संस्कृति

लोक‌ ‌गायकों‌‌ ‌‌की‌‌ ‌‌कथा‌ ‌

 

 ‌गीतों‌ ‌के‌ ‌‌माध्यम‌ ‌‌से‌ ‌‌कही‌ गयी ‌कथा‌ ‌‌को‌ ‌‌लोकगाथा‌ ‌‌कहा‌ ‌‌जाता‌ ‌‌है‌।‌ ‌‌क्षेत्रानुसार‌ ‌‌इसके‌ ‌‌लिए‌ ‌‌अलग‌ ‌‌अलग‌ ‌शब्द‌ ‌‌जैसे‌ ‌ महाराष्ट्र‌ ‌में‌ ‌लोकगाथा‌ ‌के‌ ‌लिए‌ ‌‘पवाड़ा’‌, गुजराती‌ ‌मे‌ ‌‌‘कथागीत’‌ ‌राजस्थानी‌ ‌मे‌ ‌‘गीत‌ ‌कथा’‌ ‌आदि‌ ‌‌का‌ ‌‌प्रयोग‌ ‌ किया‌ ‌‌जाता‌ ‌‌है‌।‌ लोकगाथाओं‌ ‌‌को‌ ‌गायन‌ ‌शैली‌ ‌‌में‌ ‌‌प्रस्तुत‌ ‌‌करने‌ ‌‌की‌ ‌परम्परा ‌‌कब‌ ‌‌शुरू‌ ‌‌हुई‌ ‌‌ये‌ ‌‌तो‌ ‌‌ज्ञात‌ ‌‌नहीं‌ ‌‌लेकिन‌ ‌अनुमान‌ ‌‌के‌ ‌‌आधार‌ ‌‌पर‌ ‌‌कहा‌ ‌‌जा‌ ‌‌सकता‌ ‌‌है‌ ‌कि‌ ‌‌यह‌ ‌‌आदिम‌ ‌‌साहित्यिक‌ ‌‌रूप‌ ‌‌है‌ ‌‌जो‌ ‌‌बाद‌ ‌‌के‌ ‌‌युगों‌ ‌‌में‌ ‌‌लोक‌ ‌‌मंनोरंजन‌ ‌‌के‌ ‌साथ‌ ‌‌जनमत‌ ‌‌तैयार‌ ‌‌करने‌ ‌‌के‌ ‌‌लिए‌ ‌‌लोकगाथाओं‌ ‌‌के‌ ‌‌रूप‌ ‌‌में‌ ‌‌गाया‌ ‌‌एवं‌ ‌सुना‌ ‌जाने‌ ‌‌लगा‌।‌ ‌‌धर्मेंद्र‌ ‌‌पारे‌ ‌‌के‌ ‌‌अनुसार‌ ‌”यह‌ एक‌ ‌बहुत‌ ‌सुविचा‌रित‌ ‌और‌ ‌राजनैतिक‌ ‌कर्म‌ ‌था‌।‌ जब‌ ‌समाज‌ ‌में‌ ‌गैर‌ ‌भारतीय‌ ‌तत्वों‌ ‌का‌ ‌बोलबाला‌ ‌होने‌ ‌लगा‌ ‌समाज‌ ‌का‌ ‌जीवन‌ ‌अपने‌ ‌नैसर्गिक‌ ‌धार्मिकता‌ ‌का‌ ‌निर्वाह‌ ‌नहीं‌ ‌कर‌ ‌पा‌ ‌रहा‌ ‌था‌।‌

