भगत सिंह
चतुर्दिक

आज का भारत और भगत सिंह

 

इन दिनों जितनी चर्चा गाँधी (2.10.1869- 30.1.1948) और आम्बेडकर (14.4.1891 – 6.12.1956) की होती है, उतनी भगत सिंह (28.9.1907 – 23.3.1931) की नहीं। भगत सिंह आज के भारत के ‘सीन’ में कम क्यों है? उन पर विचार जारी है, लेखादि लिखे जा रहे हैं और मार्च के महीने में, विशेषतः 23 मार्च को उनके शहादत दिवस पर देश के विविध हिस्सों में उन पर कार्यक्रम होते हैं, छोटे-बड़े आयोजन होते हैं, जुलुस भी निकलते हैं। गाँधी और आम्बेडकर ‘क्रान्ति’ के साथ नहीं थे, पर भगत सिंह का विचार ‘क्रान्ति’ से सम्बन्धित है। उनकी ऐतिहासिक अमिट और स्थायी पहचान उनके क्रान्तिकारी विचारों के कारण है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के कांग्रेसी नेताओं की तरह उन्होंने ब्रिटिशों से भी कभी समझौता नहीं किया। ‘क्रान्ति’ का समझौते से सम्बन्ध नहीं होता।

   ब्रिटिश लाइब्रेरी (पहले की इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी) में उपलब्ध स्वाधीनता आन्दोलन के दौर की सभी प्रतिबन्धित सामग्री अभी सामने नहीं आई है। लन्दन जाकर वहाँ रहकर इसे प्राप्त करने का सिलसिला जारी है। राजवन्ती  मान को 2017-18 में लन्दन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में क्रान्तिकारियों के प्रतिबन्धित साहित्य को खोजने में तमिल लेखक और भगत सिंह के जेल- साथी सी. एस. वेणु की 30 हजार शब्दों की 80 पृष्ठों की पुस्तक – सरदार भगत सिंह ‘ए शॉर्ट लाइफ स्केच’ प्राप्त हुई। भगत सिंह के सेण्ट्रल जेल के साथी सी. एस. वेणु ने ‘भगत सिंह जैसी युवा जीवात्मा’ के साथ रहने को अपने आप में एक विशेषाधिकार कहा है। भगत सिंह की यह जीवनी उनकी फाँसी के बाद 1931 में ही  लिखी गयी और जब्त की गई। राजवन्ती मान ने अंग्रेजी से हिन्दी में इस पुस्तक का अनुवाद किया है। भूमिका में उन्होंने इस पुस्तक को सबसे अधिक सुविचारित, विस्तृत इन्टेन्सिव एवं दुर्लभ ऐतिहासिक-राजनैतिक पुस्तक कहा है. वे ‘आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक चिन्तन एवं परिवेश में गहरे से विभक्त और विभाजित राष्ट्र में आज भगत सिंह के विचारों व शान्ति दर्शन को समझने की आवश्यकता और प्रासंगिकता’ कहीं अधिक बढ़ी देखती हैं।भगत सिंह पर शोध जारी है, खोज जारी है, पर जिस प्रकार गाँधी और आम्बेडकर को लेकर जितनी अधिक चर्चाएं होती हैं, उसकी शतांश भी भगत सिंह को लेकर नहीं होती। क्या इसकी मुख्य वजह यह नहीं है कि हमने ‘क्रान्ति’ और क्रान्तिकारी विचारों से अपना मुँह फेर लिया है?

‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का स्लोगन उर्दू कवि मौलाना हसरत मोहानी (1.1.1875-13.5.1951) ने भले 1921 में पहली बार दिया हो, पर इसे जन-जन तक अपने भाषणों और लेखादि के जरिये पहुंचाने का श्रेय भगत सिंह को है। उनके जैसा महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी विचारक भारत में और कोई नहीं है। लाहौर कांग्रेस (31 दिसम्बर 1929) में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (1928 में स्थापित) का घोषणा पत्र बाँटा गया था। मुख्य तौर पर भगवती चरण वोहरा (15.11.1903-28.5.1930) द्वारा लिखित इस घोषणा पत्र में क्रान्ति सम्बन्धी जो विचार प्रकट किये गये थे, वे भगत सिंह के ही क्रान्ति सम्बन्धी विचार हैं। इस घोषणा पत्र में यह कहा गया था “क्रान्ति ईश्वर विरोधी हो सकती है, लेकिन मनुष्य विरोधी नहीं। यह एक पुख्ता और जिन्दा ताकत है… क्रान्ति एक नियम है, क्रान्ति एक आदेश है और क्रान्ति एक सत्य है।” इस घोषणा पत्र को आज के भारत में पुनः पढ़े जाने की जरूरत है। इसमें भारत के मेहनतकश वर्ग के सामने दोहरे खतरे की बात कही गयी थी- “विदेशी पूँजीवाद का एक तरफ से और भारतीय पूँजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ से।” 1928-29 में भारतीय पूँजीवाद के विदेशी पूँजीवाद से गठजोड़ की बात कहना सामान्य बात नहीं थी।”भारतीय पूँजीवाद विदेशी पूँजीवाद के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है”

