पश्चिम बंगाल

बंगाल की नयी राजनीतिक परिस्थितियों की पड़ताल

 

बंगाल में ‘अच्छे दिन’ की सरकार 

अर्थात् ममता बनर्जी का पराभवकाल 

अर्थात् बंगाल की नयी राजनीतिक पारी 

अर्थात् बंगाल की 70 साला राजनीति में पैराडाइम शिफ्ट

पश्चिम बंगाल जैसी विराट जनसंख्या के राज्य के राजनीतिक इतिहास ने आजादी के बाद केवल तीन पड़ाव देखे थे। पहला पड़ाव स्वतन्त्रता संग्राम के ही विस्तार के रूप में पुरस्कारस्वरूप कॉग्रेस की देखरेख में शुरु हुआ, दूसरा ज्योति बसु के नेतृत्त्व में वामफ्रंट की सरकार के रूप में और तीसरा वामफ्रंट को जड़ों से उखाड़ फेंकनेवाली तृणमूल कॉग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक उभार के रूप में।

इन तीनों पड़ावों में बंगाल का सर्वाधिक बड़ा हिस्सा वामफ्रंट के पास रहा। कह सकते हैं कि आज की बंगाल की तकनीकि व्यवस्था और राजनीतिक-सामाजिक निर्मिति में वामफ्रंट की निर्णायक भूमिका रही है। वामफ्रंट की ही संरचनात्मक निर्मितियाँ बंगाल की फ्रेमिंग में नींव की तरह की भूमिका में रही हैं। वामफ्रंट का बंगाल के जीवन में इतना दखल रहा कि लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक के फैसले उनके मज़बूत  हस्तक्षेप से तय होते थे। लोगों के घर रंगरोदन से लेकर पति पत्नी तक के झगड़े के निपटारे पार्टी कार्यालयों में होने लगे। 

सीपीएम ने बंगाल में पार्टी-कार्यालयों को इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया कि सरकार के बाद या सरकार ही की तरह वे दो नंबर की महत्त्वपर्ण इकाइयाँ हो गयीं।

राज्य में यह एक अघोषित फरमान जैसा सत्य था कि राज्य की देखरेख और व्यवस्था पार्टी-कार्यालयों से होंगी। यह सरकार के लिए निचले स्तर की सरकारी इकाई की तरह की कोई व्यवस्था हो गयी। सरकार ने अपनी राजनीतिक इकाइयों को अनपौचारिक रूप से सरकारी संस्थाओं की तरह चिन्हित कर दिया। परिणामस्वरूप राज्यभर में कुकुरमुत्तों की तरह पार्टी कार्यालयों की लड़ियाँ लग गयीं। हर दूसरी गली में सीपीएम के पार्टी कार्यालय बनने लगे जिनपर उनकी पार्टी के लाल झंडे अहर्निश लहराने लगे। ये झंडे सीपीएम के वर्चस्व के विजय प्रतीक थे। भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन: 100 साल के सफ़र के पाँच पड़ावों ने बदला इतिहास - BBC News हिंदी

इस सत्ता मद ने लोकतन्त्र की तमाम विशेषताओं के परे की मनःस्थिति पैदा कर दी जहाँ पार्टियाँ संवाद और सहअस्तित्त्व की जगह आदेश और फैसलों पर विश्वास करने लगती हैं। नंदीग्राम या सिंगूर उसी मद या अहंकार का प्रकटीकरण था। जहाँ जनता से संवाद या सहयोग की जगह शासन के बल पर दमन और अहंकार के पोषण की प्रवृत्ति हावी रही। बंगाल जो अपनी लोकतांत्रिक सामाजिक पारिवारिक संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध था उसे तानाशाही के लाल झंडे के तले जीना पड़ा। लोग किसी बदबूदार तंग कमरे की घुटन की तरह की घुटन में रहने को जैसे अभिशप्त हो गये। सीपीएम का, राज्य के जनजीवन में ऐसा दखल था कि आमजन बिना उनकी जानकारी के कुछ भी नहीं कर सकते थे। इस घुटनभरी आबो-हवा में घुट-घुटकर मरने के अतिरिक्त और कोई उपाय न था। लेकिन जीवन के नियम कभी नहीं बदलते।

