
शिक्षा का क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से शक्ति-संघर्ष का केन्द्र रहा है और इसका स्वरूप लम्बे समय तक समावेशी नहीं बन सका। भारत की पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं थी। यह व्यवस्था मुख्यतः सीमित समुदायों तक केन्द्रित रही, जिसमें वंचित वर्गों के लिए लगभग कोई स्थान नहीं था। शिक्षा की विषयवस्तु भी व्यावहारिक जीवन की समस्याओं के समाधान की बजाय दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन पर अधिक केन्द्रित थी। विज्ञान और गणित जैसे विषयों का संस्थागत विकास अपेक्षाकृत कमजोर रहा। पाँचवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी तक शिक्षा का यही स्वरूप बना रहा और हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही शैक्षिक व्यवस्थाओं में सामाजिक समावेशन के ठोस प्रमाण नहीं मिलते।
ऐसे परिदृश्य में औपनिवेशिक काल में मैकाले की शिक्षा नीति ने एक नयी बहस को जन्म दिया, जिसकी प्रतिध्वनि स्वतन्त्रता आन्दोलन तक सुनाई दी। भारतीय विद्वानों ने इस नीति की आलोचना करते हुए इसे औपनिवेशिक हितों के अनुकूल बताया। यह धारणा प्रबल थी कि इस नीति का उद्देश्य ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो ‘रक्त और रंग से भारतीय, लेकिन विचार और रुचि से अँग्रेज’ हो। महात्मा गाँधी ने भी इस नीति की तीखी आलोचना की और भारतीय शिक्षा परम्परा को एक ऐसे वृक्ष के रूप में देखा जिसे जड़ से उखाड़ दिया गया, जिससे भारतीय समाज में हीनभावना का संचार हुआ।
उन्नीसवीं शताब्दी में ज्योतिबा फुले ने इस प्रश्न को एक अलग दृष्टि से देखा। उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था की आलोचना करते हुए भी उसमें निहित आधुनिकता और परिवर्तनकारी सम्भावनाओं को पहचाना। फुले का मानना था कि आधुनिक शिक्षा जाति-आधारित भेदभाव को तोड़ने का माध्यम बन सकती है। उन्होंने पहली बार शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय की अवधारणा को स्पष्ट रूप से स्थापित किया। उनकी माँग थी कि शिक्षा का प्रसार केवल उच्च वर्गों तक सीमित न रहकर ग्रामीण जनता, शूद्र-अतिशूद्रों और महिलाओं तक हो। 1882 के हंटर आयोग के समक्ष उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाने की जोरदार वकालत की। इस प्रकार शिक्षा में सामाजिक न्याय की पहली संगठित और वैचारिक माँग फुले के माध्यम से सामने आयी।
औपनिवेशिक शिक्षा का मूल उद्देश्य सत्ता के हितों की पूर्ति था, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक न्याय के प्रश्नों को भी गति मिली। यह विरोध केवल बाहरी औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के भीतर मौजूद असमानताओं और ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ के खिलाफ भी था। इसी क्रम में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम माना। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि शिक्षा केवल उन वर्गों तक सीमित रहेगी जिनका हित जाति व्यवस्था को बनाए रखने में है, तो यह व्यवस्था और मजबूत होगी। इसके विपरीत, यदि शिक्षा वंचित तबकों तक पहुँचेगी, तो जातिगत असमानताओं का क्षरण सम्भव होगा। अम्बेडकर का लक्ष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण था जो सामाजिक गैरबराबरी को समाप्त कर सके, और उन्होंने इसे संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से लागू करने का प्रयास भी किया।
स्वतन्त्र भारत में 1968 की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित थी। इसमें 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य रखा गया, साथ ही त्रिभाषा सूत्र, शिक्षक प्रशिक्षण और शिक्षा पर व्यय बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल थे। हालांकि इसमें सामाजिक न्याय का विचार अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद था, लेकिन इसे स्पष्ट रूप में परिभाषित नहीं किया गया। 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में पहली बार महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षिक अवसरों की समानता पर विशेष बल दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय का प्रश्न स्वतन्त्र भारत में धीरे-धीरे स्पष्ट और केन्द्रीय मुद्दे के रूप में उभरता गया।
नयी शिक्षा नीति 2020 के प्रारूप से लेकर क्रियान्वयन तक समर्थन और विरोध दोनों स्वर मुखर रहे हैं। हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा समता से जुड़े प्रावधान लागू किए जाने के बाद यह बहस फिर तेज हुई है कि शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय को नयी नीति किस हद तक सुनिश्चित करती है। इस सन्दर्भ में यह जरूरी हो जाता है कि नीति के भीतर शामिल और उपेक्षित दोनों पक्षों की सन्तुलित पड़ताल की जाए।
