सामयिक

बिहार में भूमि संघर्ष: भूमि संघर्ष के दस्तावेजीकरण का प्रयास

 

( रंगकर्मी व लेखक हसन इमाम की पुस्तक बिहार में भूमि संघर्ष‘)

रंगकर्मी व लेखक हसन इमाम की नई किताब है ‘बिहार में भूमि संघर्ष’। बिहार की भूमि समस्या पर वैसे तो अकादमिक स्तर पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं परन्तु एक गैर अकादमिक क्षेत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता द्वारा बिहार के भूमि संघर्ष पर लिखना एक अनूठी बात है। हसन इमाम इससे पूर्व अपने नाटकों तथा लोकगाथाआों खासकर ‘दीना-भद्री’ और ‘बहुला-गोढ़िन’ पर अपने काम के लिए सांस्कृतिक क्षेत्र में जाने जाते रहे हैं।

 बिहार सबाल्टर्न स्टडी सीरीज संख्या -11 के तहत यह पुस्तक पटना के ‘जेवियर सोशल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च’ तथा ‘जानकी प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित की गयी है। इस संस्था से हसन इमाम की पूर्व में भी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

 इस पुस्तक के लिए हसन इमाम ने भूमि संघर्ष के इलाकों में जाकर उसमें शामिल लोगों से सीधे साक्षात्कार कर उनके अनुभवों को शामिल कर इसे विश्वसनीय बनाने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त बिहार की भूमि समस्या पर पूर्व में काम कर चुके लोगों की पुस्तकों के माध्यम से भूमि के सवाल को एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की है। बिहार में चले भूमि आन्दोलन को देशमें चले दूसरे बड़े आन्दोलनों की रौशनी भी परखने की कोशिश की है। हसन इमाम की पारिवारिक पृष्ठभूमि में खासकर उनके पिता का बेगूसराय के भूमि संघर्षो में सीधी भागीदारी रही है लिहाजा हसन इमाम के लिए यह कोई अनजाना पक्ष नहीं रहा है अपितु बचपन से उसके गवाह से भी रहे हैं।

 बिहार में तीस के दशक में चले सशक्त किसान आन्दोलनों के उद्भव को पकड़ने से लेकर बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश में चले आन्दोलनों का भी संक्षिप्त परिचल हसन इमाम ने देने की कोशिश की है।

 पुस्तक सात अध्यायों में विभक्त है। पहले अध्याय में लेखक ने एक लंबी प्रस्तावना लिखी है जिसमें प्राचीन काल में भूमि व सामंती संबंध को भी सामने रखने का प्रयास किया है। भारत के इतिहास में प्राचीन भारत में सामंतवाद था या नहीं इसे लेकर भारत के इतिहासकारों में काफी बहस रही है। सामंतवाद की उपस्थिति को लेकर रामशरण शर्मा तथा हरबंस मुखिया के मध्य बहस में हसन इमाम खुद को शर्मा जी के करीब पाते प्रतीत होते हैं। जब वे कई उदाहरणों से यह दिखलाने का प्रयास करते हैं कि मजदूरों को जबरिया खेती कार्य में लगाया जाता था।

 हसन इमाम ने प्रस्तावना में तेभागा आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन तथा पुनप्रा वायलर का जिक्र किया है। तेभागा व तेलंगाना आन्दोलन की मुख्य बातों को भी सामने रखने की कोशिश की गई है। बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती व कार्यानन्द शर्मा आदि का भी जिक्र है। तीस के दशक में भूमि आन्दोलन की पृष्ठभूमि के लिए संदर्भ के लिए जिन पुस्तकों का जिक्र किया है उसमें दस्तावेजी महत्व की सबसे विश्वसनीय पुस्तक ‘मेरा जीवन संघर्ष’ (स्वामी सहजानंद सरस्वती के संस्मरणों की किताब) की अनुपस्थिति थोड़ी खलती है। लेखक ने स्वामी जी की ‘किसान सभा के संस्मरण’ से कुछ उद्धरण दिए हैं लेकिन यह पुस्तक परवर्ती काल की है। हिंदुस्तान के किसान आन्दोलन की इस सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक मानी जानी वाली ‘मेरा जीवन संघर्ष’ के न रहने के कारण बिहार में बीस के दशक के उत्तरार्द्ध तथा समूचे तीस व चालीस के दशक के आन्दोलनों पर थोड़े चलताउ ढ़ंग से बातें आई हैं। रेवड़ा, बड़हिया का तो जिक्र आया है परन्तु देकुलीधाम, अमवारी, राधोपुर सहित कई अन्य आन्दोलन की चर्चा तो दूर उसका जिक्र ही गायब है। यहाँ तक कि सन्दर्भ और अनुक्रमणिका में भी ‘मेरा जीवन संघर्ष’ का जिक्र नहीं है। यदि लेखक ने इस किताब का संदर्भ लिया होता तो इस काल पर थोड़ी ठीक से रौशनी पड़ती तथा यह हिस्सा और भी जीवंत हो पाता।

