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समाजसंस्कृति

लोक संस्कृति और महामारियों के देवी देवता

 

‘बिना परिचय के किसी से प्रेम नही हो सकता’ यह बात लोक संस्कृति के संदर्भ में भी कही जा सकती है। लोक संस्कृति से परिचित हुए बिना इनकी आस्थाओं और विश्वासों को नही जाना जा सकता। लोक समाज तर्क में नहीं आस्था में जीता है। आदिम जनजातियों में ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा पाई जाती है। प्रकृति की विविध शक्तियों (सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, वायु ) को सर्वोपरि मानकर इनके रहस्यों को जानने की जिज्ञासा के क्रम में पूजापाठ, यज्ञ, अनुष्ठान का आरम्भ हुआ। ऋग्वेद में वरूण, इन्द्र उषा इत्यादि देवताओं की परिकल्पना प्राकृतिक शक्तियों के ही प्रतीकात्मक रूप हैं। आदिम समाज में ईश्वर के निराकार रूप की कल्पना की गयी है।

श्रद्धा और आस्था के आधार पर इन प्रतीकात्मक शक्तियों को अपने रक्षा कवच के रूप में प्रतिष्ठित किया। प्रकृति की इन शक्तियों को भय मिश्रित आस्था के साथ पूजने की परम्परा धीरे-धीरे विकसित होते हुए मूर्ति पूजा में परिवर्तित हुई। माना जाता है कि बुद्ध काल से मूर्ति पूजा की शुरुआत हुई। अभी भी लोकपरम्परा में प्रतीकात्मक रूप में अनगढ़ पत्थरों या मिट्टी के पिंडों को पूजने की परम्परा देखी जा सकती है। आराधक अपनी भावनानुसार देवी देवताओं के रूपों की कल्पना कर लेता है। अब यह कहना मुश्किल है कि शास्त्रों में वर्णित देवी देवताओं के रूपों को ही लोक ने अपनी आस्थानुसार ग्रहण किया या शास्त्र ने लोक के अनगढ़ देवी देवताओं की कथाएं अपने अनुसार गढ़कर उनके शाश्वत रूप की स्थापना की।

अभी भी बहुत से रहस्य ऐसे है जिनका हमारे पास कोई तर्क नहीं और जहाँ तर्क नहीं वहाँ सिर्फ आस्था ही एक मात्र संबल है। प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों से जब जीवन पर संकट आता है तब लोकाश्रित आजीविक वर्ग का अदृश्य शक्तियों में भयवश आस्था उत्पन्न होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में उनकी चेतना में देवी देवता की जैसी अनुभूति होती है वे उसको वैसा आकार प्रकार देते रहें हैं। समय समय पर नित नूतन देवी देवताओं की सर्जना करना लोक समाज की विशेषता है। इसके साक्ष्य हमें लोककथाओं और गीतों से मिलते हैं। लोककथाओं और गीतों में महामारियों का जिक्र अतित की चूक से सीख लेने के लिए प्रेरित करती हैं तथा महामारियों के प्रभाव को चिह्नित करने के अतिरिक्त उस समय की विसंगतियों से भी पहचान करातीं हैं।

देवी देवताओं की लोक परम्परा के संदर्भ में कुबेरनाथ राय कपनी पुस्तक ‘निषाद बांसुरी’ में लिखते हैं पार्वती स्पष्टत: पर्वतीय प्रदेश की देवी थी, जो अनार्य देवता शिव की अर्द्धांगिनी के रूप में पुराणों में उल्लेखित हुई। जिसके बाद में अनेक नाम गुण कर्म के अनुसार उनकी अनेक रूपों में पूजा जाने लगा। शम्बरों/शबरों की देवी लावण्यमती पार्वती का उल्लेख करते हुए आगे लिखते है समय के साथ पता नहीं कब यह लोना चमारिन हो गयी। इसी से जुड़ा संदर्भ भोजपुर क्षेत्र के लोकाख्यान सोना चमाइन का है। लावण्य से लोना और लोना से सोना शब्दों की यात्रा या नामांतरण लोक के लिए सामान्य है।

लोना और सोना चरित्र की समानता यह है कि दोनों चर्मकार जाति से सम्बन्ध रखने वाली दैवी शक्तियां हैं। लोना को आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है और सोना को डाईन माना जाता है लेकिन यह लोक का अहित करने की जगह लोक हित में कार्य करती है इसलिए लोक में ऐसी धारणा थी कि यह शोषण करने वाले अंग्रेजों को प्रताड़ित करती है उनके शवों को निकाल कर भक्षण करती है और उनके अपराधों के दंड स्वरूप उनके लिए बीमारियां पैदा करती है। इस प्रकार सोना डाईन को शक्तिशाली देवी के रूप में लोक श्रद्धा और आदर के साथ पूजता था।