मनुष्य अपार संभावनाओं और जिजीविषाओं का केन्द्र होता है। वह मरने की तमाम संभावनाओं को तबतक झुठलाते रहता है जबतक मृत्यु उसे अपनी छाया से ग्रस न ले। बंगाल की जनता ने भी वही किया। उन्होंने अपने बचाव के लिए क्रूर शासन की हाँ-में-हाँ मिलाना शुरु कर दिया।  सीपीएम ने शासन की ऐसी प्रणाली विकसित की है कि जनता के पास और कोई उपाय ही नहीं बचता। सो जनता बड़े पैमाने पर सीपीएम पार्टी के सदस्य होने लगी। जो असहमत होते वे आश्चर्यजनक ढंग से गायब हो जाते। वह बंगाल का ऐसा दौर था जिसकी तुलना योरोप या रूस के अंधकारकाल से की जा सकती है। लोगों में सत्ता के कहर से बचने के लिए सत्ता के साथ जुड़ने की ऐसी लहर चली कि एक समय ऐसा लगता था कि बंगाल में हर दूसरा आदमी सीपीएम पार्टी का सदस्य है। उस स्थिति की भयंकरता का अंदाजा लगाने के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक आँकड़े की सहायता ली जा सकती है। कलकत्ता विश्वविद्यालय में काम करनेवाले 1648 कर्मचारियों में से 1328 सीपीएम पार्टी के सदस्य थे और जो नहीं थे वे तटस्थ थे या रिटायरमेंट की उम्र में पहुँच चुके पुरानेलोग थे। 

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उस समय ऐसा लगता था कि बंगाल से वामफ्रंट को हटाना असंभव है क्योंकि जिस पार्टी के पास इतने और ऐसे सदस्य हों तथा जसका राज्य के शासन में ऐसा दखल हो उसे हराना इस देश और काल के बस की बात नहीं। सीपीएम के राज में समर्थक नहीं सदस्य होना पड़ता था। लोग सीपीएम के समर्थक या सदस्य होने की होड़ लगाए रहते उस समय किसी को कल्पना भी नहीं थी कि यह सदस्यों या समर्थकों का विराट हुजूम असल में न तो समर्पित है और न ईमानदार बल्कि इसके हृदय में सीपीएम के हार और खत्म होने का स्वप्न पल रहा है।

ऐसे ही समय ममता बनर्जी  सीपीएम के विरोध के प्रतीक के रूप में उभरीं। शुरु में उन्हें मज़ाक की वस्तु समझा गया। लोग उनकी हँसी ठिठोली करते, उनपर चुटकुले बनते। बंगाल में शायद ही कोई एक व्यक्ति हो जो उन्हें गंभीरता से लेता हो। लेकिन धीरे-धीरे परिदृश्य बदला तो दृष्टि भी बदली। वामफ्रंट के अत्याचार से उपजे घुटन ने ममता बनर्जी को मज़बूती देना शुरु कर दिया। इसी बंगाल ने देखा है लोग ममता को छू-छूकर आशीर्वाद देते, बूढ़ी औरतें पूड़ियाँ बनाकर लातीं और ममता कोसभाओं में, रोडशोज़ में कौर खिलातीं। वे वामफ्रंट के विरोध का रूपक बन चुकी थीं और धीरे-धीरे बंगाल की राजनीति के आकाश में ध्रुव तारा सी छा गयीं। क्या ममता बनर्जी के पतन से बंगाल में वामपंथ फिर से जिंदा होगा? - newstaknew

