चतुर्दिक

अकादमिक आजादी की रक्षा का सवाल

 

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ अकादमिक स्वतन्त्रता सदैव जुड़ी हुई है। पिछले सात वर्ष में अभिव्यक्ति की आजादी जिस तीव्रता से घटी है, वह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एक साथ लोकतन्त्र और संविधान पर भी विचार करने को हमें बाध्य करता है। अरुंधति राय ने अपनी सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘आजादी: फ्रीडम, फासिज्म, फिक्शन’ (2020) में 2018 से 2020 के बीच लिखे गए लेखों के समय को ‘भारत में दो सौ सालों की तरह महसूस’ किया है।

कइयों ने जिनमें वे भी हैं ‘‘यह उम्मीद की थी कि 2018 नरेन्द्र मोदी और उनकी हिन्दू राष्ट्रवादीपार्टी की हुकूमत का आखिरी साल’’ होगा जो न हुआ। उन्होंने पुस्तक की भूमिका में भाजपा के दूसरे कार्यकाल के पहले ही साल में भारत के बदल जाने की बात लिखी है।’’ भारत इस तरह बदल गया है कि इसे पहचानना मुश्किल है। धर्मनिरपेक्ष, समावेशी गणतंत्र आज खतरे में है” और ‘‘फासीवाद का पूरा ढाँचा हमारी निगाहों के सामने है।’’ अपनी पुस्तक ‘आजादी’ के आरंभ में उन्होंने उरुग्वे के प्रसिद्ध उपन्यासकार, लेखक एवं पत्रकार एदुआर्दो गालेआनो (3.9.1940-13.4.2015) की पुस्तक ‘चिल्ड्रेन ऑफद डेज’ की यह पंक्ति उद्धृत की है – ‘‘दुआ करें/कि आने वाला कल/आज का ही दूसरा नाम न हो।’’

कल का समय आज से तभी बेहतर हो सकता है, जब हमें बोलने-लिखने का साहस हो, सत्य के साथ सदैव खड़े एवं डटे रहने की हिम्मत हो। भारतीय विश्वविद्यालयों की वर्तमान स्थिति सर्वज्ञात है। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों एवं राज्य विश्वविद्यालयों में बहत कम ऐसे बचे हैं, जिनका अकादमिक कार्य और शोधगुणवत्ता से भरे हों। विश्वस्तरीय एक भी विश्वविद्यालय देश में नहीं है। जेएनयू, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ विश्वविद्यालय आदि अन्य प्रमुख शिक्षण-संस्थाओं पर पिछले दिनों जिस तरह के हमले हुए हैं, वैसे पहले कभी नहीं हुए थे। 2014 में नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हुए और यह एक संयोग है कि उसी वर्ष हरियाणा के सोनीपत में एक निजी विश्वविद्यालय – अशोका विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

भारत के वर्तमान उच्च शिक्षा संस्थानों से अलग भारत में एक विश्वस्तरीय उदार कला कॉलेज (लिबरल आर्टस कॉलेज) के निर्माण हेतु आइआइटी दिल्ली के छात्रों ने आपस में बातचीत की। इस विचार को एक स्वरूप और आकार प्रदान करने के लिए उन्होंने इण्डियन स्कूल ऑफ बिजनेस के पूर्व डीन, उद्यमी, संस्थान-निर्माता, प्रशासक, फिलैन्थ्रोपिस्ट प्रमथराज सिन्हा से भेंट की, जो हड़प्पा एजुकेशन के संस्थापकों में एक, आनन्द बाजार पत्रिका के पूर्व सीइओ और आइआइटी के पूर्व छात्र हैं। आशीष धवन एवं संजीव बाख चंदानी ने उनसे ‘एप्रोच’ कर भारत में विश्व स्तर का एक शिक्षण-संस्थान खोलने का प्रस्ताव रखा। अशोका यूनिवर्सिटी एक उदार कला एवं विज्ञान विश्वविद्यालय है। इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकर एवं हरियाणा सरकार द्वारा मान्यता मिली हुई है।

