
ईरान, इजरायल, अमेरिका और भारत
भारत और ईरान दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं वाले देश हैं। इजरायल नया-नया जन्मा एक देश है और संयुक्त राज्य अमेरिका मात्र ढाई सौ वर्ष पुराना देश है, जो 4 जुलाई 1776 को अस्तित्व में आया। यहूदियों की भूमि के लिए ‘इजरायल’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, जो केवल बाईबल में ही नहीं, उसके पहले से भी प्रयुक्त होता रहा है। बाईबल के अनुसार ईश्वर के फरिश्ते के साथ युद्ध लड़ने के बाद जैकब का नाम ‘इजरायल’ रखा गया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फिलिस्तीन को विभाजित कर एक स्वतन्त्र देश ‘इजरायल’ की स्थापना की। 14 मई 1948 को इजरायल राज्य के संस्थापक और प्रथम प्रधानमन्त्री डेविड बेन-गुरियन (1886- 1973) ने इजरायल की स्वतन्त्रता की घोषणा की, जिसके तुरत बाद अरब राष्ट्रों – मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक ने उस पर हमले किये। 1948 का यह युद्ध पहला अरब-इजरायली युद्ध है। जब संयुक्त राष्ट्र ने 29 नवम्बर 1947 को एक संकल्प के द्वारा फिलिस्तीन से एक अरब और एक यहूदी राज्य की स्थापना की सिफारिश की थी,उसी समय से अरब राष्ट्रों के साथ इजरायल का सम्बन्ध शत्रुतापूर्ण हो गया।
इजरायल के उत्तर तथा उत्तर पूर्व में लेबनान और सीरिया है, पूर्व में जॉर्डन और दक्षिण पश्चिम में मिस्र है। इस यहूदी राज्य और पड़ोसी अरब देशों के बीच झड़पों, संघर्षों और युद्धों का एक सुदीर्घ इतिहास है, जिसे ‘नकवा’ (विनाश) भी कहा जाता है। 1948, 1956, 1967 (छह दिनों का युद्ध) और 1973 योम किप्पुर युद्धों के बाद इजरायल ने अपनी रक्षा करते हुए भूभाग का विस्तार किया। लाखों फिलिस्तीनी विस्थापित हुए। लगभग प्रत्येक अरब-इजरायली युद्ध पर कई किताबें तफसील से लिखी गयी हैं। अनुराधा प्रकाश की किताब ‘द ओरिजिन्स ऑफ द सेकंड अरब – इजरायल वार’, जॉर्ज एस. हैजर की ‘द थर्ड अरब- इजरायली वार’, गैलन जैक्सन की सम्पादित पुस्तक ‘ द 1973 अरब-इजरायली वार’ और गार्वेच जॉर्ज डब्ल्यू की ‘द 1973 अरब-इजरायली वार’ के साथ अरब-इजरायल युद्ध पर प्रकाशित अन्य कई किताबें हैं, जिनसे हम विस्तार से दोनों देश के युद्धों के बारे में जान पाते हैं। इस वर्ष 28 फरवरी से अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर किये गये हमले और उस हमले में मारे गये ईरान के सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) अयातुल्ला अली खामेनेई (1939 -2026) के साथ अन्य अनेक बड़े नेता, अधिकारी की मौत के बाद जैसी लड़ाई शुरू हुई है, उसकी शीघ्र समाप्ति के कम आसार दिखाई दे रहे हैं।
ईरान में शाह के शासन-काल में गाँवों में गरीबी अधिक बढ़ गयी थी। शाह की शाहखर्ची के खिलाफ इस्लाम में निहित समानता को नारा बनाकर शाह के शासन का विरोध हुआ, उसे ‘पश्चिमी देशों का पिट्ठू’ माना गया और मोहम्मद रजा पहेलवी के शासन को इस्लामी क्रान्ति ने उखाड़ फेंका। राजशाही का अन्त किया।16 सितम्बर 1941 से 11 फरवरी 1979 तक मोहम्मद रजा पहेलवी (1919 -1980) ने, जिन्हें मोहम्मद रजा शाह भी कहा जाता था, ईरान पर हुकूमत की। उनकी छवि एक धर्मनिरपेक्ष मुसलमान की थी, पर अपने तानाशाही बर्ताव के कारण उन्होंने शियाओं का समर्थन खोकर अपनी लोकप्रियता भी खो दी। उनको गद्दी से उतार कर ईरान में 1979 में इस्लामी गणतन्त्र की स्थापना हुई। ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान’ के संस्थापक ईरान के प्रथम सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी (1902 -1989) ने ग्यारह वर्ष तक शासन किया। वे 1979 से 1989 तक ईरान के ‘रहवर इंकिलाब’ थे।
