चतुर्दिकचर्चा में

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: हेडगेवार से मोहन भागवत तक

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ‘दुनिया का लम्बे समय तक चलने वाला फासिस्ट संगठन’ है। ‘द वायर’ में प्रकाशित अपने शोध और लेखों के साथ-साथ पार्थ पी. चक्रवर्ती को दिए एक इण्टरव्यू (जनवरी 2020) में बेंजामिन जकारिया ने संघ को ‘इतालवी फासीवादी और जर्मन नाजियों की परम्परा का पालन’ करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा और लम्बे समय तक चलने वाला फासिस्ट संगठन और आन्दोलन कहा है, जिसका अब राज्य की सत्ता पर कब्जा है और यह संगठन बिना किसी बाधा और अड़चन के अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ‘राज्य की पूरी क्षमता’ का उपयोग कर रहा है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की इसकी अवधारणा भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता को नष्ट करने वाली तथा एक विशेष प्रकार के हिन्दुत्व से सम्बद्ध है। संघ की विचारधारा ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर आधारित है।

27 सितम्बर 1925 (विजयादशमी) को आरएसएस की स्थापना बालकृष्ण शिवराम मुंजे (12.12.1872–3.3.1948) की प्रेरणा से मराठी देशस्थ ब्राह्मण केशव बलिराम हेडगेवार (1.4.1889–21.6.1940) ने की। इस संगठन के संस्थापक सदस्यों में इन दोनों के अलावा डॉ. एल.बी. परांजपे, , डॉ. ठोकार और बाबाराव सावरकर भी थे। हेडगेवार को संघ परिवार ‘डॉक्टर साहब’ के नाम से याद करता है। वे कुछ समय तक कॉंग्रेस में रहे थे, पर उसकी नीति और राजनीति से मोहभंग के बाद वे राष्ट्र-निर्माण के वैकल्पिक मॉडल की ओर मुड़े। हिन्दू राष्ट्र और सनातन धर्म की रक्षा के लिए, मुस्लिम लीग (30.12.1906) के जवाब में मदन मोहन मालवीय (25.12.1861–12.11.1946) ने हरिद्वार में 1915 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना की, जिसके प्रमुख नेताओं में उनके अलावा लाला लाजपत राय (28.1.1865–17.11.1928), वी.डी. सावरकर (28.5.1883–26.2.1966) और बी.एस. मुंजे थे।

असहयोग आन्दोलन (1920–1922) के दौरान 4 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा काण्ड के बाद गाँधी ने हिंसा से दुःखी होकर आन्दोलन वापस ले लिया था। इस आन्दोलन ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को अधिक मजबूत किया था। आन्दोलन वापस लेने के बाद हिन्दू-मुस्लिम एकता प्रभावित हुई। देश के विविध हिस्सों में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे और आरएसएस के गठन के पीछे अक्सर इन दंगों का उल्लेख किया जाता है, पर आनन्द तेलतुम्बडे ने पिछले वर्ष ‘द वायर’ (25 अक्टूबर 2025) में प्रकाशित अपने लेख ‘द आरएसएस वाज ऑल्सो ए रिएक्शन टू अर्ली दलित मोबिलाइजेशन’ में यह बताया है कि आरएसएस की स्थापना केवल मुस्लिम विरोध के कारण नहीं की गयी, अपितु यह आरम्भिक दलित एकजुटता और निम्न जाति के मुक्ति आन्दोलनों के भी खिलाफ थी, जिसने जातिगत विशेषाधिकार की रक्षा की, जातिवाद को बढ़ावा दिया और हिन्दू एकता की आड़ में ब्राह्मणवादी विचारधारा फैलायी। आरएसएस पर आज भी ब्राह्मणों का वर्चस्व है।

