पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाभी मुसलमानों के हाथ में है

 

2021 में देश के पाँच राज्यों में विधान-सभा का चुनाव होने जा रहा है। ये राज्य हैं-पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी। असम को छोड़कर सभी जगह गैर-भाजपा सरकार है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, पुडुचेरी में कांग्रेस और तमिलनाडु में ‘एआईएडीएम’ की सरकार है। भाजपा 2021 में इन राज्यों में अपनी जीत हासिल कर एक नया कीर्तिमान स्थापित करना चाहती है।

इसी लक्ष्य को लेकर वह पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। वह पिछले दस वर्षों से लगातार इसी प्रयास में है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद इस प्रयास में तेजी आई है, जिसका फायदा पार्टी को 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला। पश्चिम बंगाल के लोकसभा की 42 सीटों में से 18 पर भाजपा की जीत हुई और प्रतिशत वोट में भी आश्चर्यजनक वृद्धि हुई।

पिछले 2016 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को मात्र तीन सीटों से संतोष करना पड़ा था। इसके पूर्व 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 सीटों पर जीत हासिल कर नई ऊर्जा से लैस होकर पार्टी अधिक सीटों की उम्मीद कर रही थी। इसलिए भाजपा ने 2016 के चुनाव में 291 सीट पर अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया था। 2014 में भी पूरे देश में मोदी की लहर थी। पर बंगाल मोदी के प्रभाव से अछूता रहा।

2019 के बाद बंगाल में भाजपा और तृणमूल के बीच जो राजनीतिक तनाव पैदा हुई है, उसके मद्देनजर 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नज़र है। 2016 के चुनाव के बाद से ही ममता बनर्जी सरकार को प्रमुख विपक्षी पार्टी ‘वाम मोर्चा व कांग्रेस’ (कुल 76 सीट) के बजाय ‘भाजपा’ (3 सीट) से लगातार कड़ी टक्कर मिल रही है। बंगाल में भाजपा की आक्रामक रणनीति की वजह से ज्यों-ज्यों चुनाव के दिन नजदीक आते जा रहे है, त्यों-त्यों ममता बनर्जी के खेमे में भगदड़ मची है। ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी और रणनीतिकार PK बंगाल में ममता का पतन सुनिश्चित कर रहे हैं - Bollyycorn

ममता बनर्जी के बहुत से करीबी नेता तृणमूल का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थामते नज़र आ रहे है। कारण तृणमूल पार्टी में ममता दीदी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और चुनाव-प्रबन्धक प्रशांत किशोर का बढ़ता प्रभाव को बताया जा रहा है, जिसके कारण बहुत से नेता पार्टी में अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि तृणमूल के नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों से बचने के लिए भी भाजपा से जुड़ चुके हैं या जुड़ रहे हैं। बहुतों को लगता है कि इस बार ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी कठिन है। ऐसे में पनाह भाजपा में ही मिल सकती है। ऐसा नही है कि सिर्फ तृणमूल के नेता ही पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं बल्कि भाजपा के भी कई असंतुष्ट नेता तृणमूल में शामिल हो रहे हैं, पर ऐसे लोगों की संख्या कम हैं।

बंगाल में भाजपा और आरएसएस की दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी विचारधारा एकाएक जोर नहीं मारने लगी है। बल्कि आजादी से पूर्व भी बंगाल में कांग्रेस की विचारधारा के समानान्तर हिंदुत्ववादी विचारधारा मौजूद थी। पर गाँधी जी की हत्या की वजह से हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग समाज में हाशिये पर चले गए। बंगाल में कांग्रेस और वाम-मोर्चा के लंबे शासन में वे समाज में धीरे-धीरे महत्वहीन होकर नेपथ्य में चले गए। बंगाल में सुधारवादी आंदोलनों और प्रगतिशील विचारधारा के कारण समाज व राजनीति पर जातिवाद और साम्प्रदायिकता का वैसा ढीठ स्वरूप दिखाई नहीं देता, जैसा कि हिंदी भाषी राज्यों में है। अगर है भी तो लोग उसे प्रदर्शित करने में हिचकिचाते हैं। इसलिए दक्षिणपंथ की धारा बंगाल में क्षीण -गुप्त रूप में ही प्रवाहित होती रही है। आरएसअस/भाजपा के नए 'देश-भक्त' डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में 6 सच्चाइयां | SabrangIndia

