
युद्ध का मनोविज्ञान और शान्ति: सत्ता, सहमति और नैतिकता का संकट
आज जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तो युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली घटना नहीं रह गया है| आज युद्ध हमारे बेड रूम, हमारी मोबाइल स्क्रीन और सबसे खतरनाक रूप से हमारी चेतना (Consciousness) के भीतर लड़ा जा रहा है। सभ्यता की प्रगति के साथ युद्ध अधिक संगठित, अधिक तकनीकी और अधिक ‘अदृश्य'(Invisible) होते जा रहे हैं। युद्ध की दुनिया जितनी बाहर है, उससे कहीं अधिक वह हमारे भीतर रची जा रही है। शांति का स्वप्न केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक और वैचारिक ढांचे को समझने की चुनौती है जो हिंसा को ‘स्वाभाविक’ और ‘अनिवार्य’ बना देता है।
युद्ध को समझने के लिए हमें सबसे पहले मानव प्रजाति की उस अद्वितीय क्षमता को समझना होगा जिसे युवल नोआ हरारी अपनी पुस्तक ‘सेपियन्स’ (Sapiens) में ‘कल्पित वास्तविकताएँ’ (imagined realities) कहते हैं। हरारी का तर्क है कि ‘होमो सेपियन्स’ बड़े स्तर पर सहयोग इसलिए कर पाते हैं क्योंकि वो साझा मिथकों (Common Myths) पर विश्वास कर पाते हैं | हरारी का तर्क है कि मनुष्य भोजन या क्षेत्र जैसी वास्तविक चीजों के लिए नहीं, बल्कि अपने दिमाग की “काल्पनिक कहानियों” (जैसे धर्म, राष्ट्रवाद, और पवित्र स्थान) के लिए लड़ते हैं | मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो ‘राष्ट्र’, ‘धर्म’, ‘स्वतंत्रता’ इत्यादि जैसे काल्पनिक विचारों के लिए लाखों-करोड़ों की संख्या में संगठित होकर जान दे सकते हैं और जान ले भी सकते हैं ! उनके अनुसार युद्ध दो सेनाओं का टकराव नहीं, बल्कि दो ‘कहानियों’ का टकराव है।
अब यदि, हम हरारी के तर्क ‘युद्ध कल्पित मिथकों (काल्पनिक कहानियों) पर आधारित होते है’ को सही मान लें, तो इन मिथकों को करोड़ों लोगों के दिमाग में रोपने का काम कौन करता है? इस बात की विवेचना करना बहुत ही प्रासंगिक हो जाता है | सत्ता के लिए युद्ध के पक्ष में जनता की सहमति प्राप्त करना महत्वपूर्ण है। नोम चॉम्स्की अपनी पुस्तक ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ (Manufacturing Consent) में एक ‘प्रोपेगेंडा मॉडल’ की बात करते हैं | चॉम्स्की बताते हैं कि आधुनिक लोकतंत्रों में जनता को युद्ध के लिए शारीरिक बल से नहीं, बल्कि ‘सूचना के नियंत्रण’ से तैयार किया जाता है। चॉम्स्की ने इस मॉडल के माध्यम से उजागर किया है कि कैसे ‘शक्तिशाली वर्ग’ मीडिया के माध्यम से युद्ध को ‘नैतिक’ और ‘अनिवार्य’ सिद्ध करता है।
प्रोपेगेंडा, वह औजार है जो शत्रु का ‘अन्यीकरण’ (Othering) करता है। चॉम्स्की के अनुसार, मीडिया और सत्ता के ‘फिल्टर’ सूचना को इस तरह छानते हैं कि युद्ध एक ‘नैतिक आवश्यकता’ लगने लगता है। जब मीडिया ‘लोगो की हत्या’ की जगह ‘कोलेटरल डैमेज’ (Collateral Damage), बॉम्बिंग (Bombing) की जगह एयरस्ट्राइक या टारगेट न्यूट्रलाइज्ड (Target Neutralised), जैसे भाव रहित तकनीकी शब्दों का उपयोग करते हैं, तो मीडिया दरअसल भाषा के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं की हत्या कर रही होती है । यह मीडिया का प्रोपगेंडा तंत्र ही है जो आम आदमी को यह विश्वास दिलाता है कि युद्ध उसके हितों की रक्षा के लिए है, जबकि असल में वह उन आर्थिक और कॉर्पोरेट शक्तियों के लिए होता है जो युद्ध की अर्थव्यवस्था से फलती-फूलती हैं।
