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वैलेंटाइन्स डे का विरोध क्यों?

 

प्रेम किसी व्यक्ति का सबसे निजी भाव है, जो वह अपनी मर्जी से अपने स्वभाव के अनुरूप प्रकट करता है। कोई अपनी प्रेमिका को गिफ्ट, कार्ड या चॉकलेट देता है, तो किसी को यह आडंबर लगता है। ओशो के अनुसार प्रेम परमात्मा का प्रकटीकरण है। नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि ने प्रेम को मनुष्य के नौ स्थायी भावों में शामिल किया है। इसके इतर भी प्रेम बंधन, मुक्ति, प्रतीक्षा, जीवन या जहर के रूप में परिभाषित होता रहा है। यूँ तो प्यार पर बहस नई नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में प्यार पर चर्चा का स्वरूप काफी बदल गया है। विरोध हिंसा में तब्दील हो चुका है और प्रेम के विरोध में तर्क के बजाय लाठी-डंडों का इस्तेमाल तक होने लगा है।

विश्व भर में 14 फरवरी वैलेंटाइन्स डे के रूप में मनाया जाता है, इस दिन प्रेमी जोड़े एक-दूसरे के प्रति अपने इश्क का इजहार करते हैं। इस दिन का ऐतिहासिक महत्व भी है। लगभग 270 ई. के आस-पास रोम में संत वैलेंटाइन को इसी दिन  फाँसी दी गई थी। संत वैलेंटाइन ने रोम के राजा क्लॉडियस के फैसले का विरोध किया था, जिसके अनुसार वहाँ के सैनिकों को प्रेम या शादी करने का अधिकार नहीं था। राजा का मानना था कि प्रेम या शादी किसी व्यक्ति को भावनात्मक रूप से कमजोर करता है। हालांकि  हालांकि इस दिन को लेकर कई अन्य कहानियाँ भी प्रचलित हैं।

वेलेंटाइन्स-डे

संत वैलेंटाइन की पुण्यतिथि को दुनिया ने प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाना शुरू कर दिया। कालांतर में यह भारत में भी खूब प्रचलित हुआ और बाजार के प्रभाव में अब यह आठ दिनों का एक इवेंट बन गया है। इसे वैलेंटाइन वीक कहा जाता है। इस सप्ताह के आठ दिनों को क्रमशः रोज डे, प्रपोज डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे और वैलेंटाइन्स डे में बांटा गया है। हर दिन की अपनी रिवायतें हैं और इन रिवायतों के अनुसार आपसे आचरण की उम्मीद भी की जाती है। वैलेंटाइन वीक का संत वैलेंटाइन से कोई संबंध नहीं है, अपितु बाजार से है।

लेकिन सवाल है कि वैलेंटाइन्स डे का विरोध क्यों होना चाहिए? या फिर विरोध का स्वरूप क्या होना चाहिए? भारत में दो तरह से वलैंटाइन्स डे का विरोध देखने को मिलता है। एक समाज का छोटा लेकिन मुखर तबके का हिंसात्मक विरोध है, जिसमें तोड़-फोड़, मारपीट और गुंडई शामिल है। दूसरा विरोध तार्किकता के साथ आता है, जिसमें वास्तव में प्रेम के बाजारीकरण का विरोध है।

कुछ दक्षिणपंथी संगठनों के लाठी डंडों में कोई तर्क नहीं है, लाठियों में कभी कोई तर्क नहीं हो सकता। हिंसा तार्किकता के अंत के बाद ही शुरू होती है। तार्किक व्यक्ति या समाज किसी प्रकार की हिंसा नहीं कर सकता। प्रेम जैसे निजी स्थान में किसी का जबरन प्रवेश भी हिंसा है। 17-18 साल के युवक को उसकी प्रेमिका के सामने थप्पड़ मारना और जलील करना शायद उसे दोबारा किसी का हाथ पकड़ने की हिम्मत न दे या वह उम्र भर उस मानसिक सदमे से कभी बाहर ही न निकल पाए। लेकिन राजनीतिक संरक्षण प्राप्त नफरती चिंटुओं को शायद प्रेम जैसी गहरी और संवेदनशील विषय का कोई ज्ञान नहीं। वैलेंटाइन्स डे के विरोध में उनके पास सिर्फ एक ही तर्क है कि यह पश्चिमी संस्कृति की देन है। जबकि मदर्स डे, फादर्स डे, टीचर्स डे या वीमेंस डे को हम बड़ी आसानी से स्वीकार कर लेते हैं।