‌ऐसे‌ ‌में‌ ‌अपनी‌ ‌विरासत‌ ‌से‌ ‌परिचित‌ ‌कराने‌ ‌के‌ ‌लिए‌ ‌इन‌ ‌लोक‌ ‌गायकों‌ ‌‌ने‌ ‌पौराणिक‌ ‌कथाओं‌ ‌को‌ ‌स्थान‌ ‌दिया‌ ‌और‌ ‌सत्ता‌ ‌का‌ ‌दमन‌ ‌जब‌ ‌बढ़ा‌ ‌और‌ ‌‌विद्रोहियों‌ ‌‌ने‌ ‌अपने‌ ‌शौर्य‌ ‌का‌ ‌प्रदर्शन‌ ‌करते‌ ‌हुए‌ ‌कुर्बानी‌ ‌देना‌ ‌प्रारम्भ ‌किया‌ ‌तो‌ ‌इसे‌ ‌किसी‌ ‌इतिहासका‌र‌,‌ ‌किसी‌ ‌‌साहित्यकार‌ ‌और‌ ‌किसी‌ ‌‌गजेटियर‌,‌ ‌किसी‌ ‌‌नेरेटिव‌ ‌में‌ ‌‌वै‌सा‌ ‌नहीं‌ ‌लिखा‌ ‌गया‌।‌ ‌वैसा‌ ‌का‌ ‌वैसा‌ ‌लोक‌ ‌में‌ ‌पहुंचाने‌ ‌का‌ ‌महान‌ ‌कार्य‌ ‌किया‌ ‌‌इन‌ ‌नामालूम‌ ‌से‌ ‌हरबोलों‌ ‌ने‌।‌ ‌उन्होंने‌ ‌इसे‌ ‌लोकमानस‌ ‌में‌ ‌प्रसारित‌ ‌किया‌ ‌‌।‌ इन्होंने‌ ‌उन‌ ‌‌वीर‌ ‌नायकों‌ ‌के‌ ‌विद्रोह‌ ‌को‌ ‌अपने‌ ‌गायन‌ ‌का‌ ‌विषय‌ ‌बनाया‌ ‌यह‌ ‌छोटा‌ ‌कार्य‌ ‌नहीं‌ ‌था‌।‌ “‌बुंदेलखंड‌ ‌‌में‌ ‌‌गाथा‌ ‌‌गायकों‌ ‌‌को‌ ‌‌हरबोले‌ ‌‌कहा‌ ‌‌जाता‌ ‌‌है‌ ‌‌।‌ ‌‌प्रथम‌ ‌‌स्वाधीनता‌ ‌‌आंदोलन‌ ‌‌से‌ ‌‌पहले‌ ‌‌यही‌ ‌हरबोले‌ ‌‌गांव‌ ‌‌गांव‌ ‌‌घूमकर‌ ‌‌जनजागरण‌ ‌‌का‌ ‌कार्य‌ ‌कर‌ ‌रहे‌ ‌थे‌। इन‌ ‌रचनाधर्मी‌ ‌‌लोक‌ ‌‌गायकों‌ ‌‌के‌ ‌‌समूह‌ ‌‌ने‌ ‌‌वीरतापूर्ण‌ ‌गाथाओं‌‌ ‌‌को‌‌ ‌‌सुनाते‌‌ ‌‌हुए‌‌ ‌‌जन‌‌ ‌‌क्रांति‌‌ ‌‌जगाने‌‌ ‌‌का‌‌ ‌‌काम‌‌ ‌‌किया‌‌ ‌‌था‌‌।‌ ‌ ‌

श्रुतिपरंपरा‌ ‌के‌ ‌माध्यम‌ ‌से‌ ‌चली‌ ‌आ‌ ‌रही‌ ‌समृद्ध‌ परम्परा ‌के‌ ‌रूप‌ ‌‌मे‌ ‌लोकगाथाएँ‌ ‌‌अपने‌ ‌‌क्षेत्र‌ ‌‌के‌ ‌सांस्कृतिक‌ ‌जीवन‌ ‌का‌ ‌प्रतिबिम्ब‌ ‌प्रस्तुत‌ ‌‌करतीं‌ ‌‌है। लोकगाथाओं‌ ‌का‌ ‌उद्देश्य‌ ‌गीतों‌ ‌‌के‌ ‌‌माध्यम‌ ‌‌से‌ ‌लोकानुरंजन‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌अपने‌ ‌‌समय‌ ‌के‌ ‌आदर्श‌ ‌नायक‌ ‌‌नायिकाओं‌ ‌‌की‌ ‌‌गौरव‌ ‌‌गाथाओं‌ ‌‌को‌ ‌‌जीवित‌ ‌रखना‌ ‌है‌। लोकसम्पत्ति‌ ‌के‌ ‌‌रूप‌ ‌‌में‌ ‌लोकगाथाएं‌ ‌मौखिक‌ परम्परा ‌में‌ ‌जीवित‌ ‌रहती‌ ‌हैं।‌ ‌इसकी‌ ‌रचना‌ ‌सामूहिक‌ ‌‌रूप‌ ‌में‌ ‌‌होती‌ ‌है‌ ‌जिसके‌ ‌‌रचनाकार‌ ‌सदैव‌ ‌अज्ञात‌ ‌ही‌ ‌रहतें‌ ‌हैं‌।‌ ‌‌किसी‌ ‌भी‌ ‌गाथा‌ ‌का‌ ‌पहला‌ ‌गायक‌ ‌लोकगाथा‌ ‌‌की‌ ‌‌रचना‌ ‌‌कर‌ ‌उसे‌ ‌‌लोक‌ ‌को‌ ‌‌समर्पित‌ ‌करके‌ ‌‌स्वयं‌ ‌विलीन‌ ‌हो‌ ‌जाता‌ ‌है। ये‌ ‌‌गीत‌ ‌समय‌ ‌के‌ ‌प्रवाह‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌पीढ़ी‌ ‌दर‌ ‌पीढ़ी‌ ‌‌अपने‌ ‌रूप‌ ‌बदलते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌आगे‌ ‌बढ़ते‌ ‌‌रहते‌ हैं।‌ ‌‌

