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आंखें अभ्यस्त हो तो कला है!

 

21 वीं शताब्दी के इन शुरुआती वर्षों में अगर समकालीन भारतीय कला की बात करें तो सबसे पहले खुद पर शक का एक सवाल खड़ा होता है- “क्या हमने देखना और देखने पर संदेह करना कम कर दिया है?” इन दिनों हमारे आस-पास देखने की चीजों, घटनाओं और दृश्यों का अंबार इतना सघन और आक्रामक है कई बार हम वे सारी चीजें नहीं देख पाते, जिसे देखना चाहते हैं। हम अक्सर वही देख पा रहे हैं जिसे देखने के लिए न तो आंख को अभ्यस्त करना होता है, न ही मन को व्यवस्थित करना होता है। सीरियल्स देखना, टीवी पर बहस देखना फिल्में देखना, बसों में भीड़ देखना, ट्रैफिक जाम का देखना, रेस्तरां में किसी का इंतजार करते हुए बाकी लोगों को खाते देखना या फिर मॉल में घूमते हुए नई-नई चीजों के अंबार देखना। निश्चित रूप से यह देखना और किसी कला या कलाकृति को देखना…दोनों अलग अलग चीजें हैं। एक देखना, खुली आंखों की एक फिल्म भर है, दूसरा देखना, अपनी स्मृति के साथ आंखों के देखने की सरहद को अपने भीतर उतारना है। दूसरे देखने पर, अब सवाल उठ रहे हैं।

निश्चित रूप से कला को देखने के लिए अभ्यस्त आंखे चाहिए। संस्कार चाहिए। और एक किस्म का संदेह भी चाहिए। संदेह से सवाल उठते हैं और ऐसे सवाल कला को एक जिम्मेदारी का अहसास भी कराते हैं। हालांकि एक सामान्य आदमी की जिंदगी में ऐसे प्रश्नों शायद ही अस्तितव हो, क्योंकि कला को देखने के लिए अपनी स्मृति के साथ आंखों के देखने की सरहद को अपने भीतर उतारने की जो बात होती है, वह सब उन्हें झूठे, कुछ कृत्रिम, कुछ निरर्थक जान पड़ने लगते हैं। उनके पास इतनी फुरसत और धैर्य नहीं कि वे टीवी सीरियल्स से समय निकालकर कला को देखने की कोई भावनात्मक जरूरत महसूस कर सकें। फिर भी समाज में कला की अपनी अहमियत है। सामान्यीकृत करके कला को न देखा जा सकता है। तो फिर कला को देखने की कला कहां है? हमने देखना और देखने पर संदेह करना कम क्यों कर दिया है? यहीं से कला की दुनिया में आलोचना की जरूरत शुरु होती है। कला को देखने का सीधा संबंध आलोचना से है। एक अच्छी आलोचना से कलाकार के साथ-साथ प्रेक्षक को भी फायदे हैं।

इस बात में कोई शक नहीं कि कला या कलाकृति की अच्छी आलोचना पढ़ने के बाद उस कलाकृति या कला से साक्षात्कार हमें ज्यादा उद्वेलित करती है। लेकिन अच्छी आलोचना का सच भी तो उलझा हुआ सा है। कम से कम हिंदी कला आलोचना के लिए यह बात तो कही ही जा सकती है। किसी खास कला आलोचना में अक्सर हमें इस तरह के वाक्य पढ़ने को मिलते हैं- …अमुक शीर्षक कलाकृति का चटख रंग ध्यान तो खींचता है लेकिन प्रेक्षक से संवाद बनाने में चूक गई सी लगती है… कलाकार अपने मुहावरे को पाने की कोशिश में भटक गए से लगते हैं…यह पेंटिग संवेदना के स्तर पर प्रेक्षक को उस जगह तक लेकर जाती हैं, जहां कला के होने या न होने के बीच एक महीन किंतु जरूरी पर्दा भर रह गया है। एक कलाकृति का प्रेक्षक से कैसे संवाद होता है, कलाकार का मुहावरा क्या है और यह कला के होने या न होने की स्थिति क्या है, ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका रिश्ता कलाकार, कला बाजार और कला प्रेमियों तीनों से है।

