Category: स्तम्भ

पी. साईनाथ
शख्सियत

पी. साईनाथ : ग्रामीण पत्रकारिता की मिसाल

 

आजाद भारत के असली सितारे-52

 

“पिछले साल मैं पंजाब में गया तो मुझे बहुत निराशा हुई कि वहाँ सब लोग जानते हैं कि भगत सिंह शहीद थे, राजनीतिक एक्टिविस्ट थे। वे भूल जाते हैं कि भगत सिंह एक पेशेवर पत्रकार थे। उन्होंने बारह से ज्यादा पत्रिकाओं में लिखा। चार में नियमित लिखा और चार भाषाओं में लिखा− पंजाबी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी। उन्होंने पहले लिखा ‘अकाली पत्रिका’ में पंजाबी में, फिर ‘अर्जुन’ में लिखा, ’प्रताप में लिखा। उन्होंने राजनीतिक लेखन ‘कीर्ति’ में किया। एक नौजवान ने चार भाषाओं में सैकड़ौं लेख लिखे, जब कि 23 साल की उम्र में उन्हें फाँसी दे दी गयी। मैं बार-बार सोचता हूँ कि मैंने तो 23 साल में पत्रकारिता शुरू की थी। ये थी आपकी परम्परा।”

“पिछले तीस साल में बदला क्या है? पारिवारिक, निजी, ट्रस्ट के मालिकाने से कॉरपोरेट मालिकाने में मीडिया चला गया। सबसे बड़ा मीडिया मालिक मुकेश अंबानी है। सबसे अमीर आदमी भी वही है। आप लोग जो ईटीवी देखते हैं, उसमें केवल तेलुगु को छोड़ के बाकी 19 चैनल मुकेश अंबानी की प्रॉपर्टी है। एक ट्रस्ट बना के उन्होंने इन्हें खरीदा। दिलचस्प है कि उसका नाम है ‘इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट’। उससे खरीद कर उन्होंने धंधा शुरू किया।”

“कॉरपोरेटाइजेशन में मीडिया पूरा बदल गया। पत्रकारिता की समझ, उसका दर्शन और कॉरपोरेट का दर्शन एकदम अलग है। पत्रकार देखता है कि खबर क्या है, उसका सबूत क्या है। ये पत्रकार की मानसिकता है। कॉरपोरेट के लिए रेवेन्यू और प्राफिट असल चीज़ है। उनकी दिलचस्पी नहीं है कि पत्रकार ने बढ़िया स्टोरी किया, वो ये देखते हैं कि स्टोरी से रेवेन्यू मिलेगा या नहीं। कॉरपोरेट सोचता है कि मैं इस स्टोरी को तब कवर करूँगा जब मुझे कहानी से पैसा आएगा।

तो कॉरपोरेट और पत्रकार की मानसिकता अलग है। मैं कहता हूँ कि 1990 से मीडिया और पत्रकारिता दो अलग-अलग चीज़ बन गयी है। जर्नलिज्म हम करते हैं, मीडिया धंधा करता है, मुनाफा कमाता है। उसका मूल उद्देश्य यही है। पत्रकारिता को रेवेन्यू स्ट्रीम तक लाकर छोड़ दिया गया है। समीर जैन ने मुझको कहा− साईनाथ जी, पत्रकारिता किसी भी धंधे की तरह एक धंधा है। मैं इस बात को नहीं मानता। यह किसी और उत्पाद की तरह उत्पाद नहीं है। आप टूथपेस्ट को छह महीना बेच सकते हैं। कल का अखबार आप आज बेच सकते हैं क्या? मीडिया एक धंधा है, कारोबार है। टीवी एक कारोबार है, अखबार एक धंधा है, पत्रकारिता एक आह्वान है, पुकार है। पत्रकारिता हम अपने दिल से करते हैं।”

