मुनादी

कब जीतेगा बंगाल

 

भारत की आजादी के बाद देश के अन्य राज्यों की ही तरह पश्चिम बंगाल में भी काँग्रेस का शासन प्रारम्भ हुआ। लेकिन सातवें दशक के बाद से भारतीय राजनीति में गैर काँग्रेसवाद अपनी जगह बनाने लगा। 1974 के जयप्रकाश आन्दोलन, 1975 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी द्वारा लगाया गया आपातकाल, फिर जनता पार्टी का गठन; इन घटनाओं के सिलसिले ने परिवर्तन की एक देशव्यापी लहर बना दी। और इसलिए 1977 के लोकसभा चुनाव में केन्द्र की काँग्रेस सरकार का तो सफाया हुआ ही, राज्यों में भी बड़े उलटफेर हुए। बंगाल विधान सभा के चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व में वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रण्ट) ने काँग्रेस पार्टी को सत्ता से बुरी तरह बेदखल कर दिया। काँग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रे की जगह माकपा के ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री बने।

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से माकपा की सरकार पर यह आरोप खुलकर लगने लगा कि माकपा के नेता और कार्यकर्त्ता सर्वहारा की तानाशाही के नाम पर अपनी तानाशाही चला रहे हैं। इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा,मारपीट और जान से मार देने के आरोप लगे। यहाँ यह उल्लेख अनावश्यक नहीं होगा कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा माकपा के जमाने से नहीं बल्कि कॉंग्रेस के जमाने से ही शुरू हो गयी थी। 1971 में जब सत्तारूढ़ कॉंग्रेस और माकपा के खिलाफ फॉरवर्ड ब्लॉक के हेमन्त बसु चुनाव लड़ रहे थे तब उनकी हत्या कर दी गयी थी। कॉंग्रेस ने इस हत्या के लिए माकपा की ओर इशारा करके जाँच की दिशा बदल दी और आज तक पता नहीं चल पाया कि बसु की हत्या किसने की थी? हेमन्त बसु की हत्या के बाद पार्टी ने उस क्षेत्र से अजीत कुमार बिस्वास को खड़ा किया,उनकी भी हत्या हो गयी।

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 आजादी के पहले 1946 में यहाँ किसानों का एक बड़ा आन्दोलन हुआ था जिसे तेभागा आन्दोलन कहा गया। अविभाजित दिनाजपुर से शुरू हुए इस आन्दोलन में बँटाईदार किसानों की माँग थी कि उपज का दो तिहाई हिस्सा उन्हें दिया जाए। भूस्वामी वर्ग और भूमिहीन किसानों के बीच हुए इस खूनी संघर्ष की विडम्बना यह थी कि कॉंग्रेस भूपतियों के साथ थी और भूमिहीन किसानों के पक्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लड़ रही थी। वंचितों, शोषितों, भूमिहीन किसानों और मजदूरों के मन में कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए आज भी यदि थोडा आदर बचा हुआ है तो इसलिए कि पुराने संघर्ष के दौरान वे पार्टियाँ उनके साथ खड़ी थीं और लड़ी थीं। बंगाल में विरोध का स्वर सामजिक जीवन का हिस्सा रहा है और धीरे-धीरे यह स्वर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति बन गया।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेरित और प्रभावित नक्सलबाड़ी आन्दोलन (1967) ने पश्चिम बंगाल में हिंसा को राजनीति के केन्द्र में ला दिया और पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ यह आन्दोलन कई और राज्यों में फैल गया। 1946 में शुरू हुए तेभागा आन्दोलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के कार्यकर्त्ता चारू मजूमदार ने जबर्दस्त काम किया था। सरकार के खिलाफ काम करने के लिए 1948 में उनकी गिरफ्तारी हुई, जेल में ही उनकी मुलाकात कानू सान्याल से हुई। कानू सान्याल भी भाकपा में आ गये और दोनों पार्टी के लिए जमकर काम करने लगे। आगे चलकर दोनों माकपा में आये और फिर 1967 में चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने नक्सल आन्दोलन की शुरुआत की। Image result for चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने नक्सल आन्दोलन