नीत्शे के एक कथन को याद करें तो “हम कला के पास इसलिए जाते हैं कि सत्य हमें नष्ट न कर दे।” दूसरी ओर कलाकृति का सत्य अगर कुछ हो सकता है तो वह देखने वाले को उसकी स्मृति में लौटना भर हो सकता है। कलाकार का भी अपना एक सत्य है जिसे लेकर जर्मनी के महान कवि गोएटे का कथन आज भी प्रासांगिक है-“कलाकार का धर्म अपनी कला में संपूर्णत्व प्रदान करना है। यही एक कलाकृति का लक्ष्य है। नीति शास्त्र के ज्ञाता इस बात पर चिंता करते हैं कि कला दूसरों पर क्या प्रभाव छोड़ती है, जिसके बारे में कलाकार उतना ही उदासीन रहता है, जैसे प्रकृति इस बारें में कि वह शेर की रचना करता है या किसी गाने वाले पक्षी की।”

इन तीन सत्य से अलग अगर कलाकारों की दुनिया और कला के बाजार पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता। पेंटिंग प्रदर्शनियों की संख्या बढ़ रही है। दाम मिल रहे हैं। कलाकार लगातार प्रयोग कर रहे हैं। नए-नए माध्यम सामने आ रहे हैं। कला पर इस तरह के आरोप लगाने वालों से कलाकारों को शिकायत यह है कि आमतौर पर आलोचक कविता के औजारों से कला की समीक्षा करते हैं, बात सिर्फ संवेदना की होती है, माध्यम की नहीं। जबकि कला में माध्यम भी महत्वपूर्ण है। कम से कम हिंदी कला आलोचना को लेकर इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता।

कला में आलोचना की जरूरत पर आगे बढ़ने से पहले थोड़ी देर के लिए वर्ष 2016 का इंडिया आर्ट फेयर चलते हैं।दिल्ली में आयोजित इस आठवें आर्ट फेयर में पहली बार पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के कलाकार शामिल हुए। पाकिस्तान हुमैरा आबिद के एक काम ने सबको प्रभावित किया। अपने इंस्टालेशन वर्क में उन्होंने एक साथ कई लंच बॉक्स रखे थे। हुमैरा घर से जुडी चीजों पर ही ज्यादा काम करती आई हैं और यहां प्रदर्शित कला भी लोगों को एक घर की याद दिलाती रही, करीब-करीब अपने घर की तरह। एक और कलाकार का जिक्र करना चाहूंगा। सुबोध गुप्ता ने अपने इंस्टालेशन में दिखाया कि आम आदमी के लिए साइकल कितनी जरूरी है। इसके लिए उन्होंने साइकिल पर लटकते हुए केले दिखाए थे। इन दोनों कलाकृतियों में एक साम्य यह था कि माध्यम महत्वपूर्ण थे।

लेकिन अगर हम सिर्फ संवेदना और कथ्य की चर्चा करें तो कला पर बात अधूरी मानी जाएगी। आलोचना किसी कलाकृति को , उसमें व्यक्त संवेदना को और व्यक्त करने के तरीके को यानी कि माध्यम को देखने की एक कोशिश है और फिर उसे लोगों तक पहुंचाना है। आलोचना देखती है और अपने देखे पर लगातार एक किस्म का संशय भी करती चलती है। यह संशय कोई भ्रम नहीं होता, समझने की क्रिया का एक सजग विस्तार होता है। लेकिन आधुनिक भारतीय चित्रकला की एक बड़ी समस्या यह है कि यह आलोचना रहित है। अपने समय में सैकड़ों-हजारों लोगों द्वारा देखी गई किसी कला के बाद उपजे संशय या बहस के साथ नहीं है। कला को लेकर एक किस्म की दार्शनिक व्याख्याया, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, समाजशास्त्रीय तर्क और विधि, जो हमारे देखने को संस्कारित करते हैं, हमारे पास उपलब्ध ही नहीं है।

क्योंकि अभी तक हमारे यहां कला आलोचना की कोई सार्थक परंपरा नहीं बन पाई है। हिन्दी में कला आलोचना की स्थिति तो और भी दयनीय है। बीसवीं शत्ताब्दी में 80 के दशक के पत्र-पत्रिकाओं में कला खासकर चित्रकला के लिए जगह तय थी। यह वह समय था, जब भारत के चित्रकला का अपना बाजार आकार ले रहा था। ऐसे में कला आलोचना एक स्वस्थ माहौल बनाने का काम तो करती ही थी, कलाकार को आत्ममंथन पर भी विवश करती थी। हालांकि उस समय पत्र-पत्रिकाओं की संख्या आज की तुलना में कम थी, फिर भी आलोचना की विश्वसनीयता असंदिग्ध थी, इसे कलाकार भी समझते थे, खरीददार और कला रसिक भी।