“अब पत्रकारों पर हमले की बात। सौ परसेंट हमले 2013 तक ग्रामीण पत्रकारों पर हुए। जितना बड़ा जानलेवा हमला पत्रकारों पर हुआ, उसमें एक भी अंग्रेजी का नहीं है। सारा हमला हिंदुस्तानी भाषाओं के पत्रकारों पर हुआ। यह भी एक क्लास हाइरार्की (वर्गीय भेद) है …क्यों बढ़ गये हमले? इस देश में कॉरपोरेट जगत की ताकत है माइनिंग, सेज़ (एसईजेड), भूमि अधिग्रहण। ये सब कौन कवर करता है? ग्रामीण पत्रकार।

दूसरा बड़ा बदलाव 2013 में आया जब शहरी और एलीट पत्रकार भी हमले की चपेट में आ गए। पहला कौन था? नरेंद्र दाभोलकर। पाँच साल के बाद भी इस क्राइम का मामला हल नहीं हुआ है। सब जानते हैं कि दाभोलकर सिर्फ अंधविश्वास विरोधी एक्टिविस्ट नहीं थे। पचीस साल उन्होंने एक पत्रिका चलायी थी। पुलिस ने उनका केस कमजोर कर दिया क्योंकि उस समय संघ परिवार की सरकार आ चुकी थी। एक नौजवान पुलिस अफसर जाँच में अच्छा काम कर रहा था, उसे हटा दिया गया। उनका परिवार लगातार कहता रहा कि इसी अफसर को रखा जाए, उसकी नहीं सुनी गयी।

दूसरा गोविंद पानसारे। वे सीपीआइ के लीडर थे। ट्रेड यूनयन लीडर, लेकिन इतिहासकार और कालमिस्ट भी थे। तीस साल से वे कालम लिख रहे थे। सुना है नाम? उनका सबसे मशहूर काम क्या था? एक किताब- “शिवाजी कौन थे?” यह रेशनल अप्रोच से लिखी किताब थी। इसमें उन्होंने दिखाया था कि छत्रपति शिवाजी महाराज एक सेकुलर राजा था। उसका पर्सनल बाडीगार्ड था एक अफगान पठान। मुगल साम्राज्य के खिलाफ शिवाजी की लड़ाई सत्ता के लिए की गयी राजनीतिक जंग थी। शिवाजी महराज ने पंद्रह पत्र लिखे हैं अपने अफसरों को यह कहते हुए कि किसानों को नहीं लूटा जाना चाहिए क्योंकि वे हमारे समाज का आधार हैं। जहाँ भी उन्होंने लिखा या भाषण दिया, कट्टरपंथियों पर हमला किया। उनको उनके घर के सामने मार दिया गया। इसके बाद एमएम कलबुर्गी। वे पत्रकार थे। अकादमिक थे। विद्वान थे। कालम लिखते थे। उनको भी मार दिया गया। इन लोगों के बीच समान क्या था? तार्किक विचार। चौथी हत्या थी हाइ प्रोफाइल पत्रकार गौरी लंकेश की।”

“गाँवों में जो नुकसान हुआ है वह कुदरती नहीं, हमारी आर्थिक नीतियों से हुआ है। यह जान बूझकर हुआ है। मानवीय है। उसके साथ देश में असमानता बढ़ गयी है। असमानता सबसे ज्यादा गाँवों में बढ़ी। आपको मैं दो आँकड़े देता हूँ। 1991 में नई आर्थिक नीति से पहले इस देश में एक भी डॉलर अरबपति नहीं था। फिर फोर्ब्स मैगजीन- जो ग्लोबल पूँजीवाद की पुजारी है- उसका 2000 में जो अंक आया, उसमें बताया गया कि डॉलर अरबपति भारत में 8 हो गए। फिर 2012 में 53 अरबपति हो गए। 2018 में 121 अरबपति इस देश में हो गए। आपकी जनसंख्या 130 करोड़ से ज्यादा है, इसमें 121 आदमी (तीन चार महिला भी है उसमें) की धन-दौलत का वैल्यू हिंदुस्तान की जीडीपी का 22 परसेंट है। दुनिया में कोई भी समाज ऐसी असमानता पर टिके नहीं रह सकता।”