लेखक ने भूदान आन्दोलन और बिहार में उसके प्रभावों के सम्बन्ध में अच्छे ढ़ंग से प्रस्तुत किया है। तेलंगाना आन्दोलन की पृष्ठभूमि ने कैसे बिनोबा भावे के भूदान की पूर्वपीठिका तैयार की इसे प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है। भूदान आन्दोलन के दौरान किस प्रकार की, कितनी जमीन मिली इसे आंकड़ों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

भूदान आन्दोलन के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भले यह तेलंगाना से शुरू हुआ पर इसे सबसे अधिक सफलता मिली बिहार में। उसकी सबसे बड़ी वजह थी कि इस प्रमुख हिन्दी प्रदेश में किसान आन्दोलन का ताप इतना अधिक था कि वह रैडिकल दिशा में जा सकता था। क्योंकि स्वामी सहजानन्द सरस्वती के चले सामन्त विरोधी ताकतवर आन्दोलन के परिणाम स्वरूप बिहार जमींदारी उन्मूलन करने वाला देश का पहला राज्य बना था। यहीं बिहार में हुए किसान सभा के प्रयोग को अखिल भारतीय स्तर पर लागू किया गया। तेलंगाना, तेभागा या पुनप्रावायलर में हुआ संघर्ष स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित किसान सभा की स्थानीय इकाइयों द्वारा किया गया आन्दोलन था। तेलंगाना और पुनप्रावायलर मुख्यतः निजाम और त्रावणकोर महाराजा के रजवाड़े (प्रिंसली स्टेट) थे जहाँ ब्रिटिश राज सीधे-सीधे न रहने के कारण जहाँ कांग्रेस सांगठनिक रूप से निष्क्रिय रहा करती थी। लेकिन बिहार में किसान सभा को पहले कांग्रेस तथा बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से भी राजनीतिक तौर पर मुकाबला करना पड़ा। उस लिहाज से स्वामी सहजानंद सरस्वती और बिहार के किसान संघर्ष को थोड़े भिन्न ढंग से देखने की जरूरत है । 

शासक वर्ग बिहार के भूमि आन्दोलन की क्रांतिकारी संभावनाओं से वाकिफ था इन्हीं वजहों से भूदान आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बिनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण सरीखे नेताओं ने एड़ी-चोटी एक कर दिया। बिहार में सर्वाधिक मिली जमीन लगभग 6 लाख एकड़ का राज यही है। जयप्रकाश नारायण का भूदान के मुतल्लिक यह वक्तव्य बेहद महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा “कानून व कत्ल के बजाय करुणा से अधिक जमीन बांटी गई।”

हसन इमाम ने संभवतः इन्ही वजहों से भूदान के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा है “ढ़ोल-नगाड़ों और शंख ध्वनि के साथ शुरू हुए इस आन्दोलन के बारे में आम राय यह है कि इसका उद्देश्य किसान संघर्ष पर, खासकर लड़ाई के दिनों में उभार दे दिनों में, अंकुश लगाना था। न सिर्फ भारत के बल्कि विदेशों के विद्वानों और राजनीतिज्ञों ने भी आन्दोलन के इस उद्देश्य और चरित्र को स्वीकार किया है।”

 इस दौरान कुछ असंगितयां रह गई हैं मसलन दूसरी ओर ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के जे.सी कुमारप्पा की अध्यक्षता में गठित कांग्रेस भूमि सुधार कमिटि की रिपोर्ट 1949 में प्रकाशित हुई’ (पेज 22) को सही ही दर्ज किया गया है लेकिन अगले ही पन्ने पर कहा गया है ‘‘कांग्रेस भूमि सुधार कमिटि की सिफारिशों के आलोक में बिहार ने वर्ष 1947 में बिहार जमींदारी उन्मूलन बिल लाया’। बाद में यह संशोधित होकर जमींदारी उन्मूलन एक्ट 1948 के रूप् में आया।’’ (पेज 23)। जब सिफारिश 1949 में हुई है तो फिर बिल दो वर्ष पूर्व 1947 में कैसे पेश हो सकता है? इस किस्म की तथ्यात्मक भूलें रह गयी हैं।

