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द ओवैसी बर्निंग ट्रेन : स्टेशन से गाड़ी छूट चुकी है

 

धर्मनिरपेक्षता जमीनी हकीकत नहीं है, बल्ली पर टंगी हुई एक मृत अवधारणा है अब। जब चाहिए था, आकाशदीप की तरह मुंडेर पर टांगना, धर्मनिरपेक्ष पन्थियों ने कन्दील की तरह इस्तेमाल किया था तब। अब गंगा में ऐसे ऐसे और इतने इतने सम्मोही आकाशदीप लगाए गए हैं कि धर्मनिरपेक्षता की कन्दील बुझी बुझी और मायूस दिख रही है। हालात ऐसे हैं कि आने वाले दिनों में ही धर्मनिरपेक्षता का नामलेवा कोई न रह जाएगा।

धर्मनिरपेक्षता है क्या? भारतीय सन्दर्भ में क्या यह मुस्लिमों के प्रति सदाशयता बरतने का पैमाना है? सदाशयता भी कैसी ! ऐसी कि वे धार्मिक जेल की सलाखों और गुफाओं में कैद रहें ! धर्मनिरपेक्षता के बहाने  धार्मिक सलाखों और गुफाओं के बन्दियों को वह खुराक दी जाती रहे कि उनमें खास होने का अहसास भरता रहे? धर्मनिरपेक्षता के हिमायतियों ने भारत के बहुसंख्यकों को बताया कि धर्म अफीम है। अगर बहुसंख्यकों के लिए अफीम है तो अल्पसंख्यकों के लिए भी होना चाहिए। फिर अल्पसंख्यक अफीम के हवाले ही क्यों रहें?

जब से नये मिजाज की नयी सरकार आई है, एक नयी शुरुआत हुई है। नयी सरकार ने नये भारत का नारा बुलन्द किया है। इतना बुलन्द  कि पीछे का सब कुछ धो पोंछ कर बराबर कर देना है।  एक हाथ से पीछे का पोंछते चलते हैं, दूसरे हाथ से सामने गड्ढा खोदते हैं। इसी गड्ढे में नये भारत की नयी नींव के निर्माण का मंत्र पढ़ कर स्वाहा के कोरस के साथ आहुति दी जा रही है।

नये मिजाज की यह सरकार यह समझाने में कामयाब हुई है कि पिछले सत्तर साल की सरकारें मुसलमानों को तुष्ट करती रही हैं। जरूरत से ज्यादा मान देती रही हैं। भारत की बहुसंख्यक जनता पहले से ही इस अहसास से पीड़ित रही है। इसलिए जब नयी सोच की सरकार ने यह समझाना चाहा तो उसे ज्यादा कसरत नहीं करनी पड़ी। जनता पहले से ही भरी पड़ी थी। उसे इससे मानसिक तृप्ति मिली। उसे लगा कोई उनके अहसास को आवाज दे रहा है।

सरकारें, जिन्होंने सत्तर साल तक ऐसा किया, भी मना नहीं कर रहीं। तुष्टिकरण की राजनीति सत्तर साल तक फली फूली है, कौन मुकर सकता है इससे?

तुष्टिकरण की राजनीति का परिणाम यह था कि बहुसंख्यकों को लग रहा था कि मुसलमानों को विशेष मान दिया जा रहा है। मुसलमान भी यह मान कर अकड़े – अकड़े रहे कि वे विशेष हैं। अल्पसंख्यक मुसलमान बहुसंख्यक की तुलना में विशेषाधिकार के रूप में क्या क्या इन्ज्वॉय कर रहे थे, इसकी सूची बना ली जाए :

  1. मुसलमान पुरुषों को चार शादियाँ करने का अधिकार
  2. बेधड़क तलाक देने की सुविधा
  3. जुम्मे के दिन सड़क घेर कर नमाज अदा करना
  4. आतंकित करने वाले तेवर के साथ मुहर्रम पर ताजिए निकालना
  5. क्रिकेट में पाकिस्तान से भारत की हार पर आनन्द और पटाखे
  6. जिन मुहल्लों और बस्तियों में मुसलमान संगठित तरीके से निवास करते हैं, वहां पुलिस – प्रशासन को प्रभावी नहीं होने देना और
  7. परिवार नियोजन के प्रति बिन्दास बेपरवाहीपश्चिम बंगाल में BJP ने साधा मुस्लिम वोट बैंक पर निशाना, आज करेगी मुस्लिम सम्मेलन - bjp-target-muslim-vote-bank-in-west-bengal-muslim-conference-in-bengal-today

मुसलमानों द्वारा इन सात आइटमों का इन्ज्वॉय किया जाना बहुसंख्यक हिन्दुओं के पेट में मरोड़ का कारण बनता था। लेकिन हिन्दुओं की आंखों में जो सबसे ज्यादा चुभता था वह  है, धर्मान्तरण का मामला।  धर्मान्तरण से बहुसंख्यक समुदाय पर सीधी चोट पहुँचती है।

