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चित्रकूटः कुछ कहनी कुछ अनकहनी

 

चित्रकूट के सम्बन्ध में सोचते- विचारते हुए मुक्तिबोध की कविता का यह अंश अचानक स्मरण हो आया। ‘‘जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है/ जितना भी उड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है/ दिल में क्या झरना है?/ मीठे पानी का सोता है/ भीतर वह ऊपर तुम/ मुस्काता चांद ज्यों धरती पर ओ रात-भर/ मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है।’’ (सहर्ष स्वीकारा है- कविता)

चित्रकूट का नाम आते ही हमारे मन में कई प्रश्न एक साथ उठते हैं। इसका पहला उल्लेख कहाँ मिलता है? निश्चय ही वाल्मीकि रामायण में। वाल्मीकि ही नहीं भारद्वाज भी इसकी प्रशंसा करते हैं। ये ही क्यों अध्यात्म रामायण और वृहत रामायण में भी इनकी जानकारी है। फादर कामिल बुल्के ने चित्रकूट की महिमा के बारे में जानकारी दी है वह मैकेंजी के संकलन में भी उपलब्ध है। वह केवल पर्वत और पहाड़ भर नहीं है। वह केवल भौगौलिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है। वह मंदाकिनी नदी भर भी नहीं है,बल्कि सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं चारित्रिक प्रतिमान के रूप में भी उसकी एक खास पहचान है। हालांकि चित्रकूट की विविधता एक बड़े बाज़ार के रूप में इधर विकसित हुई है।

चित्रकूट का दो तिहाई भाग मध्य प्रदेश में और एक तिहाई भाग उत्तर प्रदेश में स्थित है। यह बांट बखरा तो राजनीतिक हलकों का और सुविधा की भूलभुलैइया के सर्वव्यापी रूप का है। यदि यह माना जाए कि यहाँ दो संस्कृतियां साझा होती हैं। एक वनवासी संस्कृति और दूसरी सामान्य तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। श्री राम सीता से इसके सौन्दर्य का वर्णन करते हुये कहतें हैं। “न राज्या भद्रश्चनम भद्रे न सुह्रद भीरविनभवा/ मनो में बाधते दृष्टवा रमणीयमिम गिरिम / ‘पश्यमेयमचंक भद्रेनाना द्विज गणायुतम्। शिखरैः स्वमिबोद्धिद्वैर्धातुमाद्रिविभूषितम्।/ केचिद्रजत संकशाः केचितक्षतजसन्निभाः/ पीतामंजिष्ठवर्णाश्च केचिनमनी वप्रभा “(वाल्मीकीय रामायण, अयोध्या काण्ड /श्लोक 3,4 एवं 5)

अर्थात हे! भद्रे! इस रम्य पर्वत को देखकर राज्य न मिलने तथा मित्रों का वियोग हो जाने पर भी मेरा मन दुखी नहीं होता। हे भद्रे सीते!यह पर्वत शिखर बहुसंख्यक पक्षियों से भरा है। अनेक वन्य जीव यहाँ निवास करते हैं। इस पर्वत के शिखर इतने ऊंचे हैं कि मानों ये आकाश को छेद डालेंगे। इन शिखरों के गर्भ में विविध प्रकार की धातुएं भरी पड़ी हैं। इनमें कुछ शिखर चांदी के समान श्वेत, कोई रुधिर की तरह लाल, कई शिखर पीले, कुछ मंजीठ वर्ण के और कुछ इंद्रनील मणि जैसे काले हैं।

तुलसीदास जी ने गीतावली में इसे बहुत विस्तार के साथ स्पष्ट किया है – “सब दिन चित्रकूट नीको लागत/ वर्षा ऋतु प्रवेश विशेष, गिर देखत मन अनुरागत/ चहुँदिस वन सम्पन्न विहंग मृग बोलत सोभा पावत/ जल जंतु विमल सिलनि झलकत नभ वन प्रतिबिम्ब तरंग / मानहु जग रचना विचित्र विलसति विराट अंग-अंग / मंदाकिनिहि मिलत झरना झरि-झरि भरि-भरि जल आझे / तुलसी सकल सुकृत सुख लागे मानौं राम भगति के पाछे/”