19वीं सदी में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने और जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु में एक आन्दोलन ने जन्म लिया। आरएसएस की स्थापना नागपुर में हुई थी और 19 वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में दलित-जागरूकता और दलित आन्दोलन ने एक क्रान्तिकारी अध्याय की रचना की। ज्योतिराव फुले (11.4.1827–28.11.1890) और सावित्रीबाई फुले (3.1.1831–10.3.1897) ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध दलितों में जागरूकता फैलायी। सावित्रीबाई फुले ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के भिडेवाड़ा में  लड़कियों के लिए एक विद्यालय खोला। वहाँ वे शिक्षिका रहीं। 1851 तक फुले दम्पति ने विभिन्न समुदायों के बच्चों के लिए 18 विद्यालय खोले।1852 में महार आदि निम्न जातियों के लिए एक विशेष विद्यालय खोला  ।  बेसहारा स्त्रियों के लिए 1864 में उन्होंने एक आश्रय-स्थल की स्थापना भी की । वे भारतीय नारी आन्दोलन की जननी हैं। ज्योतिराव फुले  दलित जागरण और आन्दोलन के सबसे बड़े नेता ही नहीं, वैचारिक आधार भी थे । 24 सितम्बर 1873 को  उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य दलितों और महिलाओं को सामाजिक उत्पीड़न से मुक्त करना था। ‘सत्यशोधक समाज’ जाति-विरोधी सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण आन्दोलन था। ज्योतिबा फुले ने ‘गुलामगिरी’ (1873) में दलितों की दुर्दशा का चित्रण किया।

आरएसएस की विचारधारा ‘हिन्दुत्व’ की है। सावरकर ने ‘एसेंशियल्स ऑफ हिन्दुत्व’ (1923) पुस्तिका में पहली बार ‘हिन्दुत्व’ को ‘एक सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान-चिह्न’ के रूप में प्रस्तुत किया। इस पुस्तिका का पुनर्मुद्रण 1928 में ‘हिन्दुत्व : हू इज अ हिन्दू?’ शीर्षक से हुआ। 31 छोटे-छोटे अध्यायों में विभाजित इस पुस्तिका में एक अध्याय है — ‘हिन्दुत्व इज डिफरेंट फ्रॉम हिन्दुइज्म’। आरएसएस की विचारधारा ‘हिन्दुत्व’ की है और उसने सावरकर की हिन्दुत्व-सम्बन्धी वैचारिकी और दृष्टि को अपनाया तथा लोकप्रिय बनाया। सावरकर की परिभाषा में ‘हिन्दुत्व’ की तीन अनिवार्यताएँ हैं — राष्ट्र, जाति और संस्कृति। आरएसएस को सही ढंग से समझने के लिए ‘एसेंशियल्स ऑफ हिन्दुत्व’ के अतिरिक्त माधव सदाशिवराव गोलवलकर (19.2.1906-5.6.1973) की  दो पुस्तकों — ‘वी, ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ (1939) और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ (1966) — के साथ दीनदयाल उपाध्याय (25.9.1916–11.2.1968) की पुस्तक ‘इंटीग्रल ह्यूमनिज्म : एन एनालिसिस ऑफ सम बेसिक एलिमेंट्स’  जरूरी पुस्तकें हैं। ये सभी आरएसएस  के बड़े सिद्धान्तकार हैं। यह संगठन अपने सौ वर्ष के इतिहास में अपनी विचारधारा से कभी नहीं डिगा। सावरकर ने पहली बार नये सिरे से ‘हिन्दुत्व’ को परिभाषित किया और उसकी  वैचारिकी और सैद्धांतिकी  प्रस्तुत की। वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कभी सदस्य नहीं रहे, पर पथ-प्रदर्शक सदैव रहे। उनके लिए ‘राष्ट्रीयता’ और ‘नागरिकता’ धार्मिक पहचान पर आधारित है। नीलांजन मुखोपाध्याय ने अपनी पुस्तक ‘द आरएसएस : आइकॉन्स ऑफ द इण्डियन राइट’ (2019) में आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार के बाद सावरकर को दूसरा स्थान दिया है।

सावरकर ने पहली बार ‘एसेंशियल्स ऑफ हिन्दुत्व’ में ‘पितृभूमि’ एवं ‘पुण्यभूमि’ का विचार प्रस्तुत किया। उनके लिए ‘हिन्दुत्व ‘एक सजातीय, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पहचान’ है। जैन, बौद्ध, सिख — सबका रक्त हिन्दू रक्त है। जो भारत को ‘पितृभूमि’ और ‘मातृभूमि’ नहीं मानता, जैसे मुसलमान और ईसाई, गोलवलकर के अनुसार वे कम्युनिस्ट की तरह भारत के  ‘आन्तरिक शत्रु’ हैं। गोलवलकर ने ‘वी, ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में हिन्दुत्व-आधारित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को परिभाषित किया है और  भारतीय राष्ट्रीयता का आधार हिन्दू धर्म, संस्कृति और नस्ल को माना है। उनके अनुसार भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, जहाँ राष्ट्रीयता की पहचान हिन्दू संस्कृति में समाहित होने से है। वे ‘राष्ट्र’ को पाँच तत्त्वों — देश,नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा से संगठित मानते हैं और इन पाँचों में से किसी एक तत्त्व का नष्ट होना देश का नष्ट होना है। अल्पसंख्यकों के लिए इनके यहाँ पूर्ण आत्मसातीकरण या जातीय दमन है। गैर-हिन्दू जब तक हिन्दू संस्कृति में विलीन नहीं होते, बाहरी माने जाते हैं। गोलवलकर का (वी) भारतीय संविधान की उद्देशिका ‘हम’ (वी) के विपरीत है। आरएसएस ने भारतीय संविधान को कभी नहीं  स्वीकारा। संघ अलग से ‘मनुस्मृति’ पर आधारित अपने संविधान का निर्माण कर रहा  है।