धर्मान्तरण  एक संगीन मसला है। हर युद्ध हड़पने के लिए ही लड़ा जाता है। धर्मान्तरण के माध्यम से नागरिक हड़पने की कार्रवाई चलती रहती है, जब युद्ध न भी चल रहा हो। धर्मान्तरण अमन काल का युद्ध है। जिस किसी धर्म की ओर से धर्मान्तरण की मुहिम चलाई जाती है, वह धर्म केवल जीवन को उन्नत करने का माध्यम न रह कर कुटिल राजनीति का हथियार बन जाता है। धर्मान्तरण के माध्यम से न केवल नागरिक हड़पा जाता है, कुछ हद तक जमीन की मिल्कियत भी। साथ ही संस्कृति भी प्रभावित होती है।

ऊपर जो सूची बनाई गई है, उसे इन्ज्वॉय करते हुए मुसलमान अपने को विशेष दर्जे के नागरिक होने पर सहज यकीन करते रहे हैं  जैसे जम्मू कश्मीर तीन सौ सत्तर से विशेष दर्जा प्राप्त था। इन्हें विशेष होने का अहसास इससे भी होता था कि इनके वोट के लिए सभी राजनीतिक दल इन्हें रिझाते थे। फ्लर्ट करते थे। एवज में इन्हें इनके अपने धार्मिक जेल की सलाखों के पीछे रहने की छूट देते थे।

लेकिन दिनकाल बदल गए। वोट का गणित बदल गया। भाजपा ने हिन्दुओं के वोटों का ऐसा गणित तैयार किया कि सरकार बनाने के लिए मुसलमानों के वोट की अनिवार्यता खत्म हो गई। यह मुसलमानों को आईना दिखाना भी था। ऐसा सत्तर साल में पहली बार हुआ था। दो हजार चौदह में पहली वह सरकार बनी जिसने मुसलमानों के वोटों की परवाह नहीं की। भौकाल भी ऐसा मचा दिया कि अब मुसलमानों को कोई नहीं रिझाता। न उससे कोई लटपट करता है। स्थिति यह बनी है कि भारतीय राजनीति और चुनावों में उन्हें अब कोई मुँह नहीं लगाता। निर्वासन की स्थिति बनी हुई है।

इन सब के पहले बीसवीं सदी के आखिरी दशक में दो बड़े काम किये गये। बाबरी मस्जिद को तोड़ा गया और गोधरा काण्ड को अंजाम दिया गया। दो हजार चौदह के बाद सिलसिलेवार तरीके से मुसलमानों के  विशेष होने के गुमानभंजक आयोजन किए गए हैं। कुछ विधान के स्तर पर किए गए तो कुछ सड़क पर किए गए। ऐसा हर आयोजन  जांघों पर गदा का प्रहार था। वज्रपात था। आघात था।

आइए, ऐसे आयोजनों की फेहरिस्त बनाते हैं :

  1.  तीन सौ सत्तर का जम्मू कश्मीर से वापस लेना
  2.  तीन तलाक की पद्धति को अमान्य करना
  3. नागरिक कानून में संशोधन
  4. एन आर सी का दावा
  5. भारत माता की जय बोलने का अभ्यास कराना
  6. राम मंदिर के संदर्भ में अदालत का फैसला
  7. राम मंदिर का निर्माण और अब
  8. धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध की एक वैधानिक कोशिश

इसके अतिरिक्त सड़कों पर कंटाप का कार्यक्रम चलाया जाता रहा। कंटाप केवल कान के नीचे नहीं, मान के नीचे भी बजाया गया। मान पर भी बन आई और जान पर भी। ऐसी बहुत सी हरकतों को होने दिया जाता रहा कि गुमान की जगह  दहशत ने दिमाग में डेरा डाल दिया है। भौकाल ने भयभीत किया।

निर्वासन और आघात का सिलसिला चलता रहा और अभी चालू  आहे। मगर धर्मनिरपेक्षपन्थियों ने क्या किया? वे मुंह बाये रहे। आयं- बायं भी नहीं बका। आँखें मूंदे हैं। नये मिजाज और नये अन्दाज को पास दिया। इतना भी जरूरी नहीं समझा कि कहें कि सड़क मिलने पर पास दिया जाएगा। बल्कि सड़क खाली कर दी। उन्हीं सड़कों को खाली किया जिन पर उतर कर वे बेहतर दुनिया का स्वप्न रोपा करते थे। भाईचारे के लिए नुक्कड़ नाटक करते थे। धर्मनिरपेक्ष दुनिया के लिए आवाज बुलन्द करते थे।मुस्लिम परस्ती में पश्चिम बंगाल को दूसरा बांग्लादेश बना रही हैं ममता ? | Perform India