आरंभ में इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के एक उच्च संस्थान की स्थापना की बात थी। एमआयीटी, पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय एवं स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की तरह, पर बाद में इसे मुख्य विज्ञान, सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी का विश्वविद्यालय बनाने का निश्चय हुआ। उद्देश्य बड़ा था। उच्च शिक्षा-सम्बन्धी यह अवधारणा बिल्कुल नयी और महत्त्वपूर्ण थी। छात्रों एवं अभिभावकों के मानस को बदलने की इच्छा थी। कम समय में ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इसकी पहल से भारतीय विश्वविद्यालयों के सभी छात्र, अध्यापक, प्रशासक, कुलपति परिचित नहीं है।

अशोका यूनिवर्सिटी ने लीक से हटकर एक नयी लीक का निर्माण किया है। इसके संस्थापकों में अशोक त्रिवेदी, दिलीप शांघवी, निर्मल जैन, संजीव बाखचंदानी, जे री राव सहित कुल 22 लोग थे। अशोक त्रिवेदी ने मिशिगन विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी में अशोक त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (टीसीपीडी) की स्थापना की। पिछले वर्ष इस विश्वविद्यालय ने बायो साइंसेज के त्रिवेदी स्कूल की स्थापना की घोषणा की।

अशोका विश्वविद्यालय हरियाणा के सोनीपत के राजीव गाँधी शिक्षा शहर में है। कैम्पस 25 एकड़ का है, जिसका डिजाइन अमेरिकी डिजाइन फर्म ‘पर्किन्स ईस्टमैन’ ने प्रमुख वास्तुकार आरोनश्वार्ज के नेतृत्व में किया है। यह विश्वविद्यालय निजी विश्वविद्यालय है, दान द्वारा वित्त पोषित। संस्थापक समूह में निर्णय लेने के लिए कोइ पदानुक्रम नहीं है। प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्त है। इसकी अकादमिक परिषद् में कुलाधिपति (चांसलर), कुलपति, डीन, शिक्षाविद और दुनिया भर के अनेक विद्वान हैं। अकादमिक मानक का निर्धारण अकादमिक परिषद करती है। इस विश्वमेघालय को ‘भारत को आइ वी लीग’ बनने की आकांक्षा के रूप में देखा गया है।

विश्वविद्यालय के उल्लेखनीय संकायों में गोपालकृष्ण गाँधी, राजेन्द्र भाटिया, उपिंदर सिंह, सुनील खिलनानी, नयनजोत लाहिड़ी, अश्विनी देश पांडे, महेश रंगराजन, नयन चंदा जैसे लोग हैं। प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी इस विश्वविद्यालय के 2014 से 2017 तक प्रथम कुलपति थे।  अब वे चांसलर है। प्रताप भानु मेहता दूसरे कुलपति थे- 2017 से 2019 तक। वर्तमान में 1 अगस्त 2019 से मालविका सरकार कुलपति हैं, जो पहले प्रेजिडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकाता की कुलपति और जादवपुर विश्वविद्यालय में अँग्रेजी की प्रोफेसर थीं। Dr. Pratap Bhanu Mehta recognized as Personality of the Year - YouTube

पिछले महीने प्रताप भानु मेहता के इस्तीफे के बाद अशोका विश्वविद्यालय की अधिक चर्चा और बहसों में है। प्रो. मेहता कुलपति के बाद अशोका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। उनके चिन्तन-लेखन का दायरा बहुत व्यापक है। नैतिक दर्शन, न्याय शास्त्र, राजनीतिक संस्थाएँ, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, राज्यार्थिकी सभी क्षेत्रों में उनका लेखन प्रचुर मात्रा में है। उनके लेखों में तीखापन है, तर्क अकाट्य हैं और तथ्य प्रामाणिक। वे सार्वजनिक बुद्धिजीवी (पब्लिक इंटेलेक्चुअल) हैं, जिन्हें किसी एक राजनीतिक विचारधारा का समर्थक नहीं माना जा सकता। मेहता साहसी, निर्भीक, सत्यनिष्ठ भारतीय बुद्धिजीवी हैं, जिनकी एक वैश्विक छवि है। उन्होंने ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ को भारत का ‘थिंक टैंक’ बनाया, जो अपनी बौद्धिक ईमानदारी और साहस के लिए जाना गया। 2003 में ही उन्होंने ‘द बर्डेन ऑफ डेमोक्रेसी’ पुस्तक लिखी और देवेश कपूर के साथ – नेविगेटिंग द लेवरिंथ: पर्सपेक्टिव ऑन इंडियाज हायर एजुकेशन’ पुस्तक 2017 में सम्पादित की। इसी वर्ष उन्होंने देवेश कपूर एवं मिलन वैष्णव के साथ एक और पुस्तक सम्पादित की ‘रिथिंकिंग पब्लिक इंस्टीट्यूशंस इन इंडिया’।

