सिनेमा

सिनेमा, दर्शक और समाज का सच 

‘अस्सी’ फिल्म में ‘रेप कल्चर’ के उन तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ा गया है जहाँ बलात्कार को ‘इज़्ज़त, प्रतिशोध के संदर्भ से जोड़ा गया है जिसमें  एक और पक्ष ‘भीड़ तंत्र का न्याय’ जुड़ जाता है । जब सामाजिक न्याय ‘सोशल मीडिया’ के आभासी न्याय में परिवर्तित हो जाता है, जहाँ कानून या संविधान को खेल मान लिया जाता है। हमने अंग्रेज़ी के प्रचलित पद ‘रेप कल्चर’ का प्रयोग जानबूझकर किया   है । ‘संस्कृति’ शब्द हिंदी में अपेक्षाकृत सकारात्मक अर्थच्छाया लिए हुए है, जबकि अंग्रेज़ी का ‘रेप कल्चर’ उस व्यापक मानसिक ढाँचे की ओर संकेत करता है जिसमें स्त्री-विरोधी पूर्वाग्रह, यौन हिंसा को सामान्य बनाने वाली धारणाएँ, पीड़िता को ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति होती है। सब मिलकर एक ऐसी संरचना रचते हैं जहाँ हिंसा अपराध नहीं रह जाती, बल्कि व्यवहार और कल्पना के स्तर पर सामान्यीकृत हो जाती है। साहित्य जहाँ अपने पाठक को उत्तेजित करने के बजाय विचारशील और विवेकी बनाता है, वहीं व्यावसायिक सफलता की विवशता ने सिनेमा को अपने जन्मकाल से ही दृश्यात्मक आकर्षणों और उत्तेजनाओं की ओर मोड़ दिया है, जो हिंसा को प्रश्नांकित करने के बजाय उसे तमाशे में बदल देते हैं। इसी पृष्ठभूमि में हिंदी सिनेमा और हाल ही रिलीज़ ‘अस्सी’ के संदर्भ में यह देखना आवश्यक हो जाता है कि ‘यौन हिंसा’ का चित्रण केवल कथा का उपकरण है या हमारे समय की गहरी सामाजिक मानसिकताओं का प्रतिबिम्ब ।

निर्देशक अनुभव सिन्हा और पटकथा लेखक गौरव सोलंकी वास्तव में ‘अस्सी’ फिल्म में `पितृसत्तात्मक मानसिकता,बलात्कार का सिनेमाई चित्रण,प्रतिशोध और इज़्ज़त की कथा,डिजिटल भीड़ का न्याय दर्शक और सामाजिक संवेदना के संकट को सूक्ष्मता से रेखांकित कर रहे हैं । फिल्म का कला पक्ष या निर्देशन कई स्तरों पर कमज़ोर  हो सकता है लेकिन फिल्म सिनेमा, समाज और दर्शकों को भी कठघरे में ला खड़ा करती है। इस फिल्म के बहाने हिंदी सिनेमा में बलात्कार के चित्रण की परंपरा और उसके सामाजिक अर्थों की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है।  चूक कहाँ हुई? सिनेमा से, समाज से, दर्शकों से या न्याय व्यवस्था से? अस्सी फ़िल्म इसे समझने की कोशिश भी है।