बिहार में भूमि संघर्ष का अगला चैप्टर है ‘बिहार में भूमि संघर्ष : प्रारम्भिक चरण एवं दक्षिण बिहार’। 

इस अध्याय में लेखक ने शुरुआती चरण का संक्षिप्त परिचय देते हुए दक्षिण बिहार के इलाकों यथा पटना, गया, जहानाबाद, नवादा, अरवल, भोजपुर आदि क्षेत्रों में चले भूमि संघर्ष का सिलसिलेवार व विस्तृत ब्यौरा दिया है। किस गांव में कैसे संघर्ष चले, किस प्रकार भूमिहीनों को जो अमूमन दलित जातियों से आते थे, लाल झंडे वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के बैनर तले संगठित किया गया। भूमि के साथ-साथ तालाब, आहार, पोखर, गैर-मजरुआ आम, गैरमजरूआ खास, बकाश्त भूमि के लिए किस प्रकार लड़ाइयां लड़ी गईं। सामन्तों, गुंडों व पुलिस के गठजोड़ का किस प्रकार मुकाबला किया गया।

एक-एक जिले के उदाहरण देकर हसन इमाम ने भूमि संघर्षो का तफसील से वर्णन किया है। इन वर्णनों में पाठक को कई प्रकार की दूसरी सूचनाएं भी मिलती रही हैं। मसलन दक्षिण बिहार में 1990 के बाद यादव जाति के भूस्वामियों ने बड़ी संख्या में दलितों व भूमिहीनों को उनकी जमीन से बेदखल करने का प्रयास किया। 

इसके अलावा लेखक ने जिन लोगों को जमीन दिलाई गई उस ओर अब तक काबिज हैं या नहीं? नई परिस्थिति में उस इलाके के दबंग लोग क्या दुबारा से उनके बसाए जमीनों पर कब्जा तो नहीं करना चाहते हैं ? क्या जिन पार्टियों ने खासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने उन्हें जिस भूमि पर बसाया क्या वे अब भी पार्टी के साथ हैं? उनके प्रति हमदर्दी रखते हैं? क्या पार्टी द्वारा उन्हें जोड़े रखने के अतिरिक्त प्रयास किये गए या जैसा कि एक लाभुक ने टिप्पणी की “पार्टी के लोग सिर्फ सिर्फ रिनुअल के समय आते हैं।” हसन इमाम ने लोगों से मिलने के क्रम में इस बात पर खास ध्यान रखा है कि जिन लोगों को कम्युनिस्ट पार्टी के संघर्षो के परिणामस्वरूप जमीन मिली क्या वे या उनका परिवार अब भी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति लगाव रखते हैं। अधिकांश मामलों में लेखक ने इन नोट किया यह सम्बन्ध अब काफी कमजोर या कहें मृतप्राय सा हो गया है। जब कभी भूमि प्राप्त करने वालों को कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा इसकी याद दिलाई जाती है तो कुछ लोग, जैसा कि लेखक ने नोट किया है “पहले जमींदार एहसान जताया करते थे अब आप लोग जताते हैं।”

माकपा द्वारा बसाए गए भूमिहीनों के इलाकों के नाम प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं के नाम और रखे गए हैं स्टालिन नगर, राहुल नगर, प्रमोद दास गुप्ता नगर, मार्क्सवादी नगर, पी गोपाल रेड्डी नगर, बी.टी रणदिवे नगर आदि। 

इन संघर्षों में मुख्यतः माकपा द्वारा किये गए संघर्षों का ब्यौरा है। भोजपुर इलाके में भाकपा-माले-लिबरेशन का भी जिक्र है। सी.पी.आई का जिक्र कई स्थलों पर सीपीएम के साथ आता है लेकिन इन अध्याय में सीपीआई द्वारा किये संघर्षो की चर्चा बहुत कम, या कहें लगभग नहीं के बराबर, है। कुछ जगहों पर सी.पी.आई की नकारात्मक भूमिका की चर्चा कुछ इस प्रकार की गई है कि सीपीआई ने भूमि संघर्ष छोड़ दिया उसके बाद उसे आगे बढाने का कार्य सीपीएम के द्वारा किया गया। भूमि संघर्ष में सीपीआई के महत्व को रेखांकित करते हुए भी की बार लेखक द्वारा भूमि संघर्ष में शामिल जिन-जिन लोगों से मौखिक इंटरव्यू लिया है उनमें सीपीआई से जुड़ा व्यक्ति काफी कम हैं। सीपीआई द्वारा भूमि संघर्ष से अलग हटने का काल लेखक ने 1974-75 निर्धारित किया है। तथा इमरजेंसी को भूमि संघर्ष से दूर जाने के निर्णायक काल के रूप में चिन्हित किया है। 