कहने का अर्थ है कि विषम परिस्थितियों व आपदाओं के बाद ऊपजी बीमारियों व संक्रामक रोगों से बचने के लिए लोक समाज आज भी अपनी कल्पना से देवी/देवताओं के पूजा-पाठ, अनुष्ठानों और जड़ी बूटियों का सहारा लेता है। आधुनिक अस्पताल की कमी व रोग के कारणों को जानने की समझ विकसित न होने की स्थिति में उनके पास जड़ी बूटियों, झाड़ फूक, तंत्र-मंत्र और जादू टोने के द्वारा उपचार ही एकमात्र साधन है।


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आज भी ग्रामीण समाज के प्राथमिक उपचारों के लिए इन्हीं का सहारा लिया जाता है। अभी भी घाव-घोस, नजला जुकाम जैसे संक्रामक बीमारियों के उपचार के लिए रोजमर्रा के काम में लाई जाने वाली जड़ी बूटियों से उसके निदान की प्रथा देखी जा सकती है। पीलिया, हिस्ट्रीया (भूत लगाना), बाबासीर जैसे रोगों के लिए झाड़-फूंक कराने वाले ओझा भगत आपको हर गाँव मे मिलेंगे। हर गाँव में ऐसे तथाकथित आलौकिक शक्ति वाले भगता मौजूद हैं। दैहिक, मानसिक कष्टों को दूर करने के लिए काबूला, मन्नत या मानता जैसी रीतियां चली आ रही है जिससे हमारे जैसे आधुनिक लोग भी बच नही पाते। कष्टों से उबरने के लिए तरह तरह के व्रत, पूजापाठ की संकल्पनाएं लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा हैं।

 गाँव में आने वाली हारी बीमारियां से मुक्ति पाने के लिए जोगिन गाथा का अस्तित्व लोक जीवन में वर्षों से बना हुआ है। प्रत्येक जोगन का अपना निजी व्यक्तित्व और प्रभाव क्षेत्र बताया जाता है। इन्हें सात जोगिन के नाम से जाना जाता है। शीतला और हैजा माई इन जोगिनों की बड़ी बहनें मानी जाती हैं।

भारत की अधिकांश ग्रामीणों संस्कृति के परम्परागत धार्मिक विश्वासों, और पर्व त्योहारों में समानता होने के बाद भी हर समाज में अनेक लोक देवी/ देवता होते हैं। जीवन के छोटे बड़े विपत्तियों और बीमारियों में देवता को पूजने की परम्परा हर गाँव में देखी जा सकते हैं। शिक्षा के अभाव के कारण जादू टोने और अंधविश्वास झाड़-फूंक में आस्था साधारण बात है। शकुन अपशकुन और भविष्यवाणियां आज भी जनजातियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके समाज में झाड़-फूंक करने वाला अपने क्षेत्र में बहुत प्रभावशाली माना जाता है।

इनका मानना है कि बीमारी अदृश्य शक्तियों की नाराजगी के कारण आती है। इसलिए भगता या गुनिया यानी झाड़-फूंक करने वाला डॉक्टर उस बीमारी का कारण किसी भी टोने-टोटके में या जादू टोने में खोज लेता है। समाज की निरक्षरता के कारण आज भी ग्रामीण समाज इन पर अपनी आस्था बनाए रखने के लिए मजबूर हैं। हिन्दी के आंचलिक रचनाकार फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ में हैजा की महामारी से पूर्णिया (बिहार) का अंचल त्रस्त है। वहाँ के ग्रामीण इस महामारी का उपचार झाड़-फूंक में खोज रहे हैं। उपन्यास में एक ज्योतिष की भविष्यवाणी पर विश्वास वास्तव में ग्रामीण जीवन का यथार्थ है। रेणु के समय का यह विश्वास और लोक मान्यताओं एवं लोक परम्पराएं आज भी उसी रूप में मौजूद है।

तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ जिसमे तुलसीराम ने अपने गाँव परिवार की लोक मान्यताओं एवं अंध आस्थाओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। उनका गाँव धरमपुर (उत्तर प्रदेश) जो दक्षिण दिशा में बसाया गया था इस पर पर अपनी टिप्पणी करते हुए लिखते हैं – “दक्षिण दिशा में दलित बस्तियों का होना भी एक अंधविश्वास ही है जिसके कारण गाँव के ठाकुर ब्राह्मण दलितों को दक्षिण में ही रहने के लिए विवश करते थे। एक हिन्दू अंधविश्वास के अनुसार किसी गाँव में दक्षिण दिशा में ही कोई आपदा बीमारी अथवा महामारी आती है इसलिए हमेशा गाँव के दक्षिण में दलितों को बसाया जाता है अतः मेरे जैसे सभी लोग हमारे गाँव में इन्हीं महामारियों आपदाओं का प्रथम शिकार होने के लिए दक्षिण की दलित बस्ती में पैदा हुए।