युद्ध के लिए काल्पनिक कहानियाँ तैयार हैं और इन कहानियों को करोड़ों लोगों तक पहुचाने के लिए मीडिया का प्रोपेगेंडा भी तैयार है | इसके बाद, एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि एक साधारण, कानून मानने वाला नागरिक युद्ध में हिंसा कैसे कर पता है | इस संदर्भ में हन्ना आरेंट ने अपनी प्रसिद्ध अवधारणा बेनेलिटी ऑफ़ ईविल (Banality of Evil) के माध्यम से इसका उत्तर ढूँढने की कोशिश की है |
आरेंट ने यहूदी नरसंहार में शामिल एक जर्मन नाजी ऑफिसर एडोल्फ आइकमैन के येरुशलम ट्रायल के दौरान दिए गए कथनों का गहन विश्लेषण किया | आरेंट का निष्कर्ष है कि दुनिया की सबसे बड़ी क्रूरताएं हमेशा किसी नफरत से भरे विलेन या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति द्वारा ही नहीं की जातीं, बल्कि अक्सर वे बेहद साधारण दिखने वाले लोगों के द्वारा अंजाम दी जाती हैं। यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब एक व्यक्ति स्वयं के विवेक और नैतिक सोच को त्यागकर खुद को केवल एक व्यवस्था (system) का छोटा सा हिस्सा मान लेता है। ऐसी स्थिति में, वह इंसान बड़े से बड़ा अपराध भी सिर्फ इसलिए कर देता है, क्योंकि वह उसे अपनी ‘ड्यूटी’ या ‘ऊपर से मिला आदेश’ समझता है। यहाँ बुराई किसी गहरी राक्षसी प्रवृत्ति से नहीं, बल्कि चिंतनहीनता’ (विचारशून्य़ता) (thoughtlessness) और बिना सवाल किए नियमों के पालन से पैदा होती है। आरेंट का तर्क है कि जब समाज में ‘चिंतन की क्षमता’ खत्म हो जाती है, तो व्यक्ति अपनी नैतिक जिम्मेदारी शासन या विचारधारा को सौंप देता है। युद्ध की मशीनरी में व्यक्ति खुद को एक छोटा ‘पुर्जा’ समझने लगता है। वह यह नहीं सोचता कि वह क्या कर रहा है, बल्कि वह यह सोचता है कि वह अपना काम ‘कितनी कुशलता’ से कर रहा है।
अब एक और प्रश्न उठता है कि इतनी हिंसा करने के बाद भी मनुष्य कैसे एक आम जीवन जी पाता है? क्या उसे युद्ध में लोगों की हत्या करने के बाद ग्लानि (Guilt ) महसूस नहीं होती है ? इस संदर्भ में आरेंट की ‘चिंतनहीनता’ को मनोवैज्ञानिक धरातल पर अल्बर्ट बंडूरा ने ‘नैतिक विमुखता’ (Moral Disengagement) के रूप में व्याख्यायित किया है |
बंडूरा बताते हैं हम सभी के अंदर एक ‘नैतिक कंपास’ होता है, जो हमें सही और गलत का भेद बताता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति कुछ गलत करना चाहता है, तो वह कुछ मनोवैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके इस कंपास को अस्थायी रूप से बंद कर देता है। सरल शब्दों में इसका मतलब है: अपने जमीर या नैतिकता को कुछ समय के लिए सुला देना ताकि हम बिना किसी ग्लानि (guilt) के गलत काम कर सकें।
