संस्कृति

 प्रतीकों की अभिव्यक्ति कोहबर कला

 

 लोक में लोकाचार का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। लोकाचार किसी भी पर्व, पूजा, संस्कार को जीवन्त व रोचक बनाते है। विशेषकर विवाह संस्कार में इन लोकाचारों के द्वारा वर मधु के मिलन को एक उत्सव में बदल दिया जाता है। विवाह की लोक रीतियां दो अपरिचितों के बीच जान पहचान बढ़ाने, एक दूसरे को समझने का माध्यम होतीं है। इन लोकाचारों में कई तरह के रस्में वर वधु द्वारा निभाई जातीं है। मिथिला की विवाह की लोक रीतियां बाकी क्षेत्रों से अलग व निराली है कारण यहाँ चार दिन के लम्बे लोक रीतियों व अनुष्ठान के बाद विवाह सम्पन्न होता है। विवाह की रस्में जिस कक्ष में निभाई जातीं है उसको कोहबर घर कहा जाता है।

कोहबर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है – खोह या कोह यानि गुफा या कमरा, जहाँ वर का निवास स्थान होता है। यह संस्कृत के शब्द “कोष्टवर” का अपभ्रंश भी माना जाता है। मिथिला या मधुबनी चित्रकला से अलग विवाह के अवसर पर घर के विशेष कक्ष में उकेरे गये चित्रों को कोहबर कला के नाम से जाना जाता है। 2000 साल से भी प्राचीन इस लोक कला को विश्व के सामने लाने का श्रेय विलियम जी आर्चर को जाता है। 1934 में बिहार भूकंप से भीषण तबाही ने हजारों घर उजाड़ दिये थे। गाँव के गाँव मलबे में तब्दील हो गये थे।

भूकंप से मची तबाही का जायजा लेने के लिए मधुबनी जिले के ब्रिटिश अधिकारी विलियम जी आर्चर को भेजा गया। भूकंप प्रभावित गाँव का दौरा करते हुए टूटी दीवारों पर बने चित्रों को देखकर विलियम आर्चर हैरान रह गये। घरों की दीवारों पर बने गूढ़ात्मक अभिव्यक्तियों से युक्त इन चित्रों ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया था। उन्होंने इसकी कई तस्वीरों को 1949 में इण्डियन आर्ट जर्नल में प्रकाशित करवाया। तब से मिथिला के गाँव देहातों की दीवारों पर अंकित इस चित्रकला को वैश्विक पहचान मिली।

 कोहबर कला महिला प्रधान चित्रकला है। इस चित्रकला में ज्यादातर महिलाएं ही निपूर्ण होती है। तीज त्योंहार एवं विशेष अवसरों पर अरिपन, पुरहर और कोहबर लिखने के लिए प्रत्येक घर में कोई कोई दक्ष महिला अवश्य होती है। इस कला का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आजतक मिथिला समाज में नये संस्करण के साथ विद्यमान है। अपनी कल्पना के माध्यम से महिलाएं जो चित्र बनाती है उन चित्रों का सांकेतिक अर्थ होता है। इन चित्रों में हाथी, शेर, तोता, साँप, मछलियाँ, मोर, बाँस, फूल, हल, ओखल-मूसल, शिव-पार्वती, विष्णु-लक्ष्मी, कुल देवता, अष्टदल कमल, मंडला यंत्र, तथा स्त्री-पुरूष, नैना जौगिन आदि होते हैं। कोहबर कला को बचाने की कवायद

विवाह के अवसर पर, घर के किसी एक कमरे में पूर्व दिशा की दीवार पर गोबर से लीप कर, पिसी हल्दी और पिसे चावल के घोल से चित्रकारी करके इस घर को सजाया जाता है। कोहबर घर की चित्रकारी सुहागिन स्त्रियां ही करतीं है। मान्यता है कि इस घर में देवता पितरों का आशीर्वाद वर वधु को प्राप्त होता है। विवाह की शुरुआत से लेकर समाप्ति तक के सभी रीति रिवाज इसी घर में सम्पन्न किये जाते हैं। एक प्रकार से नव वर-वधु के जीवन के शुभारम्भ का साक्षी बनता है यह कोहबर घर। कोहबर के चारों कोनों पर नैना जोगिन का चित्र भी चित्रित किया जाता है।

माना जाता है कि नैना जोगिन का चित्रण बौद्ध धर्म के प्रभाव से गृहस्थ को दूर रखने के लिए किया जाता था। मिथिला के गृहस्थ जीवन पर जब बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा, तब उससे बचने के लोक विश्वास ने नैना जोगिन के चित्रण की परम्परा शुरू हुई। इसके लिए चारों दिशाओं को तांत्रिक विधि से साधा जाता था और कोहबर घर को उसके चारों कोनों में नैना जोगिन का चित्रण कर बांधा जाता था।