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लेकिन वैलेंटाइन्स डे को सिर्फ पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा या उससे प्रभावित होने के कारण खारिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि वैश्वीकरण के दौर में हमारे जीवन की हर इकाई पर पश्चिम का प्रभाव है, जो कई मायनों में बेहद जरूरी भी है और जिससे हम व्यवहारिक तौर पर कभी खुद को अलग नहीं कर सकते। मसलन हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी जीवनशैली, नए अनुसंधान, व्यापार, रोजगार या फिर सोशल मीडिया। दिलचस्प है कि जो संगठन पश्चिम के पूंजीवाद का समर्थन करते हैं, वो वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने में लगे हैं।

रेख्ता के मंच से लेखक जावेद अख्तर कहते हैं कि समाज को प्रेम करने वालों से समस्या है क्योंकि समाज नहीं चाहता कि उसके बनाए ऊँच-नीच की दीवार को कोई तोड़े, तय दायरे के बाहर कोई जाए और समाज के उसूलों और रूढ़ ढांचे को कोई चुनौती दे। लेकिन जब दो शख्स मोहब्बत में होते हैं, वे इन नियमों को चुनौती देते हैं। ऐसे में समाज का एक क्रूर और हिंसक चेहरा हमेशा प्रेम या उसके किसी भी स्वरूप को कुचलने का प्रयास करता है। वैलेंटाइन्स डे का लाठी-डंडों के दम पर विरोध का चेहरा उसी क्रूरता का हमशक्ल दिखाई देता है।

लेकिन दूसरी तरफ उपभोक्तावाद की संस्कृति के खिलाफ खड़ी चेतना भी हमें वैलेंटाइन्स डे के वर्तमान स्वरूप के खिलाफ जरूर खड़ी करती है, जो दूसरे तरह के विरोध का आधार है। कबीर ने कहा था ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय’। यानी प्रेम न तो खेत में उपजता है और न ही बाजार में बिकता है, लेकिन वैलेंटाइन्स डे के वर्तमान स्वरूप ने मोहब्बत को बाजार में लाकर खड़ा कर दिया है। दरअसल बाजारवाद प्रेम का एक बेहद सतही और छिछला रूप प्रस्तुत कर रहा है, जिसमें प्रेम के मूल तत्व ही गौण हो जा रहे हैं। कार्ड, गुलाब या चॉकलेट देकर हम प्रेम का दायित्व भर पूरा कर पा रहे हैं। इस बीच प्रेम के बाजारीकरण से सबसे बड़ा खतरा प्रेम को ही है। इस लिहाज से वैलेंटाइन्स डे का विरोध महज बाजारवाद का विरोध है, प्रेम का बिल्कुल नहीं। हालांकि बाजारवाद अन्य भारतीय त्योहारों या उत्सवों में भी निहित है, उन सब में भी उपभोक्तावाद की संस्कृति के खिलाफ मानवीय चेतना का खड़ा होना स्वभाविक हो जाता है। वैलेंटाइन्स डे के तार्किक विरोध में वैलेंटाइन्स डे के समर्थन अथवा विरोध के अन्य तर्कों को भी शामिल करने की पूरी गुंजाइश है, जो हिंसात्मक विरोध में कहीं नहीं है।

प्रेम जैसे पवित्र रिश्ते में बाजार का प्रभाव घातक है। इसका विरोध ठीक उसी तरह देखा जाना चाहिए जैसा बाजारवाद के विरोध को देखा जाता है। 14 फरवरी को प्रेम दिवस के रूप में मनाने में आपत्ति का भी कोई ठोस तर्क नहीं है। यह ठीक है कि साल के एक दिन को प्रेम का प्रतीक मान लिया जाए, लेकिन प्रेम की अभिव्यक्ति का तरीका क्या होगा, यह न बाजार तय करेगा न कोई संगठन

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विवेक आर्यन

लेखक पेशे से पत्रकार हैं और पत्रकारिता विभाग में अतिथि अध्यापक रहे हैं। वे वर्तमान में आदिवासी विषयों पर शोध और स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क +919162455346, aryan.vivek97@gmail.com
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