नयी शिक्षा नीति का प्रारम्भिक भाग शिक्षा के उद्देश्य को रेखांकित करता है। इसके अनुसार शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति की पूर्ण क्षमता का विकास, न्यायपूर्ण समाज की स्थापना और राष्ट्रीय प्रगति को गति देना है। यह दृष्टि शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन की प्रक्रिया न मानकर सामाजिक परिवर्तन के औजार के रूप में स्थापित करती है। यह नीति स्वीकार करती है कि विश्व स्तर पर ज्ञान और कौशल की प्रकृति तेजी से बदल रही है। बिग डेटा, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों के विस्तार के कारण पारम्परिक श्रम संरचनाएँ बदल रही हैं और नये प्रकार के कौशल की माँग बढ़ रही है। इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षा को रोजगारोन्मुख और बहु-विषयक बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
नीति की दृष्टि में उच्च शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य कुशल मानव संसाधन तैयार करना है, जिससे यह आशंका पैदा होती है कि मानविकी और सामाजिक विज्ञान के पारम्परिक अनुशासनों की उपेक्षा हो सकती है। तकनीकी और व्यावसायिक दक्षता पर अत्यधिक जोर शिक्षा को एकांगी बना सकता है, जबकि समाज की जटिलताओं को समझने के लिए व्यापक मानवीय दृष्टि आवश्यक है।
नीति में भारत की समृद्ध शैक्षणिक परम्परा के पुनर्स्मरण और पुनर्स्थापन की बात की गयी है, साथ ही वंचित वर्गों के समावेशन का भी उल्लेख है। समावेशन कोई नयी अवधारणा नहीं है; यह संविधान प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों का हिस्सा रहा है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि समावेशन का उल्लेख किया गया है या नहीं, बल्कि यह है कि उसे लागू करने के ठोस उपाय कितने प्रभावी हैं।
संरचनात्मक स्तर पर 10+2 के स्थान पर 5+3+3+4 का नया ढांचा प्रस्तावित किया गया है, जो बाल्यावस्था से ही शिक्षा को अधिक लचीला बनाने का प्रयास करता है। बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करते हुए मातृभाषा में शिक्षा देने की बात कही गयी है। यह विचार सिद्धांततः स्वागतयोग्य है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, जहाँ बहुभाषी छात्र समुदाय मौजूद है, उपयुक्त शिक्षकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होगी। यदि इस दिशा में पर्याप्त तैयारी नहीं की गयी तो यह प्रावधान केवल आदर्श वाक्य बनकर रह जाएगा।
शिक्षक प्रशिक्षण के सन्दर्भ में बी.एड. पाठ्यक्रम को चार वर्षीय करने का प्रस्ताव भी सामने आता है। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की अपेक्षा की गयी है, लेकिन यह अधिक समय और संसाधन माँगने वाला कदम है। इससे युवाओं के लिए शिक्षण पेशे में प्रवेश कठिन हो सकता है और सम्भावित प्रतिभाएँ लम्बी प्रशिक्षण प्रक्रिया में उलझ सकती हैं।
नीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देना है। यही वह क्षेत्र है जहाँ सामाजिक न्याय की अवधारणा सबसे अधिक चुनौती में दिखाई देती है। निजी संस्थानों के विस्तार से शिक्षा की गुणवत्ता में कुछ सुधार सम्भव है, लेकिन इसके साथ ही आर्थिक असमानता के कारण वंचित वर्गों की पहुँच सीमित हो सकती है। यदि राज्य की भूमिका नियामक और संरक्षक के रूप में मजबूत नहीं होगी, तो शिक्षा का यह निजीकरण समावेशन के बजाय बहिष्करण का कारण बन सकता है।
उच्च शिक्षा के सन्दर्भ में नीति ने कई समस्याओं की पहचान की है—जैसे खण्डित संरचना, विषयों का कठोर विभाजन, शोध और नवाचार पर कम जोर, तथा अप्रभावी नियामक तन्त्र। इसके समाधान के रूप में बहु-विषयक संस्थानों और स्वायत्तता की बात की गयी है। किन्तु महाविद्यालयों को स्वायत्त बनाने की प्रक्रिया, यदि उचित निगरानी के बिना लागू होती है, तो वे निजी संस्थानों की तरह व्यवहार करने लगेंगे, जिससे सामाजिक न्याय का लक्ष्य कमजोर पड़ सकता है।
नीति तकनीकी आधारित निगरानी प्रणाली पर भी भरोसा जताती है, किन्तु यह मान लेना कि तकनीक अपने आप पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर देगी, एक सरलीकरण है। अन्ततः तकनीक का संचालन मनुष्य ही करता है, इसलिए मानवीय हस्तक्षेप और संस्थागत जवाबदेही को बनाए रखना आवश्यक है।
डिग्री पाठ्यक्रमों में प्रत्येक चरण पर प्रमाण-पत्र देने का प्रावधान लचीलापन तो प्रदान करता है, लेकिन इसके कारण छात्रों के बीच बीच में पढ़ाई छोड़ने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है। यह पहल ड्रॉपआउट दर को घटाने के बजाय अनजाने में उसे बढ़ा सकती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो नयी शिक्षा नीति 2020 में कई सकारात्मक सम्भावनाएँ निहित हैं, लेकिन सामाजिक न्याय और समावेशन के प्रश्न पर यह पूरी तरह आश्वस्त नहीं करती। नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके क्रियान्वयन में राज्य की प्रतिबद्धता, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और नियामक तन्त्र की मजबूती कितनी सुनिश्चित की जाती है। अभी भी इसमें व्यापक संशोधन और सतत मूल्यांकन की आवश्यकता बनी हुई है, ताकि शिक्षा वास्तव में समानता और न्याय का माध्यम बन सके।