‘टाइम’ पत्रिका ने 1979 में इन्हें वर्ष का सर्वाधिक प्रभावशाली नेता चुना था। उन्होंने ही सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया था और कई राजनीतिक कैदियों की मृत्यु के आदेश दिये थे। इनके बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता 1989 से 2026 तक, अपनी हत्या के समय तक रहे। वे मोहम्मद रजा पहेलवी के बाद सर्वाधिक लम्बे समय तक सत्ता में रहे थे – 4 जून, 1989 से 28 फरवरी 2026 तक। ईरानी क्रान्ति के प्रमुख नेताओं में उनका स्थान है। उन पर हत्या के पहले भी कई प्रयास हुए थे, जिसमें हमेशा के लिए उनका दाहिना हाथ क्षतिग्रस्त हो गया था।
ईरान में महँगाई, ईरानी मुद्रा का अवमूल्यन,नागरिक स्वतन्त्रता का अभाव, कठोर धार्मिक नियम के खिलाफ जनता में आक्रोश था। इस आक्रोश और महिला अधिकारों के लिए सत्ता विरोधी प्रदर्शन जारी थे। 16 सितम्बर 2022 के ‘हिजाब विरोधी आन्दोलन’, में महसा अमीनी की मौत हुई थी। बाईस वर्षीय महसा अमीनी को ईरान की ‘नैतिकता पुलिस’(गश्त-ए-इरशाद) ने सख्त हिजाब कानूनों का कथित तौर पर उल्लंघन करने के आरोप में हिरासत में लिया था। ‘गश्त-ए-इरशाद’ ईरान की एक कुख्यात ‘नैतिकता पुलिस’ या ‘गाइडेंस पेट्रोल’ है, जो 2006 से सार्वजनिक स्थलों पर सख्त इस्लामी ड्रेस कोड लागू कर रही है। इस्लामी ड्रेस कोड कुरआन और हदीस पर आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य शालीनता, सादगी और शरीर के अंगों को ढँकना है। हिजाब इस्लाम के अन्तर्गत पर्दा-प्रथा से सम्बन्धित है। महिसा अमीनी की मृत्यु के बाद ईरान में ‘महिला, जीवन, स्वतन्त्रता’, विरोध-प्रदर्शन आरम्भ हुआ। कई विरोथियों को फाँसी दी गयी। इस घटना से ईरान में महिलाओं के दमनकारी कानूनों और मानवाधिकार उल्लंघन पर अन्तरराष्ट्रीय ध्यान गया।
अमीनी की मृत्यु के बाद ईरान में कठोर इस्लामी आचार संहिता और नैतिक पुलिसिंग के खिलाफ एक बड़ा जनान्दोलन आरम्भ हुआ। पुलिस की हिंसा और दमन के विरुद्ध महिलाओं ने हिजाब जलाकर विरोध प्रकट किया। 2009 के बाद ईरान में होने वाला यह सबसे बड़ा विरोध-प्रदर्शन था,जिसके खिलाफ सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर क्रूर कार्रवाई की,उन्हें हिरासत में लिया। सैकड़ों लोग मारे गये, इस क्रोध और गुस्से का अन्दाज इससे लगाया जा सकता है कि खामेनेई के मारे जाने के बाद हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रसन्नता प्रकट की। अमीनी की मृत्यु के तुरत बाद उनपर लिडिया ब्रैडले की पुस्तक ‘महसा अमीनी, मार्टर?: द लाइफ एण्ड डेथ ऑफ महसा अमीनी एण्ड द फाइट टू फ्रीडम फ्रॉम एन ऑप्रेसिव सिस्टम’ आयी। ‘महिला,जीवन,स्वतन्त्रता’ का आन्दोलन ईरान में समाप्त नहीं हुआ है। पिछले साल (2025) अर्श अजीमी की पुस्तक आयी- ‘व्हाट ईरानियस वांट : विमेन, लाइफ, फ्रीडम’।