लोकगायक‌ ‌‌अपनी‌ ‌‌रूचि‌ ‌‌और‌ ‌‌स्मृति‌ ‌‌के‌ ‌‌आधार‌ ‌‌पर‌ ‌‌इन‌ ‌‌आख्यानों‌ ‌‌में‌ ‌नये‌ ‌अंश‌ ‌जोड़कर‌ ‌‌इनका‌ ‌परिष्कार‌ ‌‌करता‌ ‌‌रहता‌ ‌है।‌ लोकगाथाओं‌ ‌की‌ परम्परा ‌‌युग‌ ‌‌के‌ ‌‌साथ‌ ‌सदैव‌ ‌प्रवाहित‌ ‌होती‌ ‌रहती‌ ‌है‌ ‌उसका‌ ‌कभी‌ ‌अंत‌ ‌नहीं‌ ‌होता।‌ ‌विभिन्न‌ ‌क्षेत्रों‌ ‌‌में‌ ‌‌धार्मिक‌ ‌पौराणिक‌ ‌‌कथाओं‌ ‌‌के‌ ‌गायन‌ ‌‌के‌ ‌‌साथ‌ ‌‌साथ‌  ‌स्थानीय‌ ‌‌महान‌ ‌चरित्रों‌ ‌‌की‌ वंशावली‌ ‌‌एवं‌ ‌असाधारण‌ ‌‌कृत्यों‌ ‌‌की‌ ‌कथाओं‌ ‌‌को‌ ‌गायन‌ ‌के‌ ‌माध्यम‌ ‌से‌ ‌स्मृतियों‌ ‌‌में‌ ‌संजोने‌ ‌का‌ ‌काम‌ ‌लोक‌ ‌गायक‌ ‌‌करते‌ ‌‌थे‌ ‌‌और‌ ‌‌इसके‌ ‌‌एवज‌ ‌‌में‌ ‌‌अन्न‌ ‌‌व‌ ‌धन‌ ‌‌प्राप्त‌ ‌‌कर‌ ‌‌अपनी‌ ‌‌आजीविका‌ ‌‌चलाते‌ ‌‌थे‌।‌ ‌ऐसे‌ ‌लोगों‌ ‌को‌ ‌‌ही‌ ‌‌उत्तर‌ ‌प्रदेश‌, ‌राजस्थान‌ ‌‌व‌ ‌मध्यप्रदेश‌ ‌‌में‌ ‌परधान,‌ ‌भाट,‌ ‌हरबोले‌ ‌‌और‌ ‌‌बंगाल‌ ‌‌में‌ ‌‌बाउल‌ ‌आदि‌ ‌के‌ ‌‌नाम‌ ‌‌से‌ ‌‌जाना‌ ‌‌जाता‌ ‌है।‌