उल्लेखनीय है कि भारतीय जनसंघ (स्थापना-1951) के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सम्बन्ध बंगाल से रहा है। जनसंघ पार्टी की स्थापना का ड्राफ्ट कोलकाता में ही तैयार किया गया था। एक समय में ‘हिन्दू महासभा’ भी बंगाल में काफी सक्रिय था। 1925 में कोलकाता में लाल लाजपतराय की अध्यक्षता में ‘हिन्दू महासभा’ का अधिवेशन भी हुआ था। आर एस एस की स्थापना में ‘हिन्दू महासभा’ का बहुत बड़ा योगदान था। यही वर्ष नागपुर में आर एस एस की स्थापना का भी है। आर एस एस के संस्थापक डॉ केशवराम बलिराम हेडगेवार का भी गहरा सम्बन्ध कोलकाता से रहा था।

2014 के लोकसभा चुनाव (2 सीट) और स्थानीय निकायों में भाजपा को निरन्तर मिलती सफलता ने बंगाल में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों (जो मन मारकर वामपंथी विचारधारा और तृणमूल पार्टी में समायोजित होने के लिए अपनी मौन स्वीकृति दे रहे थे) को खुलकर आरएसएस व भाजपा के समर्थन में सामने आने का अवसर प्रदान किया। भाजपा 2014 से ही निरन्तर बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के क्रिया-कलापों का विरोध कर रही है। जरूरी, गैर-जरूरी साम्प्रदायिक मसलों को उछालकर हिंदुओं के बीच अपनी पैठ व जनाधार मजबूत करने के प्रयास में लगी है और इसमें उसे सफलता भी हासिल हुई है, जो वाम शासन में संभव नहीं हो पा रहा था।

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भाजपा के राजनीतिक एजेंडा को फैलाने में राज्य के संवैधनिक अधिकारों से लैस राज्यपालों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसका अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि जो भाजपा 2011 के चुनाव में 289 सीटों पर चुनाव लड़कर, 4.06% वोट प्राप्त कर भी कोई सीट नहीं जीत पाई और 2016 के विधान सभा चुनाव में भी 291 सीटों पर चुनाव लड़कर मात्र 3 सीटों (10.16%वोट) पर ही विजयी हो पाई थी; वह 2019 में लोकसभा चुनाव में 40.7%मत प्राप्त कर लोकसभा की 18 सीटों को पाने में सफल हो जाती है। सत्तारूढ़ तृणमूल को 12 सीट के नुकसान पर 22 सीटों 43.3% मत) पर ही संतोष करना पड़ा। पश्चिम बंगाल की राजनीति में राज्यपाल ने विपक्ष की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है।

दरअसल, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व 2014 के बाद से ‘बंगाल-विजय’ का लक्ष्य भेदने की रणनीति में लगा हुआ है। राज्य में धर्मनिरपेक्षता के बरक्स हिन्दू-साम्प्रदायिकता का पत्ता लगातार फेंकता रहा है। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का फ़ार्मूलावद्ध आरोप लगाता रहा है, जिसका सुफल 2019 के लोकसभा चुनाव में मिला और पार्टी लोकसभा की 18 सीट पाने में सफल हुई। 

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बंगाल चुनाव में भाजपा और तृणमूल के बीच एक दशक से चली आ रही रस्साकशी के बीच पिछले दिनों ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) पार्टी के मुस्लिम नेता ओवैसी के कूद पड़ने से चुनाव में एक ट्विस्ट आ गया है। ओबैसी ने बंगाल के 27 प्रतिशत (2011 की जनगणना) मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखकर पहली बार बंगाल के चुनाव में भाग लेने की घोषणा कर दी है। वर्तमान में मुसलमानों की आबादी बंगाल में 30 प्रतिशत है। जो हिंदुस्तान के अन्य राज्यों के 17-18% की औसत मुस्लिम आबादी से बहुत ज्यादा है। इसलिए कहा जाता है कि बंगाल में सत्ता की चाभी मुसलमानों के पास है। मुस्लिम आबादी जिस पार्टी के पक्ष में होती है, सत्ता उसी की झोली में होती है।