भारतीय समाज में बलात्कार आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचना और सामाजिक नैतिकता के अंतर्विरोधों से निर्मित त्रासदी है।  जो यौन हिंसा को इज़्ज़त, प्रतिशोध  की पटकथा में बदल देता  है। हिंदी सिनेमा ने भी लंबे समय तक इस त्रासदी को इसी ढाँचे में प्रस्तुत किया है जहाँ पीड़िता की पीड़ा धीरे-धीरे कथा के केंद्र से हट जाती है । बलात्कार की त्रासदी अंततः प्रतिशोध की नाटकीय पटकथा में बदल जाती है और बदले की आग में जलता हुआ पुरुष नायक केंद्र में आ जाता है । ऐसे समय में जब हिंसा और आक्रामक मर्दानगी से भरी फिल्मों – पुष्पा,एनिमल, धुरंधर अथवा प्रोपेगैंडा फिल्मों के लिए सिनेमाघर भरे रहते हैं,  फिल्म ‘अस्सी’ दर्शकों के लिए तरस कर रह गई । ‘अस्सी’  प्रश्न उठाती है कि हर बीस मिनट में होने वाला बलात्कार मात्र घटना नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम है जिसमें स्त्री को ‘इज़्ज़त’ के प्रतीक और उपभोग की वस्तु के रूप में देखने की आदत पीढ़ियों से पनपती रही है।  फिल्म केवल यौन हिंसा या अपराध नहीं दिखाती, बल्कि उस समाज  को आईना दिखाती है जहाँ न्याय कभी अदालतों में और कभी डिजिटल भीड़ के शोर में तय होने लगता है।

सनसनी और संवेदना के बीच हिंदी सिनेमा

हिंदी सिनेमा में बलात्कार का चित्रण नया नहीं है। 1953 की ‘पतिता’ की नायिका बलात्कार के बाद आत्महत्या के लिए निकल जाती है तो आराधना फिल्म  की नायिका बलात्कारी को मार कर अपराधी बन जाती है। एक ओर आत्मग्लानि, हीनता, सामाजिक भय और इज़्ज़त का सवाल था तो 1969 में प्रतिशोध की ज्वाला। जो बाद में भी कई फिल्मों में दिखाई दिया।  बेंडिट क्वीनके केंद्र में भी  प्रतिशोध का महिमामंडन अधिक है।

अभिनेता महमूद का कहना था  कि उनकी सामाजिक सन्देश देने वाली फिल्म ‘कुंआरा बाप’ 1974 को कोई पुरस्कार नहीं मिला जबकि ‘रोटी कपड़ा और मकान’ में परचूने की दूकान में आटे में नहायी नायिका के ‘रेप सीन’ ने खूब दर्शक बटोरे और पुरस्कार भी। 1970 और 1980 के दशक से यह विषय फिल्मों में दिखाई देने लगा। लेकिन इन फिल्मों में इसकी प्रस्तुति दो भिन्न दिशाओं में विकसित होती दिखाई देती है। एक ओर कुछ फिल्में इस घटना को सामाजिक और मानसिक त्रासदी के रूप में समझने की कोशिश करती हैं, वहीं दूसरी ओर कई फिल्में इसे कथानक की सनसनी और दर्शकीय उत्तेजना के साधन के रूप में इस्तेमाल करती हैं।1978 में प्रदर्शित ‘घर’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें बलात्कार की घटना के बाद एक दंपति के मानसिक और भावनात्मक संकट को केंद्र में रखा गया है। यहाँ कथा प्रतिशोध की ओर नहीं जाती, बल्कि यह दिखाती है कि इस तरह की यौन हिंसा किसी व्यक्ति के भीतर किस तरह का गहरा मनोवैज्ञानिक आघात पैदा करती है। इस फिल्म के बाद अभिनेत्री रेखा ने एक साक्षात्कार में कहा था कि घर जैसी फिल्म के बाद समझ आया  कि मनोरंजन के अलावा सिनेमा के सामाजिक सरोकार भी हो सकते हैं और मैंने भी सिनेमा को गंभीरता से लेना शुरू किया।  इसके विपरीत अस्सी के दशक में  ‘इन्साफ का तराजू ‘ जैसी फिल्मों में बलात्कार के दृश्य लंबे और अत्यधिक दृश्यात्मक रूप में प्रस्तुत किए गए, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या यह चित्रण पीड़िता की पीड़ा को समझाने के लिए था या दर्शकों की  उत्तेजना को संतुष्ट करने के लिए? इसी तरह ‘ज़ख्मी औरत’  जैसी फिल्मों में यह विषय प्रतिशोध की कथा में बदल जाता है। अस्सी फिल्म कानून की कमियों को दिखाने के बाद भी कानून पर भरोसा जताती है।