“2011 की जनगणना में पता चला कि सबसे बड़ा पलायन हुआ है इस देश के इतिहास में। विभाजन के बाद भी इतना बड़ा पलायन नहीं दिखा था। कोई नौकरी तो कोई छिटपुट काम के लिए गाँव छोड़कर भाग रहा है जबकि शहर में काम है नहीं। आपने एक रोजगार नहीं क्रिएट किया। जो किसान बनारस छोड़ कर जाते हैं उनको लखनऊ में इंफोसिस में काम मिलेगा क्या? हाँ, मिल भी सकता है, लेकिन उसकी कैंटीन में चाय बाँटने का काम। 1991 और 2011 सेंसस में देखिए, किसानों की आबादी 150 लाख गिर गयी। कहाँ गए ये किसान? सेंसस में एक और कॉलम में आप देख सकते हैं कि खेत मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। मतलब जितनी जमीन गयी, जितने लोग खेती छोड़ गए, वे सब मजदूर बन गए। इसकी रिपोर्टिंग किसने की? उन ग्रामीण पत्रकारों ने, जो मेरे साथ घूमते हैं। वे ही दिखा सकते हैं आपको कि देश में दरअसल क्या हो रहा है।”

“मैंने अरबपति और नरेगा मजदूरों की तुलना की है। कुल 121 अरबपतियों में नंबर वन कौन है? जिसके पास इतना पैसा है कि दो और तीन नंबर वाले को मिलाकर भी उससे कम पड़ता है? उसका नाम है मुकेश भाई। मुकेश भाई ने 2017 में एक साल में 16.9 अरब डॉलर पैसा कमाया। रुपये में उस समय यह एक लाख पाँच हजार करोड़ था। मैंने सोचा कि अगर मैं नरेगा मजदूर हूँ तो मैं भी एक लाख पाँच हजार करोड़ रुपया कमा सकता हूँ। हाँ, लेकिन थोड़ा टाइम लगेगा इसमें। एक लाख 87 हजार साल लगेगा इतना पैसा कमाने में। या कहें, 187 लाख नरेगा मजदूर लगेंगे इतना पैसा एक साल में कमाने में।”

“जैसे-जैसे यह असमानता बढ़ रही है, गाँवों की जीवन-शैली खराब हो रही है। इसकी रिपोर्टिंग एक बड़ी चुनौती है जिसे ग्रामीण पत्रकार ही पूरा कर सकते हैं। जब आप इस तरह की चीजें रिपोर्ट करेंगे तो एक तो प्लेटफार्म की दिक्कत है कि इसे कौन छापेगा, दूसरा हमले की आशंका। हमला केवल शारीरिक नहीं है, दूसरे किस्म का भी हो सकता है। जैसे दिल्ली में परंजय गुहा ठाकुरता ने जब ‘गैस वार्स  नाम की किताब लिखी थी रिलायंस पर। रिलायंस ने उनको सौ करोड़ का नोटिस थमा दिया था। जब रिलायंस 100 करोड़ का नोटिस परंजय को देता है तो वह जानता है कि उसकी जेब में सौ रुपया भी शायद होगा, लेकिन रिलायंस को पैसा नहीं चाहिए। यह तो चेतावनी है बाकी पत्रकारों को, कि आप भी अगर ऐसा लिखेंगे तो आपको खत्म कर दिया जाएगा।”

“एक के बाद एक रैकेट है यहाँ। फसल बीमा योजना को लें… मैं बार बार कह रहा हूँ कि यह राफेल घोटाले से भी बड़ा घोटाला है। राफेल का कितना है? 58000 करोड़। फसल बीमा में अब तक की कुल पब्लिक मनी है 86 हजार करोड़ और ये पैसा किसान को नहीं, बीमा कंपनियों को जा रहा है। चंडीगढ़ के ट्रिब्यून अखबार ने आरटीआई लगाया था इस पर। उसमें सामने आया कि पहले 24 महीने में जब 42000 करोड़ सेंटर और स्टेट का खर्च हुआ, तो 13 बीमा कंपनियों ने मिलकर 15,995 करोड़ रुपये का मुनाफा बनाया यानी हर दिन का मुनाफा 21 करोड़ रुपये।”