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लगा था कि अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद ईरान बिखर जाएगा जो नहीं हुआ। खामेनेई के मारे जाने पर ईरान में जश्न भी मनाया गया, प्रदर्शनकारियों ने पिंजड़े में न रहने के नारे भी लगाये, पर इस आन्तरिक असन्तोष और प्रदर्शन पर इजरायल-अमेरिकी हमले का वहाँ के नागरिकों पर अधिक प्रभाव पड़ा। वे खुलकर अमेरिका के विरोध में आये। ईरानी कवि अलीरेजा गजवे की 200 पृष्ठों की अप्रकाशित पुस्तक है –‘किलिंग ट्रम्प’ जिनमें से उन्हें कई कविताओं को पढ़ते हुए सुना जा सकता है। अब ईरान ने, विशेषज्ञ-सभा (असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स) ने 56 वर्षीय ईरानी सिया धर्म गुरु मोजतबा खामेनेई को सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) चुन लिया है। सुप्रीम लीडर का पद सम्हालने के बाद अपने पहले सम्बोधन में इन्होंने अमेरिका और इजरायल को दिए सन्देश में यह कहा है कि ईरान युद्ध में मारे गये शहीदों, खासकर बच्चों की मौत का बदला अवश्य लिया जाएगा और खाड़ी क्षेत्र में उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। होर्मुज जलडमरुमध्य को बन्द रखने की भी बात कही।
मोजतबा खामेनेई ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के दूसरे पुत्र हैं। वे परमाणु कार्यक्रम और ईरान के रुढ़िवादी गुट के कट्टर समर्थक हैं। 1989 से ईरान में विदेशी प्रभुत्व समाप्त हो चुका है। ईरान न तो वेनेजुएला है और ना वह खाड़ी के अन्य देशों की तरह है। ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की ट्रम्प-चाह पूरी नहीं हो सकी है। ट्रम्प ने ईरान की जनता से बगावत की भी अपील की थी, पर उनकी अपील का कोई असर नहीं हुआ है। ईरान में इस्लामी हुकूमत को हटाना आसन नहीं है। शियाओं में शहीद होने का कहीं अधिक जज्बा है। ईरान में अब खामेनेई अपनी शहादत के लिए याद किए जाएँगे। ट्रम्प ने मोजतबा खामेनेई को ईरान का शासक नामित किये जाने के बाद अपनी नाखुशी प्रकट की है-“मैं खुश नहीं हूँ। हम ऐसा व्यक्ति चाहते हैं जो ईरान में सामंजस्य और शान्ति कायम करे।”
ईरान को अस्थिर करने के लिए, नागरिक असन्तोष भड़काने और अन्य कार्यों के लिए वहाँ सीआईए के सैकड़ों एजेंट्स सक्रिय थे। ईरानी अधिकारियों के अनुसार अब तक 500 से अधिक सीआईए एजेंट्स मारे जा चुके हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, शीत-युद्ध के दौर में और उसके बाद भी अमेरिका ने जिस तरह अनेक देशों में अपने मन मुताबिक सत्ता-परिवर्तन कराया, ‘लोकतन्त्र’ के नाम पर अनेक देशों के शासक बदले, अपनी दादागिरी और गुंडई का भद्दा, अश्लील प्रदर्शन किया, वैसा वह ईरान में अब तक रजा पहेलवी के बाद नहीं कर सका है, अपने अभियान में सफल नहीं हो सका है। अफगानिस्तान से अमेरिका को भागना पड़ा, वियतनाम युद्ध में उसकी हार हुई। ईरान पर अमेरिका ने उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई दबाव बनाये, पर ईरान ने इस पर अमेरिका से कोई समझौता नहीं किया।
वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू की सूची में ईरान को दुनिया का सबसे पुराना देश घोषित किया गया है, जहाँ मनुष्य लगभग 1 लाख साल से रह रहा है। 5 हजार ईसा पूर्व से यहाँ खेती आरम्भ हो गयी थी। भारत वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू की सूची में दूसरा सबसे पुराना और चीन तीसरा सबसे पुराना देश है। ईरान का प्राचीन नाम पार्स (फारस) था। सातवीं शताब्दी में अरबों ने इस पर विजय प्राप्त कर इस्लाम का प्रसार किया। उसी के बाद यहाँ शिया इस्लाम आया। भारोपीय जाति की आबदी यहाँ सर्वाधिक 70 प्रतिशत है। धार्मिक कट्टरता के खिलाफ यहाँ सूफी आन्दोलन का विकास हुआ। फिरदौस,उमर खय्याम, रूमी, सादी, हफीज सब यहीं के थे, जो अब विश्व प्रसिद्ध कवि हैं। ईरान की आबादी इजरायल की 1 करोड़ 8 लाख की आबादी से कहीं अधिक 9 करोड़ 15 लाख है। इजरायल का क्षेत्रफल 20 हजार 700 वर्ग किलोमीटर है और ईरान का 16.5 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो भारत से आधा है। ‘ईरान’ नाम 1935 में दिया गया है। इसके पहले यह फारस कहलाता था।