चित्रकूट की शोभा और वैभव अनहोना है। कोई इस भूमि को बलिहारी मानता है। कोई इसे ऋषि तुल्य मानता है। कोई इसके भाग्य से ईर्ष्या करता है। प्रारम्भ में इसे इस रूप में ही पहचाना गया।

“अनेक कूटं बहुवर्ण कूटं माणिक्य कूटं मणिरत्न कूटं/
सुवर्ण कूटं रजताभ कूटं श्री चित्रकूटं शरणं प्रपद्ये।

तुलसी ने रामकथा और चित्रकूट को इसीलिये महत्व दिया था कि वहाँ राम रहे। वहाँ अनेक घटना प्रसंग हुए। वहाँ राम के दुखी जीवन की कथा भी है और सुखी होने के प्रयत्न का मनोविज्ञान भी। चित्रकूट सभा के माध्यम से उनके दायित्वों और रामत्व की झांकी भी। चित्रकूट का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विस्तार भी इससे समझा जा सकता है। इसके बारे में तुलसी के द्वारा उल्लिखित है कि –

“रामकथा मंदाकिनी, चित्रकूट चित चारु/
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुवीर विहारु।”

मैं कई बार चित्रकूट गया हूँ। चित्रकूट क्षेत्र के विभिन्न परिक्षेत्रों के पर्यटन का भरपूर अवसर भी मुझे मिला है। ऐसा लगता है कि कुछ तो है चित्रकूट में जो हमें बार-बार लुभाता है। चित्रकूट हमें बार-बार क्यों आकर्षित करता है। इसकी रम्यता मनोहर और चित्त को पावन करती है और हमारे मन में आह्लाद भरती है। इसे दूसरे रूप में भी अनुभव करता हूं कि पर्वत श्रृंखला, पहाड़, नदियां, झरने चाहे जिस इलाके के देखिए। वे हमें बांध लेने की अभूतपूर्व क्षमता रखते हैं। मुझे हिमाचल प्रदेश की प्रकृति, कुडई केनाल, पचमढ़ी, चंबा, धर्मशाला, डलहौजी, गुलमर्ग, ऊंटी, शिमला, पहलगांव, लैंसडाउन, कुल्लू मनाली, माउंट आबू, पेरियार, नैनीताल, भुवाली, दार्जिलिंग, मसूरी, रानीखेत आदि वन श्रृंखलाओं को देखने का अवसर मिले हैं। ये इलाके कोई सामान्य इलाक़े नहीं हैं। इनकी सादगी, प्रकृति और सुषमा हमें निहाल कर देने में सक्षम हैं।

चित्रकूट कई प्रश्नों को छोड़ता है। रम्य पहाड़, पर्वत, कंदरायें, नदियों, झरनों, उपत्यकाओं और घुमावदार घाटियाँ चमकते हुये शिलाखण्ड वहाँ हैं। उसकी पहचान पेड़ों, लताओं, गुल्मों, झाड़ि़यों, झुरमुटों एवं उनमें किल्लोल करते पक्षियों, यहाँ दौड़ते मृग एवं उनके शावकों और सनसनाती हुई हवाओं के गीत चित्रकूट में है। यहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष जैसे – आम, जामुन प्रियाल ,कटहल ,बेल ,अकोल आदि प्रचुर मात्रा में है।

