राजनीति

मोदी ने अपनी चुनौती खुद चुनी है

 

मै यदि अँग्रेजी का लेखक होता तो एक कहानी लिखता। दो महिला मतदाताओं की कहानी। यह कहानी छत्तीसगढ़ में मैंने सुनी। इस कहानी का सार यह है कि दो अलग अलग घरों में काम करने वाली दो महिला मतदाताओं को राजधानी रायपुर से सुदूर दो जिलों में स्थित उनके गाँव ले जाया गया। गाँव वे पहली बार निजी गाड़ी से गयीं। उनके लिए बकायदा लोग लगातार लगे रहे। जिस दिन मतदान होना था, उस दिन उन्हें गाँव स्थित उनके मतदान केन्द्र तक पहुँचाया गया।

अँग्रेजी का समाज ‘द टेल ऑफ टू वूमैन वोटर’ पढ़ने में रुची दिखा सकता था। लेकिन हिन्दी के समाज के लिए इसमे कोई रोचकता नहीं दिखती है। उसके लिए यह सामान्य बात है सिवाय इसके कि इस बार के चुनाव में लम्बी दूरी के मतदाताओं के लिए गाडियों का इन्तजाम हुआ। एक एक वोट संसाधनों वाली पार्टियों व उनके नेताओं के लिए महत्त्वपूर्ण हो गया है। चुनाव के नतीजे यह बता रहे हैं कि कैसे राजनीतिक दलों के लिए एक एक वोट कीमती हो गया है। अब सवाल है कि इसे खरीदें या प्रेरित करें। ससंदीय लोकतन्त्र की नयी यात्रा यहाँ से शुरु होती है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि इन मतदाताओं का क्या करें? हम यहाँ सरकार के कामकाज के जरिये इस चुनौती को समझने की कोशिश करते हैं।  

नयी सरकार के लिए चुनौती क्या है, इसकी पहचान दो तरह से की जा सकती है। एक तो तरीका यह है कि पूर्व की सरकार ने जिस तरह की स्थिति में देश और समाज को छोड़ा है और वह स्थिति यदि ठीक नहीं लगती है तो उसे बदलने की चुनौती हो सकती है। दूसरी चुनौती को समझने का रास्ता यह हो सकता है कि नयी सरकार का नेतृत्व करने वाली राजनीतिक पार्टी या पार्टियों के गठबन्धन का देश और समाज को जिस तरह से तैयार करना है उसके लिए जुटना। यह जुटना तब चुनौती कहलाती है जब अपनी तैयारी के लिए सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थितियाँ विपरीत हो या कम से कम उसके अनुकूल नहीं हो।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को किसी दूसरे नेतृत्व ने चुनौती जैसी स्थिति नहीं छोड़ी है। वे स्वंय दस वर्षों से सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। वे सरकार भी चला रहे है और भारतीय जनता पार्टी भी उनके अनुसार चल रही है। वे 2014 में शुरु करते हैं कि पिछली सरकार ने देश और समाज के सामने कैसी चुनौतियाँ पेश की हैं। वे भारतीय मतदाताओं के एक बड़े हिस्से में ‘अच्छे दिन’ का उत्साह पैदा करने में सफल होते हैं। 2014 में 31 प्रतिशत के मुकाबले मोदी नेतृत्व को ईवीएम के दर्ज मतों का 37.39 प्रतिशत 2019 के चुनाव में मिला। इसे इस रुप में दर्ज किया जा सकता है कि मोदी सरकार ने अपने सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने में रोजाना 18 घंटे के हिसाब से दम लगाया और उसे कामयाबी मिली। लेकिन 2024 में तमाम तरह के जोर लगाने के बावजूद मतों का प्रतिशत गिरकर 36.56 प्रतिशत पर आ गया और उनकी पार्टी बहुमत से काफी पिछड़ गयी। उन्हें चन्द्रबाबू नायडू की पार्टी और नीतिश कुमार की पार्टी समेत आधा दर्जन पार्टियों के प्रतिनिधियों का लोकसभा में बहुमत हासिल करने के लिए समर्थन पर निर्भर होना पड़ा है। जबकि उन्होंने अपने स्तर पर जो चुनौतियाँ पेश की थीं उन्हें वह पूरा लेने का दावा जाहिर किया है। इसमें खासतौर से अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण और कश्मीर के लिए संविधान में विशेष तौर पर धारा 370 को समाप्त करने का अपना वादा पूरा किया है।

मतदाताओं के सामने दो तरह की स्थितियाँ होती हैं। पहली तो यह कि सरकार चलाने वाले पुराने नेतृत्व की कमियों को नया नेतृत्व प्रस्तुत करता है और आगे के लिए जो चुनौतियाँ पेश करता है, उसका भी परीक्षण किया जाए। दस वर्षों में मोदी सरकार ने जो कमियाँ जाहिर की थीं और जिन विषयों को चुनौती के रुप में प्रस्तुत किया था, उसका एक तरह के 2024 तक परीक्षण हो सका है। ससंदीय राजनीति में ऐसा संक्रमण काल आता रहा है जब किसी भी एक राजनीतिक पार्टी को बहुमत नहीं मिला। गठबन्धन की तरफ संसदीय राजनीति को लौटना पड़ा है। मोदी नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती मोदी नेतृत्व खुद ही है। क्यों कि उस नेतृत्व को ही अपने कामकाज, अपनी योजनाओं की समीक्षा करनी है और भविष्य की चुनौतियों की रुपरेखा प्रस्तुत करनी है।

