रामपुर की रामकहानी

रामपुर का दाम्पत्य

 

रामपुर की रामकहानी-19

सत्नरायन भैया की पत्नी दरवाजे के बगल में खड़ी होकर माँ से बातें कर रही थीं। नजरें झुकाए हुए मैं घर के भीतर जाने लगा तो उन्होंने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और माँ से कहा, “ए बड़की अम्मा! ई राउर दुलरुआ के बिआह होई त अपने मेहरारू के साथे का करिहें ? ई त मेहरारुन के तिरछो नजर से नाईं निहारेलें।”

“बड़ा सीधा हवें हमार बाबू।”  माँ ने भी मुस्कराते हुए उनकी बातों को तस्दीक किया था।

फगुआ के दिन मैं अपनी भौजाइयों को रंग डालने जरूर जाता था। किन्तु लोटा से रंग ऊपर से डालते समय इस बात का पूरा ख्याल रखता था कि उनके अंगों का स्पर्श न हो। उन दिनों पराई स्त्री को गलत निगाह से छूना ही नहीं,  देखना भी पाप समझता था।  आखिर चेतना का विकास तो समाज में ही होता है न! जिसको जैसा परिवेश मिले। जिन किताबों का मैं नियमित अध्येता था उनसे यही सीख मिलती थी। ‘विश्राम सागर’, ‘रामचरितमानस’ और आत्मसंयम की सीख देने वाली अद्भुत कृति ‘श्रीमद्भगवद्गीता’। इन ग्रंथों के द्वारा ब्रह्मचर्य की घुट्टी मुझे कदम-कदम पर पिलायी गयी थी। इन्हीं दिनों मैंने गाँधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ को भी पढ़ डाला था। उन्होंने भी ब्रह्मचर्य के महत्व का खूब बखान किया है। मुझे लगने लगा कि स्त्री मेरे मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है। मुझे तो संस्कृत का बड़ा विद्वान बनना था और किसी विश्वविद्यालय में संस्कृत का प्रोफेसर। इंटर में पहुँचा तो संतों का साहित्य भी पढ़ा।  मेरी धारणा और भी पुष्ट होती गई। तुलसीदास अपना मानस तभी लिख सके जब उन्होंने अपनी पत्नी से रिस्ता तोड़ लिया। ‘आँखिन देखी’ की बात करने वाले कबीर ने तो यहाँ तक कहा है,

“नारी की झाँईं पड़त अंधा होत भुजंग / कबिरा तिनकी कौन गति नित नारी को संग।

नारि नसावै तीन गुन जो नर पासे होय / भक्ति मुक्ति निज ध्यान में पैठि सके नहिं कोय।”

मैंने तय कर लिया कि शादी नहीं करूँगा। इधर हाई स्कूल प्रथम श्रेणी से पास करते ही बरदेखुआ लोगों की लाइन लग गई। बाऊजी छोटी उम्र का बहाना करते थे तो लोग सुझाव देते थे कि गौना तीसरे में कर लीजिए। शादी न करने के निर्णय की सार्वजनिक घोषणा  करने का साहस मैं न कर सका और बाऊजी से कह दिया कि जो भी लोग शादी के लिए आते हैं उनसे वे कह दिया करें कि वह जब तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जायेगा, शादी नहीं करेगा। बाऊजी कहने लगे कि लड़का अभी नहीं चाहता है। इसके बावजूद लोग रिश्तेदारों को लेकर आते रहे, बाऊजी पर दबाव बनाते रहे और बाऊजी सबसे मेरी इच्छा बताकर पल्ला झाड़ते रहे।  धीरे-धीरे चारो ओर मैं बदनाम हो गया कि अपने बाप की बात नहीं मानता है और बहुत घमंडी है। किन्तु इस बदनामी का इतना असर जरूर हुआ कि मेरे ऊपर शादी का दबाव कुछ दिनों के लिए टल गया।