‌बंगाल‌ ‌‌के‌ ‌‌बाउल‌ ‌‌गांव‌ ‌‌गांव‌ ‌‌धूमकर‌ ‌‌भक्ति‌ ‌परक‌ ‌आध्यात्मिक‌ ‌‌गीतों‌ ‌‌को‌ ‌‌गाते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌भिक्षाटन‌ ‌‌करते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌जीवन‌ ‌‌गुज़ार‌ ‌देते‌ ‌‌हैं। प्रथम‌ ‌‌स्वाधीनता‌ ‌‌संग्राम‌ ‌‌में‌ ‌‌इनकी‌ ‌‌भूमिका‌ ‌‌को‌ ‌‌भी‌ ‌‌रेखांकित‌ ‌‌किया‌ ‌‌गया‌।‌ ‌‌जनजागरण‌ ‌‌में‌ ‌‌इनके‌ ‌‌योगदान‌ ‌‌को‌ ‌रवीन्द्रनाथ‌ ‌‌ठाकुर‌ ‌‌जैसे‌ ‌‌मनीषियों‌ ‌‌ने‌ ‌‌स्वीकार‌ ‌‌किया‌ ‌‌और‌ ‌‌इनके‌ ‌‌गीतों‌ ‌‌को‌ ‌‌संग्रहित‌ ‌‌कर‌ ‌‌जनसमान्य‌ ‌‌को‌ ‌‌बाउलपंथियों‌ ‌‌के ‌रचनात्मक‌ ‌‌योगदान‌ ‌‌से‌ ‌‌परिचित‌ ‌‌करवाया‌ ‌‌किंतु‌ ‌‌भाटो‌,‌ हरबोलों‌ ‌‌का‌ ‌‌इतिहास‌ ‌‌मुख्यधारा‌ ‌‌में‌ ‌‌शामिल‌ ‌‌न‌ ‌‌होने‌ ‌‌के‌ ‌‌कारण‌ ‌आजतक‌ ‌उनकी‌ ‌‌कला‌ ‌‌को‌ ‌‌विशेष‌ ‌‌पहचान‌ ‌‌न‌ ‌‌मिल‌ ‌‌सकी‌ ‌‌।‌ ‌‌जिस‌ ‌‌हरबोले‌ ‌‌ने‌ ‌‌झांसी‌ ‌‌की‌ ‌‌रानी‌ ‌‌के‌ ‌‌बलिदान‌ ‌‌को‌ ‌‌विस्मृत‌ ‌‌नहीं‌ ‌होने‌‌ ‌‌दिया‌‌ ‌‌उन‌‌ ‌‌हरबोलों‌‌ ‌‌को‌‌ ‌‌हमारी‌‌ ‌‌उपेक्षाओं‌‌ ‌‌ने‌‌ ‌‌विलुप्ति‌‌ ‌‌के‌‌ ‌‌कगार‌‌ ‌‌पर‌‌ ‌‌पहुंचा‌‌ ‌‌दिया।‌ ‌ ‌बुंदेले‌ ‌हरबोलों‌ ‌के‌ ‌मुँह‌ ‌हमने‌ ‌सुनी‌ ‌कहानी‌ ‌थी,‌ ‌खूब‌ ‌लड़ी‌ ‌मर्दानी‌ ‌वह‌ ‌तो‌ ‌झाँसी‌ ‌वाली‌ ‌रानी‌ ‌थी। ‌(‌सुभद्रा‌‌ ‌‌कुमारी‌‌ ‌‌चौहान‌‌ ‌‌की‌‌ ‌‌कविता‌‌ ‌’‌झांसी‌ ‌की‌ ‌रानी‌ ‌‌’‌इन्हीं‌‌ ‌‌हरबोले‌‌ ‌‌के‌‌ ‌‌मुंह‌‌ ‌‌से‌‌ ‌‌सुने‌‌ ‌‌गीत‌‌ ‌‌का‌‌ ‌‌हिंदी‌‌ ‌‌संस्करण‌‌ ‌‌है‌‌।‌)‌ ‌

मिथकों‌ ‌और‌ ‌पौराणिक‌ ‌कथाओं‌ ‌को‌ ‌लोकगाथाओं‌ ‌के‌ ‌‌माध्यम‌ ‌‌से‌ ‌‌लोक‌ ‌‌अपनी‌ ‌‌स्मृति‌ ‌में‌ ‌‌संजोए‌ ‌‌रखता‌ ‌‌है‌। कथ्य‌ ‌के‌ ‌‌अनुरूप‌ ‌‌लोकगाथाएं-‌ ‌वीरगाथात्मक,‌ ‌‌प्रेम‌ ‌‌गाथात्मक,‌ ‌‌रोमांचक,‌ ‌‌पौराणिक,‌ ‌‌निवेदात्मक‌ ‌‌शीर्षकों‌ ‌‌में‌ ‌‌बांटी‌ ‌‌जा‌ ‌‌सकती‌ ‌हैं।‌ ‌‌इन‌ ‌‌गाथाओं‌ ‌‌की‌ ‌‌रोजक‌ ‌‌प्रस्तुति‌ ‌‌कलाकार‌ ‌‌की‌ ‌‌साधना‌ ‌‌और‌ ‌‌अभ्यास‌ ‌‌पर‌ ‌‌टिकी‌ ‌‌होती‌ ‌‌है।‌ ‌इन‌ ‌गाथाओं‌ ‌में‌ ‌पौराणिक‌ व‌ ‌ऐतिहासिक‌ ‌कथाओं‌ ‌के‌ ‌‌पात्रों‌ ‌‌को‌ ‌‌लोक‌ ‌‌गायक‌ ‌‌गीतों‌ ‌‌के‌ ‌‌माध्यम‌ ‌‌से‌ ‌‌अपने‌ ‌‌स्वर‌ ‌‌लहरियों‌ ‌‌में‌ ‌‌ढाल‌ ‌‌कर‌ ‌‌जीवंत‌ ‌‌कर‌ ‌‌देता‌ ‌है‌।‌ ‌