ईरान के राज्य काउंटीज में, काउंटीज जिलों में और जिले गाँवों में बँटे हुए हैं। यहाँ राज्य गवर्नर जनरल द्वारा शासित होता है। ईरान में कुल 31 राज्य, 429 काउंटीज, 1 हजार 57 जिले (बाख्श), 2 हजार 589 ग्रामीण जिले(देहेस्तान) और 1 हजार 245 शहर हैं। इसके बजट का 45 प्रतिशत तेल से आता है। प्राकृतिक गैसों के भण्डार (रिजर्व) की दृष्टि से यह विश्व का सबसे बड़ा देश है। ‘ओपेक’ (तेल उत्पादक देशों का संगठन) का यह दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है, यह पश्चिमी एशियाई देश है। यह एशिया महाद्वीप के पश्चिम में स्थित है। यह खाड़ी देशों (सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान) से सटा देश है। ये छह देश ‘खाड़ी सहयोग परिषद’ (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल जीसीसी) के देश हैं। ईरान इसका हिस्सा नहीं है। ईरान की सेना में 3 लाख 50 हजार, नौ सेना में 18 हजार, वायु सेना में 30 हजार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्डस कोर (आईआरजीसी) में 1 लाख 25 हजार सैनिक हैं। ईरान की नियमित सेना से स्वतन्त्र है इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्डस कोर,जिसकी स्थापना ईरान के पहले नेता रुहोल्लाह खुमैनी ने अप्रैल 1979 में की थी। यह ईरान का अत्यधिक शक्तिशाली सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक, संगठन है। इसकी स्थापना इस्लामी क्रान्ति के बाद इस्लामिक शासन की रक्षा के लिए की गयी। यह पारम्परिक सेना से एकदम अलग है। 2019 में संयुक्त राज्य अमेरिका और कुछ अन्य देशो ने इसे ‘विदेशी आतंकवादी संगठन’ घोषित किया था।
यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि विश्व भर में अमेरिका के 877 सैन्य अड्डे क्यों हैं? किसके लिए हैं? अमेरिका सर्वाधिक शक्तिशाली देश है। उसे किसी भी देश से खतरा नहीं है। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के देशों – बहरीन, मिस्र, इराक, जोर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई (आबू धाबी, दुबई, शारजाह,अजमान,उम अल-कुवैन,रास अल खैमाह और फजेराह) में अमेरिका के स्थायी सैन्य ठिकाने क्यों हैं? इन देशों में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 40 से 50 हजार के बीच है। मध्यपूर्व के ये अमेरिकी सैन्य अड्डे अमेरिकी केन्द्रीय कमान (सेंट कॉम) के अधीन काम करते हैं। सेंट कॉम मिस्र से लेकर कजाकिस्तान तक के क्षेत्रों में सैन्य अभियानों का निर्देशन करता है। 2025 में 13 जून से 24 जून तक ईरान- इजरायल के बीच बारह दिनों का सैन्य संघर्ष हुआ था। इजरायल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किये थे, जिसके जवाब में ईरान ने सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। 