“तुलसीराम लिखते है दलितों और सवर्णो के भगवान अलग-अलग होते हैं और उनकी पूजा-अर्चना प्रसाद और हर विधि अपना अलग-अलग स्थान रखती है। देवी देवताओं के साथ भूतों को भी माना जाता है। “लोक समाज की ये मान्यताएं आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रहीं हैं। रेणु और तुलसीराम उत्तर भारत के लोक समाज के आस्थाओं और विश्वास का यथार्थ आख्यान प्रस्तुत कर रहें है। उनकी रचनाओं में हमारे गांवों के चित्र हूबहूं उकेरे गये है। लोक कवि तुलसीदास ने अपने युग (जिसे वह कलयुग कहते हैं) की महामारी का चित्रण करते हुए लोकविश्वास के अनुरूप ऐसी महामारियों को दैविक श्राप मानते हैं।

संकर सहर सर नर नारि बारिचर /विकल सकल महामारी मांजा भई है। … (रामचरितमानस)

आज भी जब कोई लाइलाज महामारी फैलती है तो उसे देवीय श्राप मानकर उसके लोककल्पित नाम के साथ पूजा अर्चना करने की लोक आस्था ग्रामीण समाज में देखी जा सकती है। जिसका उदाहरण वर्तमान में कोविड-19 जो लोक समाज में कोरोना माई कहलाने लगी है। प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों को ईश्वर का रोष या श्राप मान लेना भारतीय लोक संस्कृति का हिस्सा है इसीलिए ऐसी महामारियों के कई देवी देवताओं की पूजा अर्चना करने की परम्परा चली आ रही है।

आज भी चेचक को शीतला माई के नाम से पूजा जाता है। पिलेग माईया, का जन्म प्लेग महामारी से होता है। 1828 मध्यप्रदेश में हैजा से बचाव के लिए हरदौल देवता के नाम से सरपंच चबूतरे बनवाता है। तो कही मरही भवानी (हैजा की अधिष्ठात्री देवी) को पूजने की प्रथा शुरू होती है। लोक देवताओं से आदिम जनजातियों का लौकिक रिश्ता है वे अपने लोक देवताओं से लौकिक बातें करते है और गीतों के माध्यम से अपने संकट को हरने की गुहार लगातें हैं। चेचक जैसे संक्रामक रोग से मुक्ति पाने के लिए शीतला माई के गीत हो या या कोरोना संकट से बचाने के कोरोना माई के गीत इसी के उदाहरण हैं     

नीमिया की डाढ़ी मइया लावेली हिलोरवाकि झुलि झुलि मइया गावेली गीत… (मैथिली)
मोर मनवा रखनी हो मैया कोरा के बालकवा भीखि दी… (मैथिली)

तमाम वैज्ञानिक आविष्कारों से अनभिज्ञ लोक समाज में बीमारियों के देवी देवताओं के अंसख्य रूपों का अध्ययन एक अलग विषय है। वर्तमान की महामारी कोविड-19 जो लोक समाज में कोरोना माई कहलाने लगी है के तरह तरह के लोक गीत रचे जा रहे हैं -‘मइया संकट हर ली, संकट सबके मिटाऊ ने कोरोना से सबके बचाऊ ना …’

प्राचीन समय में लोक ने प्राकृतिक रूप से इन बीमारियों से उबरने व उपचार के लिए जड़ी बूटियों औषधियों के साथ अनुष्ठानों एवं तंत्र मंत्र का अविष्कार किया। समय की कसौटी पर कुछ वैज्ञानिक रूप से खरे साबित हुए तो कुछ परम्परागत आस्थाओं या कल्पनाओं तक ही सिमट कर रह गये। कहने का अर्थ यह है कि लोक की सभी विश्वास अवैज्ञानिक नहीं है कुछ के पीछे वैज्ञानिकता भी रही होगी लेकिन अतिवादिता के कारण वह अंधविश्वास में बदलता गया।

थारू जनजाति में बरना पूजा हो (इस अवसर पर दो दिन पूरे गाँव में पूर्णबंदी का माहौल होता है। दैनिक काम काज के लिए घर से बाहर नहीं निकला जाता ) या बिहार की छठ पूजा, चौरचन पूजा, चूड़ शीतल जैसे बहुत से पर्वो के पीछे वैज्ञानिक दृष्टि दिखाई देती है। खानपान रहन सहन पर्व त्योहारों के लोक विश्वास अनुभवजनित आस्था से जुड़े है जिन्हें समझने की जरूरत है। प्रत्येक संस्कृति के अपने आदिम, स्थानीय, क्षेत्रीय विश्वास होते हैं और उसके संबंध में हर संस्कृति के अपने तर्क होते हैं। जिनकी पड़ताल सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से किए जाने चाहिए। बदलते हुए समय के अनुरूप लोक समाज को अपने जड़ हो चुके आदिम पूर्वाग्रहों से निकलकर शिक्षा के प्रकाश में अपनी आस्थाओं को वैज्ञानिक कसौटियों पर भी परखने की जरूरत है।

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लेखिका कालिंदी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। सम्पर्क +919868545886, vibha.india1@gmail.com

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