रामपुर की रामकहानी

कमली के विवाह में ड्रामा

 

रामपुर की रामकहानी-22

कमली के विवाह में बारात बरवाँ से आई थी लेकिन सट्टा रामपुर के नाच का ही था। झिंगुरी काका के घर के बगल में पीपल के पेंड़ के नीचे तंबू लगा था। डोलडाल होने के लिए पुरनका टोले की पोखरी नजदीक पड़ती थी।

पुरनका टोला यद्यपि उजड़ चुका था किन्तु टोले का इकलौता इनार अभी भी इस्तेमाल में था। राम बिरिछ भैया के पिता जी, जिन्हें मैं ‘बड़का दादा’ कहता था, डोलडाल होने के बाद रोज सबेरे उसी इनार के जल से दतुअन करते, नहाते और मेरे उजड़ चुके घर के सामने स्थित काली माई के थान पर हाथ जोड़कर बैठ जाते और थोड़ी देर तक ध्यान लगाने के बाद ही घर लौटते। वे गगरा के मुँह में उगहन फँसाकर सर्कवासीं लगाते और ताबड़तोड़ तीन-चार गगरा पानी भरकर अपने सिर पर उड़ेल लेते। एक ही हाथ से उलटकर वे जब पीतल के गगरे का पानी सीधे अपने सिर पर उड़ेलते तो उनके मुँह से “हर हर गंगे” की ध्वनि स्वत: फूटने लगती। जेठ के महीने में भी कुएं का पानी इतना ठंढा रहता कि उस पानी से एक बार नहा लेने के बाद सारी थकावट दूर हो जाती और चार-पाँच घंटे तक शरीर में ताजगी बनी रहती।

धुँधलका होते-होते द्वारपूजा होने लगी थी। बारात तो दिन डूबने से पहले ही गाँव के बाहर आ गई थी। द्वारपूजा के लिए बारातियों को थोड़ा इंतजार करना पड़ा था। फिर अगुआनी हुई। घरतिहा लोग बारात की अगुआनी के लिए गाँव के बाहर तक गए थे। अगुआनी के समय अंग्रेजी बाजा बज रहा था। एक पगड़ीधारी आदमी ‘सिंहा’ भी बजा रहा था। कुछ लोग उसे ‘धुतुंगा’ भी कहते थे। बहुत दिनों से यह बाजा दिखायी नहीं देता है। समधी और उनके भाइयों को माला पहनाकर स्वागत किया गया। बाकी बारातियों का यथायोग्य हाथजोड़ कर।

 हमारे गाँव में पटनवारों के चार घर थे। चारो सबसे खेतिहर। बड़का टोला पर खेदू दास और हरदुआर दास, केदार काका के टोले पर रामचंदर दास और मेरे अर्थात सुकुल के टोले पर झिंगुरी दास। हरदुआर दास की गाँव में प्रतिष्ठा खेती के बल पर ही थी और वे कई बार गाँव के निर्विरोध प्रधान बने थे। रामचंदर दास भी बड़े खेतिहर थे और वे भी कई बार प्रधान रहे। उन्हें लोग फरिसगाट कहते थे क्योंकि वे काफी दिनों तक फारेस्ट गार्ड रह चुके थे। गाँव में जो सरकारी प्राइमरी स्कूल है उसकी नींव उन्हीं के कार्यकाल में पड़ी थी। मेरा वे बहुत सम्मान करते थे और गाँव की प्रगति के संबंध में समय-समय पर मुझसे भी राय-मशवरा किया करते थे। गाँव में स्कूल खोलने के प्रेरकों में मेरी भी भूमिका थी। अपने टोले के झिंगुरी दास को मैं झिंगुरी काका कहता था। इनमें सबसे सम्पन्न खेदू दास ही थे। उन्हें ‘महतो’ कहा जाता था। खेदू दास को मैंने नहीं देखा है किन्तु उनकी पत्नी ‘महतीन’ को देखा है। भारी डीलडौल वाली साँवले रंग की महतीन विधवा होने के कारण सफेद सूती साड़ी पहनती थीं और अपने विशाल बखरी खपड़ैल घर के ओसारे में आसन जमाती थीं। उनकी आवाज भी बिल्कुल मर्द जैसी थी। उनका कोई बेटा नहीं था। एक बेटी थी जो शादी के बाद अपने ससुराल चली गई थी। महतीन अमूमन अकेले ही रहती थीं। उनके घर के ओसारे में एक विशाल पलंग पड़ा रहता था, लोग उसे मसहरी कहते थे। उस जमाने में भी सबके सामने उस मसहरी पर विराजने में महतीन को किसी तरह का संकोच नहीं होता था। उन्हें कभी-कभी हुक्का गुड़गुड़ाते हुए भी देखा जा सकता था। उनका शानदार हुक्का उनकी मसहरी के बगल में पड़ा रहता था। महतीन का असली नाम संपाती था।