“‌लोकरंजन,‌ ‌‌लोकोत्साह‌ ‌‌और‌ ‌‌लोककल्याण‌ ‌‌के‌ ‌‌साथ-साथ‌ ‌‌संस्कृति‌ ‌‌के‌ ‌‌उदात्त‌ ‌‌चरित्र‌ ‌‌को‌ ‌‌असाक्षर‌ ‌‌जनता‌ ‌‌में‌ ‌‌जीवित‌ ‌रखने‌ ‌‌का‌ ‌‌कार्य‌ ‌‌यही‌ ‌‌लोग‌ ‌‌करते‌ ‌‌हैं।‌ ‌‌वह‌ ‌‌जनता‌ ‌‌जो‌ ‌‌मंदिर‌ ‌‌नहीं‌ ‌‌जाती‌ ‌‌तथा‌ ‌‌पुराणों‌ ‌‌में‌ ‌‌नहीं‌ ‌‌बैठती,‌ ‌‌उन‌ ‌‌तक‌ ‌‌हमारे‌ ‌‌चरित‌ ‌नायकों‌ ‌‌को‌ ‌‌ले‌ ‌‌जाने‌ ‌‌का‌ ‌‌कार्य‌ ‌‌ये‌ ‌‌द्वार-द्वार‌ ‌‌और‌ ‌‌गाँव-गाँव‌ ‌‌बिना‌ ‌‌किसी‌ ‌‌भेदभाव‌ ‌‌के‌ ‌‌सब‌ ‌‌जगह‌ ‌‌जाकर‌ ‌‌करते‌ ‌‌हैं।‌ “‌ ‌

..‌बुंदेला‌ ‌‌परिवारों‌ ‌‌की‌ ‌‌लोक‌ ‌‌कलाकारों‌ ‌‌की‌ ‌परम्परा ‌‌सैकड़ों‌ ‌‌वर्षों‌ ‌‌से‌ ‌‌चली‌ ‌‌आ‌ ‌‌रही‌ ‌‌है,‌ ‌‌जहां‌ ‌‌यही‌ ‌‌इनका‌ ‌‌रोजगार‌ ‌‌का‌ ‌‌साधन‌ ‌‌है‌ ‌और‌ ‌‌इसी‌ ‌‌से‌ ‌‌ही‌ ‌‌अपना‌ ‌‌दानदक्षिणा‌ ‌‌से‌ ‌‌परिवार‌ ‌‌का‌ ‌‌पेट‌ ‌‌पालते‌ ‌‌हैं‌ ‌‌लेकिन‌ ‌‌समय‌ ‌‌की‌ ‌‌मार‌ ‌‌के‌ ‌‌अनुसार‌ ‌‌इस‌ ‌‌लोक‌ ‌‌संगीत‌ ‌‌को‌ ‌सुनने‌ ‌‌वालों‌ ‌‌की‌ ‌‌संख्या‌ ‌‌कम‌ ‌‌हो‌ ‌गयी ‌‌वहीं,‌ ‌‌दान‌ ‌‌दक्षिणा‌ ‌‌देने‌ ‌‌वालों‌ ‌‌की‌ ‌‌कमी‌ ‌‌आ‌ ‌गयी ‌‌है,‌ ‌‌जिससे‌ ‌‌परिवार‌ ‌‌को‌ ‌‌पालना‌ ‌‌इन‌ ‌लोक‌‌ ‌‌कलाकारों‌‌ ‌‌को‌‌ ‌‌भारी‌‌ ‌‌पड़ने‌‌ ‌‌लगा‌‌ ‌‌है‌‌ ‌‌।‌