उदारीकरण और उपभोक्तावाद के तीव्र विस्फोट के बीच मीडिया में एक क्रांति सी आ गई। कई नए दैनिकों, साप्ताहिकों और मासिकों का उदय हुआ। पर इन सब में कला या कला आलोचना को हाशिए की चीज समझा जाने लगा। हालांकि इन पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य के लिए पर्याप्त जगह थी और इसका एक प्रमुख कारण यह था कि अधिकांश संपादक या प्रमुख पत्रकार साहित्य से चलकर पत्रकारिता तक पहुंचे थे। लेकिन कला आलोचना धीरे-धीरे और विपन्न होती चलली गई।

आलोचना के नाम पर सतही चीजें तो छपती ही रहीं, कला में स्केंडल की तलाश भी होने लगी और इसे अखबार की जरूरत बताकर निरुत्तर करने की सयास कोशिशें भी सामने आईं। धीरे-धीरे कलाकार, कला रसिक और खरीददार तीनों हीं कला आलोचना के प्रति उदास हो गए। हालांकि अंग्रेजी मीडिया में यह स्थिति न तब थी और न आज है। अभी भी वहां चित्रकला और चित्रकारों से जुड़ी खबरें प्रमुखता पा जाती हैं. अंग्रेजी के प्रायः सभी देनिकों साप्ताहिकों और मासिकों में नियमित रूप से कला पर लिखने वाले लोग सक्रिय हैं। यह बात दिगर है कि उनमें भी कला कीजाए कलाकारों को फोकस करने वाले लोग अधिक हैं। पर अंग्रेजी कला आलोचना कलाकारों और खरीददारों के बीच के रिश्ते को या भारतीय चित्रकारों के विदेश से संबंध को जरूर पुष्ट कर सकती है, लेकिन भारतीय कला और दर्शक के बीच का जो रिश्ता अपनी रागात्मकता खो चुका है, उसमें मिठास नहीं ला सकता।

अभी भी अंग्रेजी मीडिया का प्रचार-प्रसार एक खास वर्ग तक सीमित है। दूसरी ओर आज की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि कभी-कभार छपने वाली आलोचना एक विशेष किस्म के फ्रेंम में कैद है और उसमें अगर कलाकारों के नाम बदल दिए जाएं और किसी दूसरे कलाकार को फिट कर दिया जाए तो कहीं से अनगढ़ा नहीं लगेगा। इसमें एक-दो नाम अपवाद भी हो सकते हैं पर कमोवेश स्थिति यही है। ये कथित आलोचनाएं किसी ठोस नतीजे पर न तो कलाकारों को पहुंचाती हैं और न कला प्रेमियों को। कविता के औजारों से चित्रकला आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं है। कविता शब्दों के जरिए पाठकों को संबोधित करती है, जबकि रंग और रेखाएं शिल्प के जरिए प्रेक्षक तक पहुंचती है।

यहां यह भी कतई जरूरी नहीं है कि कला में रंगों और रेखाओं का वह संबोधन एकदम सुस्पष्ट हो। अमूर्त कला का मामला और भी निराला है। अमूर्त कला हमारे अवचेतन के उस रूप को संबोधित करती है, जिसका कोई मूर्त रूप हमारे भीतर मौजूद नहीं रहता। हर किसी की जिन्दगी में निरंतर कुछ न कुछ ऐसा घटता रहता है जिसे आकारों या भाषा में नहीं ढाला जा सकता। ऐसे में कविता के प्रतिमानों के सहारे कला की आलोचना कभी-कभी बड़े भ्रम पैदा करती है। इस भ्रम में देखना और भी उलझन पैदा कर सकती है। आम तौर पर जरूरी नहीं, कि जो व्यक्ति किसी कला को देख रहा है, वह दृष्टिसंपन्न भी हो। वह देखकर भी अनदेखा कर सकता है या वही देख सकता है, जो सामने हो, दृश्य हो, जो कुछ उसकी आंखों के घेरे में आता हो। ऐसे में कला का मर्म भटक सा नहीं जाएगा। एक सजह आलोचना की व्याख्या समाज की दृष्टि को कैसे बदल सकती है, इसे जानने के लिए महान चित्रकार पिकासो की अपनी कला में प्रयोग की चर्चा भी जरूरी है।