चौवन वर्षीय प्रतापभानु मेहता का मख्य क्षेत्र राजनीति-विज्ञान है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सेंट जॉन्स कॉलेज  और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सेंट एड्वर्डस स्कूल से शिक्षा प्राप्त की है। वे इण्डियन एक्सप्रेस’ के सहयोगी सम्पादक एवं नियमित स्तम्भकार हैं। फाइनेंसियल टाइम्स, द टेलीग्राफ, द इंटरनेशनल हेराल्ड, ट्रिब्यून एवं हिन्दू में वे लिखते हैं। उनका समस्त लेखन अँग्रेजी में है। 16 मार्च को प्रताप भानु मेहता ने अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दिया। यह सामान्य घटना नहीं थी। इसने अकादमिक आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सवाल को पुनः सामने ला खड़ा किया है। प्रताप भानु मेहता के इस्तीफे से अकादमिक स्वतन्त्रता का प्रश्न जुड़ा है। पहले उन्होंने कुलपति की हैसियत से इस्तीफा दिया था और अब प्रोफेसर के रूप में उन्होंने त्यागपत्र दिया है।

अशोका यूनिवर्सिटी की अब तक एक ‘लिबरल’ छवि रही है। इस विश्वविद्यालय का चरित्र जेएनयू से भिन्न है। जेएनयू का चरित्र जनवादी है और अशोका यूनिवर्सिटी का अभिजनवादी। इसकी फैक्ल्टी में काफी ख्यात-विख्यात प्रोफेसर हैं। अनुदान के लिए यह विश्वविद्यालय सरकार पर निर्भर नहीं है। यह स्वयं अधिक समर्थ और सुरक्षित है। प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्तियाँ एक विशेष विचारधारा को कैम्पस में फैलाने और अकादमिक स्वतन्त्रता एवं गुणवत्ता को नष्ट करने के लिए की गयीं हैं। थीसिस की नकल करने वाला एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति है, और एक केन्द्रीय विश्वविद्यलाय के कुलपति की चिन्ता नमाज पढ़ने के समय लाउडस्पीकर को रोकने की है, जेएनयू के कुलपति ने कैम्पस में टैंक रखवाने की बात कही थी। अशोका यूनिवर्सिटी में हमेशा गुणवत्ता को महत्त्व दिया गया है।

इस यूनिवर्सिटी के संस्थापकों एवं न्यासियों में अधिक संख्या न्यू-टेक उद्यमियों की है, जिनके सामने विश्व के कई प्रमुख विश्वविद्यालय रहे हैं। प्रताप भानु मेहता के इस्तीफे से यह सवाल खड़ा होता है कि यह अशोका यूनिवर्सिटी के झुक जाने, डर जाने या दबाव में आने से हुआ या अन्य किसी कारण से? प्रताप भानु मेहता मोदी, भाजपा सरकार और आरएसएस के हिन्दुत्व एजेण्डे के आलोचक हैं। उन्होंने भाजपा को फासिस्ट कहा है, हिन्दु बहुसंख्यकवाद की आलोचना की है- अपने कॉलम में लेखों में, इन्टरव्यूज में। उन्हें किसी ने त्याग पत्र देने को नहीं कहा। इस्तीफा देने के पहले विश्वविद्यालय के संस्थापकों के साथ उनकी बैठक हुई थी, कुलपति मालविका सरकार की उपस्थिति के बिना, स्थापित मानदण्डों को भंग करते हुए। ट्रस्टियों ने प्रोफेसर मेहता को इस्तीफा देने को नहीं कहा था, पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके जुड़ाव को एक ‘राजनीतिक जवाबदेही’ (पोलिटिकल लायबिलिटी) के रूप में देखा।