“‌धर्मेंद्र‌‌ ‌‌पारे‌ ‌इन्हीं‌ ‌‌हरबोलों‌ ‌को‌ ‌वसुदेवा‌ ‌‌भी‌ ‌कहते हैं। इस‌ ‌‌समुदाय‌ ‌‌का‌ ‌‌पेशा‌ ‌‌भी‌ ‌गीत‌ ‌‌गाते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌भिक्षाटन‌ ‌‌करना‌ ‌‌है।‌ ‌‌सुबह‌ सवेरे‌ ‌‌गांव‌ ‌गांव‌ ‌धूमकर‌ ‌प्रभात‌ ‌फेरियों‌ ‌‌की‌ ‌भांति‌ ‌अपने‌ ‌‌गीत‌ ‌‌सुनाकर‌ ‌‌ये‌ ‌‌लोगों‌ ‌‌को‌ ‌जगाते‌ ‌‌थे।‌ ‌‌गीतों‌ ‌‌की‌ ‌‌पंक्ति‌ ‌‌में‌ ‌‘‌हर‌ ‌‌हर‌ ‌‌गंगे’‌, ‌हर‌ ‌‌हर‌ ‌बम‌,‌ हरे‌ ‌‌मोरा‌ ‌‌राम‌,‌ ‌‌की‌ ‌‌आवृति‌ ‌‌होने‌ ‌‌के‌ ‌‌कारण‌ ‌‌इन्हें‌ ‌‌हरबोला‌ ‌‌नाम‌ ‌‌से‌ ‌‌संबोधित‌ ‌‌किया‌ ‌‌गया‌।‌ बुंदेलखंड‌ ‌‌के‌ ‌गांवो‌, ‌नगरों‌ ‌की‌ ‌गलियों‌ ‌‌में‌ ‌‌लोकवाद्य‌ ‌यंत्रों‌ ‌‌के‌ ‌धुनों‌ ‌में‌ ‌‌अपनी‌ ‌स्वर‌ ‌लहरी‌ ‌को‌ ‌गुंजयामान‌ ‌‌करते‌ ‌‌हुए‌ कंधे‌ ‌पर‌ ‌गुदरी‌ ‌लटकाए‌ ‌फकीरों‌ ‌‌जैसे‌ ‌द्वार‌ ‌‌द्वार‌ ‌‌पर‌ ‌‌भिक्षा‌ ‌‌मांगते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌आगे‌ ‌‌बढ़‌ ‌‌जाते‌ ‌‌थे‌।‌ धर्मेंद्र‌ ‌‌पारे‌ ‌‌के‌ ‌‌अनुसार‌ “‌हरबोलों‌ ‌‌को‌ ‌‌हम‌ ‌‌भजन‌ ‌‌कीर्तन‌ ‌‌और‌ ‌‌गाथाओं‌ ‌‌का‌ ‌‌गायन‌ ‌‌करते‌ ‌‌भिक्षुक‌ ‌‌जाति‌ ‌‌कहें‌ ‌‌तो‌ ‌‌ज्यादा‌ ‌‌सही‌ ‌‌होगा।‌ ‌‌इस‌ ‌‌तरह‌ ‌‌की‌ ‌और‌ ‌‌भी‌ ‌‌जातियाँ‌ ‌‌हैं।‌ ‌मसलन‌ ‌‌नाथ,‌ ‌‌सपेरे,‌ ‌‌योगी,‌ ‌‌बैरागी,‌ ‌‌भोपा,‌ ‌‌जोशी‌ ‌‌आदि।”‌ ‌

…‌हरबोलों‌ ‌‌में‌ ‌‌ऐसा‌ ‌‌माना‌ ‌‌जाता‌ ‌‌है‌ ‌‌कि‌ ‌सूर्योदय‌ ‌‌के‌ ‌‌पश्चात‌ ‌‌यदि‌ ‌‌वे‌ ‌‌भिक्षाटन‌ ‌‌करेंगे‌ ‌‌तो‌ ‌‌उन्हें‌ ‌‌पाप‌ ‌‌लगेगा।‌ ‌आज‌ ‌‌भी‌ ‌‌मथुरा‌ ‌‌वृंदावन‌ ‌‌क्षेत्र‌ ‌‌में‌ ‌‌ये‌ ‌‌लोग‌ ‌‌वासुदेव‌ ‌‌का‌ बाना‌ ‌‌धारणकर‌ ‌‌लगभग‌ ‌‌आधी‌ ‌‌रात‌ ‌‌को‌ ‌‌उठकर‌ ‌‌स्नान‌ ‌‌करके‌ ‌‌पाँव‌ ‌‌में‌ ‌‌घुँघरू‌ ‌‌और‌ ‌‌सिर‌ ‌‌पर‌ ‌‌मोरमुकुट‌ ‌‌धारण‌ ‌‌करके‌ ‌‌हाथ‌ ‌‌में‌ ‌डोली‌ ‌‌लेकर‌ ‌‌कथा‌ ‌‌गायन‌ ‌‌करते‌ ‌‌हुए‌ ‌‌दो-दो‌ ‌‌लोगों‌ ‌‌के‌ ‌‌समूह‌ ‌‌में‌ ‌‌निकलते‌ ‌‌हैं।‌ ‌‌एक‌ ‌‌नाचता‌ ‌‌है‌ ‌‌एक‌ ‌‌कथा‌ ‌‌गायन‌ ‌‌करता‌ ‌‌है।‌ ‌‌गाँव‌ ‌के‌ ‌‌लोग‌ ‌‌इनकी‌ ‌‌आवाज‌ ‌‌सुनकर‌ ‌‌इन्हें‌ ‌‌सूप‌ ‌‌में‌ ‌‌रखकर‌ ‌‌सीधा‌ ‌‌समान‌ ‌‌भेंट‌ ‌‌करते‌ ‌‌हैं।‌ ‌‌यह‌ ‌‌कथा‌ ‌‌गायन‌ ‌‌मंजीरा‌ ‌‌करताल‌ ‌‌और‌ ‌तंबूरों‌ ‌‌के‌ ‌‌साथ‌ ‌‌होता‌ ‌‌है।‌ ‌‌भोर‌ ‌‌होते-होते‌ ‌‌यह‌ ‌‌कथा‌ ‌‌समाप्त‌ ‌‌हो‌ ‌‌जाती‌ ‌‌है।‌