आज के भारत में क्रान्ति की बात करना राजद्रोह माना जाएगा। जो करेगा और क्रान्ति पथ पर चलेगा, उसे माओवादी कहा जाएगा। भगत सिंह ने मार्च 1926 में ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की थी। क्या 2026 में ‘नौजवान भारत सभा’ की शतवार्षिकी मनाई जाएगी? ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना के दो वर्ष बाद 1928 में क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना की गयी। इस संगठन ने औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकने, पूँजीवाद की समाप्ति और समाजवाद की स्थापना के लिए संघर्षरत होने को कहा था। कहा जा सकता है, कि आज भारत में औपनिवेशिक सत्ता नहीं है और हम गयी आज़ादी की हीरक जयन्ती मना रहे हैं। भगत सिंह ने भारतीय जनता की जिस मुक्ति की बात कही थी, क्या वह पूर्ण हुई? आजादी की उनकी परिभाषा भिन्न थी। वे सत्ता परिवर्तन भर नहीं, वे व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे। उनके लिए आजादी का मतलब लॉर्ड रीडिंग और लॉर्ड इर्विन की जगह पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास का सत्तासीन होना नहीं था। आज जब सब कुछ चुनाव में सिमट चुका है, हम सब इस या उस पार्टी के पक्ष में खड़े हो रहे हैं, स्वाधीन भारत में चुनाव के जरिये समय समय पर होने वाले सत्ता परिवर्तन से हमने क्या हासिल किया है! सीधा सवाल है भारत को सत्ता परिवर्तन चाहिए या व्यवस्था परिवर्तन? 1930 में ही भगत सिंह ने यह घोषणा की थी कि कांग्रेस अंग्रेजों से समझौते करेगी और आजादी की लड़ाई की परिणति समझौतों में हुई। व्यवस्था परिवर्तन की अब कोई बात नहीं करता। भगत सिंह को याद करने का मतलब है व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में खड़े होना और व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव । क्या क्रान्ति के बिना यह संभव है?

आज हिन्दू-मुस्लिम दंगे नहीं है, पर हमारे मानस को सत्ताधीशों ने साम्प्रदायिक मानस में बदल दिया है। भगत सिंह के लिए साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता का सवाल प्रमुख था। 1920 का दशक एक अर्थ में साम्प्रदायिक दंगों का दशक भी है। 1928 में भगत सिंह के ‘किरती’ पत्रिका में दो लेख प्रकाशित हुए थे-  ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ एवं  ‘साम्प्रदायिक दंगे और इलाज।’ भगत सिंह ‘नौजवान भारत सभा’ के महासचिव थे और भगवती चरण बोहरा प्रचार-सचिव। तीन दिनों (11-13 अप्रैल 1928) की इस सभा की राजनीतिक कॉन्फ्रेंस में जिन सवालों पर चर्चा हुई थी, उनमें एक मुख्य सवाल ‘धर्म’ का भी था। इस सम्मेलन में साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ। भगत सिंह ने धर्म को अपने रास्ते में एक रोड़ा कहा था। उस समय का यह रोड़ा अब पर्वत बनकर हमारे सामने खड़ा है। सनातन धर्म के भेद-भाव की बात उन्होंने कही थी। आज देश में ‘सनातन संस्था’ है, जिसके कारनामों से सब परिचित नहीं है। उन्होंने केवल स्वामी दयानन्द के सम्बन्ध में यह नहीं कहा कि ‘वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाए’ गुरुद्वारे जाकर सिखों के ‘राज करेगा खालसा’ जैसे कथन की भी आलोचना की। ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ लेख में उन्होंने लाहौर के ताजा दंगों (अगस्त 1927) की भी बात कही। “भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं।”