आरएसएस के सौ वर्ष के इतिहास में उसके केवल छह सरसंघचालक हुए हैं, जबकि स्वतन्त्र भारत के 78 वर्षों में पन्द्रह राष्ट्रपति और चौदह प्रधानमन्त्री हो चुके हैं। सरसंघचालक  आरएसएस का सर्व प्रमुख होता है। वह संगठन के वैचारिक, सांगठनिक और नीतिगत फैसलों का अन्तिम निर्णय लेता है। इनका चयन लोकतान्त्रिक पद्धति से न होकर निवर्तमान प्रमुख द्वारा किया जाता है। डॉ. हेडगेवार पन्द्रह वर्ष तक (1925–1940) आरएसएस के प्रथम सरसंघचालक थे। दूसरे सरसंघचालक माधवराव  सदाशिवराव गोलवलकर थे। वे सर्वाधिक समय तक, लगभग तैंतीस वर्ष (1940–1973) तक सरसंघचालक रहे। उनके समय में ही महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी और संघ पर पहली बार प्रतिबन्ध लगा था।

बालासाहेब देवरस (11.12.1915–17.6.1996), जिनका वास्तविक नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस है , बीस वर्ष (1973–1994 ) तक सरसंघचालक रहे। चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया (प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह(29.1.1922–14.7.2003) का कार्यकाल केवल सात वर्ष (1994 –2000) तक रहा। पाँचवें सरसंघचालक कुपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन (18.6.1931–15.9.2012)  2000 से 2009 तक सरसंघचालक रहे। अब डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत (11.9.1950) 2009  से छठे सरसंघचालक हैं। दत्तात्रेय होसवाले सरकार्यवाह हैं और संघ के अभी छः सहसरकार्यवाह हैं।

स्वाधीन भारत में आरएसएस को ‘फासिस्ट संगठन’ कहने वालों की एक बड़ी संख्या है। इस  संगठन के जन्म के कुछ ही वर्षों बाद जिन कुछ  लोगों का इससे मोहभंग हुआ, उनमें गोपाल मुकुन्द बालाजी हुड्डार (17.6.1902–1991) सर्वप्रमुख हैं। वे हिन्दुत्ववादी अर्द्धसैनिक संगठन और आरएसएस के संस्थापक सदस्यों में थे। वे आरएसएस के पहले सरकार्यवाह भी थे। यह पद सरसंघचालक के बाद दूसरा सबसे प्रमुख पद है। उनका बी.एस. मुंजे से निकट सम्बन्ध था। स्पेन के गृहयुद्ध में उन्होंने 1936 में भाग लिया था। 1930 के दशक में ही उन्होंने संघ से अपने को अलग कर लिया। धीरेन्द्र के. झा ने ‘हेडगेवार्स ग्रेट बिट्रेयल’ (कारवान, जुलाई 2023) लेख में विस्तार से, तथ्यपरक ढंग से इन पर विचार किया है।