बंगाल में सीपीएम से घुट रहे जनमानस ने उन्हें किसी मसीहा सा देखा। अपनी घृणा और घुटन को एककर जैसे सारी शक्ति ममता के प्रतीक में भर दी कि यह प्रतीक उन्हें मुक्ति दिलाएगा। यह वर्ग मुँह से लाल सलाम कहता था लेकिन मन में लाल पताका के गिरने के स्वप्न को लिए जी रहा था। ममता बनर्जी ने उस स्वप्न को बल दिया। ममता बनर्जी ऐसे समय में यूँ उभरीं और बंगाल की सत्ता से एक समय के ख़ुदाओं को ज़मींदोज़ कर दिया। यह अचानक नहीं था कि सीपीएम के ज़माने में जो जनता ‘हाँ-में-हाँ’ मिलाती थी, ममता के उभार के समय सांस्कृतिक तौर पर उसी हां में हाँ का व्यंग्य खोज ले आई। जय गोस्वामी ने अपनी कविता ‘शासक के प्रति’ में वामफ्रंट के तानाशाही रवैये के प्रति बंगाल की जनता के 34 साला घुटन को इतने इंटेंस व्यंग्य से प्रकट किया था कि नन्दीग्राम-सिंगूर आंदोलन के समय वह कविता जैसे सीपीएम की ताबूत में लग रही अंतिम कील पर हथौड़े की तरह प्रयुक्त हुई।

लेकिन ममता बनर्जी की राजनीतिक शक्ति के स्रोत वामफ्रंट के शक्ति-केन्द्रों से ही निकले थे। राजनीति के सारे मानक, सारे गुण वामफ्रंट के ही थे। राज्य और समाज की सारी संरचनाएँ वे ही थीं बस शासक नए हो गये। प्रेमचंद की भाषा में कहें तो जॉन की जगह गोविन्द ने ले ली लेकिन यह गोविन्द भी निराला था। इसके पास जॉन के ही लोग थे जो लाल झंडे को छोड़ हरे को पकड़ लिया था। शुरु में तृणमूल कॉग्रेस के पुराने सदस्यों और कन्वर्टेड (वामफ्रंट से) सदस्यों में हिंसक झड़पें होती रहीं जो कमोबेश आज भी जारी हैं। ममता बनर्जी अपनी शुरुआती सभाओं में खुद को सच्चा-मार्क्सवादी भी कहतीं। असल में मार्क्सवादी विचारसरणी का बंगाल के राजनीतिक आकाश में ऐसा रंग-घुला था कि कोई भी इससे अछूता नहीं रहा।  वामफ्रंट का ही सारे सपोर्टिव सिस्टम ममता के साथ आ लगा था। वही मुस्लिम वोटबैंक वही सवर्णं वोट वही बंगाली जातीयता और पार्टी-कार्यालयों द्वारा सिस्टम-कंट्रोल का सारा का सारा पैटर्न वही।

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इन्हीं तीन पड़ावों में बंगाल की राजनीति सांस ले रही थी कि इधर अचानक भारत की राजनीति में नरेन्द्र मोदी और प्रकारांतर से हिन्दुत्त्व का तीव्र उभार हुआ और समूचा राजनीतिक परिदृश्य एक झटके में बदल गया। आज भारत की राजनीति के पुराने सारे मानक भरभरा के गिर गये हैं और राष्ट्रीय ही नहीं लोकल और पंचायत स्तर की राजनीति तक प्रभावित हुई है। आज ऊपर ही नहीं निचले स्तर तक की राजनीति के पुराने द्वंद्व भरभराकर टूट गये हैं और उन तमाम द्वंद्वों में एक छोर पर भारतीय जनता पार्टी आ गयी है। 

तमाम राज्यों में सारे पारंपरिक टकराव शिफ्ट होकर भाजपा की धुरी में सिमट गये हैं। लालू नीतिश दोस्ती हो अथवा अखिलेश यादव का मायावती से जुड़ने की पेशकश, शिवसेना का कॉग्रेस के साथ गठबंधन हो अथवा देशभर में भाजपा के बरअक्स दूसरी तमाम पार्टियों का एक मंच पर आना- यह बताता है कि आज भारत में राजनीति अपने तमाम छोरों से मुक्त होकर भाजपा की ओर देखने लगी है। इस बदलाव का पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी प्रभाव पड़ा और खुद को लिबरल तथा धर्मनिरपेक्ष कहनेवाला समाज आज मज़बूती जय श्रीराम और मोदी-मोदी करने लगा है।  वामपंथ ने नहीं, बल्कि ममता की तृणमूल ने बंगाल में आरएसएस को बढ़ावा दिया है | न्यूज़क्लिक