  महाराजगंज, उन दिनों गोरखपुर जिले का तहसील मुख्यालय था और पूरी तहसील में प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना के उद्योग से दो कॉलेज खुल चुके थे, पहला जवाहरलाल नेहरू डिग्री कॉलेज महाराजगंज और दूसरा लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज आनंदनगर। इंटर करने के बाद मैंने महाराजगंज डिग्री कॉलेज में प्रवेश लिया जो मेरे घर से लगभग 6 किलोमीटर पड़ता था। इंटर में मुझे राजकिशोर मिश्र जैसे सुरुचि संपन्न शिक्षक मिले थे जिनके कारण हिन्दी में मेरी रुचि बढ़ गई थी। बी.ए. की कक्षाओं में डॉ.वेदप्रकाश पाण्डेय मिले और उन्होंने अनजाने ही भविष्य की मेरी दिशा निर्धारित कर दी। डॉ. विजयरंजन वर्मा और डॉ. घनश्याम पाण्डेय जैसे शिक्षको के नाते हिन्दी के प्रति मेरी रुचि दृढ़ से दृढ़तर होती गई। मैं अपने घर से पैदल आता-जाता रहा और कॉलेज में सर्वाधिक अंकों के साथ बी.ए. में प्रथम श्रेणी प्राप्त किया।

उन दिनों एम.ए. करने के लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। मेरिट स्कॉलरशिप तो हाई स्कूल के अंकों के आधार पर ही मिलने लगी थी जो अध्ययन काल मे कभी बंद नहीं हुई। मेरिट के आधार पर एम.ए. में एडमीशन भी हुआ और संत कबीर छात्रावास जैसे सर्वोत्तम छात्रावास में कमरा भी मिला। मेरी पढ़ाई सुचारु ढंग से चलने लगी। किसान पुत्र और गँवईं मानसिकता के कारण मैं एक संकोची और दब्बू किस्म का विद्यार्थी बना रहा किन्तु जब एम.ए. प्रथम वर्ष का रेजल्ट आया तो मेरे भीतर आत्मविश्वास पैदा हुआ और क्लास में मेरी प्रतिष्ठा भी बढ़ी। क्लास के सर्वोत्तम विद्यार्थियों की ऐसी दोस्ती कायम हुई जिन्हें देखकर क्लास के अन्य खल प्रकृति के सहपाठी द्वेष की दावाग्नि में दहकने लगे। मेरे जीवन का वह स्वर्णिम काल था।  विभाग के जो चार विद्यार्थी एम.ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए वे हम आठ दोस्तों में से ही थे। ये चारो बाद में उच्च शिक्षा के लिए चयनित हुए। सुरेन्द्र दुबे कुलपति होकर रिटायर हुए, सदानंद गुप्त उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष रहे, मैं कलकत्ता चला गया और आशा सिंह( आशा उपाध्याय) इलाहाबाद वि.वि. से संबद्ध एस।एस। खन्ना गर्ल्स पी.जी. कॉलेज में प्रोफेसर बनीं। चार, जिनका प्रथम क्षेणी आते-आते रह गया उनमें देवेन्द्र सिंह गवर्नेंट इंटर कॉलेज मे शिक्षक बने, कनक श्रीवास्तव लखनऊ के एक इंटर कॉलेज में शिक्षिका बनीं, शची शुक्ला( मिश्र) मिलिटरी के कर्नल से शादी करके गायब हो गईं और लगभग चालीस वर्ष बाद कथाकार के रूप में अवतरित हुईं। हाँ, अनीता वर्मा कहाँ गायब हो गईं कुछ पता नहीं चला।

उन दिनों विश्वविद्यालय के प्रत्येक विभाग से एक शोध-छात्र को मेरिट के आधार पर शोध वृत्ति मिलती थी। उसका मैं हकदार था। पी.एच-डी. में रजिस्ट्रेशन की तिथि से शोध वृत्ति मिल सकती थी। विभागाध्यक्ष प्रो. भगवती प्रसाद सिंह से मैंने आग्रह किया और हमारे शिक्षकों ने उदारता का परिचय देते हुए प्रो. रामचंद्र तिवारी के निर्देशन में रजिस्ट्रेशन की कार्यवाही पूरी कर दी। संत कबीर छात्रावास में फिर से कमरा एलॉट हो गया, किन्तु अब नौकरी ढूँढना मेरी पहली प्राथमिकता थी।