“पत्रकारिता में अभी दो स्कूल हैं− एक है पत्रकारिता, दूसरा स्टेनोग्राफी। अभी अखबार और चैनल में स्टेनोग्राफी कर रहे हैं सब। जो मालिक बोलता है, वे लिखते हैं। मैं पीपुल्स आर्काइव आँफ रूरल इंडिया (परी) नाम की वेबसाइट तेरह भाषाओं में चला रहा हूँ। बड़े-बड़े पत्रकार छद्म नाम से हमको लेख और फिल्में दे रहे हैं क्योंकि उनके यहाँ वह छपने वाला नहीं है। मेरी सीनियरिटी के लोग मुझे लिख कर दे रहे हैं। वे भी एक जमाने में पत्रकारिता में अच्छा काम करने के लिए आए थे, समाज में सुधार करने के लिए आए थे। गाँधी, आंबेडकर, भगत सिंह, सब इसी आदर्शवाद और समाज सुधार को लेकर पत्रकारिता में आए थे।”

“जिसे हम कृषि संकट कहते हैं, वह दरअसल समाज का संकट है। मिस्त्री, दर्जी, मोची, सारे संबद्ध पेशे कौलैप्स कर रहे हैं। मैं कहता हूँ कि यह समाज का संकट भी नहीं है, यह सभ्यता का संकट है। हमारी सभ्यता छोटे किसान, छोटे मजदूर पर आधारित है। इसलिए यह सभ्यता का संकट है। मैं आखिर में ये भी कहता हूँ कि जो आग कृषि में लगी है वो मध्यवर्ग तक पहुँच चुकी है तब भी हम आवाज नहीं उठाते हैं। तीन लाख 20 हजार किसान खुदकुशी कर चुके हैं और हम चुपचाप बैठे हैं। क्या समाज है जो चुपचाप इसे स्वीकार कर रहा है? इसलिए मैं कह रहा हूँ कि यह हमारी इंसानियत का संकट है।”

ये पी. साईनाथ के उस व्याख्यान के कुछ अंश है जिसे उन्होंने बनारस के पराड़कर स्मृति सभागार में 29 नवंबर 2019 को दिया था। (न्यूजलॉंन्ड्री हिन्दी, 3 दिसंबर 2019 से)

पालागुम्मी साईनाथ का जन्म 13 मई 1957 को चेन्नई में एक तेलुगू भाषी परिवार में हुआ था। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति वी.वी.गिरि के पौत्र हैं। उनकी शिक्षा मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के लोयोला कॉलेज और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में हुई। इतिहास से एम.ए. करने के बाद उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता से ही की। 1980 में वे ‘यूनाइटेड न्यूज ऑफ इण्डिया’ से जुड़ गए। इसके बाद वे ‘ब्लिट्ज’ में चले गए जो उन दिनों मुंबई का प्रसिद्ध साप्ताहिक था और उसकी प्रसार संख्या 6 लाख थी। यहाँ उन्होंने पहले विदेशी मामलों का सम्पादन विभाग सँभाला और फिर उसके उपसम्पादक बन गए। पी. साईनाथ ‘ब्लिट्ज’ से दस साल तक जुड़े रहे।

पी. साईनाथ ग्रामीण क्षेत्रों की अपनी बेबाक पत्रकारिता तथा अपने संगठन ‘परी’ (पीपल्स ऑर्काइव ऑफ रूरल इंडिया) के कारण खासतौर पर जाने जाते हैं। वे ‘परी’ के संस्थापक हैं। दिसंबर 2014 में गठित ‘परी’ डिजिटल जर्नलिज्म का एक अद्भुत मंच है। यह एक जीवंत जरनल भी है और आर्काइव भी। पूरे भारत का ग्रामीण वैविध्य, वैज्ञानिक दृष्टि-संपन्न लेखकों की कलम से, विभिन्न भाषाओं में तथा छायाकारों के छायाचित्रों के माध्यम से भी अपने यथार्थ रूप में यहाँ उपलब्ध है। आप कहानियों के रूप में, रिपोर्टिंग के रूप में, वीडियो और ऑडियो के भी रूप में यहाँ जब चाहें देख सकते हैं। इतना ही नहीं, ‘परी’ में कोई भी व्यक्ति, यदि उसके पास कुछ भी ‘परी’ की प्रकृति के अनुकूल और मूल्यवान है, योगदान कर सकता है। ‘परी’ के फोटो एडीटर बिनैफर भरूचा, मैनेजिंग एडीटर नमिता वायकर, एक्जूकीटिव एडीटर शर्मीला जोशी तथा टेक्निकल एडीटर सिद्धार्थ अडेल्कर हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ और अनुभवी व्यक्ति हैं। पी. साईनाथ का यह संगठन स्वतंत्र है, किन्तु वे इसके लिए किसी कारपोरेट या सरकार से अनुदान नहीं लेते।