जैसा कि मैंने ऊपर बताया बंगाल में ज़मीन पर आज भी जो राजनीतिक-सामाजिक सेटअप है वह वामफ्रंट का ही है, सत्ता में शीर्ष बदला है लेकिन उसके सारे टूल्स पुराने ही हैं। शासन करने का तरीका हो अथवा व्यापार आदि को लेकर राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि सबपर मार्क्सवादी ढाँचागत निर्मिति हावी है। आज भी बंगाल पूँजीपतियों के लिए हेय दृष्टि रखता है। इसकी नीतियों में सर्वहारा और बुर्जवा का ऐसा रंगरोदन हुआ है कि पैसे की हर आमद को यह संदेह से देखता है। एक आमबंगाली वामफ्रंट द्वारा पूँजी और सर्वहारा के बनाए फ्रेमिंग का ऐसा आदी हो गया है कि आज भी उससे मुक्त नहीं हो सका है। एक समय बड़ाबाज़ार मारवाड़ी पूँजीपतियों के बहाने पूँजी के उभार का सबसे बड़ा केन्द्र था लेकिन आज पूँजीपति बंगाल से पलायन कर रहे हैं। देश का पूँजीपति बंगाल के बंद(हड़ताल) संस्कृति से ऐसा डरा हुआ है कि यहाँ खुद के लिए एक मुसलसल घुटन की सी स्थिति पाता है।

ऐसे में बंगाल का आकाश हर तरह से बाहरी हवा के लिए बंद हो चुका है। वह यथास्थिति में जीने को अभिशप्त है। बंगाल में जो व्यक्ति 30 साल पहले किसी पेड़ के नीचे चाय बेचता था तो वह आज भी उसी पेड़ के नीचे वैसे ही चाय बेच रहा है। उसकी स्थिति में न कोई सुधार आया है और न राज्य के बाजार में ही कोई उछाल या परिवर्तन आया है। ममता बनर्जी ने जिस परिवर्तन के नारे के साथ सीपीएम के घुटन भरे शासन के विकल्प का स्वप्न दिया था दुर्भाग्य से वह वैसा ही बना हुआ है बल्कि पहले से अधिक तीव्रता से सांस ले रहा है। उसपर भाजपा के उभार के काउंटर में ममता बनर्जी ने मुस्लिम तुष्टीकरण को और तीव्रता दे दी जिसकारण बंगाल में असंतोष फैल गया।

लोगों के अंदर का छुपा हिन्दूवाद इसतरह के भेदभाव से आहत होना शुरु हुआ जिसे भाजपा के उभार ने सांकेतिक बल दिया। आज बंगाल की जनता इस पुरानी स्थिति को जड़ से उखाड़ फेंकने को आतुर हो गयी है। उसने अपनी मोनोटोनस और एकरस जिन्दगी में बदलाव का स्पव्न देखना शुरु कर दिया है।यह नयी बयार परवर्ती पूँजीवाद के उभार में सोशल मीडिया की खिड़की से बही है। उसे पता है कि भाजपा का आगमन ही बंगाल के पारंपरिक दृष्टि को बदल सकता है। बंगाली मानुष लगातार देख रहा है कि दूसरे राज्य बंगाल से किन मायनों में भिन्न हैं। वह भाजपा को उस बदलाव के पूरक के रूप में देख रहा है। असल में भारतीय जनता पार्टी ही वह अकेली ऐसी पार्टी है जिसका अपना स्व है और दुनिया के तमाम विचारधारात्मक फैशनों और परिवर्तनों के बावजूद 1925 से आजतक उसमें कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की कमान जिसको मिलने वाली है, वो नाम बड़ा चौंकाने वाला है