इसी बीच पवित्रा डिग्री कॉलेज, मानीराम में एडहॉक ज्वायन कर लिया। कॉलेज अभी एडेड नहीं था। भविष्य की उम्मीद पर लोग पढ़ा रहे थे। डेढ़ सौ रूपये महीना सैलरी थी। मैं हॉस्टल से ही साइकिल से आता-जाता था और शोध कार्य भी जारी था।

एक दिन क्लास लेकर आया तो एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति को स्टाफ रूम में बैठे देखा। मेरे सहधर्मी शिक्षकों ने बताया कि ये आप की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैंने जिज्ञासा प्रकट की तो उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वे रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर हैं और उनकी एक बेटी है जिसकी शादी के लिए वे आए हैं। शादी मुझे करनी नहीं थी किन्तु इनकार करने का साहस नहीं था। बदनामी बहुत हो चुकी थी। मैंने उन्हें रिक्शे पर बैठाया और स्वयं उनके साथ सायकिल से चलते हुए रोडवेज जी।एम। आफिस में वरिष्ठ लिपिक के पद पर कार्यरत जगन्नाथ भैया के पास चला आया। जगन्नाथ भैया मेरे ममेरे भाई थे और स्थानीय अभिभावक भी। भैया से मैंने कह रखा था कि यदि कहीं से शादी का प्रस्ताव आए तो उन्हें स्पष्ट बता दें कि जब तक स्थायी नौकरी नहीं मिल जाएगी तब तक शादी के विषय में मैं बात भी नहीं करूँगा।

जगन्नाथ भैया इंस्पेक्टर साहब को पहले से जानते थे। उनके हृदय में इंसपेक्टर साहब के प्रति बड़े सम्मान का भाव था। पुलिस लाइन में रिजर्व इंस्पेक्टर के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने क्षेत्र के बहुत से लोगों को पुलिस की भर्ती में मदद की थी। भैया उन्हें स्पष्ट रूप से मना नहीं कर सके। इंस्पेक्टर साहब ने अपने पॉकेट से बायोडाटा सहित लड़की की तस्वीर निकालकर जगन्नाथ भैया के हाथ में थमा दिया। जगन्नाथ भैया ने एक नजर देखा और उन्ही के सामने वह तस्वीर मेरी ओर बढ़ा दिया।  बेलबाटम और कॉलरदार ओपेन सर्ट के दोनो बाजुओं पर इठलाती घुँघराले बालों की दो चोटियाँ तथा नील कमल सी आँखों वाली लड़की की उस तस्वीर ने मेरे संकल्प-वृक्ष को जड़ से हिलाकर झकझोर दिया। जगन्नाथ भैया ने उन्हें गाँव जाकर बाऊजी से बात करने का सुझाव दिया। इंस्पेक्टर साहब चले गए।  वहाँ से सायकिल से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित हॉस्टल तक पहुँचने में मुझे एक घंटा से अधिक लग गया। बार-बार मैं सायकिल से उतरता, पॉकेट से फोटो निकाल कर देखता और फिर जल्दी से पॉकेट में रखकर चल देता।

बाद में इंस्पेक्टर साहब गाँव गये और बाऊजी से मिले। बाऊजी जी भी शादी करना चाहते थे किन्तु उन्हें पता था कि मेरी सहमति के बगैर बात आगे नहीं बढ़ सकती। मैंने निर्णय लेने के लिए उन लोगों से कुछ और समय की माँग की। जिसके साथ जीवन गुजारना है उसे देखना कौन नहीं चाहता ? किन्तु अपनी इस अभिलाषा को सार्वजनिक करना मेरे बूते की बात न थी।