 झिंगुरी काका भी खेतिहर थे। वे बाऊजी के सखा थे और उनकी पत्नी माई की सखी। इस दोस्ती में मैंने कभी खटास आते नहीं देखा। उनके बेटे प्रेम सागर पटेल ने अपने पिता के नाम पर गाँव में ही एक विद्यालय खोल रखा है, जी.डी. जूनियर हाई स्कूल।

झिंगुरी काका की एक ही बेटी थी। इसीलिए बेटी के बिआह में उन्होंने खुलकर खर्च किया था। द्वारपूजा में हाथी भी आया था और एक सौ से ऊपर बाराती भी। सभी बारातियों को बुनियाँ और सेव के साथ उन्होंने भरपेट शर्बत भी पिलाया था। शर्बत में दही डाला गया था। जेठ का महीना था। सभी बारातियों ने कई-कई गिलास शर्बत पिये थे।

द्वारपूजा के बाद बाराती तंबू के नीचे आकर अपना-अपना डेरा जमा लिए। दुलहा, सहबाला, समधी और उनके अन्य सगे रिश्तेदारों के लिए तंबू के मध्य भाग में बिछी दरी के साथ ऊपर से कुछ मुलायम गद्दे भी लगा दिए गये थे। बाकी बारातियों के लिए तंबू के नीचे अलग-अलग गद्दे और उन पर चद्दर। कुछ चारपाइयाँ भी थीं जिन्हें ग्रामवासियों से माँगकर इकट्ठा कर लिया गया था। कुछ बुजुर्ग और सम्मानित लोगों ने उनपर आसन जमाया था। एक मुलायम गद्दे वाली खास चारपाई थी जिसपर समधी के गुरू ने आसन जमाया था। घंटा भर आराम करने के बाद भोजन के लिए आमंत्रण आया। बाराती हमारे अतिथि थे। उनके भोजन करने के बाद ही घराती भोजन कर सकते थे। भोजन के लिए बाराती बैठ गए। पुरइन के पत्ते पर दही चिउड़ा परोस दिया गया। पुरइन का पत्ता इसी उद्देश्य से सुरहा ताल से मँगाया गया था। दही-चिउड़ा खाने के तुरंत बाद गरम-गरम पुड़ी सब्जी दी जानी थी। उन दिनों यही परंपरा थी। यज्ञ-परोजन में दही -दूध की कमी नहीं पड़ती थी। उधर घर में परदे के पीछे महिलाएं गारी गा रही थीं,

“केकरे अंगना जेवनार बनल बा कवन भँड़ुआ जेवन आयो, हाय सिया राम से भजो।

झिँगुरी बाबू के अँगना जेवनार बनल बा, समधी भँड़ुआ जेवन आयो, हाय सियाराम से भजो।”

“आया है कैसा जमाना जी वाह वाह

समधी पटेल राम ऐसे हुए हैं,

अपने बहिनी के करेंलें बयाना जी वाह वाह।”

गाढ़ा दही चिउड़ा और भेली सबके सामने परोसा हुआ था, सबको भूख भी लगी थी किन्तु सभी बाराती चुपचाप बैठे थे। दुलहा भोजन नहीं कर रहा था। रिसियाया हुआ था। उसे मनाना जरूरी था। दुलहा के भोजन करने के बाद ही दूसरे लोग भोजन कर सकते थे। दुलहा के सामने एक चमचमाती हुई एचएमटी घड़ी और टू बैंड का नेल्को ट्रांजिस्टर लाकर रख दिया गया। नई चमचमाती हुई सायकिल भी बाहर ओसारे में खड़ी कर दी गई। दस-दस के दो और एक रूपए का एक नोट भी दुलहा के सामने रख दिया गया। इसके बाद भी सभी लोग मिन्नत कर रहे थे। दुलहे का मुँह सीधा नहीं हो रहा था। महिलाएं भी भूखी थीं। उन्हें तो घरातियों के खा लेने के बाद ही भोजन करना था। गारी का लक्ष्य अब न खाने वाला दुलहा हो गया था।