ममता बनर्जी 2011 के विधानसभा चुनाव में 294 सीटों में से 184 सीट प्राप्त कर 34 वर्षों से राज कर रही वाम शासन को खत्म करने में इसी कारण सफल हुई कि ‘नंदीग्राम -सिंगूर’ के मसले पर वाम शासन से नाराज़ मुसलमानों ने आंदोलनरत ममता बनर्जी के पक्ष में वोट दिया था। 2016 के विधान सभा चुनाव में ममता बनर्जी ने अपने विकास -कार्यों को गिनाकर शानदार जीत हासिल की। इसमें भी मुस्लिम बहुल इलाकों में तृणमूल के पक्ष में किये गगए मतदानों का योगदान है।

एआईएमआईएम के ओवैसी का हौसला बिहार विधानसभा चुनाव (2020) में पांच सीट जीतने के बाद से बुलंद हैं। असदुद्दीन ओवैसी बिहार के बाद अब बंगाल की राजनीति में किस्मत आजमाने की चाहत में हैं। बंगाल में टीएमसी के खिलाफ भाजपा पहले से ही मोर्चा खोले हुए थी और अब ओवैसी की दस्तक ने ममता बनर्जी की बेचैनी में और भी इजाफा कर दिया है क्योंकि, मुस्लिम वोटों के बँट जाने से भाजपा को सीधा फायदा होने की संभावना है, जैसाकि बिहार में हुआ। आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सत्ता से वंचित रह गयी क्योंकि मुस्लिम वोट बँट जाने से ‘भाजपा और जेदयू गठबन्धन’ को फायदा हुआ।  बिहार के बाद अब UP की नब्ज टटोलेंगे असदुद्दीन ओवैसी, ये है प्लान - asaduddin owaisi will explore up s pulse on january 12 - UP Punjab Kesari

बंगाल की 30 फीसदी मुस्लिम आबादी के बल पर असदुद्दीन ओवैसी को न सिर्फ बंगाल में ही अपनी सियासत चमकाने का अवसर मिलेगा वरन उसकी पार्टी को मुस्लिमों के बीच अखिल भारतीय स्वीकृति पाने का भी मौका मिलेगा। मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए वे भाजपा के तरह ही योजनावद्ध तरीके से काम कर रहे हैं। बंगाल चुनाव में ओवैसी को इसमें ऐतिहासिक सफलता मिल भी सकती है। इतिहास गवाह है कि आजादी के पहले बंगाल की धरती (ढाका) पर ही 30 दिसम्बर 1906 को मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी, जो बाद में देश के बंटबारे का कारण बनी।

‌पिछले माह दिसम्बर में बंगाल चुनाव को लेकर असदुद्दीन ओवैसी ने बंगाल में अपनी पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की थी जिसमें यह तय हुआ कि हर जिले में एक समिति बनाई जाए। हैदराबाद के पूर्व महापौर माजिद हुसैन को बंगाल चुनाव की जिम्मेदारी दी गयी है। इससे पहले वे बिहार चुनाव की कमान संभाल चुके थे।

पश्चिम बंगाल में संगठन बनने के बाद यह तय होगा कि पार्टी विधानसभा में कैसे और कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगी। वैसे पार्टी की इच्छा तो यही है कि बंगाल की सभी सीटों पर उसके उम्मीदवार चुनाव लड़ें क्योंकि पार्टी कार्यकर्ता पूरी तरह से सक्रिय हैं और बकायदा लोगों से सम्पर्क भी कर रहे हैं। एआईएमआईएम के पास बंगाल को लेकर आक्रमक चुनाव लड़ने की योजना है। पार्टी बिहार चुनाव के बाद से ही देश में बड़े पैमाने पर सदस्यता अभियान चला रही है जिसमें पश्चिम बंगाल में ही 10 लाख से अधिक पंजीकृत सदस्य बन चुके हैं। पार्टी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से सदस्यता अभियान चला रही है।

ओवैसी की पार्टी बंगाल में मुस्लिमों के बीच अपने को वाम और तृणमूल के विकल्प के तौर पर पेश कर रही है। राज्य के मुर्शिदाबाद जिले में अकेले 2 लाख सदस्य हैं। बिहार चुनाव में मिली पाँच सीटों के बाद पार्टी के समर्थकों का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। बिहार के जिस सीमावर्ती इलाकों में पार्टी को जीत मिली है वह बंगाल से सटा हुआ है। इसलिए ओवैसी बंगाल के चुनाव को लेकर उत्साहित हैंऔर बंगाल में अपनी उपस्थिति को दमदार तरीके से दर्ज करने के लिए आक्रमक चुनाव प्रचार की रणनीति बना रहे हैं। पार्टी 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इनमें से 65 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिमों का सीधा प्रभाव है। ऐसे में ओवैसी की नजर ऐसी सीटों पर खास तौर पर है। मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक की भूमिका में हैं। Mamata by side, Muslim leader rates govt work at grassroots level: '0 %' | Cities News,The Indian Express