       मैंने कॉलेज से पाँच दिन की छुट्टी ली। बैग उठाया और ट्रेन से बनारस के लिए प्रस्थान किया। दरअसल, इंस्पेक्टर साहब ने बताया था कि उनकी बेटी इन दिनों उनके बड़े बेटे के पास बनारस में है जो साहूपुरी कैमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर्स में केमिस्ट हैं और वहीं कैम्पस में रहते हैं। मेरे लिए उनका पता लगाना कठिन नहीं था। बनारस में मैं शोध छात्र की हैसियत से नागरी प्रचारिणी सभा के गेस्ट हाउस में ठहरा और दूसरे दिन साहूपुरी में उनके आवास पर पहुँच गया। ग्राउंड फ्लोर के एक फ्लैट में वे रहते थे। पहले मैंने गोरखपुर का निवासी और उनके पिता जी से परिचय का हवाला देकर उनसे मिला। उनके आग्रह पर बैठा, चाय पिया और जब देखा कि यहाँ कोई सयानी लड़की नहीं है तो मैंने उन्हें अपना परिचय देते हुए अपने आने का उद्देश्य भी बता दिया। अब वे लोग अतिरिक्त रूप से सतर्क हो गए। पकौड़े बने और दुबारा चाय पीनी पड़ी। उन्होंने मुझे बताया कि उनकी बहन दो दिन पहले ही उनके छोटे भाई के पास चली गई है जो कछवा ( जिला-मिर्जापुर) के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर चिकित्साधिकारी हैं। उस दिन मैं गेस्ट ङाउस लौट आया।

28 मार्च 1977, दिन सोमवार। सुबह सिटी बस से कैंट गया और वहाँ से सवा दो रूपये का टिकट खरीदकर कछवा जाने वाली बस में बैठ गया। दोपहर तक बस कछवा पहुँच गई। रास्ते भर तरह-तरह के विचार उमड़ते-घुमड़ते रहे। मिलने और बात करने के तरीकों के बारे में कल्पनाएं करता रहा। मेरा इरादा था कि डॉक्टर साहब के अस्पताल में रहते हुए ही मैं उनके आवास पर जाकर सरोज का दर्शन कर लूँ। इरादा अपने को भी उसके सामने प्रस्तुत करने का था और उससे स्पष्ट रूप से कहने का कि मैं एक किसान पुत्र हूँ। गाँव में रहता हूँ। मेरा खपड़े का एक छोटा सा मकान है। आर्थिक दृष्टि से भी संपन्न नहीं हूँ। शादी के बाद तब तक गाँव में रहना पड़ेगा जब तक मेरी स्थायी नौकरी नहीं लग जाती और परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हो जातीं। मेरे ऊपर जिम्मेदारियाँ भी बहुत हैं। माता-पिता के अलावा अपने छोटे भाई और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी मुझे ही निभानी है। नौकरी के बारे में कुछ भी कहना कठिन है। मुझे वह देख ही रही है। यह सब जानकर यदि वह शादी करना चाहे तो ठीक अन्यथा वह मुझे चुपके से संकेत कर दे। मैं स्वयं ही कोई बहाना करके शादी से इनकार कर दूँगा। इसके लिए यदि वह समय लेना चाहे तो बाद में भी पत्र द्वारा सूचित कर सकती है। मैं रास्ते भर यही सब सोच रहा था किन्तु व्यक्ति का सोचा हुआ हो पाता है क्या ?

कछवा का छोटा सा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र। मरीजों की भीड़ छँट चुकी थी। घुसते ही देखा, कंपाउंडर मरीजों को दवा बाँट रहा था। मैं उसी से पूछ बैठा,

“यहाँ गोरखपुर जिले के कोई डॉक्टर हैं क्या ?”

“हाँ, एक डॉक्टर शर्मा हैं।” कहकर उसने अपने पीछे का परदा हटाया और डॉक्टर साहब को आवाज दिया, “आप से कोई मिलने आया है।”

मेरा दिल थम सा गया। मकसद तो मेरा सिर्फ यह पता करना था कि डाक्टर साहब अस्पताल में हैं या नहीं। किन्तु डॉक्टर साहब आवाज सुनते ही बाहर आ गए।

मैंने डॉक्टर साहब को नमस्कार किया।

“आइए बैठिए।” उन्होंने कहा और मैं उनके चैम्बर में चला गया। मरीज नहीं थे।

“कहिए कहाँ से आए हैं?”