बंडुरा ने ऐसे कई तरीके बताए हैं: पहला तरीका है जिसमे बुराई को अच्छाई का रूप दिया जाता है ; जहां व्यक्ति अपने गलत काम को किसी बड़े और नेक उद्देश्य से जोड़ देता है; जैसे कि देशभक्ति, देश की सुरक्षा, शांति स्थापित करना, लोकतंत्र की स्थापना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, दुनिया को ‘सामूहिक विनाश के हथियारों’(WMD) से रक्षा करना इत्यादि | दूसरा तरीका है जिसमे हिंसा की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दिया जाता है | यह कहकर कि मैं तो केवल आदेश का पालन कर रहा था | तीसरा तरीका है जिसमें युद्ध में किए गए हिंसा की जिम्मेदारी को बाँट दिया जाता है | जब बहुत सारे लोग मिलकर हिंसा करते हैं, तो हर कोई सोचता है, कि हिंसा सिर्फ मैंने थोड़े ही किया है, सबने किया है। यहाँ पर समूह में किए गए गलत काम में कोई भी खुद को पूरी तरह दोषी नहीं मानता; और सबसे खतरनाक तरीका है, पीड़ित को इंसान न समझना, उसे दुश्मन, ‘कीड़ा-मकोड़ा, राक्षस, हिंसक जानवर समझना, ताकि उसे चोट पहुँचाते समय दया न आए। इन मनोवैज्ञानिक ढालों के कारण ही एक सैनिक या नागरिक युद्ध की विभीषिका में भी अपनी ‘अच्छी छवि’ बनाए रख पाता है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि युद्ध की दुनिया का निर्माण ‘कल्पित मिथकों’ (हरारी), ‘सहमति के निर्माण’ (चॉम्स्की), ‘चिंतन की अनुपस्थिति’ (आरेंट) और ‘नैतिक विमुखता’ (बंडूरा) से होता है। शांति का स्वप्न केवल युद्ध के रुकने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चेतना का निर्माण है जो इन चारों तंत्रों को चुनौती दे सके।
युद्ध की इस संगठित दुनिया के बीच, शांति का स्वप्न देखना ही सबसे बड़ा क्रांतिकारी कार्य है। बीसवीं सदी के महान संगीतकार और शांतिदूत जॉन लेनन ने अपने कालजयी गीत ‘Imagine’ में उसी ‘कल्पित वास्तविकता’ को चुनौती दी थी, जिसे हरारी युद्ध का आधार मानते हैं। लेनन गाते हैं: Imagine there’s no countries, It isn’t hard to do, Nothing to kill or die for… Imagine all the people, Livin’ life in peace,
लेनन का ‘नो कंट्रीज’ का आह्वान दरअसल हरारी के उस तर्क का उत्तर है कि यदि हम संकीर्ण मिथकों को छोड़ दें, तो हमारे पास ‘मारने या मरने’ का कोई कारण शेष नहीं रहेगा।
हाँलांकि युद्ध की दुनिया ठोस है, हिंसक है और संगठित है, जबकि शांति अभी एक आशा है, एक स्वप्न है। लेकिन जैसा कि लेनन अंत में कहते हैं:
“You may say I’m a dreamer / But I’m not the only one I hope someday you’ll join us / And the world will be as one”
शांति का यह स्वप्न उन लोगों का सामूहिक प्रतिरोध है जिन्होंने सोचने से इनकार नहीं किया है, जिन्होंने बंडूरा की ‘नैतिक विमुखता’ को ठुकरा कर अपनी अंतरात्मा को जागृत रखा है। जब तक दुनिया में एक भी व्यक्ति यह ‘इमेजिन’ (कल्पना) करने का साहस रखता है कि सीमाएं और युद्ध अनिवार्य नहीं हैं, तब तक मानवता की हार नहीं हो सकती।