“ चिट्ठी बाँचि ल हो बाबू बरवाँ के, चिट्ठी बाँचि ल

तुहार बहिनी छिनार, घूमें नदुआ बजार

खाएं पेंड़ा नमकीन, मरद खोजें शौकीन

अबहिन बाड़ी कमसिन, चिट्ठी बाँचि ल।”

“रहरी के तीन पत्ता, तीनों कचनार हो,

दुलहा के तीन बहिनियाँ, तीनो छिनार हो।”

 अंत में गुरू बाबा को बुलाया गया। उन्होंने डाँटते हुए खाने का आदेश दिया तब जाकर दुलहे ने कौर उठाया। इसके बाद बारातियों ने भोजन किया। बाराती भोजन करके जब जाने लगे तो गारी गाने वाली महिलाओं के स्वर में और भी उमंग छा गया था।

“भागा भागा बहनचो।। भागा S। अपनी दीदी के भँड़ुआ भागा।।।”

 गुरू महराज के साथ पुरोहित और एक अन्य ब्राह्मण देवता केवल दही-चिउड़ा खाए। पुड़ी सब्जी को उन दिनों कच्चा भोजन माना जाता था जिसको खाने से छूत लगती थी। दही-चिउड़ा खाना निरापद था। वह पक्का भोजन था। इसीलिए उन दिनों ब्राह्मण लोग आमतौर पर पक्का भोजन ही करते थे। बारातियों के भोजन कर लेने के बाद घराती भोजन करने बैठे। बाऊजी के साथ मैं भी भोजन करने लगा। बाऊजी तो दही-चिउड़ा ही खाए किन्तु मुझे पुड़ी सब्जी खाने की छूट थी। अभी बालक जो था। जनेऊ नहीं हुआ था। भोजन के बाद मैं वहीं नाच देखने लगा। मेरी स्मृति में नाच देखने का यह पहला अनुभव था।

कमली के बिआह में आई नाच में मैं पहली बार भागीरथी को मेहरारू बनकर तबले पर थिरकते देखा था। उन दिनों लड़कों को ही साड़ी पहनकर लड़कियों का भी रोल करना पड़ता था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई और प्रख्यात लेखक बाबू रायकृष्ण दास की पौत्री डॉ। प्रतिभा अग्रवाल को भी कलकत्ता जैसी सांस्कृतिक नगरी में नाटकों में स्त्री का रोल करने के लिए बड़े पापड़ बेलने पड़े थे। एक दिन उन्होंने अपनी वह आप बीती मुझे बतायी थी। फिर गाँवों में होने वाले ड्रामों में अभिनय के लिए लड़की के भाग लेने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

भागीरथी को बुजुर्ग लोग ‘नाचन’ कहकर भी पुकारते थे। परदे के पीछे से ज्यों ही नाचन थिरकते हुए मंच पर आए, दर्शकों के शरीर में करंट दौड़ गया, सीटियाँ बजने लगीं और जहाँ तहाँ नचदेखवा खड़े हो गए। बैठाने के लिए लोगों को बड़ी मसक्कत करनी पड़ी।

“सरौता कहाँ भूल आए प्यारे ननदोइया-2”

सिर्फ एक ही पंक्ति पर लगभग आधे घंटे तक तरह-तरह से ठुमका लगाते जिस दिन मैंने नाचन को देखा था उसी दिन से उनपर ऐसा फिदा हुआ कि आस-पास के गाँवों में उनकी नाच का सट्टा सुनकर देखने जाने से नहीं रोक पाता था। छरहरे बदन के गोल चेहरे वाले नाचन को जब भी साड़ी पहनकर मंच पर उतरते देखता तो खड्डा -सिसवा रेल में यात्रा के दौरान एक सूरदास से सुने गीत की नायिका राधा की मूर्ति आँखों के सामने थिरकने लगती। “लकलक पातर गोर राधे, पातर लकलक गोर।” राधा क्या नाचन से ज्यादा सुंदर रही होंगी? “अँखिया बुझाला जे ठाकुर जी हउवें।” राधा की आँखों का नहीं पता किन्तु राधा बने नाचन की आँखें सचमुच ठाकुर जी को फेल करती थीं। नाचन के माथे की बिन्दी, नासिका की कील, षोडसी जैसे उरोज और जूड़े के बंधन से मुक्त होने को छटपटाती नागिन जैसी लटकती लटें, इसके अलावा सजने सँवरने की जरूरत ही क्या थी नाचन को ?