इसलिए दूसरे किसी जगह के रंग में रंगकर वहीं की संस्कृति को अपना लेते हैं जबकि भाजपा हर जगह अपनी संस्कृति के प्रोजेक्शन में विश्वास रखती है। उसने असम को, कश्मीर को, कर्नाटक को, महाराष्ट्र को और यहाँ तक की दिली को भी अपने रंग में रंग दिया है। बंगाली साफ-साफ देख पा रहे हैं कि भाजपा का अपना अलग रूप है, रंग है, तेवर है, तरीका है।उसका पूँजीवाद को लेकर जो खुला अप्रोच है वह बंगाल के आकाश को पूर्णतः बदल सकता है और बंगाल की यथास्थिति को सच में एक विकल्प दे सकता है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी का अप्रोच वामफ्रंट (और ममता बनर्जी से भी) से एकदम अलग है।

जिस टाटा के लिए बुद्धदेव और ममता की द्वंद्वांत्मक रसाकस्सी ने बंगाल को नर्क बना दिया था, उसी टाटा को गुजरात के तबके मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने यहाँ स्वर्ग उपलब्ध करा दिया था। आज की लड़ाई सीधे-सीधे इसी दो दृष्टियों की है कि ममता बनर्जी के शासन में निवेश विहीन बंगाल चाहिए या भाजपा के नेतृत्त्व में दिल्ली या मुम्बई की तरह खुला बाज़ार। सड़ रहे, पुराने हो चुके बंगाल को दिल्ली की, मुम्बई की हवा लग गयी है। उन्हें भी अपने महानगर उपाधि को सही मायने में अर्थ देना है। वर्ना वे अच्छी तरह जानते हैं कि कलकत्ता एक विकसित गाँव से बढ़कर नहीं है, उसका महानगर रूप भाजपा ही दिला सकती है।

भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में ममता के किले को ध्वस्त करने के लिए उन्हीं के शासन से सूत्र खोजे हैं। बंगाल की राजनीति के मुख्य आधारों को अपने हिन्दुत्त्व के एजेंडे के बीजों से पाट दिया है। बंगाल की राजनीति की पड़ताल के बाद तीन ऐसे बिन्दु उभरते हैं जिनपर काउंटर तैयार करके भगवाधारियों के लिए बंगाल फतह आसान हो जाएगा। 

  1. पूँजी निवेश का खुला बाजार। सीपीएम और तृणमूल के शासन में बंगाल जो कि बंद समाज हो गया था उसे भाजपा के रूप में खुलने का अवसर मिल रहा है। इसे बंगाली जनमानस ने ठीक से समझ लिया है।
  2. हिन्दुत्त्व तो भाजपा की मूल शक्ति ही है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत भी यही है और कमज़ोरी भी। वह जब-जब जीती है तब इसी हिन्दुत्त्व के कारण और हारी भी है तो इसी के कारण। आज बंगाल के ओठे हुए आदर्श और उदारवाद की इमारत ढह गयी है। मुस्लिम मोर्चे के इंटेंस उभार ने बंगाल के उन तमाम आदर्शों के प्रति संदेह और अविश्वास को जन्म दिया है। जो बंगाली भाजपा को ताउम्र हेय दृष्टि से देखते रहे, उससे जुड़ना बौद्धिकता के खिलाफ समझते रहे आज उसी से जुड़ने और बंगाल में स्थापित करने को लालायित तथा आतुर फिर रहे हैं। असल में परवर्की पूँजीवाद अपने साथ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के उदारवाद के दार्शनिक आधारों के प्रति संदेह लेकर अवतरित हुआ है। इसने दुनिया को दक्षिणपंथ की ओर मोड़ा है। आज दुनियाभर में दक्षिणपंथ की सरकारें बन रही हैं तो इसकी यही वज़ह है। भारत और बंगाल भी अपवाद नहीं।
  3. प्रतीक और रूपकों में बंगाल में आदर्शों की शिफ्टिंग भाजपा का मज़बूत पक्ष है। भाजपा के काम करने का एक अनोखा तरीका है। वह लड़ाई के समय उस परिवेश में या तो अपने नायक स्थापित करती है अथवा पुराने नायकों को श्रीहीन कर नया रूप दे देती है। राष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गाँधी, सरदार पटेल और डॉ अंबेडकर को मोदी ने ऐसे ही अपने पाले में कर लिया तो विवेकानंद और सुभाषबोस के द्वारा नेहरू के रूपक का मज़बूत विलोम तैयार कर दिया है।