इज़्ज़त का विमर्श और स्त्री देह

भारतीय समाज में आज भी बलात्कार को  ‘इज़्ज़त लूटना’ कहा जाता है। यह भाषा अपने आप में एक सामाजिक मानसिकता को प्रकट करती है। इस शब्दावली के कारण अपराध का केंद्र बदल जाता है। बलात्कार स्त्री के शरीर और उसकी स्वतंत्रता पर हिंसा होने के बजाय परिवार और समुदाय की प्रतिष्ठा पर आक्रमण के रूप में समझा जाने लगता है। इस तरह स्त्री देह केवल उसका निजी अस्तित्व नहीं रह जाता, बल्कि वह परिवार और समाज की प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया जाता है। परिणामस्वरूप पीड़िता के व्यक्तिगत अनुभव, उसका दुःख, उसका मानसिक संघर्ष हाशिए पर  चला जाता है। हिंदी सिनेमा  प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। अस्सी फिल्म इस स्टीरियोटाइप को तोड़ती है।

प्रतिशोध की कथा और पुरुष नायक

हिंदी सिनेमा में भी बलात्कार की घटना के बाद कथा प्रतिरोध के बदले प्रतिशोध की दिशा में मुड़ जाती है। तब यह यौन हिंसा न रहकर बदला लेने की कथा बन हीरोइज़्म को महत्व देने लगती है। जैसे दुश्मन (1998), मॉम (2017) या मर्दानी (2014-2019-2026) जैसी  फिल्मों में अपराध के बाद कथा का मुख्य लक्ष्य अपराधी को दंडित करना बन जाता है। कई बार यह बदला भाई, पिता या पति के माध्यम से लिया जाता है, जिससे कथा का नायक फिर से पुरुष ही बन जाता है। इस तरह पीड़िता की पीड़ा , प्रतिशोध की नाटकीय संरचना में बदल जाती है।

पितृसत्तात्मक भाषा और स्त्री का वस्तुकरण {अस्सी का संदर्भ }

अस्सी फिल्म के एक दृश्य में पितृसत्तात्मक मानसिकता के गहन स्वरूप को सूक्ष्म लेकिन गहरे ढंग से सामने लाता है। इस दृश्य में बलात्कारी का पिता अपने बेटे को समझाते हुए कहता है कि ‘घर का खाना ही बेस्ट  होता है, लेकिन कभी-कभी मन करे तो बाहर पैसे देकर छोले भठूरे खाये जा सकते हैं’।  यह संवाद पहली नजर में एक साधारण रूपक लगता है, लेकिन वास्तव में यह स्त्री के प्रति समाज की ‘उपभोगी दृष्टि’ को उजागर करता है। यहाँ पत्नी को ‘घर का खाना’ और अन्य स्त्रियों को ‘बाहर का खाना’ कहा गया है। इस रूपक के माध्यम से स्त्री को सीधे-सीधे उपभोग की वस्तु में बदल दिया जाता है। ‘कोबाल्ट ब्लू’ नामक फिल्म में नायक का पिता उसकी माँ को धमकी देता है कि ‘आ जाओ वरना तुम जानती हो बाहर खाने में मुझे ज़रा समय नहीं लगेगा। सिनेमा में इस तरह के संवाद यह भी संकेत करता है कि पुरुष की यौन स्वतंत्रता को समाज किस तरह सामान्य और स्वाभाविक मान लेता है। विवाह संस्था के भीतर पत्नी उसकी स्थायी संपत्ति की तरह मानी जाती है, जबकि बाहर की स्त्रियाँ ऐसी वस्तु हैं जिन्हें पैसे देकर प्राप्त किया जा सकता है। इस तरह पितृसत्ता  रोज़मर्रा की भाषा और पारिवारिक सलाहों में भी मौजूद होती है।