इस्तीफा देते हुए उन्होंने यह कहा कि ‘स्वतन्त्रता के संवैधानिक मूल्यों और सभी को समान समझने की राजनीति के पक्ष में उनका सार्वजनिक लेखन विश्वविद्यालय के लिए जोखिम’ माना जाता है। कुलपति मालविका सरकार को उन्होंने जो इस्तीफा-पत्र दिया, उसे आज सभी प्रोफेसरों को पढ़ना चाहिए। उन्होंने एक ‘उदार विश्वविद्यालय को फलने-फूलने के लिए उदारवादी राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों की जरूरत’ बतायी और यह उम्मीद की कियूनिवर्सिटी ऐसे माहौल को बचाने में अपनी भूमिका का निर्वहण करेगा। सरकारी पंजे निजी विश्वविद्यालय की ओर बढ़ चुके हैं। प्रोफेसर मेहता ने नीत्शे को उद्धृत किया कि ‘एक विश्वविद्यालय के लिए सच में जीना मुमकिन नहीं होता।’ प्रोफेसर मेहता का इस्तीफा ‘एक बुद्धिजीवी और सरकार के आलोचक के रूप में उनकी सार्वजनिक भूमिका का परिणाम’ है।  प्रो. प्रताप भानु मेहता के इस्तीफे पर नहीं थम रहा बवाल, जानें क्या है अशोका यूनिवर्सिटी का पूरा मामला

प्रोफेसर मेहता के इस्तीफे के दो दिन बाद अरविन्द सुब्रमण्यन ने भी इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कुलपति को लिखे पत्र में यह कहा कि ‘निजी ओहदे और निजी वित्त’ भी अकादमिक अभिव्यक्ति और स्वतन्त्रता सुनिश्चित नहीं कर सकते। अरविन्द सुब्रमण्यन भाजपा और सरकार विरोधी नहीं है। वे 16 अक्टूबर 2014 से 20 जून 2018 तक भारत सरकार के प्रमुख आर्थिक सलाहकार थे। इकसठ वर्षीय अरविन्द सुब्रमण्यन की उच्च शिक्षा आइआइएम हैदराबाद, दिल्ली विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की है। 2011 में ‘फ़ॉरेन पॉलिसी’ पत्रिका ने विश्व के सौ बड़े विचारकों में इन्हें शामिल किया था। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में पिछले वर्ष जुलाई में सुब्रमण्यन अशोका यूनिवर्सिटी में आए। वे आर्थिक नीति के नये अशोका सेंटर के संस्थापक निदेशक भी हैं। दिसम्बर 2018 में उनकी पुस्तक आयी थी – ‘ऑफ  काउंसेल: द चैलेंजेज ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’।

इन दो इस्तीफों के बाद अशोका यूनिवर्सिटी कई सवालों के घेरे में आ गयी। फैकल्टी के सदस्य और छात्र चुप नहीं रहे। फैकल्टी के सदस्यों ने विश्विद्यालय को लिखा कि प्रो. मेहता के इस्तीफे ने ‘यूनिवर्सिटी की फैकल्टी को गहरी चिन्ता में डाल दिया है।’ 18 मार्च को लिखे गये इस पत्र में यह शंका प्रकट की गयी कि ‘‘भविष्य में और फैकल्टी इस तरह से हटाये जा सकते हैं… मेहता के समर्थन में हम पूरी तरह से हैं।’’ 18 मार्च की शाम को एक वर्चुअल मीटिंग में एक हजार से अधिक छात्र, फैकल्टी और अल्मुनी उपस्थिति थे। प्रोफेसर मेहता से इस्तीफा वापस लेने को कहा गया, पर उन्होंने इस्तीफा वापस नहीं लिया। प्रताप भानु मेहता ने अपने छात्रों को ‘सुपरहीरो’ कहकर पत्र लिखा।