भारत में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें 1990 के बाद आनी शुरू हुई थीं। ‘द हिन्दू’ ने 1990 से किसानों की आत्महत्या की खबरें नियमित रूप से छापना शुरू किया। ये खबरें ग्रामीण मामलों के संवाददाता पी. साईनाथ द्वारा दी जाती रहीं। आरंभ में ये खबरे महाराष्ट्र से, फिर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पंजाब, मध्य प्रदेश से आने लगीं। अकेले 2009 में 17366 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रिपोर्ट दर्ज हुई। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की थी। सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ से दबे किसानो की आत्महत्या का सिलसिला आज भी थमा नहीं है।

 निस्संदेह ग्रामीण क्षेत्रों की पत्रकारिता का पी. साईनाथ का अनुभव असीमित है। उन्होंने देश के दस सूखा पीड़ित राज्यों की यात्रा करके उनका गहराई से अध्ययन किया था। इस अध्ययन से किसानों की दशा, भूख, अकाल आदि के बारे में जमीनी हकीकत से वे परिचित हुए।

असल में उन्हें लगता था कि पत्रकारों की निगाह, खबरों से ज्यादा ‘मनोरंजन’ पर टिकी रहती है और उनका ध्यान देश की ग़रीबी तथा दूसरे कठिन सवालों की ओर कम जाता है। उन्होंने निश्चित किया कि, “अगर देश की मुख्य पत्रकारिता की धारा ऊपर के पाँच प्रतिशत लोगों को अपने केंद्र में रखना चाहती है, तो मैं नीचे से पाँच प्रतिशत लोगों को अपनी पत्रकारिता का विषय बनाऊँगा।”

उन्होंने 1993 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में एक फैलोशिप के लिए आवदेन किया। इंटरव्यू के दौरान जब उन्होंने अपनी योजना में ग्रामीण भारत की दशा का हवाला दिया कि वह इसी विषय पर काम करना चाहेंगे तो इंटरव्यू लेने वाले सम्पादक ने सवाल किया कि “अगर मैं कहूँ कि मेरे पाठक ऐसे किसी विषय में कतई दिलचस्पी नहीं रखते, तब…?” इस पर पी. साईनाथ ने तुरंत पलट कर सवाल किया, “आपका अपने पाठकों से आखिरी बार आमना-सामना कब हुआ था.. जो आप उनकी रुचि के बारे में ऐसा दावा यहाँ बैठे-बैठे कर सकते हैं?”

फिलहाल, पी. साईनाथ को फैलोशिप मिल गई और उन्होंने देश के पाँच राज्यों से दस सबसे ग़रीब ज़िलों के अध्ययन का काम चुना। इस काम के दौरान पी. साईनाथ ने देश-भर में एक लाख किलोमीटर यात्रा की, जो सोलह विभिन्न सवारियों से पूरी हुई। इसमें पाँच हजार कि.मी. की पैदल यात्रा भी शामिल है। उस दौर में पी. साईनाथ की इस फैलोशिप की 84 रिपोर्ट्स अठारह महीनों तक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में लगातार छपती रही और बाद में वह सामग्री एक पुस्तक के रूप में सामने आई जिसका शीर्षक है, “एवरीबॉडी लव्स ए गुड ड्राट : स्टोरीज फ्रॉम इंडियाज पूअरेस्ट डिस्ट्रिक्ट्स”। यह पुस्तक लगातार दो वर्षों तक भारत में पाठकों की पहली पसंद बनी रही। इसे पेंगुइन की ‘आल टाइम्स बैस्टसैलर’ कहा गया। इस किताब की जितनी भी रॉयल्टी पी. साईनाथ के नाम आई, उसे उन्होंने नए ग्रामीण पत्रकारों को दिए जाने वाले पुरस्कार के लिए एक फंड को सौंप दिया।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने पी. साईनाथ की रिपोर्टिंग शैली को दूसरे अखबारों के सामने मॉडल के तौर पर रखा, जिसमें ग़रीबी तथा ग्राम-विकास के मुद्दे बेहद साफ होकर सामने आए थे। कनाडा के एक डाकुमेंट्री फिल्म निर्माता ने पी. साईनाथ के काम को केंद्र में रख कर एक फिल्म बनाई ‘ए ट्राइब ऑफ हिज़ ऑन’। यह फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी।