मुर्शिदाबाद जिले की कुछ विधानसभा सीटों पर 60 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोट हैं, जहां एआईएमआईएम, कांग्रेस और टीएमसी दोनों को टक्कर देने के लिए तैयार है। एआईएमआईएम का दावा है कि कोलकाता में भी 6 फीसदी अबंगाली मुसलमान हैं, जिनका शहरी सीटों पर राजनीतिक असर है जो चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि मुसलमान टीएमसी से इस बात को लेकर असंतुष्ट हैं कि अपने घोषणापत्र में उसने मुसलमानों के लिए 17 फीसदी आरक्षण का जो आश्वासन दिया था वो अभी तक लागू नहीं हुआ है। आरक्षण, नौकरी, रोजगार के सवाल पर मुस्लिम समुदाय बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी से अलग अपने लिए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है, जिसे एआईएमआईएम भी बाखूबी समझती है और इसे भुना सकने की स्थिति में भी है। इसलिए एआईएमआईएम इस बात को जोर-शोर से उठा रही है कि

अगर ममता बनर्जी खुद को मुस्लिमों का समर्थक मानती है तो उन्होंने अपने घोषणापत्र के अनुसार 17 फीसदी मुस्लिम आरक्षण के प्रावधान को क्यों नहीं लागू किया?बंगाल में कोई भी मुस्लिम विश्वविद्यालय क्यों नहीं हैं, जबकि हावड़ा में एक हिंदी विश्वविद्यालय खुल चुका है। बंगाल के 23 जिलों में 15 जिले ज्यादा महत्व के हैं, जिनमें से 5 मुस्लिम बहुल हैं। मुस्लिम नेतृत्व का आरोप है कि यहाँ विकास का कोई काम नहीं हुआ है, जबकि चुनावी भाषणों में ममता बनर्जी यह दावा करती रही है कि मुसलमानों के लिए 90 फीसदी विकास का काम कर दिया गया है। 

ओवैसी ने बंगाल के मुस्लिमों में मजबूत पकड़ रखने वाले फुरफुरा शरीफ (हुगली जिले में) के धार्मिक नेता मौलाना तोहार सिद्दीकी के बेटे अब्बास सिद्दीकी से हाथ मिला लिया है जो बंगल में मुस्लिमों के बीच एक मजबूत विकल्प के तौर पर अपने को पेश कर रहा है।

ममता बनर्जी और ओवैसी के बीच जुबानी जंग जारी है।

एक तरफ ममता बनर्जी एआईएमआईएम को भाजपा की ‘बी टीम’ कहती है जिसे आरएसएस से धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के खिलाफ लड़ने के लिए पैसा मिलता है। दूसरी तरफ एआईएमआईएम का मानना है कि भाजपा और टीएमसी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मुसलमानों को टीएमसी से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है। इधर भाजपा, ओवैसी की पार्टी का बंगाल में चुनाव लड़ने का स्वागत कर रही है और कह रही है कि लोकतंत्र में सभी पार्टी को चुनाव लड़ने का अधिकार है। भाजपा जानती है कि ओवैसी के बंगाल में चुनाव लड़ने से उसका सीधा फायदा है। जैसा कि बिहार में हुआ।  पश्चिम बंगाल CM ममता बनर्जी पर AIMIM चीफ ओवैसी का पलटवार, कह दी ये बड़ी बात | BTV Bharat

बिहार की तरह ही ओवैसी अब पिछले कुछ वक्त से पश्चिम बंगाल में चुनावी काम कर रहे हैं। एआईएमआईएम की बंगाल योजना 2019 के आम चुनाव के बाद ही तैयार कर ली गयी थी जिसे अब अमली जामा पहनाया जा रहा है। अभी बंगाल के लगभग सभी जिलों में एआईएमआईएम की यूनिट मौजूद है। पार्टी ने अपना प्रमुख ध्यान दिनाजपुर, मालदा, हावड़ा, कूच बिहार, बीरभूम, आसनसोल, नदिया जैसे जिलों पर केंद्रित किया है जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है।