21 मार्च के इस पत्र में उन्होंने लिखा कि छात्रों के विरोध केवल दो व्यक्तियों के लिए न होकर संस्थानिक अखण्डता/अक्षतता के लिए था। छात्रों ने उनके समर्थन में एकजुटता दिखाई थी। प्रोफेसर मेहता ने छात्रों के विरोध को ‘अंधेरे और अशुभ छायाओं के बारे में भी’ देखा, जो ‘भारत के लोकतन्त्र पर मँडराते थे।’ बाद में यूनिवर्सिटी के चांसलर, कुलपति, न्यासी बोर्ड के अध्यक्ष और दो प्रसिद्ध प्रोफेसरों ने एक संयुक्त बयान जारी कर संस्थागत प्रक्रियाओं में कुछ खामियों को स्वीकार कर ‘अकादमिक स्वयात्तता और स्वतन्त्रता के लिए’ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। देश-विदेश के अनेक शिक्षाविदों ने प्रो. मेहता के इस्तीफे पर चिन्ता प्रकट करते हुए विश्वविद्यालय की आलोचना की।

विश्व के कई प्रमुख विश्वविद्यालय अशोका के साथ ‘पार्टनरशिप’ करना चाहते थे, जिनके सामने अब एक संकट खड़ा हो गया है। कौशिक बसु ने इसे ‘दुखद समाचार’ कहा है। उनके अनुसार ‘असहिष्णुता रचनात्मकता को नुकसान पहुँचाती है।’ आशुतोष वार्ष्णेय ने धन के निवेश के कारण इस विश्वविद्यालय को ‘शिक्षण संस्थान के बजाय एक कम्पनी’ कहा है। गुरचरण दास इस ट्रैजिडी को केवल अशोका की ही नहीं, भारत की भी ट्रैजिडी मानते हैं (ए टेल आफॅ टू हीरोज : टाइम्स ऑफइंडिया, 25 मार्च 2021) वे इसे आधुनिक भारत के दो नायकों की कहानी के रूप में देखते हैं, जिनमें एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी प्रताप भानु मेहता साहस पूर्वक सत्ता को सच दिखा रहा है और दूसरा बोर्ड ऑफट्रस्टीज के अध्यक्ष आशीष धवन आदर्शवादी तरीके से एक बेहतर दुनिया बनाने की कोशिश कर रहा है।

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आशीष धवन ने उदार विचारों को बढ़ावा देने वाले एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने का स्वप्न देखा, जिसके आधे छात्र स्कॉलरशिप पर पढ़ रहे हों। गुरचरण दास को उन्होंने बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया। गुरचरण दास ने अपनी बचत यूनिवर्सिटी को दान कर दी। हार्वर्ड, येल, कोलम्बिया, लंदन सकूल ऑफ इकोनॉमिक्स, एमआइटी जैसे प्रसिद्ध संस्थानों के डेढ़ सौ शिक्षकों ने यह सवाल किया कि क्या आजादी को लेकर अशोका पहले की तरह प्रतिबद्ध है?

अशोका यूनिवर्सिटी के दान दाता रूढ़िवादी हैं। उनकी चिन्ता में फण्ड की कमी, वजीफों में कमी, फीस-वृद्धि, शिक्षकों की वेतन-वृद्धि रूकने जैसी कई समस्याएँ हैं। सरकारी की तनी भृकुटि को वे नजरअन्दाज नहीं कर सकते। विश्व-गुरु का राग अलापने वाले अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का हाल सामने है और अब सरकार के निशाने पर निजी विश्वविद्यालय भी हैं। पूँजी में वर्तमान सरकार के विरोध की शक्ति नहीं है। अनुदार विचारधारा उदार विचारों के पनपने में बाधक है। सवाल यह है कि अकादमिक आजादी की रक्षा कौन करेगा? प्रताप भानु मेहता जैसे प्रोफेसर भारत में कितने हैं? क्या यह समय केवल सार्वजनिक बुद्धिजीवियों के हवाले है? अकादमिक आजादी की रक्षा अकादमिक क्षेत्र के लोगों पर ही निर्भर करती है।

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लेखक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com

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