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प्रेम का ‘शिल्प’
हाँ और ना के बीच

प्रेम का ‘शिल्प’

 

    एक स्त्री ने यह साहस दिखाया कि वह उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करे और मामले को सार्वजनिक करे जो विवाह के वादे पर लम्बे समय से उसके साथ सम्बन्ध में रहने के बाद उसे धोखा दे कर चला गया। वह उसकी अवहेलना करता रहा, व्यस्तता के तरह-तरह के बहाने बना कर उक्त महिला को मुगालते में रखता रहा कि वह सम्बन्ध के भीतर है पर परिस्थितियाँ संवाद की नहीं हैं। मगर उसने उसे सच नहीं बताया कि वह प्रेम के नाम पर उससे छल कर रहा है या शुरू से करता आया था। उसने छुपाया कि वह अन्य स्त्री से विवाह कर चुका है।

इंसान होने की न्यूनतम शर्त इतनी तो है ही कि अपनी सहचर, अपनी लिव इन साथी को कम से कम सम्बन्ध जारी न रहने का निर्णय बताया जाए। मामला कानून के अधीन है। न्याय की दरकार भी वहीं से है। सोशल मीडिया के ट्रायल का न कोई अर्थ है न हासिल। मगर उनकी अभिव्यक्तियों से हिन्दी समाज की (अ) गतिकी को समझा जा सकता है।

      इससे हमारी सभ्यता का जो असल चेहरा उजागर हुआ, उसने इर्द-गिर्द के जीवन में आयी अनेक जिंदगियों की याद ताजा कर दी। उनकी पीड़ा और आत्म-संघर्ष का असल अनुमान मुझे अब हुआ। इनमें से एक थी मेरी दोस्त शीला और उसका दोस्त सिद्धार्थ जे.एन.यू से पीएचडी के साथ-साथ यूपीएससी की भी तैयारी कर रहे थे। पढ़ते-लिखते, नोट्स का आदान-प्रदान करते-करते वे आपस में प्रेम भी करने लगे। जीवन-संघर्षों में एक-दूसरे का साथ देते-देते उनका जीवन भी साझा हो गया। तब तक मध्यवर्ग में विवाहपूर्व साथ रहने का आचरण इतना आम नहीं था कि शीला इस ओर सोच भी पाती लिहाजा उसने सिद्धार्थ से शादी के लिए कहा। चाहता तो वह भी यही था। शीला के मोह में वह बिंधा था ही।

इसके अलावा जीवन के कई आयामों में वह उस पर निर्भर भी था। मगर बड़े भाई से पहले अपनी शादी की बात करने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। समय के एक मोड़ पर एक ओर पी.एचडी की थीसिस जमा करने की तिथि पास थी दूसरी ओर मुख्य परीक्षाएँ नजदीक थीं। एक को पकड़ने पर दूसरा सिरा हाथ से छूट जाता। स्कॉलरशिप से खर्चा भी पूरा न पड़ता था। परिणाम की अनिश्चितता के कारण पी.एचडी को छोड़ कर यूपीएससी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता था। दो नावों पर सावारी करते करते जब उसका दम फूलने लगा और आशंका हुई कि कहीं दोनों ही हाथ से न छूट जाएँ। तो वह फिर से साथ रहने का आग्रह शीला से करने लगा।  “न तो मैं तुमसे मिले बिना रह सकता हूँ और न कामों की इतनी बढ़ी हुई व्यस्तता में मिलने औऱ बात करने के लिए अलग से समय निकाला जा सकता है।“ शीला के साथ रहने से तमाम तरह की अन्य अनेक चिन्ताओं से भी वह मुक्त हो जाता था। उनका भी गहरे कहीं एहसास तो उसे रहा होगा मगर उसने कहा नहीं।

 शीला द्वंद्वग्रस्त आधुनिका थी। उसके अपने मूल्य थे उन पर टिकना और उनके लिए जीना-मरना जानती थी। मगर परम्परा से मिले संस्कार भी चेतना में कहीं धंसे रहते थे। वह जी-जान से सिद्धार्थ के हित के लिए करना चाहती थी मगर बिना शादी के साथ रहने का जोर नहीं जुटा पा रही थी। मजबूरन सिद्धार्थ ने अपने घर में बोलने की हिम्मत जुटाई तो उसे घर से खूब खरी खोटी सुनने को मिली कि बड़े अविवाहित भाई के रहते उसने ऐसा सोचा भी कैसे। फिर से उसने कातर आवाज में शीला की चिरौरी शुरू कर दी। शीला का कहना था कि वह भी अपने माँ पिता का भरोसा नहीं तोड़ सकती। उन दोनों के लम्बे विचार-विमर्श की परिणति इस निर्णय पर हुई कि वे हॉस्टल छोड़ कर एक छोटा सा घर ले कर साथ रहेंगे और बारी-बारी से सफलता की कोशिश करेंगे। पहले दोनों की समस्त उर्जा एक की परीक्षा पर केन्द्रित रहेगी और फिर दूसरी पर। इस तरह से दोनों का शोधकार्य भी पूरा होगा और परीक्षा उत्तीर्ण करने के चांस भी मजबूत होंगे। शीला ने शर्त रखी कि शादी करने तक वह आत्मीय मित्र की तरह रहेगी। उसकी घर की आर्थिक स्थिति बेहतर थी और शादी में अड़चन भी सिद्धार्थ की ओर से थी। लिहाजा तय हुआ कि पहले सिद्धार्थ की सफलता में दोनों की सारी ऊर्जा केन्द्रित की जाए।