1920 के दशक में हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच पारस्परिक विश्वास बहुत कम हो गया था। इस दशक में कई शहरों में दंगे हुए थे। अगस्त 1927 का लाहौर दंगा सब की तुलना में कहीं अधिक घातक था। भगत सिंह लाहौर में थे और वे केवल लाहौर दंगे को ही नहीं 1920 के दशक में देश के विभिन्न स्थलों में फैलै दंगों को देख रहे थे। 1920-21 में मालाबार में, अप्रैल 1921 से मार्च 1922 तक बंगाल, पंजाब और  मुल्तान में, अप्रैल 1924 से मार्च 1925 तक दिल्ली, लाहौर, लखनऊ, मुरादाबाद, भागलपुर, गुलबर्गा, शाहजहाँपुर, कोहट, इलाहाबाद में, अप्रैल 1925 से मार्च 1926 तक कलकत्ता, युनाइटेड प्रोविंस, सेंट्रल प्रोविंसेज, बम्बई प्रेजिडेंसी, बरार, गुजरात, शोलापुर में,  अप्रैल 1926 से मार्च 1927 तक दिल्ली, कलकत्ता, पंजाब, युनाइटेड प्रोविंसेज, बम्बई प्रेजिडेंसी, सिंध और 4 सितम्बर 1927 को नागपुर का दंगा, अप्रैल 1927 से मार्च 1928 तक लाहौर, बिहार, ओडिशा, पंजाब केतिया, युनाइटेड प्रोविंसेज में बम्बई प्रेजिडेंसी में 6, सेंट्रल प्रोविन्स में 2, बंगाल में 2 और दिल्ली में दंगे हुए थे। 1928 में भगत सिंह ने लिखा- “भारतवर्ष की दशा, इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायी के जानी दुश्मन हैं”।  इन दंगों के कारण उन्हें हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय लगा था। आज दंगे नहीं हैं, पर भाजपा की सरकार बनने और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद मुसलमानों की जो स्थिति है, इसे लेकर दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देश चिन्तित हैं। भगत सिंह धर्म, ईश्वर, दंगे आदि के खिलाफ थे।भगत सिंह ने दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का जो हाल अपने समय में देखा था उसमें आज कहीं अधिक वृद्धि हो चुकी  है। केन्द्रीय मन्त्री तक भड़काऊ भाषण और स्लोगन एक विशेष समुदाय के प्रति देता है। भगत सिंह ने अपने समय में लिखा था- “इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली…. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं।” आज नेताओं ने, दलों ने हमारे मानस को साम्प्रदायिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारत साम्प्रदायिक दंगों से कहीं आगे बढ़कर साम्प्रदायिक मानस (कम्युनल माइण्ड) का निर्माण कर रहा है।

भगत सिंह ने अपने समय में पत्रकारिता के व्यवसाय को बहुत ही गन्दा कहा था, उनके उत्तेजनापूर्ण लेखों को दंगा कराने का जिम्मेदार माना था. वे अपने समय के भारत को लेकर  चिन्तित थे- “भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है भारत का बनेगा क्या?” आज के भारत को देखकर क्या सचमुच हमारे दिल में कोई सवाल उठता है और रक्त के आँसू की बात छोड़ दें, क्या आँखों में आँसू आते हैं? भगत सिंह ने कई बार साझी राष्ट्रीयता की बात कही है। आज हिन्दू राष्ट्रीयता की बात की जा रही है।

लोगों को आपस में लड़ने से रोकने के लिए उन्होंने ‘वर्ग-चेतना’ पर बल दिया था। साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में वर्ग-हित और वर्ग-चेतना की बात कही थी। धर्म उनके लिए व्यक्तिगत मामला था, जिसमें दूसरे का कोई दखल नहीं होना चाहिए। उनके सामने गदर आन्दोलन था जिसने धर्म से राजनीति को अलग किया था। भगत सिंह को याद न करने वाले वर्ग-चरित्र स्पष्ट हैं। वे केवल अपना भला चाहते हैं, भारत का भला नहीं। भगत सिंह ने गरीबों की भलाई धर्म, रंग, नस्ल, राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव को मिटाकर एकजुट होने में मानी थी। उनका बल आर्थिक स्वतन्त्रता पर था। पूँजीपतियों और कॉरपोरेटों की सरकार, उनके दलाल और नौकर भगत सिंह के खिलाफ हैं। मई 1928 के लेख ‘धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम’ में उन्होंने टॉलस्टॉय (9.9.1828-20.11.1910) की पुस्तक ‘एस्से एण्ड लेटर्स’ की चर्चा की है। जिसके अंग्रेजी अनुवादक अयलमेर मॉडे थे। 370 पृष्ठों की इस पुस्तक का अनुवाद 1904 में प्रकाशित हुआ था। भगत सिंह ने अपने लेख में इस पुस्तक के तीन हिस्सों- धर्म के सारभूत, धर्म का दर्शन और धर्म के कर्मकाण्ड पर विचार किया। आज भगत सिंह पर विचार करते हुए हमें उनके ऐसे विचारों पर अधिक ध्यान देने की जरुरत इसलिए है कि चारो और धर्मान्धता फैली हुई है।