पिछले सत्तर साल में धर्मनिरपेक्षियों की ऐसी धड़कनों और काँग्रेस समेत दूसरे राजनीतिक दलों की तुष्टि की राजनीति से यह सुफल हासिल हुआ था कि आजाद भारत में ओवैसी का अवतार नहीं हुआ था। दोनों प्रवृत्तियों ने मिल कर ओवैसी के पैदा होने के लिए जमीन उर्वर नहीं होने दी थी।

अब ओवैसी पैदा हो चुका है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सीटें हासिल करके न केवल मुख्यधारा में शामिल हो रहा है, बल्कि जल्दी ही अपने लिए ठोस जमीन हासिल कर लेगा। निश्चित रूप से इसके लिए धार्मिक राष्ट्रवाद वाले नये भारत की अवधारणा को शुक्रिया बनता है। लेकिन यह सदैव याद रखना है कि ओवैसी का अवतार किसी लोकतान्त्रिक मन्थन का परिणाम नहीं है। वह धार्मिक राष्ट्रवाद की नई फसल है।

इस नयी फसल का विकास ताड़का की तरह होगा। हजार हाथियों का बल होगा इस ताड़का में। सुन्दर वन तबाह होगा। ताड़का की वजह से हिन्दुस्तान का नाम बदल कर ताड़कावन करना होगा। पहले भी सुन्दरवन का नाम बदल कर ताड़कावन करने की कथा उपलब्ध है। विश्वामित्र न तब सामना कर  पाये थे उसका और न आज कोई विश्वामित्र ताड़का की हिमाकत के सामने हिम्मत दिखा पाएगा।

भारतीय राजनीति में ओवैसी का उदय धार्मिक राष्ट्रवाद की राजनीतिक दाल में घी का तड़का है और धर्मनिरपेक्षता की दाल में धतूरे का तड़का। इन दोनों तड़के का परिणाम एक ही निकलेगा। मौके – बेमौके सिजलर्स प्लेट में धधकती आग परोसी जाएगी। एक से एक करामाती सिजलर्स।

स्टेशन से गाड़ी छूट चुकी है। द ओवैसी बर्निंग ट्रेन।

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लेखक प्रबुद्ध साहित्यकार, अनुवादक एवं रंगकर्मी हैं। सम्पर्क- +919433076174, mrityunjoy.kolkata@gmail.com

2 responses to “द ओवैसी बर्निंग ट्रेन : स्टेशन से गाड़ी छूट चुकी है”

  1. कृष्ण ठाकुर says:

    यह लेख पूरी तरह साम्प्रदायिक है जो एक वर्ग के प्रति घोर नफरत और बेहद छोटी सोच को दर्शाता है. लेख का शीर्षक ही दर्शाता है कि लेखक आरएसएस और बीजेपी की साम्प्रदायिक और जन्मजात जातिवादी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहता है. हिंदी के अधिकांश विद्वानों का यही हाल है. इसी सोच और विचारधारा के लोगों ने हिंदुओं को जाति के नाम पर असंख्य टुकड़ियों में बाँट रखा है और हर टुकड़ी की मानवता सिर्फ अपनी टुकड़ी तक सीमित रहती है. नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं होता है. हमें अपने अंदर झांक कर देखने की अधिक जरूरत है. यह तो कुछ ऐसा है कि अपने मुहल्ले में गंदगी और कूड़े-कर्कट की भरमार है, चारों तरफ से बदबू आ रही है और हम पास के मुहल्ले वालों को सफाई का उपदेश दे रहे हैं. कबीरदास जी के शब्दों में :
    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
    जो दिल ढूंढा अपना, मुझसा बुरा न कोय ।।
    अमेरिका में एक अश्वेत की हत्या होती है और पूरा यूरोप शर्मसार होकर घुटनों पर आ जाता है. पूरे यूरोप के पुलिस वाले माफी मांगते है. हमारे यहां नस्लभेद (जाति और सम्प्रदाय) के नाम पर रोज हत्याएं होती हैं, कुकर्म होते हैं और सरकार एवं जनता को कोई खास फर्क नहीं पड़ता है. हत्यारे और कुकर्मियों की जाति और धर्म देख कर नेता, मंत्री और जनता उनका समर्थन करती है.
    मेरा आशय सिर्फ इतना है कि समाज को बांटना तथा नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. विविधता में एकता को ही हमें अपनी संस्कृति बनानी होगी. बाँटेंगे तो टूटेंगे, एक होंगे तो मजबूत होंगे.
    सादर.

  2. प्रकाश देवकुलिश says:

    प्रकाश देवकुलिश

    कई मुद्दों को खंगालता है और बेबाकी से बातें रखता है यह आलेख।एक ओर प्रगतिवादियों के , धर्म को लेकर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के प्रति पूर्वाग्रह पर चोट है तो दूसरी तरफ धर्मनिर्पेक्षतावादियों की मौके पर चुप्पी पर आघात। साहसिक आलेख…बाकी सारी बातें तो तथ्य हैं , जिन्हें चुटीले अन्दाज में रखा गया है. खरी खरी बात है, न इधर की न उधर की…..काबिलेतारीफ…

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