भीड़ का न्याय और संविधान का प्रश्न

फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि एक छतरीवाले व्यक्ति द्वारा बलात्कारियों की हत्या का सिलसिला चालू हो जाता है । यह दृश्य एक गहरे सामाजिक प्रश्न को सामने लाता है, क्या न्याय अदालत तय करेगी या भीड़?  जब कोई व्यक्ति स्वयं न्याय अपने हाथ में ले लेता है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर प्रश्न बन जाता है।  आज का समाज डिजिटल माध्यमों से गहराई से प्रभावित है। सोशल मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि वह नैतिक निर्णयों और सार्वजनिक राय को भी प्रभावित करने लगा है। फिल्म में जब हत्यारे को सोशल मीडिया पर हीरो बनाया जाता है, तो यह दिखाता है कि किस तरह डिजिटल भीड़ किसी घटना को अपने तरीके से व्याख्यायित कर सकती है। इस तरह पितृसत्ता का एक नया रूप सामने आता है – डिजिटल पितृसत्ता, जहाँ न्याय और नैतिकता का निर्माण सोशल मीडिया के शोर में होने लगता है। यह मॉब लिंचिंग की ओर भी संकेत करता है जैसे हाल ही दिल्ली में ‘होली’ के समय जो हिन्दू-मुस्लिम का झगड़ा आपराधिक घटना में बदल गया जो अत्यंत दुःखद और भयावह है । अत्यंत रोचक तथ्य है कि फिल्म में इस छतरी वाले(कुमुद मिश्रा) को जब भी परदे पर दिखाया जाता है तो बैकग्राउंड में ‘ जलतरंग’ बजता है । जलतरंग बजाने वाले कलाकार और उसके प्रशंसक भी अब बहुत कम बचे हैं।  जलतरंग यहाँ मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है।  डिजिटल युग में हमारी संवेदनाओं का मशीनीकरण हो रहा है। सोशल मीडिया पर हम सबसे ज्यादा अ-सोशल यानी असभ्य रूप में नज़र आ रहे हैं। हज़ारों की मित्रसूची के बावजूद मनुष्य अकेला अनुभव करता है।

किशोर मानसिकता और स्त्री-विरोधी संस्कृति

फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू नौवीं कक्षा के छात्रों का व्हाट्स ऐप चैट है। जहाँ  लड़कियों के बारे में अश्लील टिप्पणियाँ करते हुए और अपनी महिला अध्यापिका के बारे में भद्दे मज़ाक करते हुए दिखाया गया है।यह दृश्य केवल किशोर जोक्स तक सीमित नहीं है । यह इस बात की ओर संकेत करता है कि स्त्री-विरोधी मानसिकता किस तरह सामाजिक संस्कारों के माध्यम से बचपन से ही विकसित होती है। जब समाज की भाषा और हास्य में ही स्त्री के प्रति अवमानना मौजूद हो, तो वह धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। दूसरी ओर  पीड़िता  के पांच-छह साल का मासूम लड़का है जिसका पिता उसके लिए कहता है कि “वह बच्चा रह कहाँ गया ?”  यह छोटा-सा वाक्य बहुत गहरे अर्थों से भरा हुआ है। यह दिखाता है कि हिंसा का प्रभाव केवल पीड़िता तक सीमित नहीं रहता  वह पूरे परिवार और अगली पीढ़ी को प्रभावित करता है जिसने एक बालक की  मासूमियत को निगल लिया। पीड़िता जब सहज होते हुए अपने स्कूल की प्राचार्या से कहती है “मैं तैयार हूँ मैम”! वह उस घटना को पूरी ज़िंदगी का ट्रामा नहीं बनाकर रखना चाहती उसका पीटीआई और बच्चा भी इसे दुर्घटना समझकर ज़िंदगी के अगले पड़ाव की ओर बढ़ना चाहते हैं लेकिन तब आश्चर्यजनक ढंग से झटका लगता है जब प्रिंसिपल कहती हैं- “मैं तैयार नहीं ! यह स्कूल तैयार नहीं !हमारा समाज तैयार नहीं कि वह बलात्कार को  गंभीर अपराध की श्रेणी में मानकर अपराधी को सज़ा दिलवाने के लिए आगे आये।“  वास्तव में सभी वकील ,जज और संस्थाओं परिवारों के उच्च निर्णायक पद भार संभालने वाले आज भी इसे स्त्री देह की पवित्रता से जोड़कर परिवार की  प्रतिष्ठा से बाँधकर देखता है। इसलिए कोर्ट में वह अपना नकाब हटाकर जज और पूरे समाज से मुखातिब होकर अपना बयान देती है।