लोककथनानुसार कोहबर की शुरुआत राजा श्री राम और जानकी के विवाह के समय से हुई थी। उस समय राजा जनक ने सीता के स्वयंवर के अवसर पर अपनी प्रजा से नगर को सजाने एवं बारातियों के स्वागत में अपने अपने घरों की दीवालों पर भीतिचित्र बनाने का आग्रह किया। उसी समय से लोक परम्परा में इस चित्रकला को विवाह के लोक रीति का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया लेकिन एक बड़ी विचित्र बात है कि जिस सीता के विवाह से कोहबर लिखने की परम्परा की शुरूआत हुई उसी कोहबर के चित्रों में अन्य देवी देवता उकेरने के साथ तोता- मैना, खल- मूसल, शिव पार्वती आदि के चित्र तो बनते है लेकिन सीता राम का चित्र नही बनाया जाता क्योंकि मैथिल लोक समाज में अवध में ब्याही सीता के वैवाहिक जीवन को बहुत सुखद नहीं माना जाता। इसलिए कोहबर में सीता राम की युगल जोड़ी छोड़कर अन्य देवी देवताओं के चित्र अंकित किये जाने की परम्परा है। यही कला आगे चलकर मधुबनी चित्रकला (मिथिला पेंटिंग) के नाम से प्रचलित हुई।


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कोहबर में जो चित्र बनते है उसका सम्बन्ध वर-वधु से होता है। इस में उन वस्तुओं का अंकन होता हैं जिससे दंपत्ति के बीच निकटता स्थापित करके प्रजन्न, उर्वरता और वंश वृध्दि को बढ़ावा मिलें। कह सकते है वर वधु को अप्रत्यक्ष रूप से “यौन शिक्षा” देने के उद्देश्य से कोहबर में अनेक सांकेतिक चित्र उकेरे जाते हैं। नव विवाहित को कोहबर के माध्यम से शिक्षित करने की यह अद्भुत लोक परम्परा प्राचीन युग से चली आ रहीं है। इसमें जो चित्र बनते है उसका सम्बन्ध वर-वधु को मिलन के लिए संकेतिक रूप से तैयार करना होता है।

उनमें से सबसे महत्वपूर्ण चित्र होता है बाँस और कमल दल जिसे पुरइन कहते हैं। पुरइन स्त्री जननांग तथा बाँस पुरुष जननांग के प्रतीकार्थ रूप में चित्रित किये जाते है। अटल साक्षी के रूप में चन्द्रमा और सूरज बनाये जाते हैं। प्रेम के प्रतीक तोता मैना का चित्र उकेरा जाता हैं। नवदांपत्य जीवन में प्रेम और उल्लास सदैव बना रहे इस कामना के साथ प्रकृति के बेल बूटों से लेकर पशु – पक्षी, जल-जीव, फल-फूल को कोहबर में मूल स्थान दिया जाता है। प्रकृति की सृजनशीलता के साक्ष्य बने इन चित्रों से कोहबर कक्ष को सजाया जाता है जिसमे सांकेतिक रूप में गृहस्त जीवन के शुभारम्भ के साथ संतति के विकास की अगली कड़ी के रूप में वर वधु को स्त्री पुरुष के समागम के महत्व से परिचित कराया जाता है। इस कक्ष में कमल, बाँस और केला पत्ता एक विशेष प्रतीकात्मक अर्थ से चित्रित किये जाते हैं।

माना जाता है कि केला और बाँस के वृक्ष तेजी से वृद्धि करते हैं। इसी प्रकार मछली की प्रजनन क्षमता, तोता सुग्गा और कछुआ को दीर्घायु का प्रतीक कह सकते हैं चिरई और साँप का जोड़ा वंश वृद्धि से सम्बन्ध रखते हैं। नैना जोगिन के चित्र का उद्देश्य वर के प्रेम के ऊपर तांत्रिक नियंत्रण स्थापित करना होता है। कमल पुष्प जो कीजड़ में खिलकर अपनी सौन्दर्य आभा से सबको प्रफुल्लित करता है। कुल मिलाकर नवजीवन की सुखद शुभारम्भ के लिए शुभ संदेश देते हुए प्रकृति के विभिन्न उपादान बेल बूटों से सजे इस कक्ष में विविध प्रतीक चिह्नों के माध्यम से नव वर वधु को गूढ़ संदेश देने के प्रयोजन से ही पूरे कक्ष को चित्रों से सजाया जाता है। कुछ कहे बिना ही संकेतों मे कहने की कला लोक संस्कृति की अपनी विशेषता है। अनगढ़ सी दिखने वाली ऐसी असंख्य लोक कलाओं की मूक अभिव्यक्तियों को अभी समझना शेष है।

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लेखिका कालिंदी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। सम्पर्क +919868545886, vibha.india1@gmail.com

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