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भारत में अँग्रेजी राज के पाँव उखाड़ी थी हिन्दी

  कांग्रेस के जन्म से लगभग ग्यारह वर्ष पहले 23 मार्च 1874 की ‛कवि वचन सुधा’ में स्वदेशी के व्यवहार के लिए एक प्रतिज्ञा-पत्र प्रकाशित हुआ था, जिस पर कई लोगों के हस्ताक्षर थे। तब महात्मा गांधी की उम्र लगभग पाँच साल की रही होगी। आगे चलकर गांधी ने अपने आन्दोलन में स्वदेशी पर अत्यधिक बल दिया और अँग्रेजों से लड़ने के लिए इसे हमेशा एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। भारतेंदु द्वारा अपनी 24 वर्ष की उम्र में स्वदेशी के व्यवहार की प्रतिज्ञा भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में रेखांकित की जाने वाली महत्वपूर्ण घटना है।

डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि ‛कवि वचन सुधा’ में इस प्रतिज्ञा-पत्र के प्रकाशन के साथ ही ‛हरिश्चन्द की कलम से भारतीय जनता ने अँग्रेजी राज के नाश का वारंट लिख दिया था।’ भारतेंदु ने एक लेख ‛भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है ’ में परदेसी वस्तु और परदेसी भाषा का भरोसा न करने की बात की थी। निज भाषा को ज्ञान की भाषा बनाने के लिए ‛निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ कहा। भारतेंदु युग में अँग्रेजों की प्रशस्ति और उनसे सहयोग की आकांक्षा की प्रवृतियाँ राजा शिव प्रसाद ‛सितारेहिंद’ सरीखे कुछ लोगों में देखने के लिए अवश्य मिलती हैं, किंतु हिन्दी के व्यापक साहित्य का मिज़ाज़ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बिल्कुल विरुद्ध था।

भारतेंदु तटस्थ लेखक नहीं थे। वे अँग्रेजी साम्राज्यवाद के विरोधी थे। अँग्रेजी साम्राज्यवाद के आर्थिक शोषण की नीति को वे बख़ूबी समझ रहे थे। जिस समय दादा भाई नौरोजी भारतीय धन के विदेश जाने के आंकड़े दे रहे थे और अँग्रेजों के विरुद्ध अपना क्षोभ व्यक्त कर रहे थे, उसी समय भारतेंदु ‛ पै-धन विदेस चलि जात इहैं अति ख्वारी ’ लिख रहे थे। भारतेंदु ने अँग्रेजी राज की बार-बार आलोचना की है। वे जिस प्रकार से समाज-सुधार के साथ स्वदेशी आन्दोलन के महत्व को प्रकाशित कर रहे थे, उससे ऐसा लगता है कि वे भारत के राजनीतिक आन्दोलनों की बहुत सारी बातें बहुत पहले ही सोच चुके थे।

स्वतन्त्रता आन्दोलन के उस दौर के प्रमुख लेखक पत्रकार भी थे। भारतेंदु और उनके सहयोगियों ने रचनात्मक लेखन के साथ अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में (1900 ई.) में ‛सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन शुरू हुआ और लगभग दो दशकों तक द्विवेदी जी ने इसका सम्पादन किया। इस पत्रिका की चर्चा अत्यंत जरूरी इसलिए हो जाती है कि अँग्रेजी राज के विरुद्ध इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसमें जितने भी लेख प्रकाशित हुए हैं, उनमें किसी में भी ब्रिटिश राज के समर्थन की बात नहीं हुई है।

आदिवासियों के प्रति अँग्रेजी राज्य का रवैया हिंसक था। इसलिए अँग्रेजी राज्य के विरुद्ध आदिवासियों के सैंकड़ों विद्रोह हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‛सरस्वती’ में आदिवासियों से सम्बन्धित कई लेख प्रकाशित किये। यह पत्रिका साहित्यिक थी और इसने हरिऔध, मैथिली शरण गुप्त से लेकर निराला सहित अनेक लेखकों-कवियों तक के निर्माण में अपनी भूमिका निभाई है। साहित्य निर्माण के साथ राष्ट्रीय चेतना का विकास करना भी इसका प्रमुख ध्येय था। इसलिए ‛सरस्वती’ में ऐसी रचनाओं को जगह मिलती थी, जिनसे हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्धि के साथ स्वतन्त्रता आन्दोलन को मजबूती मिल सके।