शीला की चिन्तन औऱ विश्लेषण की उसकी क्षमता विस्मित करती थी। वही सिद्धार्थ के लिए निबन्ध और विस्त उत्तर तैयार किया करती। वह भली-भाँति जानता था कि शीला से सीख कर ही वह दृष्टि अर्जित कर सकता है, उसके पास वह प्रखरता नहीं। उस साल वह साक्षात्कार में रह गया मगर अगली बार शीला ने खुद को पूरी तरह झोंक दिया।  उसके खाने-पीने, सफाई, स्वास्थ्य हर चीज का ध्यान रखते हुए जिस तरह वह उसकी तैयारी करवाती थी लगता था जैसे कोई सावित्री अपने सत्यवान में और-और प्राण फूंक रही हो। अन्ततः दोनों की मेहनत रंग लायी और वह प्रशासनिक अधिकारी बन गया। फिर वह मसूरी प्रशिक्षण कार्यक्रम में चला गया और शीला विवाह का इन्तजार करती हुई अपनी पढ़ाई में जुट गयी।

वक्त गुजरने के साथ सिद्धार्थ की मुलाकातों और फोन का अन्तराल बढ़ने लगा। शीला ने सोचा नए दायित्वों का बोझ होगा। हालाँकि धीरे-धीरे उसकी आवाज से लगने लगा था जैसे वह कुछ छिपा रहा हो। थकहार कर उसके ऑफिस में सम्पर्क किया तो दूसरी ओर की आवाज ने बताया कि साहब अपनी शादी के लिए लम्बी छुट्टी पर गये हैं। शीला को बिल्कुल भरोसा नहीं हुआ तो वह सिद्धार्थ के गाँव की ओर निकल पड़ी। उसकी सलामती की फिक्र में मैं भी उसके साथ हो ली। पूरे रास्ते वह चुपचाप सूनी आँखों से बाहर तकती रही। बीच-बीच में व्याकुल होकर उंगलियाँ चटकाने लगती।  घर पहुँचने पर हमने उसके घरवालों के बीच उसकी नई नवेली पत्नी को भी मौजूद पाया।

सिद्धार्थ दोस्तों के साथ बाहर कहीं निकला हुआ था। बातचीत के दौरान हमने जाना कि वह जिले के नामी-गिरामी राजनेता की बेटी है। सिद्धार्थ का हवेलीनुमा घर हाल का बना हुआ लगता था। नवीन समृद्धि की जगर-मगर से घर-आँगन इस तरह चुंधिया रहा था जैसे कम समय में ढेरों-ढेर वैभव खुद को जहाँ-तहाँ अटा रहा हो। मैंने कहा “तुम्हारा सिद्धार्थ तो बिक गया। एक था जो मानवता की आर्त पुकार से द्रवित हो करुणा के पथ पर चल पड़ा कि मानवता को दुख से मुक्ति मिले। उससे भी कवियों की संवेदना को शिकवा रहा कि उसे यशोधरा को बता कर जाना चाहिए था। तुम्हारा सिद्धार्थ तो आधुनिक युग की समकक्ष सहचर को बताए बिना गया भी तो तो इस राह……”

यह सब अन्य किसी से जान कर शीला के मन पर क्या बीती क्या उसने कहा-किया। कितने साल इस सबसे उसे उबरने में लगे, बताना व्यर्थ है। इस घटना के सालों बाद आज वह एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है। उसकी एक मेधावी बेटी है। उसका पति वैज्ञानिक है। ऊपर से शान्त-समृद्ध-सफल दिखते उसके जीवन को देख कर कौन विश्वास करेगा कि उसकी जिजीवेषा कम हो गयी है। आज भी वह मेरे सामने जब-तब फफक पड़ती है कहती हुई “यार एक बार बता तो सकता था। बता के क्यों नहीं गया? मैं थोपती थोड़ी खुद को उस पर। मेरा भी तो स्वाभिमान है। कह देता साफ साफ मेरे लिए यही करना महत्त्वपूर्ण है अब। मैं घर वालों की ही सुनूँगा। आज तक उसकी हर बात समझती आयी थी। कोशिश करती यह भी समझने की।”

उसने जाने का जो तरीका अपनाया उसने जीवन भर के लिए शीला के आत्मविश्वास को छलनी कर दिया उसके आत्म-गौरव पर ऐसी ठेस लगी है कि शायद ही कभी इस अवसाद से वह उभर पाएगी। उसके पति के साथ उसका व्यवहार देख कर सोचती हूँ कहाँ गयी वह पहले वाली मेरी प्यारी सखी शीला। वह हमेशा समर्पण की मुद्रा में रहती है। उसे न छोड़कर मानो वह उस पर कोई एहसान कर रहा हो। उसे लगता है उससे अगर कोई भी चूक हुई तो वह भी बिन बताए चल देगा फिर वह अपनी बच्ची से क्या कहेगी। एक अजीब सी एँग्जाइटी में वह हमेशा घिरी रहती है। घर-बाहर सब चाक-चौबंद, त्रुटिविहीन रखने के तनाव की नोक पर टंगी रहती है वह।

 और सिद्धार्थ तुम? सत्ता और वैभव के दलदल में खुश हो न? लम्बे समय तक प्रेम सम्बन्ध जीने के बाद एक पुरुष के लगातार झूठ बोल कर जाने और बिन बताए दूसरी स्त्री से शादी करने के तरीके में कोई कमी जाने-माने लेखकों और उनके समर्थकों को नजर नहीं आयी। उन्होंने तो बताने, नहीं बताने जैसी फिजूल बातों पर ध्यान भी नहीं दिया। आज तुम्हें बचे-खुचे अपराध भाव से भी मुक्ति मिल गयी होगी न?

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