भूमि संघर्ष के कमजोर होने के कारणों के सम्बन्ध में लेखक का विचार है “सीपीआई (संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी) के नेतृत्व में भूमि संघर्ष के एक सफल गौरवशाली इतिहास की शुरुआत हुई। हजारों एकड़ जमीन पर भूमिहीनों ने कब्जा जमाया। लेकिन संघर्ष के कई क्षेत्रों में जिला नेतृत्व और संघर्षरत कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष के दौर में बढ़ते रणनीतिक अंतर्विरोधों ने न केवल भूमि संघर्ष को कमजोर किया बल्कि संघर्ष में सीधे-सीधे भागीदार कार्यकर्ताओं में हताशा पैदा किया। कुछ एक जिलों में, जिला नेतृत्व एवं पार्टी के निर्वाचित विधायक, सांसद द्वारा परोक्ष रूप से भूस्वामियों की पक्षधरता की प्रवृत्ति भी देखने को मिली। इसके अतिरिक्त संघर्ष को क़ानूनवाद की तरफ़ भी देखने की प्रवृत्ति आई।”

बिहार में भूमि संघर्ष में में दक्षिण बिहार के साथ साथ उत्तर बिहार को भी समेटा गया है। उत्तर बिहार के पांच प्रमुख जिलों में तो जाकर संघर्ष के कई जीवित बुजुर्गों आए इंटरव्यू लेकर ‘फर्स्ट हैंड अकाउंट’ को सामने लाने का प्रयास किया गया है। बेगुसराय, मधुबनी, खगड़िया, सीतामढ़ी, पश्चिमी चंपारण, समस्तीपुर, दरभंगा आदि जिलों के भूमि संघर्षों का विशेषकर सीपीएम के नेतृत्व में चलाए गए संघर्षों का ब्यौरा प्रस्तुत किया है। इन जिलों में किये गए फील्ड सर्वेक्षण के आंकड़े प्रस्तुत किये गए हैं। अधिकांश इंटरव्यू भले सीपीएम धारा से जुड़े कार्यकर्ताओं का लिया गया है लेकिन उससे एक समग्र दृष्टिकोण बनाने में मदद मिलती है।

लेखक ने अपने अध्ययन में बताया है कि अधिकांश जगहों पर जमीन मालिक उच्च जातियों से आते हैं और अधिकांश लाभार्थी पिछड़ी और दलित जातियों से। लेकिन सीतामढ़ी ऐसा जिला है जहाँ भूस्वामी पिछड़ी जातियों के रहे हैं लिहाजा संघर्ष भी उन्हीं के विरुद्ध रहा है। अपने फील्ड सर्वेक्षण में लेखक ने इस बात और विशेष बल डाला है कि भूमि संघर्ष में जाति एक कारक तो रहा है पर सबसे निर्णायक पहलू नहीं। जैसे भूस्वामियों में सभी जातियों के लोग हैं वहीं लाभार्थी भी मिली-जुली जातियों के रहे हैं। लेखक ने कई उदाहरणों से यह दिखलाया है कि भूमि संघर्ष अगड़ा-बनाम पिछड़ा का जातीय संघर्ष नहीं अपितु एक वर्गीय दायरे में लड़ा रहा गया था। तथ्यों व सन्दर्भों की सहायता से लेखक ने खुद को अस्मितावादी चौखटे से खुद को बचाते हुए बिहार में भूमि संघर्ष के पीछे के असली कारण वर्गीय लड़ाई को सामने लाने का प्रयास किया है। जैसा कि उन्होंने खुद कहा है “निष्कर्षतः कम्युनिस्ट पार्टियों के झण्डे तले बिहार में हुए भूमि संघर्ष के नेतृत्वकारी जमात में सभी धर्मों एवं जातियों के लोग रहे लेकिन पिछड़ी जातियों के गरीब किसानों ने ही संघर्ष का नेतृत्व किया। शासक वर्ग के जातीय एवं सांप्रदायिक विभाजन रेखा को लांघते हुए इस संघर्ष ने मज़दूरों एवं गरीब किसानों की वर्गीय एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।” 