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन को अपनी कविताओं के जरिये प्रभावित करने वाले कवियों में मैथिली शरण गुप्त का नाम अग्रणी है। इनकी ‛भारत-भारती’ की पंक्तियां स्वतन्त्रता सेनानियों के कंठों में बसी थीं। इसकी ये पंक्तियां कि ‛हम कौन थे क्या हो गये और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी’ को पढ़कर नौजवान राष्ट्रीय चिंता से मचल जाते थे। माखनलाल चतुर्वेदी की हिमतरंगिनी, हिमकिरीटनि, माता, युगचरण, समर्पण आदि की कविताओं से हिन्दी भाषी समाज को राष्ट्रीय भावधारा में अवगाहन करने का अवसर मिलता है।

उनकी ‛पुष्प की अभिलाषा’ कविता की ये पंक्तियां तो क्रांतिकारियों को आत्मोसत्सर्ग की प्रेरणा दे रही थीं ‛मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जायें वीर अनेक।’ बालकृष्ण शर्मा ‛नवीन’ की ‛विप्लव गान’ कविता की इस पंक्ति ‛कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये’ में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठती है। बालकृष्ण शर्मा ‛नवीन’ न सिर्फ कविता के जरिये क्रान्तिकामना करते हैं, बल्कि गांधी जी के आह्वान पर जेल की यातना भी सहते हैं।

राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान की ‛त्रिधारा’, ‛झांसी की रानी’, ‛वीरों का कैसा हो वसंत’ आदि कविताओं में राष्ट्रीय भावों की तीखी अभिव्यंजना हुई हैं। सुभद्रा जी ने ‛जालियाँवाला बाग में बसंत’ में लिखा है कि ‛आओ प्रिय ऋतुराज मगर धीरे से आना, यह है शोक स्थान यहाँ मत शोर मचाना।’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं से स्वतन्त्रता आन्दोलन की धार तेज हुई है। दिनकर की हुंकार, विपथगा, रेणुका में साम्राज्यवाद और अँग्रेजी राज के प्रति भीषण आक्रोश भरा हुआ है। इनमें पराधीनता के विरुद्ध प्रबल विरोध और पौरुष की भयंकर गर्जना है। ‛कुरुक्षेत्र’ महाकाव्य का स्वर तो पूरी तरह राष्ट्रीय है।

दिनकर इसमें कहते हैं कि ‛ उठो-उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो, बढ़ो-बढ़ो कि आग में गुलामियों को झोंक दो।’ दिनकर की कविता त्याग और समर्पण के साथ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विध्वंस और क्रांति के पक्ष में खड़ी है। दिनकर की कविताओं ने युवकों को राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की बलि-वेदी पर स्वत्व को उत्सर्ग करने के लिए प्रेरित किया है। छायावाद के कवियों में जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटकों चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि में राष्ट्रीयता के प्रति आग्रह को देखा जा सकता है। ‛अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा और हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ जैसे गीत रागात्मक स्वरूप के साथ राष्ट्रीयता को रच रहे थे। ये गीत और नाटक स्वतन्त्रता आन्दोलन को मजबूती दे रहे थे। प्रसाद ने ‛आकाश दीप’ और ‛गुंडा’ जैसी कहानियां भी लिखीं जिनके चरित्रों ने आन्दोलनकारियों को गहरे में प्रभावित किया।

निराला की कविताओं में अँग्रेजी उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का विरोध दर्ज हुआ है। निराला अंत तक साम्राज्यवाद के विरोध में खड़े मिलते हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय मुक्ति की बेचैनी साफ दिखायी पड़ती है। ‛जागो फिर एक बार’, ‛वर दे वीणावादिनी वर दे’, ‛भारती जय विजय करें’, ‛शिवा जी का पत्र’ आदि कविताओं में आज़ादी की ईमानदार बेचैनी भरी है। निराला ने ‛चतुरी चमार’ जैसी रचना के जरिये राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के आयाम को विस्तार दिया है।