“मैं भी गोरखपुर का ही हूँ। यहाँ अपनी एक रिश्तेदारी में आया हूँ। पता चला कि यहाँ मेरे जिले के कोई डॉक्टर आए हैं तो मिलने चला आया। बड़ा पिछड़ा क्षेत्र है यह। कैसा लगता है आप को ?”

“पहली पोस्टिंग है न! ग्रामीण क्षेत्र में जाना ही पड़ेगा। वैसे यहाँ से नजदीक ही मेरी ससुराल भी है, भदोही के पास मूसी “

वे हालचाल बताते रहे। तबतक चाय आ गयी। मैंने चाय पी और चलने को उद्यत हुआ।

“कोई काम था ?”

“नहीं, बस मिलने चला आया था।”

अबतक दोपहर के दो बज चुके थे। डॉक्टर साहब के लंच का समय हो चुका था। अभी तक मुझे उनके आवास के बारे में भी पता नहीं चल पाया था। अब उम्मीद सिर्फ यह थी कि जब डॉक्टर साहब लंच के बाद चार बजे अस्पताल आएं तो मैं उनके आवास पर जाकर चुपके से सरोज का दर्शन करूँ।

मैं समय काटने के लिए बाजार की ओर चला गया और ठीक चार बजे लौटा। डॉक्टर साहब के आवास और अस्पताल को एक सड़क विभाजित करती थी। इसी सड़क पर एक छोटी सी चाय की दूकान थी और पास में पान बेचने वाले की गुमटी। आते-जाते डाक्टर साहब उस गुमटी पर पान खाते थे। दूकानदार ने वहीं से डाक्टर साहब का आवास दिखाया और यह भी बताया कि डाक्टर साहब इस समय अस्पताल में हैं।

मैं शीघ्र उनके आवास पर गया। दरवाजा खटखटाया। दो -तीन बार खटखटाने के बाद सौन्दर्य की देवी बाहर निकली। मेरी नजर उसकी आँखों पर पड़ी और ऐसी पड़ी कि गड़ी ही रह गई। सिर्फ आँखे ही देखता रह गया।

“कहिए, क्या बात है ?”

मैं अचकचा गया।

“डॉक्टर साहब से मिलना है।”

“वे नहीं है। अस्पताल में हैं।” कहते हुए उसने फटाक से दरवाजा बंद कर लिया।

मैं हताश। कहाँ तो सोचा था बातें करूँगा। कहाँ सिर्फ आँखें देखते रह गया। चेहरा भी न देख सका।

थोड़ी दूर पर मैंने देखा, एक किसान अपनी फसल की ओसौनी कर रहा था। पास में उसके दो बच्चे खेल रहे थे। बगल में एक चारपायी पड़ी थी। मैं उसी पर जाकर बैठ गया।

दो मिनट बाद किसान की पत्नी ने पूछा, “का बाबू केहूके अगोरतानी का ?”

“हाँ, एक जनी आवेके बाड़ें। उनहीं के अगोरतानीं।”

समय तेजी से भाग रहा था। मुझे सात बजे की ट्रेन पकड़नी थी। डॉक्टर साहब कभी भी अपने आवास पर लौट सकते थे। मैंने हिम्मत करके उस किसान की पत्नी से कहा,

“डॉक्टर साहब के घर में एक लड़की रहती है। मुझे उसे देखना है। क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो ?”