 एक-एक कर सभी जिलों में किस प्रकार सीलिंग से फाजिल जमीन, गैर मजरूआ जमीन, सरकारी जमीन के लिए भूस्वामियों, उनके गुंडों से काफी लड़ाई हुई उसका एक जीवंत खाका प्रस्तुत किया है।

 लगभग तमाम भूमि संघर्षों में कैसे भूस्वामी, भाड़े के गुंडों का उपयोग गरीबों को बेदखल करने के लिए किया करता है उसका वर्णन है। आपसी संघर्ष में किस प्रकार भूमिहीनों के पक्ष से लोग मारे जाते हैं इस सम्बन्ध में लेखक ने बताया है। अधिकांश शहीदों के नाम तक दिए हैं। लेकिन निरंतर धक्कों के बाद भी भूमिहीनों ने जमीन पर कब्जा बरकरार रखा। भूमि संघर्षों के दौरान पुलिस की भूमिका ज्यादातर भूस्वामी की ओर दिखाई देती है। 

पुलिस को यदि राज्य का प्रतिनिधि मानें तो उसकी भूमिका स्पष्ट नजर आती है वरना राज्य किस तरह व्यवहार करता है खासकर 1990 के बाद जब सामाजिक न्याय की सरकार वाम पार्टियों के सहयोग पर निर्भर करती है इसपर लेखक ने कुछ खास रौशनी नहीं डाली है। भाड़े के गुंडों को सियासी संरक्षण कहाँ से मिलता रहा है इस सम्बन्ध में एक इशारा रहता तो पढ़ने वालों को भूमि संघर्ष की राजनीति की थोड़ी और समझ बढ़ती। वैसे यहाँ-वहाँ इस पर थोड़ी बहुत टिप्पणियां हैं।

पुस्तक के अन्तिम अध्यायों में फील्ड सर्वेक्षण के आधार पर कई तालिकाओं को प्रस्तुत किया गया है जिनमें भूमि संघर्ष के विभिन्न पहलुओं तथा उसकी वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालती है। उदाहरणस्वरुप क्या आपको भूमि संघर्ष से पहले आवास भूमि तथा भूमि अधिकार से संबंधित सरकारी नीति का ज्ञान था? भूमि संघर्ष का नेतृत्व करने वाले किस जाति से आते थे? संघर्ष करने वालों की आर्थिक स्थिति कैसी थी? क्या भूमि संघर्ष से उभड़े किसी नेता ने संघर्ष के बीच या बाद में भूस्वामी से समझौता कर लिया? यदि समझौता कर लिया तो इसके क्या कारण थे? यदि जोत व आवास की जमीन दखल में है तो क्या उसका पर्चा आपको मिला है? क्या वर्तमान समय में चल रहे भूमि संघर्ष के साथ सामाजिक एवं जातीय उत्पीड़न के खिलाफ भी संघर्ष चल रहा है?

अधिकांश फील्ड सर्वेक्षण उत्तर बिहार के पांच राज्यों के मौखिक इंटरव्यू पर आधारित है।

लेखक ने भूमि संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक व जातीय संघर्ष के प्रति रवैये में क्या फर्क पड़ा है? क्या उस मोर्चे पर भी प्रगति हुई है इन सवालों को भी पुस्तक में उठाने की कोशिश की गई है। इस सम्बन्ध में लेखक की यह टिप्पणी गौर करने लायक है “शोध अध्ययन के क्रम में यह बात स्पष्टता से सामने आई की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में जिन भूमिहीनों को वास और जोत की जमीन पर दखल दिलाया गया, आज उनका बड़ा हिस्सा वोट के समय अपनी-अपनी जातियों की पहचान वाली पार्टियों को वोट करते हैं। भूमि संघर्ष के लाभार्थियों, जिनका बहुसंख्यक हिस्सा पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के भूमिहीनों का था, आखिर बाद के दिनों में राजद, लोजपा, बसपा जैसी जातीय पहचान की राजनीतिनोर केंद्रित पार्टियों के वोट बैंक में कईं तब्दील हुआ? यह गंभीर राजनीतिक विमर्श की मांग करता है।”

अपनी तमाम सीमाओं के बाद भी बिहार में वामपंथ की एक खास धारा-सीपीआई (एम) के भूमि संघर्ष को दस्तावेजीकृत करने वाली किताब है ‘बिहार में भूमि संघर्ष’

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लेखक संस्कृतिकर्मी व स्वतन्त्र पत्रकार हैं। सम्पर्क- +919835430548, anish.ankur@gmail.com

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