बंगाल पर बात करते हुए नरेन्द्र मोदी लगातार बेलूरमठ और दक्षिणेश्वर मंदिर का जिक्र करते हैं। अपने वक्तव्यों में वे लगातार इसका जिक्र करते हैं कि अपने शुरुआती दिनों में वे बेलूरमठ आते रहे हैं और स्वामी विवेकानंद के प्रति अपने समर्पण को तो वे सालों से प्रकट करते रहे हैं। अभी दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति की स्थापना और विमोचन के बहाने मोदी और भाजपा ने बहुत दूर की कौड़ी खेली है। यह असल में प्रतीकात्मक लड़ाई है। ममता बनर्जी कलकत्ते में कालीघाट से चुनाव लड़ती हैं। कालीघाट बंगाल में माँ काली के विश्वप्रसिद्ध मंदिर का केन्द्र है। वैसे भी बंगाल शाक्त प्रदेश है। यहाँ स्त्रियों की पूजा होती है।

नरेन्द्र मोदी और भाजपा ममता बनर्जी के कालीघाट का जवाब दक्षिणेश्वर से देना चाहते हैं। वे पिछले 44 सालों से उपेक्षित दक्षिणेश्वर और बेलूर मठ को फिर से राजनीति के केन्द्र में लाकर ममता और कालीघाट का विलोम तैयार करना चाहते हैं। दक्षिणेश्वर ही रामकृष्ण परमहंस की कर्मस्थली रही है। वहीं के काली मंदिर में वे पुजारी रहे तथा बेलूरमठ स्वामी विवेकानंद की। ऐसा करके भाजपा बंगाल की मानवतावादी राजनीतिक जमीन को हिन्दुत्त्ववादी तो कर ही रही है लेकिन बंगाल की राजनीति का केन्द्र भी शिफ्ट कर रही है। यह कालीघाट से दक्षिणेश्वर की ओर की यात्रा है। देखते ही देखते बंगाल की मीडिया का समूचा फोकस बेलूरमठ की ओर हो गया है। अर्थात् सीपीएम और तृणमूल के रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मानवतावाद का विलोम स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र और हिन्दूवाद। यह प्रतीकों और आदर्शों की शिफ्टिंग का खेल है। मोदी इस खेल में सफल हो रहे हैं तथा बेलूरमठ के रूपक को स्थापित करने में शुरुआती सफलता प्राप्त कर चुके हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती, PM मोदी समेत इन दिग्गजों ने किया नमन

 इसी साल जनवरी में सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बंगाल आगमन इसी प्रतीक और रूपकों की लड़ाई के अर्थ में महत्त्वपूर्ण था। नरेन्द्र मोदी और भाजपा बंगाल की मूल बहस को रवीन्द्रनाठ से शिफ्ट करके स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस की ओर मोड़ना चाहते थे और हो भी वैसा ही रहा है।

जिस भाजपा को सभाओं में 100 लोग भी नहीं मिलते थे उसे हज़ारों की संख्या में लोग मिल रहे हैं, रोडशोज़ में अटी पड़ी भीड़ और राज्यभर में जयश्रीराम के नारे मिल रहे हैं। लाल सलाम और माँ माटी मानुष की जय के नारों वाले बंगाल में जय श्रीराम का उद्घोष एकदम नया फिनोमिना है। भाजपा ने बंगाल की यथास्थिति में गुणात्मक परिवर्तन ला दिया है और सूक्ष्मता से देखने पर यह एहसास होगा कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में यह पहली बार एक सच्चा विकल्प बनकर आई स्थिति है क्योंकि पुराने परिवर्तन केवल व्यक्तियों के परिवर्तन थे, नीतियों और शैली में वे तीनों पड़ाव एक से रहे हैं लेकिन भाजपा की नीतियाँ और शैली और आचरण तीनों ही बंगाल के लिए एकदम नया अनुभव है।