वर्तमान में इसकी पहचान महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय के रूप में श्री रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय के रूप में भी है। प्राकृतिक एवं गुणकारी औषधीय वृक्षों के रूप में है। अब तो चित्रकूट में भी अन्य शहरों की तरह सीमेण्ट और कांक्रीट के जंगल उग रहे हैं। इसका भी नगरीकरण हो रहा है। बाहरी लोग यहाँ अधिक आर्थिक निर्भरता तलाश रहे हैं। इसकी बसाहट के पीछे रामत्व और सांस्कृतिक आभाएं कम अर्थ की प्राप्ति का घनत्व ज़्यादा है फिर भी यहाँ कुछ तो है। चित्रकूट के भौगोलिक परिवेश में कामदगिरि (राम सीता का निवास) यहाँ का छोटा सा तालाब। सामने एक ऊँची गोल-गोल पहाड़ी जिसे लक्ष्मण पहाड़ी के रूप में जाना जाता है। लक्ष्मण यहीं पहरा देते थे। यह भी कि उनके भाई राम और भावज सीता को कोई कष्ट न हो। वे यहाँ सुखपूर्वक रहें। यह भाई-भाई के बीच का स्नेह बंधन है। तुलसी ने लिखा –

सेवहिं लखन सीय रघुवीरहिं। जिमि अविवेकी पुरुष सरीरिहि।
नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी।

सुरसरि धारि नाउ मन्दाकिनी/ जो सब पातक पोतक डाकिनी।। (रामचरित मानस) अर्थात मनुष्य के जीवन निर्वाह के लिए जिन वस्तुओं की ज़रूरत होती है। वे यहाँ भरपूर उपलब्ध हैं। सभी पापों का क्षार करने वाली मन्दाकिनी का जल यहाँ उपलब्ध है। सांस्कृतिक सम्पन्नता में रामत्व का मिश्रण है।

चित्रकूट की भौगोलिकता में हनुमान धारा है। मंदाकिनी जिसे सती अनसुइया की मानस पुत्री के रूप में पहचाना जाता है। गोदावरी है जो गुप्त है। पर पता नहीं कहाँ से निकलती है और कहा समाप्त होती है। इसकी महिमा का गायन अनुगायन हुआ है। उसकी प्राकृतिक सुषमा में अभी भी बड़ी ताक़त है। कंदरा, गुफ़ा और चट्टानों को तोड़कर पहाड़ का भाल फोड़कर गोदावरी किसकी परिक्रमा करती है और फिर कहाँ भ्रमण करती है। कहाँ गायब हो जाती है। कहाँ पानी का श्रोत है। यह बड़े बड़े शिला खंडों को बेरहमी से तोड़ कर फिर कहाँ से प्रकट हो जाती है। पानी आता तो है और फिर कहाँ चला जाता है। इसे कोई नहीं जानता? काल विधाता ही इस रहस्य को जानें। यह अभी भी एक अबूझ पहेली है। बहरहाल अब इसके रूप में नित नए परिवर्तन घटित हो रहे हैं या लक्षित हो रहे हैं। आगे के समय में अभी और क्या,- क्या घटेगा, कोई नहीं जानता पहचानता है। यह गुप्त गोदावरी अभी कितनी प्रकट होगी और कितना गुप्त। यह किन किन रूपों में ढलेगी। यह काल की निरंतरता में निहित है।

चित्रकूट के बारे में अब्दुर्रहीम खानखाना के संदर्भ में एक प्रसिद्धि उक्ति है।”चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेश/जा पर विपदा परत है, सो आवत इहि देश।”किसी के भी अंतस्तल में लगता होगा कि क्या सचमुच जिन पर विपत्ति घिरती है, वही लोग यहाँ आते हैं और आगे भी आते रहेंगे। राम के रूप में, उनके निवास के रूप में यह उक्ति भले ही सही लगे, लेकिन अभी भी तो लोग वहाँ रहते हैं। पुण्य प्राप्त करने या पुण्य कमाने की चाह है या और कुछ है। यह एक जलता सवाल है। जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। तुलसीदास का चित्रकूट अलग है। वे यहाँ के पशु-पक्षियों के बारे में भिन्न तरह से रेखांकन करते हैं। जैसे -“चित्रकूट के विहंग मृग, वेलि विटप तृन जाति/पुण्यपुंज सब धन्य अस, कहहिं देव दिन राति/एहि प्रकार सबके मन भाए/चित्रकूट रघुनंदन छाए।”