पश्चिम बंगाल के एक गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू इस नक्सल आन्दोलन के आन्दोलनकारियों का मानना था कि भारतीय मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए भारत सरकार की नीतियाँ जिम्मेवार हैं और सरकार ही सामन्तों के पोषक और रखवाले हैं। इसलिए अपनी जान की बाजी लगाकर सामन्तों,जमींदारों और सरकार के लोगों को नष्ट करना इन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च ध्येय बना लिया। नतीजे के रूप में खूब खून-खराबा हुआ,दोनों तरफ के बहुत लोग मारे गये और छिटपुट तो अब भी मारे जा रहे हैं।नक्सल आन्दोलन में वर्गीय हिंसा और हत्या, पुलिस का दमन, नक्सलियों की सामूहिक हत्या आम बात हो गयी थी। पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका झुम्पा लाहिरी ने अपने उपन्यास ‘द लॉलैंड’ में नक्सल आन्दोलन के दौरान हुई पुलिस-बर्बरता का मार्मिक चित्रण किया है।

नक्सल आन्दोलन ने हिंसा की संस्कृति को इस तरह स्थापित कर दिया कि हिंसा संसदीय राजनीति का आवश्यक उपकरण बन गया। 1959 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को लेकर भी एक बड़ा आन्दोलन हुआ था जो खाद्य आन्दोलन (फूड मूवमेण्ट) के नाम से प्रसिद्ध है। रियायती दर पर अनाज वितरण के लिए हुए इस आन्दोलन में भी कई लोग मारे गए। सत्ताधारी पार्टी और सरकारी नीतियों का हिंसक विरोध बंगाल के जनजीवन का हिस्सा हो गया। इसलिए यह अकारण नहीं कि बंगाल में हिंसा को एक राजनीतिक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करने के मामले में सभी राजनीतिक पार्टियाँ लगभग एक जैसी रही हैं।

आजादी के बाद के पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास पर गौर करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ सत्ता की यात्रा का भी एक चक्र है। अँग्रेजों से मुक्त होने के बाद विभाजित बंगाल का शासन काँग्रेस के हाथ में आया, काँग्रेस की नीतियों से त्रस्त जनता ने 1977 में माकपा को शासन सौंप दिया। माकपा से उबी और घुटी हुई जनता ने तृणमूल काँग्रेस को बंगाल सौंप दिया।

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 शासन में आने के बाद माकपा के नेतृत्व में वाम मोर्चा ने पश्चिम बंगाल में जो सबसे अच्छा काम किया वह भूमि सुधार का था। भूमिहीन किसानों और खेतिहर मजदूरों पर वैसे भी माकपा की अच्छी पकड़ थी लेकिन भूमि सुधार जैसे असाधारण कार्य को सम्पन्न करा देने के बाद तो यह गरीबों, मजदूरों और अभिवंचितों की अपनी पार्टी बन गयी। इसलिए यह अकारण नहीं कि चौंतीस वर्षों तक माकपा पश्चिम बंगाल में अजेय और निर्विकल्प बनी रही। आजादी के बाद तीस वर्षों के शासन काल (1947 से 1977 तक) में जहाँ कॉंग्रेस ने सात बार मुख्यमन्त्री बदले और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगाया वहीँ माकपा का चौंतीस वर्षों का शासन सिर्फ दो मुख्यमन्त्रियों ज्योति बसु (1977-2000) और बुद्धदेव भट्टाचार्य (2000-2011) ने सम्हाल लिया।