आज के भारत के समक्ष जो प्रमुख सवाल हैं, उन पर भगत सिंह ने विचार किया है क्योंकि ये सवाल किसी न किसी रूप में उनके समय में भी थे। उन्होने नौकरशाही पर विचार किया, धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन को प्रगति में बाधक माना, नौजवानों को जागने, उठने को कहा, संस्कृति, भाषा और लिपि पर विचार किया, साहित्य-चर्चा की….. “रूसो, वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्य क्रान्ति घटित न हो पाती। यदि टॉलस्टॉय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में वर्षों  व्यतीत न कर दिए होते, तो रूस की क्रान्ति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार तथा व्यवहार तो दूर रहा।” ये कबीर को ही नहीं, नजरूल इस्लाम को भी याद करते हैं। 1924 के एक लेख विश्व-प्रेम में उन्होंने विश्व-बन्धुता को केवल संसार में समानता के रूप में देखा। आज जो लोग वसुधैव कुटुम्कम की बात अक्सर करते हैं, उन्हें भगत सिंह को पढ़ना चाहिए। विश्व-बन्धुत्व की बात करनेवालों को उन्होंने मिथ्यावादी कहा और उन्हें कर्मक्षेत्र में आकर परीक्षा देने को कहा- “कौन माता का लाल सच्चे हृदय से विश्व बन्धुत्व का  इच्छुक है? कौन है समस्त संसार के लिए अपना सुख बलिदान करने वाला? जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, धनी-निर्धन, छूत-अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहाँ विश्व-बन्धुता और विश्व प्रेम”

 भगत सिंह ने ‘भगवान’ और ‘धर्म, दोनों को भूत कहा है, निजी सम्पत्ति का विरोध किया है, अछूत के सवाल सामने रखे हैं. अछूत को उन्होंने भाई कहकर असली जनसेवक माना है। उन्हें उठने को, अपना इतिहास देखने को, अपनी शक्ति पहचानने को, संगठनबद्ध होने को, पूरे समाज को चुनौती देने को, दूसरों की खुराक न बनने को, नौकरशाही के झाँसे में न फँसने को कहा. उन्हें सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा करने और राजनीतिक आर्थिक क्रान्ति के लिए कमर कसने को कहा। “तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, सामाजिक शक्ति हो, सोए हुए शेरों/ उठो और बगावत खड़ी कर दो।” युवकों पर उन्हें विश्वास था। आज की युवा शक्ति पूरी आबादी के पचास प्रतिशत से अधिक है। आज का भारतीय युवक क्या कर रहा है। वे जिस कान्ति की बात कर रहे थे, नयी व्यवस्था, नयी राज्यसत्ता और वास्तविक आजादी की बात कर रहे थे, वह क्रान्तिकारी युवकों के बिना कभी साकार नहीं हो सकती। नवयुवकों को उन्होंने कहा – “मक्कार तथा बेईमान लोगों के हाथों में न खेलें, जिनके साथ उनकी कोई समानता नहीं है और जो हर नाजुक मौके पर आदर्श का परित्याग कर देते हैं।” उन्होंने नौजवानों में, ‘देश का भविष्य’ देखा था- “देश का भविष्य नौजवान के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं, उनकी दुख सहने की तत्परता, उनकी बेखौफ बहादुरी और लहराती कुर्बानी दर्शाती है कि भारत का उनके हाथों में सुरक्षित है।”

भगत सिंह क्रान्तिकारी थे। आज के भारत को क्रान्ति की जरूरत है या नहीं? जनता द्वारा जनता हित में उन्होंने कान्ति की बात कही थी। 98 प्रतिशत के लिए स्वराज्य चाहा था। भगत सिंह को फाँसी दी गयी पर उनके विचार आज भी लहरा रहे हैं। उनका उद्देश्य उस क्रान्ति से था, जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत करेगी। क्या आज भारतीयों द्वारा भारतीयों का शोषण नहीं हो रहा है? असेम्बली हॉल में फेंके गये पर्चे (8 अप्रैल 1929) में पार्लियामेण्ट के पाखण्ड का जिक्र है। इस पर्चे में यह कहा गया था – “व्यक्तियों की हत्या करना तो सरल है, किन्तु विचारों की हत्या नहीं की जा सकती”। भगत सिंह को याद करने का अर्थ क्रान्ति मार्ग पर आगे बढ़ना है। निचली अदालत में जब उनसे क्रान्ति सम्बन्धी मत के बारे में पूछा गया था, उनका उत्तर था – “क्रान्ति के लिए खूनी लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत  प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।” भारत की मौजूदा समाज अवस्था से हम सन्तुष्ट हैं या असन्तुष्ट?

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com

5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x