काजली कनौजिया
संस्कृति

काजली कनौजिया में बिखरी पुरातात्विक सम्पदा

 

भारत में मूर्तिकला हमेशा से कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम रही है, भारत में मूर्ति कला का विकास अन्य ललित कलाओं जैसे ही स्थापत्य और चित्रकला के साथ ही हुआ। भारत में मूर्तिकला के अनेक स्वरूप जैसे मृण मूर्तिकला, धातु मूर्तिकला, पाषाण मूर्तिकला आदि के रूप में हुआ। मूर्तिकला के दो उद्देश्य होते हैं प्रथम अतीत को जीवित रखने का प्रयास और द्वितीय अपनी अभियुक्ति को आकार प्रदान करने का प्रयास।

 भारत की सबसे प्राचीन मूर्तियाँ सिंधु घाटी के मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की प्राचीन अवशेषों से मिलती है भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मूर्ति पूजा प्राचीन काल से चली आ रही और प्रत्येक क्षेत्र में मूर्तियाँ पाई जाती है मूर्तियाँ इतिहास के स्रोतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मूर्तियों की सहायता से तत्कालीन समय की सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक धार्मिक तथा साहित्यिक जानकारी भी सरलता से प्राप्त की जा सकती है।

 बैतूल जिले में भी पुरातात्विक सम्पदा बिखरी पड़ी है बैतूल के साल बर्डी भैंस देही काजली कनौजिया आदि कई जगहों पर प्राचीन मूर्तियों के अवशेष देखने को मिलते हैं प्रस्तुत आलेख में काजली कनौजिया से प्राप्त मूर्ति अवशेषों का अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।

 काजली कनौजिया बैतूल जिले की आमला तहसील में स्थित है जो बैतूल जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है काजली का प्राचीन नाम करजलमय था। इतिहासकार आर.जी .पांडे के अनुसार मगध का शासन बैतूल विदिशा होशंगाबाद के क्षेत्र में भी रह चुका था इस कारण इस क्षेत्र में भी बौद्ध धर्म का प्रभाव परिलक्षित होता है, साथ ही यह क्षेत्र नाग वंश के शासकों से भी जुड़ा रहा है इसलिए इस क्षेत्र में नागों की पूजा भी की जाती है और इस क्षेत्र में नाग पंचमी का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है और शादी जन्मदिन जैसे शुभ अवसरों पर नागों को बकरा मुर्गा की बलि दी जाती है इसके आसपास नागपुर नागझिरी नांगलवाड़ी जैसे नगरों के नाम भी इस क्षेत्र को नागवंशी शासक एवं बौद्ध कालीन संस्कृति से जोड़ती है।

 कनौजिया से प्राप्त से प्राप्त मूर्ति समूह में से अधिकांश मूर्तियाँ समय एवं संरक्षण के अभाव के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी है फिर भी जो लक्षण दिखाई देते हैं उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह मूर्तियाँ मध्यकाल में बनाई गई थी और संभवतः यह अमरावती मूर्ति कला से सम्बन्धित है। अमरावती मूर्तिकला का प्रादुर्भाव सातवाहन काल के दौरान हुआ अमरावती जोकि दक्षिण भारत के गुंटूर जिले में स्थित है इस पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। 

तारा योगिनी की मूर्ति

 कनौजिया में प्राप्त मूर्ति समूहों में से एक मूर्ति तारा योगिनी की हो सकती है तारा को तंत्र यान के तहत देवी का दर्जा दिया जाता है कुल चौसठ योगिनी ओं में से एक तारा को मातृ सत्ता का दर्जा दिया जाता है तारा की मूर्ति भारत के अलावा तिब्बत, सिक्किम, नेपाल आदि में पाई जाती है। शैव यान के अंतर्गत नाथ योग तथा तंत्र योग में योगियों की आराधना की जाती है।

 संस्कृत साहित्य में तारा और अन्य योगियों को मात् देवी जैसे दुर्गा काली आदि शक्तियों से जोड़ा गया है मध्य प्रदेश और भारत की कई जगहों पर योगिनी मंदिर पाए जाते हैं, मध्यप्रदेश के खजुराहो भेड़ाघाट तथा मतौली मुरैना में भी योगिनी मंदिर पाए जाते हैं।