 उसने अपनी असमर्थता जाहिर की, किन्तु तुरंत आ रही एक दूसरी महिला की ओर संकेत करती हुई बोली, “ऊ चाहें त देखा सकेली।”

मैंने उस महिला से सबकुछ बता दिया और कहा कि मैं उस लड़की को देखने के लिए गोरखपुर से आया हूँ और सात बजे की गाड़ी से बनारस लौटना है।

उसने मुस्कराते हुए कहा, “ई कवन बड़हन बाति बा ? हम अब्बे देखा दे तानीं।” कहते हुए उसने मुझे अपने साथ चलने को कहा और जाकर डॉक्टर साहब के बँगले के पीछे का दरवाजा जोर-जोर से खटखटाने लगी।

फाटक खुला। एक चेहरा झाँका। जैसे घने बादलों के बीच से चाँद। उस महिला ने थोड़ी दूर पर चर रही मुर्गियों की ओर संकेत करते हुए कहा, “ए बहिनी, देख S तोहार मुर्गिया कुल हमार गेहूँ खा लेति बाड़ी।”

“हमारी नहीं हैं। हम लोग मुर्गी नहीं पालते हैं।” उसने दरवाजे के भीतर से ही जवाब दिया।

“अरे तनि बहरे आके देख S त S।” महिला भी हिम्मतवाली थी।

घटाओं को चीर कर चाँद बाहर आ गया था और मुर्गियों को निहारने लगा। मैं अपनी आँखों में वह सौन्दर्य भर लेना चाहता था। एक टक निहारता रहा। मृग-शावक सी चंचल उसकी नजरें अचानक मेरे ऊपर पड़ीं।

 “एक मिनट सुनिएगा।” कहता हुआ मैं उसके करीब जाने लगा।

 “भाभी! वही आदमी दुबारा आया है।” कहती हुई वह भीतर गई और बदले में उसकी भाभी बाहर आ गईं।

“कहिए, क्या बात है?”

“डॉक्टर साहब से मिलना है।”

“डॉक्टर साहब अस्पताल में हैं।” कहते हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया।

लौटते समय मैंने उस महिला को दो रूपए ईनाम दिए, आभार जताया और पूछा,

“कइसन जोड़ी बा ?”

“बबुआ, भगवान बना के भेजले बाड़ें।”

19 मई 1977। सादे समारोह के साथ शादी संपन्न हो गई। उन दिनों शादी में लड़की की बिदाई अमूमन नहीं होती थी। मेरी भी नहीं हुई। इस दौरान हमारे बीच नियमित पत्राचार होता रहा। शायद कोई हफ्ता गुजरा हो जिसमें हमने एक दूसरे को चिट्ठियाँ न लिखी हों। पत्र लिखना, पत्र की प्रतीक्षा करना और पढ़कर उसका जवाब देना, बस यही दिनचर्या थी उन दिनों।

और आखिर गौना भी हो गया। सरोज के लिए उत्तर वाले कमरे में चारपाई डाल दी गई। दो ही कमरे थे। आगे पीछे ओसारा और बीच में दालान। दालान में हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी। लोग उसी रास्ते आते-जाते थे और हम भोजन भी वहीं करते थे।  दक्खिन वाला कमरा राशन तथा खाने-पीने के सामान से भरा रहता था।

उन दिनों लोग रात के अँधेरे में चुपके से अपनी पत्नियों के पास जाते थे ताकि कही कोई देख न ले। किसी दंपति को एक साथ लेटे हुए मैंने कभी नहीं देखा था। गौने के दिन मैं बाहर सोया था जीजा जी के साथ। जीजा जी ने बारह बजे के बाद दो तीन बार मुझे अपनी केहुनी से ठेला और घर में भेजने का प्रय़ास किया। हमारे आस-पास कई रिश्तेदार सोये हुए थे। ओसारे में माँ थी और बहने भी। दालान का दरवाजा ओठगाँ दिया गया था। उसे खोलकर अंदर जाना था। माँ, बहनों और दूसरे रिश्तेदारों के बीच से होते हुए घर के भीतर जाने की हिम्मत मैं न कर सका। इस निर्लज्जता की दीवार को फाँदना मेरे लिए बहुत कठिन था। मैं न तो रातभर सो सका और न घर के भीतर दाखिल हो सका।  भटक खुलने में मुझे हफ्तों लगा और निर्लज्ज बनने में महीनों।