पिकासो ने अफ्रीकन कला रूपों का अपने लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने एक नयी चित्र-भाषा गढ़ी। अफ्रीकन कला को अपनी कला के साथ जोड़कर पिकासो ने कलाप्रेमियों के बीच जो व्याख्या की, उससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई। इसके बाद ही रोथको जैसे चित्रकार सामने आए। तो इस नए प्रयोग से पश्चिम में देखने का ढंग बदला। कला के साथ दुनिया भर के लोगों के संबंध भी बदले। चित्रकला में जनसामान्य की कला का प्रवेश एक अभूतपूर्व घटना थी। अब तक चित्रकला कुछ खास लोगों के लिए थी। पिकासो ने अफ्रीकन कला रूपों को अपने चित्रों में ला कर एक साथ एक ही ‘ऑब्जेक्ट’ को कई तरह से देखने का प्रस्ताव रखा। यह महत्वपूर्ण कदम था। ब्रिटेन के प्रतिष्ठित चित्रकार डेविड हॉकनी कहते हैं-“ पिकासो ने पहली बार दोनों आंखों से देखना चित्रित किया था।”

आधुनिक कला की शुरुआत करने वाले विन्सेन्ट वैन गॉग, पॉल सिजैन, पॉल गॉगुइन, जॉर्जेस श्योरा और हेनरी डी टूलूज लॉट्रेक जैसे ऐतिहासिक चित्रकार भी खुद अपनी कला की व्याख्या करके आलोचना को एक नई दिशा देते थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में हेनरी मैटिस, -घनवादी जॉर्जेस ब्रैक्यू, आंद्रे डेरैन, रॉल डफी और मौरिस डी व्लामिंक भी देखने की कला को समृद्द करने के लिए आलोचना पर जोर देते रहे। 

युवा चित्रकार मनीष पुष्कले

अब यह ‘देखना’ और देखने के लिए आंखों को समृद्ध करने की प्रक्रिया थम सी गई लगती है। भारतीय युवा चित्रकार मनीष पुष्कले कहते हैं-“ मुझे लगता है हम लोग देखना भूल गए हैं। हम एक अमूर्त पेंटिंग के सामने खड़े होते हैं और तत्काल सवाल करते हैं कि इसका मतलब क्या है? जिस तरह हम सुगंध और दुर्गंध का भेद किसी के बिना बताए कर लेते हैं, शोर और संगीत में फर्क कर लेते हैं, कोई गलत नीयत से छूए तो हमें तत्काल पता चल जाता है, उसी तरह हम देख कर कला और अ-कला का भेद क्यों नहीं कर पाते? शायद हमारे देखने का ढंग दूषित हो चुका है, वह भी एक ऐसे समय में जब दिखाने के लिए एक पूरा विशाल बाजार सामने खड़ा है। मनुष्य जब जागता है तब देखता है। जब सो रहा होता है तब भी स्वप्न देखता है। यानि वह लगभग हर समय कुछ-न-कुछ देख रहा है। देखने से इतना अधिक घिरा मनुष्य फिर देखना कैसे भूल गया, यह एक पहेली है। जब वह चित्र के सामने आता है, तो देखते हुए पूछता है कि यह बना क्या है?”

आम तौर पर हम मानते हैं कि एक अच्छी पेंटिंग, एक अच्छा मूर्तिशिल्प या एक अच्छी कला अपने समाज और समय की गवाही हमें देते हैं। लेकिन जब तक हम उसे देखते नहीं तब तक उस गवाही को साझा करने का नैतिक अधिकार हमें प्राप्त नहीं होता। हम जितना कम देखते हैं, उसी अनुपात में वह गवाही हमारे लिए कमजोर और अविश्वसनीय बन जाती है। गवाही से साक्षात उसी का होता है, जिसके पास देखने की शक्ति होती है। देखने की कला होती है। जब तक यह शक्ति और कला हमारे पास आ नहीं जाती, तब तक तब तक हम भारतीय समाज में कला के स्थान को निर्धारित नहीं कर सकते, न ही हम कला और समाज के बीच सान्निध्य अथवा दूरी को माप सकते हैं। इसके लिए पहले कलाकारों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। कला आलोचना के औजार बदलने होंगे मलयालम कवि कुमारन आशान याद आ रहे हैं- “अपने नियम बदलो/ नहीं तो तुम्हारे नियम तुम्हें बदल डालेंगे।”

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लेखक वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार एवं कलाकार हैं। सम्पर्क choudharydeoprakash@gmail.com

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जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
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