मुनादी

जनान्दोलन ऐसा जो राजनीति बदल दे

 

व्यवस्था में परिवर्तन की चाह से आम जन द्वारा किये गये राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को ही जनान्दोलन कहा जा सकता है। भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम बना रहा।उस गुलामी की जकड़ से भारतवासियों  के मुक्त होने की छटपटाहट ने  एक राजनीतिक आकांक्षा को जन्म दिया। भारत की आजादी के लिए 1857 के सिपाही विद्रोह समेत कई जनान्दोलन हुए,हजारों लोगों को अपनी शहादत देनी पड़ी, अन्ततः  महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चले अहिंसक आन्दोलन से  देश को  1947 में आजादी मिली।इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत का स्वतन्त्रता संग्राम दुनिया के कुछ महत्त्वपूर्ण,लम्बे और निर्णयकारी जनान्दोलनों में से एक है।

आजादी की लड़ाई के दौरान  भारत के नवनिर्माण के जो सपने देखे गए थे,1960 आते-आते वे टूटने लगे।देश महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अराजकता के दलदल में बुरी तरह धँस गया। क्षोभ और आक्रोश की व्याप्ति बढ़ने लगी। आखिरकार जनाक्रोश ने राजनीतिक अभिव्यक्ति का आकार ले लिया। गुजरात के कुछ छात्रों की माँगों से शुरू हुआ आन्दोलन(1974) बिहार का भी आन्दोलन बन गया और देखते देखते यह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश का व्यापक जनान्दोलन  बन गया।1975 में लगाए गये आपातकाल ( तानाशाही रवैये) के खिलाफ भारत के मतदाताओं ने कठोर  निर्णय लेते हुए इन्दिरा गाँधी की सरकार को उसकी औकात बता दी।1974 का आन्दोलन संसदीय राजनीति की दृष्टि से भी अब तक का सबसे बड़ा जनान्दोलन है, यह बात अलग है कि इस जनान्दोलन के नतीजे टिकाऊ नहीं रहे। बाद में भी  सत्ता परिवर्तन के लिए  कई आन्दोलन हुए।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बोफोर्स घोटाले के मुद्दे पर चले आन्दोलन ने केन्द्र में राजीव गाँधी की सरकार गिरा दी तो लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर चले अण्णा आन्दोलन की  राजनीति से उभरे अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में शीला दीक्षित की  कॉंग्रेसी सरकार को शिकस्त दी।  अलग -अलग राज्य की माँगों ने भी संसदीय राजनीति के सागर में सत्ता के कई टापू बनाये। इन तमाम परिवर्तनों में सिर्फ सत्ता में हिस्सेदारी बदली,शासन की प्रकृति में कोई फर्क नही आया। आजादी के 70 वर्षों के बाद भी देश की सामाजिक व्यवस्था और  राजनीतिक संस्कृति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ क्योंकि सत्ता ही हमेशा राजनीति का साध्य बनी रही|

परिवर्तन की राजनीति के नाम पर भी सत्ता परिवर्तन का ही  चक्र चलता रहा, इसलिए यह अकारण नहीं कि 1974 का जयप्रकाश आन्दोलन (जो एक राष्ट्रव्यापी जनान्दोलन था) और 2011 का अन्ना आन्दोलन(जिससे लोगों को काफी उम्मीद हो गयी थी) को भी सत्ता के उपकरण बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा| यह एक अजीब विसंगति है कि मौजूदा  लोकतन्त्र का स्वभाव पुराने राजतन्त्र से ज्यादा क्रूर है, और यह क्रूरता देश में नयी आर्थिक नीति लागू होने के बाद से लगातार बढ़ती रही है| अब तो भूमण्डलीकरण और उदारीकरण का रंग भारत पर इस तरह चढ़ा है कि यह एक आजाद मुल्क से ज्यादा दुनिया भर में लूट खसोट मचाने वाली विश्व की  व्यापारिक संस्थाओं का जूनियर पार्टनर लगता है| ऐसे में देश भर के नागरिकों का उपभोक्ता बन जाना कोई हैरतनाक बात नहीं है| इस करुण सच्चाई पर किसे रोना नहीं आएगा कि इस देश का अन्नदाता आत्महत्या के लिए विवश है और  ज्ञान एवं  अध्यात्म की दुनिया का विश्व गुरु आज  भोग के दलदल में धंसता जा रहा है|

आजाद भारत को सँवारने में देश की संसदीय राजनीति असमर्थ रही है,यह पिछले सत्तर वर्ष के इतिहास में भारत की सबसे बड़ी विफलता है| सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में लोकतन्त्र आज कई तरह की चुनौतियों से घिरा हुआ है। लोकतन्त्र के मौजूदा परिदृश्य का तो आलम यह है कि लोक बेहाल है और तन्त्र पूरी तरह नष्ट और भ्रष्ट हो चुका है| हर क्षेत्र में  विकल्प की घोर  जरूरत महसूस होने लगी है| इसलिए वैकल्पिक शब्द आज जीवन और जगत के लिए सबसे ज्यादा  महत्त्वपूर्ण हो गया है| वैकल्पिक शिक्षा, वैकल्पिक चिकित्सा,वैकल्पिक राजनीति,वैकल्पिक मीडिया,वैकल्पिक विकास,वैकल्पिक अर्थव्यवस्था,वैकल्पिक खेती……मतलब एक मुकम्मल  विकल्प से ज्यादा बड़ी जरुरत फिलहाल किसी और चीज की नहीं है|

सरकार के प्रदूषित और जनविरोधी संकल्पों के विरुद्ध विकल्प की आवाज पहले भी उठती रही है| 1970 के दशक में पेड़ को बचाने के लिए मशहूर  चिपको आन्दोलन देश भर में सफल  हुआ,गौरा देवी इसकी प्रणेता थीं| 89 वर्ग किलोमीटर में फैले केरल की शान्त घाटी में सरकार कुन्तिपूंझ नदी पर बिजली निर्माण के लिए बाँध बनाना चाहती थी,लेकिन जनता के प्रबल  विरोध और तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी के हस्तक्षेप से यह परियोजना स्थगित हो गयी| नर्मदा नदी पर बन रहे अनेक बाँधों के खिलाफ मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा  आन्दोलन अब भी चल रहा है| अनिल प्रकाश के नेतृत्व में गंगा मुक्ति आन्दोलन के माध्यम से गंगा पर जल माफिया के वर्चस्व को ख़त्म किया गया|

2012 में निर्भया के साथ जिस तरह का बर्बर बलात्कार हुआ उसके खिलाफ लगभग पूरा देश सड़क पर आ गया| ये तो कुछ आन्दोलनों के उदहारण हैं,इसतरह के छोटे-बड़े आन्दोलन देश भर में हो रहे हैं| लेकिन अब टुकड़ों के आन्दोलन से यह देश नहीं बचेगा, मुकम्मल विकल्प के लिए एक समग्र जनान्दोलन की जरुरत है, एक ऐसा जनान्दोलन जो देश की राजनीति को बदल दे| राजनीति अगर सही दिशा में बदल गयी तो देश बदल जाएगा|

.

कमेंट बॉक्स में इस लेख पर आप राय अवश्य दें। आप हमारे महत्वपूर्ण पाठक हैं। आप की राय हमारे लिए मायने रखती है। आप शेयर करेंगे तो हमें अच्छा लगेगा।

लेखक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'संवेद' और लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक 'सबलोग' के सम्पादक हैं। सम्पर्क +918340436365, kishankaljayee@gmail.com

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
3 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments


डोनेट करें

जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
sablog.in



विज्ञापन

sablog.in






3
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x