बंकीम, विवेकानंद,श्रीअरविन्द और सुभाष की धारा को पुनर्जीवित करती इस नयी विचारधारा के प्रति बंगाल ने बाँहें पसार दी हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि भाजपा को बंगाल में विराट समर्थन मिल रहा है। बंगाल से बाहर के लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि बंगाल में शहर, ग्राम के पीछे-पीछे चलता है। बंगाल का शहरी वर्ग सुविधावादी और सत्ता की हाँ-मेंहाँ मिलाकर चलने वाला है इसलिए वह सदैव सत्ता के साथ खड़ा होता है जबकि गांव बदलाव के जनक होते हैं। गाँवों में हवा बदलते ही शहर पीछे-पीछे हो लेता है। कॉग्रेस को हराने में भी ग्रामीण बंगाल ने सीपीएम को पहले अपनाया था, शहर ने बाद में, टीएमसी के समय भी यही हुआ और आज भाजपा को भी पहले ग्रामीण बंगाल ने ही अपनाया है। यानी जीत की यात्रा सही दिशा में जा रही है।

बंगाल में पिछले 7-8 सालों में अजेय बनी हुई ममता के चेहरे पर पिछले दो सालों में आए तनाव को देखकर बंगाल की बदली बयार को आसानी से समझा जा सकता है। जय श्रीराम के नारे से ममता ऐसे बिदकती हैं मानो किसी साँड़ ने लाल कपड़ा देख लिया हो। ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति की धुरी थीं लेकिन आज उनका समूचा जेस्चर काउंटर पर चल रहा है। यानी वे विधायक की जगह नकार में जीने लगी हैं और तमाम नीतियाँ भाजपा के जवाब में बना रही हैं। इन चीजों ने भाजपा को बंगाल में बढ़त दे दी है। 

मैं पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुए नए बदलाव को यहां के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों के बहाने, कुछ चित्रों और चिन्हों के ज़रिए प्रकट करने का प्रयास करूँगा और फिलहाल इन्हीं चित्रों के साथ आपको छोड़ जाना चाहूँगा। इन चित्रों के ज़रिए आप अपनी बुद्धि से यह तय करें कि बंगाल का अगला चुनाव क्या कहता है- 

दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा पर्व कैसे बन गया ? | Durga Puja, Bengal

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा मतलब राष्ट्रीय पर्व या उससे भी बड़ी कोई चीज़। इसदिन पूरा बंगाल ख़ुद को तैयार करता है। नए-नए कपड़े पहनता है, घरों में रंगरोदन करता है, ऐसा लगता है  मानो पूरा बंगाल इसी पर्व के सेलिब्रेशन के लिए ही कमा रहा है, जी रहा है। आप सालभर बंगालियों को दुर्गापूजा की तैयारियों में व्यस्त पाएंगे। आम बोलचाल की भाषा में, व्यवहार में दुर्गा पूजा में यह करेंगे, वह करेंगे के मुहावरे प्रयोग में लाए जाते हैं। इसबार दुर्गा पूजा में यह करना है, या पैसे इकट्ठा कर रहे हैं क्योंकि दुर्गापूजा में वह करेंगे। 

आप इसी से अंदाजा लगाइए कि बंगाल में दुर्गापूजा क्या महत्त्व रखता है। इस दुर्गापूजा के पर्व में हर बंगाली 4-6 कपड़े खरीदता है। हर दिन के मेले के लिए नए कपड़े। उस बंगाल में पिछले पूजा में स्त्रियों के लिए बने गहनों में ॐ और कमलफूल छाप के गहने बने। सड़कों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स में भारतीय परिधानों में लगी स्त्रियों की आदमक़द तस्वीरों में कान के झुमकों और गले के हारों में हिंदूवादी प्रतीकों को चिन्हित करते गहने दिखे। ख़ुद को मानवतावादी और धर्मनिरपेक्ष कहने वाला बंगाल पहली बार हिन्दूवादी प्रतीकों के प्रति इस क़दर पैशनेट दिखा। I Was Asked to Remove My Hijab to Appear For the NEET Exam