तुलसी दास ने चित्रकूट के वैभव को चित्रकूट की पीड़ा को, उसके साज श्रृंगार को अनेक तरह से सराहा है। राम के अयोध्या से वन गमन का प्रसंग है। सीता राम के साथ ही वन गमन करना चाहती हैं। राम ने पहाड़, नदियां और पर्वत श्रृंखलाओ का वहाँ के पानी का, वहाँ की असलियत और भयावहता का उसकी कठिनता का बेहद भयावह रूप चित्रित किया है। वैसे सीता जैसी कोमल अनुभूतियों वाली स्त्री से जो कहा। वह एकदम सच है। “काननु कठिन भयंकर भारी/ घोर घाम हिम बारि बयारी/ कंदर खोह नदी नद नारे/ अगम अगाध न जाहिं निहारे/”

चित्रकूट की एक यात्रा में जैसा मुझे बताया गया था कि यहाँ रहीम की समाधि है या मजार है। बड़ी मुश्किल से उसे मैं खोज पाया था। झाड़ झंखाड़ से एकदम भरी हुई। चित्रकूट में रामायण मेला का अपना अलग महत्व है। डॉ राम मनोहर लोहिया ने इसकी परिकल्पना की थी। अभी तो इस पर लगातार कार्रवाई चल रही है। यहाँ की संस्कृति और भौगोलिकता का प्रतिबिंबन करने वाली मंदाकिनी जिसे दूसरी गंगा भी माना जाता है। इसका दूसरा नाम पयस्वनी भी है। इसे प्रदूषण मुक्त करने की अनंत योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रदूषण मुक्त होना भी एक मनोहारी प्रलोभन और सपना है तटबंधों को साफ़ सुथरा रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके विभिन्न क्षेत्रों की टूट -फूट के घाटों की और साफ़ सुथरा रास्ता तैयार करने की कोशिश की जा रही है। रास्तों की मरम्मत और पुनर्निर्माण हेतु कार्यवाहियां जारी हैं।

चित्रकूट क्षेत्र में अनेक स्थान हैं। मसलन-कामदगिरि, लक्ष्मण पहाड़ी, जानकी कुण्ड, प्रमोदवन, गुप्त गोदावरी, हनुमान धारा, रामघाट, अत्रि अनुसुइया आश्रम, भरत कूप, रामशिला, रामशैय्या, के अतिरिक्त बालाजी का मंदिर भी शामिल है। माना जाता है कि बाला जी के निर्माण हेतु औरंगजेब ने पहल की थी। राम के पूर्व, राम के समय और राम के पश्चात चित्रकूट ने अनेक रंग देखे। अभी आगे आने वाला समय उसे न जाने कितने रंग रूप दिखायेगा। चित्रकूट हमें कई संदर्भों में याद आता है।

चित्रकूट अब तो नई साज सज्जा दुनिया के विकास के साथ खड़ा है। लेकिन क्या इसी के बलबूते पर उसके सांस्कृतिक महत्त्व को स्वीकार किया जाए। वह क्या है जो हमें बेचैन भी कर रहा है। वह है इसका प्रकृत स्वरूप। अदम गोंडवी सही लिखते हैं।”कांकरीट के इस जंगल में फूल खिले पर गंध नहीं/ स्मृतियों की घाटी में यूं कहने को मधुमास नहीं।/” इसकी सहजता स्वाभाविकता को कैसे सुरक्षित और प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जाए? सोचता हूं और इन प्रश्नों में लगभग खो जाता हूँ

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सेवाराम त्रिपाठी

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। सम्पर्क +919425185272, sevaramtripathi@gmail.com
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