एक साक्षात्कार में तीस्ता सीतलवाड के एक प्रश्न का जवाब देते हुए उन्होंने कहा है, “आज पूरा इंडियन लैंग्वेज मीडिया, अंग्रेजी मीडिया का क्लोन बन रहा है।”…और “इसीलिए पत्रकारिता में आज आचार संहिता की जरूरत है, मोनोपोली के खिलाफ। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक रिलायंस कंपनी या मर्डोक या टाइम्स ऑफ इंडिया 90 फीसदी मीडिया का स्वामी हो जायँ… एक एंटी मोनोपोली कानून होना चाहिए।”

पी. साईनाथ ने 2020-21 में होने वाले किसानों के आन्दोलन का समर्थन किया था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि ये तीनों कानून किसानों के हित में नहीं हैं। 4 दिसंबर 2020 के ‘द वायर’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने किसानों के आन्दोलन का समर्थन किया था।

पी. साईनाथ को प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे एवार्ड मिल चुका है। उन्हें 7 जुलाई 2021 को आंध्र प्रदेश सरकार का प्रतिष्ठित वाईएसआर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला जो किसी पत्रकार को मिलने वाला पहला पुरस्कार था। इसमें उन्हें 10 लाख की राशि मिली थी जिसे उन्होंने विनम्रतापूर्वक यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि किसी पत्रकार को कोई सरकारी पुरस्कार स्वीकार नहीं करना चाहिए क्योंकि एक पत्रकार अपनी सरकार का लेखा परीक्षक होता है। इतना ही नहीं, उन्होंने 2009 में मिलने वाला भारत सरकार का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ भी अस्वीकार कर दिया था।

साईनाथ एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं। तस्वीरों का उनका संकलन “विजिबुल वर्क, इनविजिबुल वीमेन : वीमेन एंड वर्क इन रूरल इंडिया” 6 लाख से भी अधिक लोगों द्वारा देखा जा चुका है।

उन्हें जापान के प्रतिष्ठित ग्रैंड फुकुओका पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। यह जापान का सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से है जो पहली बार किसी पत्रकार को मिला है। इस पुरस्कार राशि को पी. साईनाथ ने दो श्रेणी को लोगों को दान दे दिया है पहला, ऐसे ग्रामीण पत्रकारों के परिवारों को जिनकी जान कोविड-19 के कारण चली गई है और दूसरा, ‘परी’ की ओर से दी जाने वाली फेलोशिप के रूप में दलित और आदिवासी समुदाय के उन पत्रकारों को जो ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हैं।

 इसके अलावा भी पी. साईनाथ को दुनिया भर के अनेक पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। साईनाथ के बारे में 1984 में ही ख्बाजा अहमद अब्वास ने कहा था कि, “वह बेहद निर्भीक, अडिग, अथक तथा जुनून-भरे पत्रकार हैं… सबसे बड़ी बात, कि उन्हें भ्रष्ट नहीं किया जा सकता… यह सिर्फ पालागुम्मी साईनाथ हैं, जो राजा को नंगा कहने की हिमाकत कर सकते हैं।”

अमर्त्य सेन ने उन्हें अकाल और भुखमरी के विश्व के महानतम विशेषज्ञों में से एक माना हैं। आज पी.साईनाथ का जन्मदिन है। हम उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं और उनके सुस्वास्थ्य व सतत सक्रियता की कामना करते हैं

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