ओवैसी जानते हैं कि बंगाल में अपनी पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं होगा क्योंकि उनकी पार्टी को उत्तर बंगाल के उर्दू-भाषी मुसलमानों का समर्थन प्राप्त है, जबकि दक्षिण बंगाल के बांग्ला-भाषी मुसलमानों के बीच ममता बनर्जी अब भी सर्वमान्य नेता हैं। दक्षिण बंगाल में मुसलमानों की संख्या काफी ज्यादा है। शायद इसलिए एआईएमआईएम के सूत्रों का कहना है कि अगर टीएमसी हमसे सम्पर्क करती है तो गठबन्धन का विकल्प खुला है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि मुसलमान टीएमसी से उतना खुश नहीं हैं जितना होना चाहिए। यदि ऐसे में मुस्लिमों का वोट बँटता है तो भाजपा 2021 का चुनाव जीत सकती है। मुस्लिम समुदाय डरा हुआ है और अपनी पहचान के लिए उन्हें अपनी राजनीतिक पार्टी की जरूरत है। फुरफुरा शरीफ के धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी ने भी अपनी पार्टी बना ली है। पिछले तीन महीनों से वे रैलियां कर रहे हैं. इन रैलियों में अच्छी खासी भीड़ देखी गयी है। ओवैसी, धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी की पार्टी से गठबन्धन कर उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में भी जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रहै है। इस चुनाव में एआईएमआईएम और अब्बास सिद्दीकी के एक साथ आने से जो राजनीतिक समीकरण बन रहा है उससे चुनाव परिणाम में उलट-फेर हो सकता है। ममता बनर्जी के हाथ से सत्ता फिसल भी सकती है। Gita Rani Bhunia: पश्चिम बंगाल: सबांग उपचुनाव में टीएमसी की जीत, चौथे नंबर पर खिसकी कांग्रेस - west bengal gita rani bhunia of trinamool congress wins in sabang | Navbharat Times

टीएमसी से जुड़े नेताओं का कहना है कि एआईएमआईएम पार्टी 2019 में भी बंगाल में चुनाव लड़ी थी और नतीजा क्या निकला यह सबको पता है। उनका फिर से चुनाव लड़ने का स्वागत है, क्योंकि यह एक लोकतांत्रिक देश है। तृणमूल के नेताओं का कहना है कि मुस्लिम लोग ममता बनर्जी के कामों को देख चुके हैं, वे उन पर भरोसा करते हैं और वे बेवकूफ नहीं हैं। वे अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम हो रहे हैं। उन्हें सरकार से आर्थिक सहायता मिल रही है। रहने के लिए जगह मिल रही है। गतिधारा में टैक्सी ड्राइवर के रूप में नौकरी मिल रही है। अगर 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात है, तो हमें पता है कि ओवैसी किसके आदेश पर चुनाव लड़ेंगे?

मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी भी भाजपा और एआईएमआईएम पर हमला करते हुए कहती हैं कि अल्पसंख्यक वोटों को बाँटने के लिए भाजपा हैदराबाद की पार्टी लायी है जो भाजपा से पैसा लेकर काम कर रही है जिसकी रणनीति है कि मुस्लिम वोट हासिल करेने के लिये हिंदुओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाएंगे ताकि हिन्दू वोट भाजपा को मिल सके।

एआईएमआईएम जैसी पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल बेहद अहम है। बिहार और महाराष्ट्र में पार्टी के प्रदर्शन ने पार्टी को पश्चिम बंगाल में अपना जनाधार बढ़ाने का हौसला दिया है। मुस्लिम आबादी के हिसाब से जम्मू-कश्मीर और असम के बाद पश्चिम बंगाल भारत में तीसरे नंबर पर है और जनसंख्या के लिहाज से, यूपी के बाद, दूसरे नंबर पर है। अगर 2021 में बंगाल के चुनाव में ओवैसी की पार्टी को सफलता मिलती है तो वह भविष्य में ‘मुस्लिम लीग’ साबित हो सकती है। बी जे पी के हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की नीति का फायदा ओवैसी उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