24 जून 2025 को युद्ध विराम हुआ, पर इस वर्ष 28 फरवरी से ईरान, इजरायल-अमेरिका युद्ध इन पंक्तियों को लिखे जाने (13 मार्च 2026) तक समाप्त नहीं हुआ है और न तुरत इसके समाप्त होने की आशा है। पहल अमेरिका और इजरायल ने की। ईरान के दक्षिणी शहर मिनाब के शजारेह तैय्येबेह गर्ल्स एलिमेंट्री स्कूल पर अमेरिका ने मिसाइल से हमला कर 100 से अधिक लड़कियों को मार डाला। तेहरान टाइम्स ने अपने पहले पन्ने पर 100 लड़कियों का फोटो डालकर यह लिखा है-“ट्रम्प, लुक देम इन द आइज विद हंड्रेड्स ऑफ इरानियन चिल्ड्रेन डेड, द यूएस प्रेसिडेंट स्टिल डिनाइज द बॉम्बिंग ऑफ मिनाब्स, एलेमेंटरी स्कूल!” ट्रम्प और नेतन्याहू ने जिस युद्ध की शुरुआत की है, उसका अन्त उतना आसान नहीं है।
इजरायल दक्षिण पश्चिम एशिया का एक स्वतन्त्र यहूदी राज्य है, जिसका जन्म फिलिस्तीन से ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के बाद 14 मई 1948 को हुआ यह दक्षिण पूर्व एशिया और मध्यपूर्व का सबसे उन्नत देश है। सॉफ्टवेयर, संचार एवं जीवन-विज्ञान में इसने अत्याधुनिक तकनीकों का विकास किया है। यहाँ प्रति 10 हजार कर्मचारियों पर 140 वैज्ञानिक, तकनीशियन और इंजीनियर हैं, जो अमेरिका में मात्र 85 हैं। छह वैज्ञानिकों को यहाँ नोबेल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। इसके विश्वविद्यालय अत्याधुनिक हैं। कम्प्यूटर, गणित, रसायन-विज्ञान में यहाँ के विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 50 विश्वविद्यालयों में हैं। यहूदी यहाँ 73.5 प्रतिशत हैं, अरब 21.1 प्रतिशत और अन्य 5.4 प्रतिशत है। 76 वर्षीय प्रधानमन्त्री बेंजामिन नेतन्याहू लिकुड पार्टी केअध्यक्ष हैं और वे इजरायल राज्य की स्थापना के बाद पहले इजरायली प्रधानमन्त्री हैं। वे लम्बे समय से इजरायल के प्रधानमन्त्री हैं। अगस्त 2025 में नेतन्याहू ने ग्रेटर इजरायल की बात कही थी, जिसमें फिलिस्तीनी क्षेत्र के अलावा जार्डन, सीरिया, मिस्र और लेबनान के कुछ हिस्से भी शामिल किये जा सकते हैं। उधर ट्रम्प भी ग्रेट अमेरिका और इधर मोदी भी ग्रेट इण्डिया की बात करते हैं। इन तीनों ने अपने-अपने देश में जैसे ‘ग्रेटर’ कार्य किये हैं, उसी के कारण इजरायल में नेतन्याहू के खिलाफ और अमेरिका में ट्रम्प के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत की बात निराली है। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन ने जब प्रधानमन्त्री को ‘डांस’, करने का आग्रह किया था, इन्दिरा गाँधी ने नहीं स्वीकारा, पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इजरायल में ‘डांस’ करते हैं और वहाँ से भारत लौटने के मात्र दो दिन बाद, अमेरिका और इजरायल दोनो ने मिलकर ईरान पर हमला किया, जिसकी जानकारी मोदी को नहीं थी, जबकि ट्रम्प को वे अपना ‘मित्र’ बताते हैं और ये पहले प्रधानमन्त्री हैं, जिन्होंने इजरायल की यात्रा की।
इस युद्ध में अमेरिका का प्रति दिन एक बिलियन डॉलर खर्च हो रहा है। कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 100 डॉलर हो चुकी है। ट्रम्प इसे वैश्विक शान्ति के लिए बड़ी छोटी कीमत कह रहे हैं। शेयर बाजार पर अमेरिका-इजरायल, ईरान युद्ध का असर दिखाई पड़ रहा है। लड़ाई के पहले दिन ही खामेनेई की मौत हो गयी, पर कई दिनों तक भारत खामोश रहा। ईरान इन्तकाम चाहता है। सम्भव है, नेतन्याहू भी मारे जाएँ। अमेरिका और इजरायल की सनक से कमोबेश पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। मिनाब के शजारेह तैय्येबेह गर्ल्स एलिमेंट्री स्कूल पर जिस टॉमहॉक क्रूज मिसाइल से हमला किया गया, वह केवल अमेरिका के पास है, पर अमेरिका अपना दोष नहीं स्वीकार रहा है। ईरानी सबसे अधिक मारे गये हैं, पर इजरायल कम क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है।