इस बीच अब्दुल गनी खान चौधरी,प्रणव मुखर्जी,प्रियरंजन दास मुंशी, समेत कॉंग्रेस के कई कद्दावर नेता हुए, लेकिन कोई माकपा के लिए चुनौती नहीं बन पाये। मात्र पन्द्रह वर्ष की उम्र में कॉंग्रेस में शामिल होने वाली ममता बनर्जी को 1975 में बंगाल महिला कॉंग्रेस(तब इन्दिरा कॉंग्रेस) का महासचिव बनाया गया। जिद और जूनून से लैस इस जुझारू युवती ने आठवें दशक में अपनी जो राजनीतिक यात्रा शुरू की,जिस तरह का संघर्ष किया और जैसी यातनाएँ झेलीं वह बंगाल के राजनैतिक इतिहास में दस्तावेजी महत्त्व का है। एक तरफ युवा काँग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी का कद लगातार बढ़ता गया वहीं दूसरी ओर माकपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की निरंकुशता बढ़ती गयी। पार्टी आम लोगों के जीवन में दखल देने लगी। पूरे बंगाल के गली मोहल्ले में भी पार्टी कार्यालय खुलने लगे। एक समय जो पार्टी दबे कुचले, गरीब, किसान मजदूर की आवाज थी अब वह वही जनता को तंग और तबाह करने का केन्द्र बन रही थी। Image result for नयी पार्टी तृणमूल काँग्रेस ब

इस बीच ममता ने अपने को काँग्रेस से अलग करके अपनी नयी पार्टी तृणमूल काँग्रेस बना ली और माकपा का विरोध तेज कर दिया। देश में नयी आर्थिक नीति लागू होने के बाद उदारीकरण के दौर में पश्चिम बंगाल की माकपा भी उदार हो गयी। 2000 में बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासनकाल में विशेष आर्थिक क्षेत्र (स्पेशल इकोनोमिक जोन) की चर्चा तेज हुई और टाटा जैसे उद्योगपति को कार उत्पादन के लिए आमन्त्रित किया गया। यह परियोजना माकपा के लिए जैसी आत्मघाती साबित हुई, ममता की राजनीति के लिए वैसा ही वरदान साबित हुई।

2006 से 2008 के बीच सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा मोटर्स के लिए भूमि अधिग्रहण के सवाल पर तृणमूल और माकपा के बीच भयंकर खूनी संघर्ष हुआ। यद्यपि इस संघर्ष में कई और राजनीतिक पार्टियाँ और देश के सामजिक कार्यकर्त्ता शामिल थे,लेकिन इसका राजनीतिक लाभ ममता बनर्जी को ही मिला। आखिरकार 2011 के बंगाल विधान सभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत के साथ तृणमूल काँग्रेस सत्ता में आयी और ममता बनर्जी बंगाल की पहली महिला मुख्यमन्त्री बन गयी। शायद ही किसी ने यह सोचा हो कि राजीव गाँधी के पीछे मासूम सी खड़ी रहने वाली लड़की ममता कॉंग्रेस से निकलकर काँग्रेस से बड़ी हो जाएगी और पूरे बंगाल की नकेल अपने हाथ में ले लेगी। बंगाल के गाँवों में ममता ने जन कल्याण का अच्छा काम किया और येन केन प्रकारेण नक्सल समस्या को नियन्त्रित किया।

आज जब ममता बनर्जी अपने शासन का दस वर्ष पूरा करने वाली है, वह अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। उनकी यह कठिनाई 2019 के लोक सभा चुनाव से नहीं जब भाजपा ने उसे कड़ी चुनौती दी थी, बल्कि उससे भी दो वर्ष पहले से शुरू हो गयी थी जब उनके भरोसेमन्द नेता और पार्टी में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले मुकुल राय ने उनका साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। ममता के हम उम्र मुकुल रॉय को तीक्ष्ण राजनीतिक बुद्धि का अचूक रणनीतिकार माना जाता है। ममता पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह बंगाल की राजनीति में अपने भतीजे की प्रमुखता के लालच में पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों को दरकिनार कर रही हैं, साथ ही चुनाव की रणनीति में प्रशान्त किशोर की प्रमुखता भी पार्टी के नेताओं को रास नहीं आ रहा। इन सब का खामियाजा ममता को पार्टी में मचे भगदड़ के रूप में झेलना पड़ रहा है Image result for नयी पार्टी तृणमूल काँग्रेस ब

पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान बंगाल में भाजपा ने नारा दिया था- ‘19 में हाफ, 21 में साफ’। हाफ का मतलब लोक सभा के कुल सीटों(42) का आधा 22, भाजपा 18 सीटों पर जीतकर अपने लगाए नारे के लगभग पास पहुँच गयी थी। और साफ का मतलब है इस विधान सभा चुनाव में भाजपा तृणमूल की सत्ता को उखाड़ देना चाहती है,इसलिए वह 200 सीटों का नारा लगा रही है। यदि वह 125 सीट तक भी पहुँच जाती है तो फिर जादुई आँकड़े (148) को छूने से उसे रोकना ममता के लिए कठिन इसलिए होगा कि जोड़ तोड़ और खरीद फरोख्त के खेल में भाजपा को महारथ हासिल है।

2014 के लोक सभा चुनाव में जब मोदी लहर थी तब ममता ने बंगाल में भाजपा को 2 सीटों से आगे बढ़ने नहीं दिया लेकिन वही भाजपा 2019 के चुनाव में 18 सीटें जीतने में कामयाब हुई है तो इसलिए कि इन पाँच वर्षों में ममता के नेतृत्व और कार्यशैली के कारण तृणमूल की लोकप्रियता घटी है और इसके कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है, दूसरी तरफ हिन्दुत्व के आक्रामक उभार के कारण भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ी है। भाजपा के विस्तार का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2019 के अगस्त तक में भाजपा के सदस्यों की कुल संख्या 18 करोड़ से अधिक हो गयी है,इस संख्या का एक अर्थ यह भी है कि अब दुनिया में आठ देश ही भाजपा से बड़े हैं।ऐसे में भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊँचा होना स्वाभाविक है।

ममता की मुश्किल यह भी है कि कल तक जो नेता कार्यकर्त्ता तृणमूल के लिए जी जान से लगे हुए थे वे ही आज भाजपा की तरफ से लड़ रहे हैं। इसलिए ममता की चुनौती दोहरी बनी हुई है क्योंकि वह भाजपा से लड़ रही है और तृणमूल से भी। हालाँकि दलबदल तो पूरे देश की राजनीतिक शैली बनी हुई है लेकिन बंगाल में यह संकट ज्यादा है। काँग्रेस,माकपा,तृणमूल और भाजपा सभी पार्टियों के नेताओं की आवाजाही सभी पार्टियों में निर्बाध बनी हुई है। 

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असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और अब्बास सिद्दकी का सेक्युलर फ्रंट तथा कॉंग्रेस और माकपा का गठबन्धन भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। एक सम्भावना यह भी है कि कॉंग्रेस के अब्दुल मन्नान अब्बास सिद्दकी को सेक्युलर फ्रंट से अलगा कर कॉंग्रेस में ले जाए। जो भी हो इनमें से कोई सत्ता का दावेदार नहीं है, लेकिन सत्ता के खेल को बनाने और बिगाड़ने में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। बंगाल में मुसलमानों की आबादी तीस प्रतिशत है और 100 से 110 सीटों पर इनका निर्णायक प्रभाव रहता है। ये मतदाता आम तौर पर तृणमूल के साथ रहते हैं, इन्हें तोड़ने में यदि कोई कामयाब होता है तो यह बात भाजपा के पक्ष में जाएगी। उल्लेखनीय है कि ओवैसी की पार्टी ने बिहार के चुनाव में पाँच सीटें जीतकर अपना दमखम दिखा दिया है।

एक चुनावी पदयात्रा में ममता बाउल कलाकारों के साथ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की तस्वीर हाथ में लिए दिखती हैं, भाजपा ने भी स्वामी विवेकानन्द पर फूल माला चढ़ाना और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर कार्यक्रम शुरू कर दिया। वह बार बार अपने संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ले रही है जिन्होंने कॉंग्रेस से अलग होकर भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी। प्रतीकों की छीना झपटी से लेकर सड़कों पर खून खराबा जारी है। महापुरुषों के नाम से बंगाल बदलने वाला नहीं है। यहाँ जो राजनीतिक भ्रष्टाचार और हिंसा है उससे मुक्ति पहली जरूरत है। विधान सभा चुनाव में जीत चाहे जिसकी हो बंगाल हारता हुआ दिख रहा है इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ और नहीं हो सकता।

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लेखक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'संवेद' और लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक 'सबलोग' के सम्पादक हैं। सम्पर्क +918340436365, kishankaljayee@gmail.com

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