नाचन धरिकार जाति के थे। लगभग भूमिहीन पिता के पाँच भाइयों में दूसरे नंबर पर। उन दिनों धरिकार अछूतों में भी सबसे निचले पायदान पर माने जाते थे। गाँव के चमार अपने को धरिकारों से ऊँचा समझते थे। दलितों के भीतर के इस स्तर-भेद को देखकर ही डॉ। भीमराव अंबेडकर जैसे असाधारण योद्धा ने जाति प्रथा के खिलाफ लड़ाई में अपने हथियार डाल दिये थे और थक हार कर बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये थे।

 नाचन के पाँचो भाई एक से बढ़कर एक टठगर और बलिष्ठ थे, अपने पिता धुत्तू की तरह। उनके माता-पिता दोनो परानी गाँव के अनेक ब्राह्मणों-ठाकुरों की तुलना में अधिक सुंदर और साफ रंग वाले थे। बेना-डगरा बनाना और बेंचना उनका पुस्तैनी पेशा था। नाचन को छोड़कर उनके चारो बेटे झरिया की कोइलरी में चले गए और रिटायर होने के बाद ही लौटे। बीच-बीच में वे गाँव आते थे और अपने रोब-दाब का प्रदर्शन करके चले जाते थे। नाचन को नाच का ऐसा चस्का लगा कि उन्ही के बलपर गाँव में लोगों ने नाच की मंडली बनाई और लगन के दिनों में घूम घूम कर सट्टा नाचने लगे।

कमली के बिआह में लैला-मजनूँ का ड्रामा हुआ था। नाचन ने लैला का रोल किया था। भिनसहरा होने तक ड्रामा चला था लेकिन बाराती के साथ नचदेखवा उसके बाद भी जमे रहे और तबतक नाचन को नचाते रहे जबतक पूरब की ओर लालिमा नहीं छाने लगी।

नचनिया और तबलची को उन दिनों सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी। रात में तो नाचना पड़ता ही था नचनिया को दिन में भी नाचना पड़ता था। खास तौर पर मरजाद के दिन शिष्टाचार के समय। दोपहर में भोजन के बाद तिजहरिया को जब शिष्टाचार होता था और दोनों पक्ष के लोग सभा में शास्त्रार्थ करते थे तो उसके बाद नचनिया को भी बारातियों के मनोरंजन के लिए नाचना पड़ता था। इस समय नचनिया ज्यादा सजधज कर मंच पर नहीं उतरता था किन्तु नृत्य का प्रदर्शन तो करना ही पड़ता था। शिष्टाचार के दौरान बारातियों और घरातियों की ओर से आये नाऊ अपने-अपने पक्ष के लोगों पर बड़े-बड़े पंखों से हवा करते थे। शास्त्रार्थ के बाद मेवे बाँटे जाते थे, खास तौर पर कटे हुए गड़ी-छुहाड़ा के टुकड़े। इत्र भी छिड़के जाते थे। बच्चे गड़ी-छुहाड़ा बाँटने वाले के हाथों की ओर टूट पड़ते थे। मुझे भी एक मुट्ठी गड़ी-छुहाड़ा हासिल हो गया था किन्तु इसे पाने में बाऊजी की मुख्य भूमिका थी जो वहाँ मौजूद थे। उन्होंने मुझे उस सभा में पढ़ने के लिए “गजाननं भूत गणादि सेवितं।।।।” वाली गणेश वंदना रटा दिया था जिसकी सस्वर प्रस्तुति करके मैं बहुत गौरवान्वित था।

       घरतिहा की ओर से पंडित थे रामबिरिछ भैया। वे पड़ोसी भी थे। भोजन के बाद जब शादी होने लगी तो महिलाएं घेर कर बैठ गईं। शादी कराने में रामबिरिछ भैया भी अपनी पंडिताई दिखाने लगे। आधी रात होते-होते दुलहिन और दुलहा दोनो ऊँघने लगे। दोनो बच्चे थे। दोनो की उमर लगभग पंद्रह साल की थी। खेलने-खाने की उमर थी। शादी के महत्व से दोनों अपरिचित थे। दुलहे को बार बार मुँह धोकर आने को कहा जाता, लेकिन फिर भी नींद अपना प्रभाव नहीं छोड़ती। अंत में बाऊजी ने हस्तक्षेप किया,

“ए राम बिरिछ, जल्दी खतम करS, लइके सूतत बाँड़ें। उनके ऊपर तोहरे पंडिताई के कवनो असर नाईं बा।”