‌‌हरबोलों‌ ‌‌की‌ ‌‌कथा‌ ‌‌गायन‌ ‌‌और‌ ‌‌भिक्षा‌ ‌‌माँगने‌ ‌‌के‌ ‌तरीके‌ ‌‌क्षेत्र‌ ‌‌और‌ ‌‌अंचल‌ ‌‌के‌ ‌‌अनुसार‌ ‌‌बदलते‌ ‌‌हैं।‌ ‌‌राजस्थान,‌ ‌‌गुजरात,‌ ‌‌महाराष्ट्र,‌ ‌‌छत्तीसगढ़,‌ ‌‌उत्तरप्रदेश,‌ ‌‌मध्यप्रदेश‌ ‌‌के‌ ‌गाँव‌‌ ‌‌में‌‌ ‌‌इसे‌‌ ‌‌देखा‌‌ ‌‌जा‌‌ ‌‌सकता‌‌ ‌‌है।‌ ‘‌ ‌‌धर्मेंद्र‌‌ ‌‌पारे‌ ‌लोकगाथा‌ ‌गायकों‌ ‌‌द्वारा‌ ‌परंपरागत‌ ‌लोकवाद्य-‌ ‌‌जैसे‌ ‌ढोल,‌ ‌चंग,‌ ‌नगाड़े‌,‌तंबूरा‌,‌करताल‌ ‌‌जैसे‌ ‌‌अनेक‌ ‌यंत्रों‌ ‌‌के‌ ‌वादन‌ ‌में‌ ‌‌महारत‌ ‌हासिल‌ ‌‌कर‌ ‌‌रखी‌ ‌‌होती‌ ‌‌है‌।‌ इनमें‌ ‌‌से‌ ‌‌कुछ‌ ‌‌वाद्य‌ ‌‌यंत्रों‌ ‌‌का‌ ‌‌आविष्कार‌ ‌‌भी‌ ‌‌इन‌ ‌‌लोगों‌ ‌‌ने‌ ‌‌स्वयं‌ ‌‌किया‌ ‌‌है‌ ‌‌जिसकी‌ ‌विरासत‌ ‌‌को‌ ‌‌आगे‌ ‌‌बढ़ाने‌ ‌‌वाले‌ ‌‌लोक‌ ‌‌कलाकार‌ ‌‌अब‌ ‌‌कम‌ ‌‌देखने‌ ‌‌को‌ ‌‌मिलते‌ ‌‌हैं‌।‌ ‌अपने‌ ‌‌विशेष‌ ‌‌वाद्य‌ ‌‌यंत्रों‌ ‌‌के‌ ‌‌वादन‌ ‌‌और‌ ‌गायन‌ ‌‌से‌ ‌‌लोकगाथाओं‌ ‌‌की‌ ‌‌जीवंत‌ ‌‌प्रस्तुति‌ ‌‌से‌ ‌‌श्रोताओं‌ ‌को‌ ‌‌भाव-विभोर‌ ‌करने‌ ‌‌वाली‌ ‌‌लोक‌ ‌‌शैली‌ ‌‌अब‌ ‌‌विलुप्त‌ ‌‌होती‌ ‌‌जा‌ ‌रही‌ ‌‌है‌।