युद्ध जारी है। कब थमेगा, कोई नहीं जानता। संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद ने कई आपातकालीन बैठकें बुलायीं, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनो पक्षों-ईरान और इजरायल से ‘संयम बरतने’ की अपील की, क्षेत्र को विनाश के कगार से पीछे खींचने का आग्रह किया, चेतावनी भी दी,पर अब संयुक्त राष्ट्र का कोई महत्त्व नहीं है।
अमेरिकी-ईरानी शिक्षाविद, राजनीतिक विश्लेषक सैयद मोहम्मद मरांडी ने (14.5.1986), जो अभी तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं, कहा है कि “भारतीय प्रधानमन्त्री ने नेतन्याहू से गठबन्धन करके एक मुर्खतापूर्ण गलती की है। इस युद्ध का भारत कोअधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। उसके पास तेल भण्डार नहीं है, रणनीतिक भण्डार भी नहीं है।” मोदी-नेतन्याहू मिलन और ट्रम्प- मोदी ‘मैत्री’ का यह परिणाम है कि भारत अमेरिका के घुटनों पर गिर चुका है और नेतन्याहू से मिलने के मात्र दो दिन बाद इजरायल ईरान पर हमला करता है, जिसकी भारत को कोई जानकारी नहीं होती। ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला कर अन्तरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया, भारत ने कोई शिकायत नहीं की। आज विश्वमंच पर ‘विश्वगुरु’ की कोई हैसियत नहीं है। भारत में तेल का आयात तीन मार्गों – होर्मुज (इराक/सऊदी), केप ऑफ गुड होप (रूस/यूएसए) और व्लादिवोस्तोक मार्ग (रूस) से होता है। होर्मुज से मात्र पाँच छह दिनों में तेल पहुँचता है और अन्य दो मार्गों से इसे आने में 20-22 दिन से 35-45 दिन लग जाते हैं। भारत तेल के लिए जलडमरुमध्य पर निर्भर है। यह दुनिया का सबसे महत्त्वपूर्ण‘ऑयल चेक प्वायंट’ है, जिसे दुनिया की ‘तेल की नस’, कहा जाता है। विश्व का 20 से 25 प्रतिशत कच्चा तेल इसी जल-मार्ग से आयात होता है। पश्चिम एशिया से आने वाला एलएनजी 68 प्रतिशत से अधिक है। आज तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कभी बन्द नहीं हुआ था।
28 फरवरी के हमले/युद्ध के बाद जलडमरुमध्य से जहाजों का आवागमन 95 प्रतिशत कम हो गया है। भारत में गैस(प्राकृतिक, एलएनजी और एलपीजी, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) की कुल खपत का 50 से 60 प्रतिशत दूसरे देशों से आयात होता है।भारत के लिए एलपीजी के मुख्य आयातक देश कतर, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत हैं। यहाँ अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं, जहाँ ईरान मिसाइलें दाग रहा है, ड्रोन से हमले कर रहा है। इस युद्ध का प्रभाव हर तरह के उद्योग पर पड़ेगा क्योंकि सबको गैस और तेल की स्टोरेज जरूरी है, जो अनन्त काल के लिए नहीं होती। इस ‘स्टोरेज’ के खत्म होने पर दिक्कत होगी। भारत के अनेक उद्योग खतरे में पड़ सकते हैं। भारत के पास एक महीने का ‘स्टोरेज’ है। युद्ध समाप्त नहीं हुआ, तब क्या होगा? भारत में में 90 प्रतिशत गैस की आपूर्ति खाड़ी के देशों से होती है और खाड़ी के देश ईरान के निशाने पर हैं।फिर उज्ज्वला गैस योजना का क्या होगा?
