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि कविता को कितनी तरह से पढ़ा जा सकता है, यह समझना भी है कि अंततः यह जीवन और उसकी रचनाशीलता बनते कैसे हैं। जीवन लगातार सरलता से जटिलता की ओर बढ़ने की यात्रा है। भाषा इसी जीवन से निकलती है। कविता इस जीवन के बिना सम्भव नहीं है। जीवन को हम जितनी गहनता से महसूस करते हैं, उसके अंतर्द्वंद्वों को जितनी वेधकता के साथ महसूस करते हैं, उसके दुर्गम रास्तों को पर जिस तरह चलने की कोशिश करते हैं, हमारी कविता में भी वह वेध्यता, गहनता, वह दुर्गमता चली आती है। मुक्तिबोध इस लिहाज से अन्यतम हैं।

ऐसा नहीं कि बाकी कवियों में यह जीवन नहीं है। या बाकी कवियों को पढ़ने से पहले कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती। लेकिन मुक्तिबोध अपनी रचना में जो आग का घेरा पैदा करते हैं, खुद उसमें जैसे प्रवेश कर जाते हैं। वे अनुभव को बिल्कुल अपनी नसों पर महसूस करते हैं और उसे बिल्कुल उसी तड़कते हुए ढंग से लिख डालना चाहते हैं।

बेशक, मुक्तिबोध सामान्य मनोविज्ञान के कवि नहीं हैं। उनके भीतर एक बेचैन काफ़्काई आत्मा है जो सबकुछ के ध्वंस की भी कल्पना कर रही है और सबकुछ को रचने का भी स्वप्न देख रही है। रामविलास शर्मा जैसे मार्क्सवादी विद्वान उनको समझ नहीं पाते।

उनका मनोविज्ञान जैसे कोई आहत-घायल-तड़फड़ाता हुआ पंछी है जिसके भीतर अंदेशों में डूबी चेतना है। यह चेतना बनती कहाँ से है? कुछ अपनी स्थितियों से, कुछ व्यवस्थागत सच्चाइयों से और कुछ अनुभूति की उस तीव्रता से, जिससे वे उन अंधेरों को देख पाते हैं जो दूसरों को तब तक नजर नहीं आतीं। उनकी अभिव्यक्ति इन अंधेरों से निकल कर उड़ान भरना चाहती है।

तो मुक्तिबोध के इस द्वंद्व में, उनकी रचनाशीलता के उफनते समुद्र में कुछ दम साध कर, कुछ धीरज से प्रवेश करना पड़ता है- लहरों के थपेड़े सहने पड़ते हैं, शैवालों और प्रवाल भित्तियों के पार जाना पड़ता है और इन सबके बाद कहीं गहरे वह मोती मिलता है जिसकी पारदर्शी चमक में दुनिया कुछ अलग ढंग से पहचानी जा सकती है। ऐसा नहीं कि यह कोई बदली हुई दुनिया होती है- वही दुनिया होती है, और ऐसा भी नहीं कि मुक्तिबोध इस बदरंग दुनिया को ख़ूबसूरत बना देते हैं- वे बस इतना करते हैं कि ऊपर का छिलका हटा देते हैं और नीचे की सड़ांध सामने ला देते हैं। वे अपनी अंतर्वेदना के स्रोतों का पता देते हैं और खुद उनमें कहीं गर्क भी हो जाते हैं। मुक्तिबोध को न पढ़ने से किसी का कुछ बिगड़ेगा नहीं, लेकिन पढ़ने से कुछ बन ज़रूर सकता है

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प्रियदर्शन

लेखक प्रसिद्ध कथाकार और पत्रकार हैं। सम्पर्क +919811901398, priydarshan.parag@gmail.com
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