दर्शक, बाजार और हिंसा का आकर्षण

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि ऐसे संवेदनशील विषय पर गंभीरता से अपनी बात रखने वाली फिल्मों को दर्शक  क्यों नहीं मिलते  दर्शक भी तो इसी समाज का हिस्सा है । हिंसात्मक सिनेमा का दौर आज खूब वाह-वाही बटोर रहा है। यह स्थिति केवल मनोरंजन या  पसंद का मामला नहीं है। इसके पीछे  एक विशेष संरचना गढ़ी गई है जहाँ आक्रामक पुरुष नायक को राष्ट्र और परिवार के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह छवि पितृसत्तात्मक समाज की उस कल्पना को पुष्ट करती है जिसमें शक्ति और न्याय का केंद्र पुरुष होता है। इसके विपरीत, जब कोई फिल्म समाज की जटिलताओं और कड़वे यथार्थ को सामने लाती है, तो वह दर्शकों के लिए कम आकर्षक हो जाती है क्योंकि वह आत्ममंथन की माँग करती है।

अंततः अस्सी फिल्म  को दर्शक न मिलना ,उस सामाजिक मानसिकता पर गूढ़ प्रश्न  उठाती  है  कि क्या हमारा समाज संवेदनशील सिनेमा के लिए तैयार नहीं ? सिर्फ मनोरंजन के नाम पर पैसा वसूल ही उसका  ध्येय  है ।  शायद इस प्रश्न का उत्तर केवल सिनेमा निर्माताओं के पास नहीं है क्योंकि उनके अनुसार हम वही बनाते है जो दर्शक देखना चाहते हैं।  इसलिए इसका जवाब  हमारे समाज की सामूहिक चेतना में  कुंडली मारे बैठा हुआ है। जब तक समाज स्त्री देह को प्रतिष्ठा  या  प्रतिशोध की पटकथा में कैद रखेगा, तब तक बलात्कार जैसे गंभीर विषय पर बनाने वाली  फिल्म चाहे कितनी  प्रश्नाकुल,व्याकुल करने वाली क्यों न हो, दरअसल उसी पुरानी घिसी-पिटी हिंसक मानसिकता का आईना भर बनकर रह जाएगी।  सवाल यह भी बनता है  कि सिनेमा ‘रेप कल्चर’ को क्यों प्रोमोट करता है, या  हम दर्शक के तौर पर  क्यों बार-बार उसी हिंसक कथा को देखने के लिए सिनेमाघर जाते हैं ? यदि  हमारी संवेदनाएँ सचमुच जीवित हैं, तो सिनेमा के परदे पर दिखाई देने वाली हिंसा से पहले हमें अपने भीतर पैठी  चुप्पी’ को पहचानना होगा, जहाँ से ‘रेप कल्चर की असली पटकथा लिखी जा चुकी होती  है। अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि सिनेमा यौन हिंसा को किस रूप में दिखाता है असली सवाल यह है कि हमारा समाज उसे किस दृष्टि से देखना चाहता है।  शायद समय आ गया है कि हम परदे पर दिखाई देने वाली हिंसा से पहले अपने भीतर लिखी जा रही उस अदृश्य पटकथा को पढ़ें, जहाँ से “रेप कल्चर” की असली कहानी शुरू होती है।

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रक्षा गीता

लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com
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