हमारा भारतीय समाज भी विचित्र है। साधु-सन्यासी अमूमन रँड़ुआ या अविवाहित होते हैं और ब्रह्मचर्य की महिमा गाते रहते हैं जबकि उनके सारे आराध्य बीबी-बच्चे वाले हैं। विष्णु भगवान क्षीर सागर में लक्ष्मी के साथ बिहार करते हैं, शिव, पार्वती के साथ हिमालय पर। राम जंगल में भी सीता को लेते गए और अनेक गोपिकाओं के साथ रास रचाने वाले कृष्ण तो सबसे निराले हैं। कई बीबियाँ हैं किन्तु प्रेम किया राधा रानी से।

हमें भी स्कूल की कक्षाओं में कीट-पतिंगों की प्रजनन-क्रिया के बारे में तो थोड़ा-बहुत पढ़ाया गया था किन्तु मानव जाति के इस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष को गोपनीय रखा गया। मान लिया गया कि सबकुछ तो प्राकृतिक है। यौन शिक्षा की जरूरत ही क्या है ? लोग सीख ही लेते हैं अपने-अपने अनुभवों से। अरे भाई, बच्चा पैदा होना भी तो प्राकृतिक है फिर गर्भ धारण करने के बाद से ही डॉक्टर के पीछे उसकी राय लेने क्यों दौड़ते रहते हैं ? 

       बहरहाल, ब्रह्मचर्य के महत्व का पाठ पढ़ते हुए शादी न करने का जो संकल्प मैंने बचपन में ही ले लिया था उसका परिणाम यह हुआ कि लड़कियों से हमेशा दूरी बनाकर रहने लगा था। स्त्री-पुरुष के प्राकृतिक रिश्ते को समझने में मेरी धार्मिक आस्था ने शादी होने के समय तक मुझे बाधित किया।

सरोज से शादी का निर्णय लेते समय प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ ने मेरी बहुत मदद की थी। मुझे अपने घर की दशा का भली-भाँति बोध था। इंस्पेक्टर साहब को सिर्फ मेरे ऊपर भरोसा रहा होगा। किन्तु फौरी तौर पर उनकी बेटी को तो इसी गाँव के उस कमरे में गुजर करना था जिसमें कोई खिड़की तक न थी, बिजली की कौन कहे। सरोज का जन्म शहर में हुआ था और उनका अबतक का जीवन भी कानपुर, लखनऊ और झाँसी जैसे बड़े शहरों के सरकारी बंगलों में रहते हुए बीता था। शादी के बाद इस पिछड़े हुए गाँव में मेरे जैसे लड़के के साथ जो स्वभाव से भी सन्यासी हो, निभा पाना आसान था क्या ?

शादी के कुछ महीने बाद ही मुझे स्थाई नौकरी मिल गई। पहली सैलरी थी 927 रूपए। किन्तु परिवार का सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के नाते खर्च बहुत अधिक थे। दो छोटी बहनों की शादी और विश्वंभर की पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर थीं। मेरी ही तरह विश्वंभर को छात्रवृत्ति आरंभ से ही मिलने लगी थी और मेरी ही तरह वे भी मितव्ययी थे, इसीलिए उनकी पढ़ाई में अधिक खर्च नहीं होता था। किन्तु दोनो छोटी बहनें सयानी हो चुकी थीं और उनकी शादी की जिम्मेदारी मेरी थी। मैं अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा बहनों की शादी के लिए जमा करने लगा। इधर माँ भी बीमार रहने लगी थी और उसके इलाज में भी खूब खर्च हो रहा था। सरोज के भाग्य में कमाऊ पति तो था किन्तु उसकी कमाई से कोई लाभ नहीं था।

 शादी हुई तो सरोज इंटर मे पढ़ रही थीं। शादी के बाद बी.ए. किया, बी।टी।सी। किया और सरकारी प्राइमरी स्कूल में टीचर बनीं। और इस तरह जब खुद कमाने लगीं तो नौकरी छोड़कर मेरे साथ कलकत्ता आ गईं। केवल पाँच साल तक नौकरी कर पायी थीं। निदा फाज़ली का कहना है कि “कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता।”