राम बिरिछ भैया को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने जल्दी जल्दी अग्नि के फेरे लगवाए, कन्यादान और उसके बाद सेनुरदान का रसम पूरा कराया।

******

इस बार गाँव गया तो भागीरथी को भव्य विग्रह वाले साधु के वेश में देखा। सफेद सँवारी हुई दाढ़ी, लंबी जटा, ललाट पर चंदन का तिलक, गले में तुलसी की माला, बगल में कमंडल और एक दंड धारण किए भागीरथी पहुँचे हुए संत लग रहे थे, किन्तु साधु का बाना धारण करके भी सरल हृदय नाचन गाँव नहीं छोड़ सके। यदि सधुआने के साथ ही उन्होंने गाँव भी छोड़ दिया होता और किसी मठ पर जाकर आसन जमाया होता तो निस्संदेह आज सैकड़ों क्या हजारों में उनके चेले होते और लाखों करोड़ों में खुद भी खेल रहे होते। पहली नजर में उनके विग्रह की भव्यता किसी को भी आकृष्ट कर लेगी। अब तो उनका आठवाँ दशक समाप्त होने को है, कान जवाब देने लगे हैं और जवानी के दिनों की यादें भी।  

 मैं अपने पुराने दिनों की नृत्य कला के बारे में बातें करने के उद्देश्य से भागीरथी से मिलने गया था। मुझे देखते ही उन्होंने पहुँचे हुए संत की तरह बड़े अदब के साथ बैठने का आग्रह करते हुए कहा, “बंदगी साहेब’।

              हमेशा ‘अम्मर बाबू’ कहकर पुकारने वाले भागीरथी भैया की जबान से ‘साहेब’ शब्द सुनकर मैं भी ‘भैया’ कहने का साहस न कर सका।

“संत जी, अपनी जवानी के दिनों में जब आप ड्रामा खेला करते थे, उसके बारे में अपने कुछ अनुभव बताइये। कौन-कौन से ड्रामा खेलते थे आप लोग ?”

‘चंद्रभूप’, ‘सुनकेसर’, ‘सोरठी बिरजाभार’, ‘सदाबृज सारंगा’, ‘गरीब के किस्मत’, ‘गोपीचंद’ और ….” याद करने लगे संत जी। “बाबू अब याद नाहीं आवता…” संत का बनावटी चोला छोड़कर अपने असली रूप में आ गये थे भागीरथी भैया।

“तोहरे साथे अउर के रहल ड्रामा के टीम में ?”

“चौक के मुस्तफा, सिसवनिया के फूलचंद नेटुआ, अपने गाँव के निद्धू, बीपत और।।।”

“साड़ी पहिन के नाच तS फूलोचंद खूब बढ़ियाँ करें।” उन्होंने थोड़ी दूर पर बैठकर बेंचने के लिए मूँगफली भून रहे फूलचंद की ओर संकेत किया। “ सोरठी बिरजाभार तS इनहीं के अगुआई में होत रहे।”

 फूलचंद के मुरझाए चेहरे पर मुस्कान थिरक आई। वे हमारी बातें सुन रहे थे। उन्होंने बताया कि, “ड्रामा लिखने का काम पड़री के खलील मास्टर और रहमद मियाँ तथा बउलिया के उसमान गनी करते थे। लोग कापी में उतार लेते थे और उसी से रिहर्सल करते थे। ड्रामे की कोई किताब नहीं थी उन दिनों।”

“भक्त चंदा नाटक भी खेलते थे हमलोग। अपने गाँव के झिन्नू भी बहुत अच्छा नाचते थे।” फूलचंद ने यह भी जोड़ दिया।

 बाद में जैसे-जैसे याद आता गया भागीरथी भैया जोड़ते गये। “जग्गू के पूत रघुनाथ अहीर बहुत अच्छा नाचते थे और जोगीड़ा गाते थे। अधारे भैया फरुआही बहुत बढ़िया गाते थे। छब्बे काका ढोल अच्छा बजाते थे। वे ढोल छाते भी थे। काली माई की पूजा में जो खँसी कटती थी उस खँसी के चमड़े की ढोल बनती थी। छब्बे काका भगत थे, कंठीधारी थे, किन्तु खँसी के चमड़े से ढोल छाने का का काम बड़ी रुचि से करते थे। बोलते-बोलते भागीरथी भइया अतीत में कहीं खो गए……”

 

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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