नार्वे और अमेरिका से भारत जो गैस लेगा, उसे यहाँ पहुँचने में दो-तीन महीने लगेंगे। कीमत भी बढ़ेगी। दोगुनी – तिगुनी हो जाएगी। अभी ही रसोई गैस की किल्लत आरम्भ हो चुकी है- अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान का हमला जारी है। स्ट्रेट आफ होर्मुज बन्द है। मोजतबा खामेनेई खाड़ी देशों को अमेरिकी सैन्य अड्डे बन्द करने को कह चुके हैं। अमेरिका के लिए ईरान ‘एक खतरनाक ताकत’ है। अमेरिका से और इजरायल से जुड़कर भारत का कभी भला नहीं हो सकता। इस युद्ध में भारत की भूमिका निन्दनीय रही है। अमेरिका के सामने भारत आत्म समर्पण कर चुका है। इजरायल से इसकी घनिष्ठता से देश की छवि बिगड़ी है।ईरान-अमेरिका युद्ध सैन्य और तेल प्रतिष्ठानों तक ही सीमित न रहकर अन्य कई ठिकानों पर भी फैल सकता है। खाड़ी देशों की आबादी का बड़ा हिस्सा डिसेलिनेशन प्लांट (समुद्री पानी को मीठा बनाने वाले संयन्त्र) पर निर्भर है। समुद्र के पानी को मीठा बनाने वाले कुवैत, सऊदी अरब,कतर, यूएई और ओमान के 10 बड़े जल-संयन्त्र ईरान के निशाने पर हैं। खाड़ी देशों में 90 प्रतिशत जल आपूर्ति डिसेलिनेशन प्लांट से होती है, जिस पर कुवैत की शहरी आबादी, रियाद के 35 लाख,कतर के 18 लाख, दुबई के 53 लाख और ओमान के 50 लाख से अधिक लोग निर्भर हैं। आबू धाबी की पूरी आबादी इसी पर निर्भर है। युद्ध से इन देशों में जल संकट बढ़ने की सम्भावना है।
इराक पर अमेरिकी हमले की निन्दा 2003 में भारत के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से की गयी थी। भारत ने आयातुल्ला खामेनेई की हत्या पर पाँच दिनों तक कोई शोक-सन्देश तक नहीं दिया। बाद में भी ईरानी दूतावास विदेश मन्त्री नहीं गये, गये विदेश सचिव। इस युद्ध को ‘सांस्कृतिक युद्ध’ के रूप में भी देखने की जरूरत है। भारत इतना लाचार और असहाय कभी नहीं था। अमेरिका ने भारतीय नागरिकों को पाँवों में बेड़ियाँ डालकर, हाथों में हथकड़ियाँ पहनाकर भारत भेजा, प्रधानमन्त्री ने विरोध नहीं किया। भारत की आबादी 1 अरब 47 करोड़ है। अमेरिका हमलावर देश है। अमेरिका और इजरायल से ‘मैत्री’ स्थापित कर भारत जहाँ भी पहुँचेगा, अच्छा नहीं होगा। घुटने टेक कर कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता। ‘विश्व गुरु’ बनने की बात दूर रही।