शादी के एक साल बाद ही मेरे बड़े बेटे का जन्म हुआ। गाँव में सुविधाएं बिल्कुल नहीं थीं। सरोज को बड़हलगंज लाना पड़ा किन्तु जन्म के कुछ दिन बाद फिर से सरोज को गाँव जाना पड़ा और अगले कई वर्षों तक गाँव आना-जाना जारी रहा।

आज हमारी शादी के सैंतालीस साल हो चुके हैं। सरोज से शादी और शादी के बाद सरोज से ही प्यार। मन आज तक न भरा न बहका। किसी अन्य लड़की से प्यार की कौन कहे मुझे किसी ने कभी आकर्षित तक न किया।  हम आपस में खूब लड़ते भी हैं और एक दूसरे पर जान भी छिड़कते हैं। शादी से पहले न तो हम एक दूसरे की रुचियाँ समझ सके थे और न एक दूसरे के स्वभाव। हमें नियति ने मिला दिया था। बुजुर्गों ने एक डोर में बाँध दी और हम आज तक उसी डोर में बँधे हुए हैं।  वे लोग अवश्य भाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन-साथी समान विचारों और समान रुचियों वाले मिल जाते हैं। जैसे कार्ल मार्क्स-जेनी मार्क्स, ज्योतिबा फुले-सावित्री बाई फुले, महात्मा गाँधी-कस्तूरबा गाँधी, गोपराजू रामचंद्र राव-सरस्वती गोरा, जयप्रकाश नारायण-प्रभावती देवी आदि। किन्तु इस तरह के जोड़े अपवाद होते हैं। हम जैसे सामान्य लोग प्यार के बल पर एक दूसरे के साथ एडजस्ट करके ही काम चला लेते हैं।

अपने अध्ययन और अनुभव के क्रम में मैं स्वयं अपने को बदलता हुआ पाता हूँ, विचार और आचरण दोनो ही रूपों में। जब तक मैं धर्मभीरु था तब तक सरोज के प्रति मेरा दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक अधिक था। अधिकारबोध अधिक था। किन्तु, जब मार्क्सवाद से परिचित हुआ तो धीरे-धीरे उनके प्रति दृष्टिकोण बदलता चला गया। रवैया दोस्ताना हो गया। धर्म हमें औरत के प्रति एकनिष्ठ तो बनाता है किन्तु उससे ज्यादा वह औरत से अपेक्षा भी रखता है। जहाँ भी धार्मिक कट्टरता है वहाँ औरत की दशा ज्यादा दयनीय है। इस्लामिक देशों में दशा और भी खराब है। तालिबानों ने उन्हें पालतू जानवर बना दिया है। मार्क्सवाद से परिचित होने के बाद ही मैं ‘नारी का मुक्ति संघर्ष’ लिख सका।

अपने अनुभवों के आधार पर आज मैं कह सकता हूं कि प्रेम-विवाह ही जीवन साथी चुनने का सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है किन्तु उसमें माता -पिता और परिवार के वरिष्ठ जनों की सहमति भी आवश्यक है। प्रौढ़ व्यक्तियों का प्रेम ही स्थायी हो सकता है। प्रेम अनायास ही नहीं होता। एक दूसरे के संपर्क में आने, साथ रहने, एक दूसरे की रुचियों को जानने-समझने से प्रेम होता है। जाहिर है प्रेम-विवाह में जाति-धर्म के बंधन बाधक नहीं होने चाहिए। जिस समाज में ये बाधक हैं वह समाज पिछड़ा है और ऐसी बाधाओं का मुकाबला करना किसी भी प्रेमी जोड़े के लिए बहुत कठिन होता है। इसलिए इससे बचना ही समझदारी है। प्रेम ही सबकुछ नहीं है जीवन में। फैज़ ने सही कहा है, “और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के सिवा।”

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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