दूसरा चित्र, कलकत्ते के एक सबसे पुराने और बड़े गर्ल्स कॉलेज में यहाँ पिछले दिनों तृतीय वर्ष की एक मुस्लिम छात्रा बुर्का पहनकर कॉलेज आई तो गेट पर दरवान ने उसे रोक लिया। वह लड़की पिछले तीन सालों से लगातार बुर्के में आती रही है लेकिन यह पहला मौका था जब उसके साथ यह घटना घटी। वज़ह थी दरवान की बदली हुई दृष्टि। दरवान का कहना था कि कॉलेज जैसी जगह पर चेहरा ढककर आने का सिस्टम ठीक नहीं है। यहाँ बुर्का-टुर्का नहीं चलेगा। कॉलेज के प्रिंसिपल और वरिष्ठ शिक्षकों ने बीचबचाव कर घटना को आया गया कर दिया। हालांकि दरवान का अंतिम वक्तव्य यह था कि आपलोग कह रहे हैं तो इसे कॉलेज में ऐसे ही घुसने दे रहा हूँ लेकिन मेरा मन यह गवाही नहीं दे रहा कि एक सार्वजनिक जगह पर इस तरह पर्दा करके कोई आए।

तीसरा चित्र, बंगाल में सरकारी संस्थानों में कर्मचारियों का किसी-न-किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव रहता है। यह ग्रुप सदैव सत्ता के साथ जुड़ना पसंद करता है। फिलहाल बड़े पैमाने पर लोग भाजपा से जुड़ने लगे हैं। आज हर सरकारी संस्थान में भाजपा के लोग होने लगे हैं। शिक्षण- संस्थानों में एबीवीपी के सदस्यों की संख्या पढ़ने लगी है और जगह-जगह जय श्रीराम और भारत माता की जय के नारों से दीवारें पटी पड़ी हैं। After joining BJP, Suvendu performed power in Kanthi, said- 200 this time

चौथा चित्र, पिछले साल यानी 2020 के दिसम्बर में भाजपा ने ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एक प्रदर्शन किया था। पानी में जैसे जलकुम्भी के पौधे हर दूसरे कदम तैरते दिखते हैं वैसे ही भाजपा के कार्यकर्ता सड़कों पर नारे लगाते दिख रहे थे। इतनी बड़ी संख्या में भाजपा के पास सदस्य हैं, यह देख सभी दंग हुए यानी जिस बंगाल में भाजपा का कोई नामलेवा नहीं था आज वहाँ सड़कों पर इतने सदस्य हैं कि सांस लेने तक की जगह नहीं।  और पुलिसवाले उनसे आदर से पेश आ रहे थे। नौकरशाह और पुलिसवालों के आदर के क्या मायने हैं, यह आप तय कीजिए।

 पाँचवां चित्र, वामफ्रंट को हराने के लिए जो भीड़ ममता के पास जुटी थी वह एक-एक कर उनसे छिटक रही है और भाजपा में शामिल हो रही है। इतनी बड़ी संख्या में तृणमूल से इस्तीफा देकर भाजपा में जाने वाले नेताओं के गंभीर मायने हैं।

ऐसे सैकड़ों चित्र खींचे जा सकते हैं जिनसे बंगाल के बदल रहे नये राजनीतिक परिवेश को समझा जा सकता है। बंगाल में ‘अच्छे दिन’ आलेवाले हैं। बंगाल ने भाजपा के लिए पलक पावड़े बिछा लिए हैं, बस ताजपोशी की देर है।

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लेखक सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज, कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापक (हिन्दी विभाग) हैं। सम्पर्क +919831615131, adityakumargiri@gmail.com

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