हर‌ ‌‌क्षेत्र‌ ‌‌के‌ ‌अनुसार‌ ‌लोक‌ ‌गाथाओं‌ ‌‌की‌ ‌गायन‌ ‌‌शैली‌ ‌‌और‌ ‌‌वाद्ययंत्रों‌ ‌‌की‌ ‌‌अपनी‌ ‌‌समृद्ध‌ ‌परम्परा ‌‌है‌ ‌‌जैसे‌ ‌राजस्थानी‌ ‌लोकगाथाओं‌ ‌में‌ ‌पाबूजी‌ ‌की‌ ‌पड‌ ‌में‌ ‌रावणहत्था,‌ ‌रामदेव‌ ‌जी‌ ‌की‌ ‌लोकगाथा‌ ‌में‌ ‌ढोल‌, ‌भरथरी‌ ‌गायन‌ ‌में‌ ‌‌तंबूरे‌ ‌‌जैसे‌ ‌‌वाद्य‌ ‌‌यंत्रों‌ ‌‌का‌ ‌प्रयोग‌ ‌इनके‌ ‌‌गायन‌ ‌‌में‌ ‌‌चार‌ ‌‌चांद‌ ‌‌लगा‌ ‌‌देता‌ ‌है।‌ ‌इसीलिए‌ ‌‌कहा‌ ‌‌जाता‌ ‌‌है‌ ‌‌कि‌ ‌लोकगाथा‌ ‌में‌ ‌संगीत,‌ ‌नृत्य‌ ‌और‌ ‌गीत‌ ‌की‌ ‌त्रिवेणी‌ ‌बहती‌ ‌है।‌ ‌लोकगाथाएं‌ ‌मनोरंजन‌ ‌‌के‌ ‌‌साथ‌ ‌‌अपने‌ ‌‌समय‌ ‌‌का‌ ‌ऐतिहासिक‌ ‌‌दस्तावेज‌ ‌‌होती‌ ‌‌है‌।‌ जिनके‌ ‌‌अध्ययन‌ ‌‌से‌ ‌‌उस‌ ‌‌युग‌ ‌‌की‌ ‌सामाजिक‌ ‌‌सांस्कृतिक,‌ ‌और‌ ‌धार्मिक‌ ‌‌पक्षों‌ ‌‌के‌ ‌अनगिनत‌ ‌‌पहलुओं‌ ‌‌को‌ ‌‌समझा‌ ‌‌जा‌ ‌‌सकता‌ ‌‌है‌।‌ क्योंकि‌ ‌गाथा‌ ‌‌गायक‌ ‌लोकनायक‌ ‌के‌ ‌जीवन‌ ‌चरित्र‌ ‌और‌ ‌गुणों‌ ‌को‌ ‌गाकर‌ ‌‌लोक‌ ‌‌में,‌ ‌उत्साह‌ ‌भरने‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌ही‌ ‌जाति-धर्म‌ ‌और‌ ‌साम्प्रदायिक‌ ‌संकीर्णताओं‌ ‌से‌ ‌ऊपर‌ ‌उठकर‌ ‌सदाचार‌,‌ ‌नैतिकता‌ ‌‌और‌ ‌‌मानवता‌ ‌‌का‌ ‌संदेश‌ ‌देता‌ ‌हैं।‌ ‌‌इसलिए‌ ‌‌इन‌ ‌‌अनाम‌ ‌‌लोक‌ ‌‌गायकों‌ ‌‌की‌ ‌‌गायकी‌ ‌‌को‌ ‌‌राष्ट्रीय‌ ‌‌लोकगायकी‌ ‌‌का‌ ‌सम्मान‌‌ ‌‌मिलना‌‌ ‌‌चाहिए‌‌।‌

संदर्भ‌‌ ‌‌ग्रंथ‌ ‌

गाथा‌ ‌‌गायक‌ ‌‌हरबोले‌ ‌-‌धर्मेन्द्र‌ ‌‌पारे‌, ‌आदिवासी‌ ‌‌लोककला‌ ‌‌एवं‌ ‌‌बोली‌ ‌‌विकास‌ ‌‌अकादमी‌, ‌मध्यप्रदेश‌ ‌‌संस्कृति‌ ‌‌परिषद‌ ‌भोपाल‌‌ ‌‌द्वारा‌‌ ‌‌प्रकाशित‌‌ ‌-‌ ‌2015‌ ‌

भारतीय‌ ‌‌लोक‌ ‌‌साहित्य‌, परम्परा ‌‌और‌ ‌‌सम्मान‌ ‌-‌ ‌‌विद्या‌ ‌‌सिन्हा‌, ‌प्रकाशन‌ ‌‌विभाग‌, ‌‌सूचना‌ ‌‌और‌ ‌‌प्रसारण‌ ‌‌मंत्रालय‌, ‌भारत‌ ‌सरकार‌‌ ‌-2011‌ 

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लेखिका कालिंदी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। सम्पर्क +919868545886, vibha.india1@gmail.com

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