 कनौजिया में स्थित योगिनी मूर्ति खंडित अवस्था में है, केवल उसका ऊपरी हिस्सा ही सुरक्षित अवस्था में है कुछ युग्म मूर्तिया दिखाई देती है संभवत यह मूर्तियाँ मध्यकाल राजपूत काल से सम्बन्धित है ऐसी ही मूर्तियाँ खजुराहो के मंदिरों में भी दिखाई पड़ती हैं।

 भगवान विष्णु की मूर्ति

विष्णु हिन्दुओं का प्रसिद्ध देवता है, हिन्दू देवताओं की त्रिमूर्ति में प्रमुख देवता जिसे विश्व का रक्षक माना जाता है। कनौजिया कनौजिया में विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा पाई जाती है। उनके चारों हाथों में से तीन हाथ सुरक्षित है लेकिन एक हाथ क्षतिग्रस्त है, विष्णु को दक्षिण भारत में भी पूजा जाता है, उन्हें वहाँ पेरूमल कहा जाता है।

शिव पार्वती की प्रतिमा

शिव और पार्वती की युग में प्रतिमा शिव और शक्ति सम्प्रदायों के सम्मिश्रण को प्रदर्शित करता है। पार्वती शब्द वैदिक साहित्य में उपयोग नहीं किया जाता इसके बजाय अंबिका रुद्राणी का उपयोग किया गया है। देवी का सती पार्वती नाम महाकाव्य काल में प्रकट होता है। वेवर का मानना है कि जैसे शिव विभिन्न देवताओं रुद्र और अग्नि का संयोजन है वैसे ही पुराण पाठ में पार्वती रुद्र की पत्नियों का संयोजन है।

 मध्यकाल में शिव सम्प्रदाय और शक्ति सम्प्रदाय के मध्य तीव्र संघर्ष हुए और कनौजिया में जिस प्रकार शिव पार्वती की युग्म प्रतिमाएं प्राप्त हुई है वह दोनों सम्प्रदायों के मध्य समन्वय को प्रदर्शित करता है।

यक्ष यक्षिणी की प्रतिमा

प्राचीन साहित्य में यक्षो की गणना भूत किन्नर राक्षस गंधर्व नाग आदि अमानुषिक वर्ग में की गई। यक्ष तथा यक्षिणी ओ की प्रतिमाएं मंदिरों के द्वार तथा दीवारों पर रखी जाती थी धन के देवता कुबेर को भी यक्ष माना जाता है। शास्त्रों में 24 यक्षों जिनमें गोमुख दंड पानी गंधर्व कुबेर और वरुण तथा 36 प्रकार की यक्षिनो में विशाला लक्ष्मी मालिनी का उल्लेख है। यक्षिणी और यक्ष की मूर्ति दिल्ली के भारतीय रिजर्व बैंक के प्रवेश द्वार पर भी है।

बुध और बोधिसत्व की प्रतिमाएं

कनौजिया के पुरस्मार्को में विभिन्न तरह के केस विन्यास अलंकरण दिखाई देते हैं। उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में केश विन्यास अधिक भव्य दिखाई देता है प्रस्तुत प्रतिमा में जो केश विन्यास दिखाई देता है उसे स्पष्ट है कि यह प्रतिमाएं बुद्ध या बोधिसत्व की है क्योंकि बुद्ध का केश विन्यास अपने आप में विशिष्ट है। इस केश विन्यास की अनेकों मूर्तियाँ बुद्ध की पाई जाती है, इस प्रकार से काजली कनौजिया में बुद्ध, विष्णु, शिव, पार्वती, यक्षिणी आदि की मूर्तियों के पूरा अवशेष पाए जाते हैं।

  स्थानीय ग्रामीणों द्वारा इनकी पूजा की जाती है लेकिन जानकारी व अज्ञानता के अभाव में प्रतिमाओं पर सिंदुर या पूजा सामग्री जम गई है इस कारण से यहाँ स्थित अनेक प्रतिमाओं को पहचान पाना मुश्किल है। आवश्यकता है इन प्रतिमाओं के उचित रखरखाव व संरक्षण की ताकि इस क्षेत्र का सही इतिहास लोगों के समक्ष आए इन प्रतिमाओं के अन्वेषण से इस क्षेत्र को एक नई पहचान प्राप्त होगी

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लेखक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर में सहायक प्राध्यापक (इतिहास) हैं। सम्पर्क +918982842018, satankeramit@gmail.com

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