2024 के चुनाव में बुनियादी बातें यह उभरकर आयीं कि वास्तविक विषयों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। वे वास्तविक मुद्दे बेरोजगारी और चीजों की कीमतों में वृद्धि के रुप में सामने आये। भारतीय सामाजिक संस्थान (सीएसडीएस) के सर्वे में यह बात प्रमुखता से उभर कर सामने आयी। वास्तव में बेरोजगारी और मूल्य वृद्धि का प्रश्न सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के एक बुनियादी चक्र के भंग होने की स्थितियों को परिभाषित करता है। समाज के बड़े हिस्से का जब यह चक्र भंग होता है कि वह एक बड़ी प्रतिक्रिया के रुप में सामने आता है।

एक चुनाव दूसरे चुनाव के लिए

2024 के चुनाव नतीजों के मद्देनजर पुरानी सरकार के नये कार्यकाल के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती पेश करता है कि वह अपनी कार्य संस्कृति और आर्थिक सामाजिक सुधार की दिशा पर तत्काल प्रभाव से विचार करे। सरकार के नये कार्यकाल के लिए सहयोगियों ने पहली प्रतिक्रिया के रुप में भी इसे व्यक्त किया है। जिसे अग्नीवर नाम की योजना पर फिर से विचार करने की आवाज लगायी। नरेन्द्र मोदी नेतृत्व की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक व सामाजिक हालातों को सुधारने की दिशा में उठाए गये कदम रहे हैं। उन्हें उन कदमों पर फिर से विचार करने का दबाव समाज के भीतर से उठता रहा है। मसलन किसानों के आन्दोलन को एक उदाहरण के रुप में देखा जा सकता है।

आर्थिक सामाजिक नीतियाँ समावेशी होने की जरुरत पर बल देती हैं। बेरोजगारी के बढ़ने का सम्बन्ध नीतियों से जुड़ा होता है और उसे मुफ्त राशन के कार्यक्रम से पाटा नहीं जा सकता है। ठीक उसी तरह से सोशल इंजीनियरिंग का आधार केवल प्रतिनिधि का चेहरा नहीं हो सकता है। समाज में प्रतिनिधि के रुप में अपनी पहचान को देखना और उस समाज के बुनियादी विषयों का सरकार की नीतियों में प्रतिनिधित्व एक दूसरे से गुंथे हुए हैं। लेकिन संसदीय राजनीति में एक विकृत संस्कृति लगातार विकसित हुई है कि सरकार का नेतृत्व अपनी लोकप्रियता को विज्ञापनों की संख्याओं से मापने लगा है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली गठबन्धन की सरकार जबरन ‘फील गुड’ और ‘शाइनिंग इण्डिया’ के विज्ञापनों को अपनी लोकप्रियता मान बैठी थी। लेकिन वास्तविक हालातों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की और वाजपेयी सरकार हमेशा के लिए विदा हो गयी।

2024 के चुनाव नतीजों को नरेन्द्र मोदी नयी सरकार के रुप में खुद को देख रहे हैं या फिर पुरानी सरकार को विस्तार अवधि मिलने के अवसर के रुप में देख रहे हैं, यह सबसे मुख्य चुनौती दिखती है। यह तो स्पष्ट है कि 2024 में पुरानी सरकार को जनादेश नहीं मिला है। सरकार को सहयोगियों के साथ चलाने का समर्थन मिला है। यह भी कि साम्प्रदायिकता बुनियादी विषय नहीं हो सकता है और ना ही साम्प्रदायिकता को पूँजीवाद के विस्तार और गहरा करने के लिए वैचारिक आधार के रुप में इस्तेमाल करने की इजाजत हो सकती है। संविधान की तरफ नरेन्द्र मोदी के लौटने का और संवैधानिकता के प्रति दुर्व्यवहार जैसी स्थिति को स्वीकार नहीं किए जाने का स्पष्ट जनादेश मिला है। अब इसे चुनौती के किस खाते में डाला जाता है, यह महत्त्वपूर्ण है। पहला तो यह कि साम्प्रदायिक बहुसंख्यकवाद की तरफ बढ़ने के लिए संविधान के साथ अपने व्यवहार को जारी रखना या फिर संवैधानिक स्थितियों के साथ जो अब तक हुआ हैं, उसे दुरुस्त करने की दिशा में आगे बढ़ना है। नयी सरकार के लिए नयी सरकार का पृराना कार्यकाल ही वास्तविक चुनौती का आईना है

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अनिल चमड़िया

लेखक मीडिया शोध पत्रिका ‘जन मीडिया’ हिन्दी और ‘मास मीडिया’ अंग्रेजी के सम्पादक हैं। सम्पर्क +919868456745, namwale@gmail.com
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