प्रेमचंद ने 1936 ई. में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए साहित्य के बारे में कहा था कि साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। प्रेमचंद का कथा साहित्य उनके कथन को चरितार्थ करता है। प्रेमचंद राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं से और उनकी राजनीति से सहमत भी होते हैं और असहमत भी। असहमति और सहमति के बिंदुओं को अपनी कहानियों और उपन्यासों में रचनात्मक रूप देते हैं।

प्रेमचंद ने ‛सोजे वतन’ लिखा और अँग्रेजी शासन ने उसे प्रतिबंधित कर दिया। उन्होंने यदि अँग्रेजी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपने कथा साहित्य में विमर्श रचा तो भारतीय समाज में गहरे तक धंसे सामंतवादी व्यवस्था की जड़ तक आलोचना भी की है। प्रेमचंद शोषण पर आधारित जाति और संप्रदाय की सामाजिक व्यवस्था को पूर्ण स्वराज के लिए बाधक मानते हैं। इसलिए वे अपने कथा साहित्य में वर्णाश्रम व्यवस्था की विद्रूपताओं को उजागर करते हैं। वे सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी के रहते भारत की स्वतन्त्रता को महज राजनीतिक स्वतन्त्रता मानते थे।

उनके विचारों में असली आज़ादी तब तक नहीं हो सकती जब तक सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी का नाश न हो जाये। किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, उनकी चिंता के केंद्र में थे। इनके जीवन को अपनी कथा में लाकर आज़ादी के मायने समझाते हैं। उन्होंने गोदान, रंगभूमि, कर्मभूमि जैसे उपन्यासों में स्वतन्त्रता आन्दोलन के विविध सन्दर्भों को उद्घाटित किया है। भारतीय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के अंतर्द्वंद्व को उजागर करती हुई कफ़न, पूस की रात, ठाकुर का कुआं, सतरंज के खिलाड़ी, सद्गति जैसी कहानियां लिखीं, जिनका पाठ स्वतन्त्रता आन्दोलन के राजनीतिक सन्दर्भों से अलग नहीं है।

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में प्रायः गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चन्द्र बोस आदि के साथ-साथ यदा-कदा भगत सिंह की भूमिका की चर्चा होती है। हिन्दी भाषा व साहित्य और इसके साहित्यकारों को भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन सम्बन्ध चर्चाओं में लगभग हाशिये पर रखकर देखा जाता है। जबकि स्वतन्त्रता आन्दोलन को वैचारिक मजबूती देने में भारतीय भाषाओं में हिन्दी की अहम भूमिका रही है। इस आलेख में जिस प्रकार अनेक महत्वपूर्ण लेखकों और उनके साहित्य की चर्चा नहीं हो पायी है, उसी प्रकार स्वतन्त्रता आन्दोलन सम्बन्ध चर्चाओं में हिन्दी भाषा व साहित्य के योगदान को हाशिये पर रखकर देखने की प्रवृति रही है। हिन्दी भाषा के लेखकों ने और हिन्दी के साहित्य ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में महती भूमिका निभाई है।

हिन्दी के लेखकों ने अपनी लेखनी की वजह से अदालतों के चक्कर काटे हैं, आर्थिक दंड भरे हैं, जेल की यातनाएँ सही हैं और हिन्दी के साहित्य ने राष्ट्रीय विवेक को जागृत किया है, स्वतन्त्रता आन्दोलन को मजबूत किया है। निःसन्देह यह कहा जाना चाहिए कि भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में हिन्दी भाषा ने बहुभाषी भारतीय समाज में सेतु बनकर भारतीय उपमहाद्वीप से ब्रिटिश राज की विदाई की है

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गजेन्द्र कान्त शर्मा

लेखक पटना विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर एवं शोधोपाधि प्राप्त हैं एवं प्रगतिशील लेखक संघ से संबद्ध हैं। सम्पर्क +919431063567, gajendrasharma9211@gmail.com
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