 पश्चिम बंगाल के चुनाव में बी जे पी और तृणमूल के बीच

रवींद्रनाथ टैगोर, विवेकानंद, सुभाष चन्द्र बोस और विद्यासागर जैसे महापुरुषों पर दावेदारी की जंग भी चुनाव के मद्देनजर तेज हुई है। बंगाल के मनीषियों की जयंती का कोई भी अवसर बीजे पी और तृणमूल अपने हाथ से जाने देना नहीं चाहती है। मुझे बुलाने के बाद अपमान मत कीजिए" नेताजी के समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में फूटा ममता बनर्जी का गुस्सा

23 जनवरी को सुभाष चन्द्र बोस की 125 वीं जयंती थी। केंद्र सरकार ने नेता जी की जयंती को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया। मुख्य कार्यक्रम का आयोजन कोलकाता में किया गया। वही दूसरी ओर ममता बनर्जी ने नेता जी के जन्मदिन को ‘देशनायक दिवस ‘ के रूप में मनाने का फैसला किया।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी 23 जनवरी को नेताजी की जयंती पर पश्चिम बंगाल के दौरे पर थे। वे कोलकाता के नेशनल लाइब्रेरी (राष्ट्रीय पुस्तकालय) में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से जुड़े कार्यक्रम में पहुंचे। उनके साथ बंगाल की मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी भी मौजूद थीं। दोनों नेताओं के बीच जो पांच फीट का फासला था वह राजनीतिक मतभेद और विचारधारा की दूरी के कारण पाटा नहीं जा सका। संवाद की कमी आखिरकार जनता के सामने झलक ही गयी। लाइब्रेरी में प्रवेश से लेकर बाहर आने तक प्रधानमन्त्री मोदी और ममता बनर्जी के बीच कोई संवाद होता दिखाई नहीं दिया। प्रधानमन्त्री मोदी वहां मौजूद अधिकारी से लाइब्रेरी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी जानकारी लेते हुए दिखाई दिए। परन्तु ममता बनर्जी से उन्होंने कोई बात नहीं की। एक-दूसरे से नजरें भी नहीं मिलाईं। दोनों ही नेता पूरे समय एक-दूसरे से विपरीत दिशा में देखते हुए नजर आए।

दोपहर 12 बजे ममता बनर्जी ने कोलकाता के श्यामबाजार क्रासिंग स्थित नेता जी की मूर्ति से रेड रोड तक 10 किलोमीटर से भी ज्यादा की पद-यात्रा कर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। An eight-km long yatra in Kolkata led by Mamata Banerjee on the 125th birth anniversary of Netaji

नेता जी की 125 वीं जयंती के अवसर पर ही केंद्र सरकार की कला -संस्कृति विभाग के द्वारा भी कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में एक और कार्यक्रम का आयोजन किया गया था जहाँ प्रधानमन्त्री मोदी और मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी दोनों ही पुनः आमने सामने थे। मुख्य मन्त्री ममता बनर्जी जैसे ही बोलने के लिए उठी कि कुछ लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने लगे। ममता बनर्जी ने इसे अपना अपमान समझा और विरोध स्वरूप कुछ भी बोलने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में बुलाकर किसी को इस तरह अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। यह केंद्र सरकार का कार्यक्रम है, किसी पार्टी का कार्यक्रम नहीं। वे जय हिंद, जय बांग्ला बोलकर मंच से हट गयी।

आने वाले 3-4 महीनों में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होना है। बीते कुछ महीनों में बंगाल में सियासी उठापटक और बयानबाजी तेज हुई है। राजनीतिक दलों के नेताओं और उसके समर्थकों के द्वारा एक-दूसरे पर जिस ढंग से जुबानी जंग और हिंसक हमले किये जा रहे है वह लोकतंत्र के लिए घातक है।

2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम का देश की आने वाली राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। यह तय करेगा कि देश हिंदु-मुस्लिम ध्रुवीकरण की ओर बढ़ेगा या फिर सबको साथ लेकर चलनेवाली विचारधारा की और अग्रसर होगा। पश्चिम बंगाल चुनाव में वाम-पंथी पार्टियों की ‘शीत-निष्क्रियता’ आश्चर्यजनक तो नहीं पर चिंताजनक जरूर है। वाम-पंथी नेताओं को अपने विनाश की चिंता उतनी नहीं है बल्कि इससे कहीं अधिक आनंद ममता बनर्जी के आसन्न पराभाव की कल्पना से है।

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लेखक कवि और कला समीक्षक हैं। सम्पर्क +918777806852, rajyabardhan123@gmail.com

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