तीस के दशक के आरम्भ में आरएसएस के संस्थापकों में से एक डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने फरवरी-मार्च 1931 में लंदन में राउंड टेबल कॉन्फ़्रेंस में भाग लेने के बाद 15 मार्च 1931 से 24 मार्च 1931 तक इटली की यात्रा की थी । रोम में वे कई प्रमुख सैन्य शिक्षण-संस्थाओं में गये थे। ‘बलिल्ला’ और ‘अवांगार्दिस्ट’ संस्थाओं में भी उन्होंने रुचि ली। इटली-विशेषज्ञ मार्जिया केसोलैरी ने अपने लेख ‘हिन्दुत्वाज फॉरेन टाई-अप इन द नाइन्टीन थर्टीज : आर्काइवल एविडेंस’ (ईपीडब्ल्यू, वॉल्यूम 35, नं. 4, 22–28 जनवरी 2000, पृ. 218–228) में इटली में मुंजे की मुसोलिनी से भेंट के बारे में लिखा है। इटली में ‘बलिल्ला’ और ‘अवांगार्दिस्ट’ संस्थाएँ फासिस्ट राजनीति का केन्द्र थीं, जहाँ छः से अठारह वर्ष के युवकों को प्रशिक्षित किया जाता था। 19 मार्च 1931 को दिन के तीन बजे मुंजे इटली की फासिस्ट सरकार के मुख्यालय पलाज्जो   वेनेजिया में मुसोलिनी से मिले थे। दूसरे दिन, 20 मार्च की डायरी में इस मुलाकात के बारे में उन्होंने लिखा। कार्लो फॉर्मिची (14.2.1871–13.12.1943) और जिएसेपे टुकी (5.6.1894–5.4.1984) जैसे  इटैलियन विद्वान फासिज्म के समर्थक थे। कार्लो फॉर्मिची की बुद्धिज़्म और हिन्दू दर्शन में गहरी रुचि थी।

रामानन्द चटर्जी (29.5.1865–30.9.1943) ‘मॉडर्न रिव्यू’ पत्रिका के संस्थापक सम्पादक थे। उनके दामाद कालिदास नाग ने 1920 के दशक में यूरोप में ‘इण्डोलॉजी’ का प्रचार-प्रसार किया था। वे भारत विद कार्लो फॉर्मिची और जिएसेपे टुकी के सम्पर्क में थे। उनके प्रभाव के कारण 1925 में विश्वभारती में फॉर्मिची को आमन्त्रित किया गया था। लगभग इसी समय फॉर्मिची के प्रभाव के कारण टैगोर इटली आमन्त्रित किये गये थे । टैगोर फासिज्म के विरुद्ध थे और फॉर्मिची कट्टर समर्थक। टुकी को इटली की सरकार ने भारत जाने का यात्रा-व्यय दिया था। भारत में रहते हुए उन्होंने विश्वभारती, शान्तिनिकेतन, कलकत्ता और ढाका विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया था।

आरएसएस के फासीवादी चरित्र को समझने में आर्काइव से तथ्य एकत्र कर पहली बार मार्जिया कसोलारी ने उन्हें सामने रखा। इटली से लौटने के बाद मुंजे ने 1935 में नासिक में ‘सेंट्रल हिन्दू मिलिट्री एजुकेशन सोसायटी’ की स्थापना की। दो वर्ष बाद 12 जून 1937 को उन्होंने ‘भोंसला मिलिट्री स्कूल’ स्थापित किया, जिसके मुख्य भवन का उद्घाटन ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया (26.6.1916–16.7.1961) ने किया था। मार्जिया केसोलैरी ने ईपीडब्ल्यू के अपने लेख के बीस वर्ष बाद भारतीय उग्र राष्ट्रवाद, इटालियन फासीवाद और नाजीवाद के सम्बन्ध पर एक पुस्तक लिखी — ‘इन द शैडो ऑफ द स्वस्तिक : द रिलेशनशिप बिटवीन इण्डियन रेडिकल नेशनलिज्म, इटालियन फासिज्म ऐंड नाजिज्म’ (2020)।

ब्रिटिश सरकार के ‘आधिकारिक रिकॉर्ड’ (18.1.1933) में आरएसएस का उल्लेख है। यह मुंजे-मुसोलिनी की भेंट के लगभग दो वर्ष बाद का है। 1933 की एक गोपनीय रिपोर्ट ‘नोट ऑन द  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ में ब्रिटिश गुप्तचर विभाग ने भविष्य में संघ द्वारा भारत को जर्मनी के नाजियों और इटली के फासिस्टों के रूप में रखने जाने की इच्छा बतायी थी । 1924 से 1935 के बीच ‘केसरी’ में मुसोलिनी और उसकी फासिस्ट सत्ता की प्रशंसा में कई लेख छपे थे। आरएसएस की विचारधारा पहली बार व्यवस्थित रूप से गोलवलकर की पुस्तक ‘वी, ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ में व्यक्त हुई  है। इसका सम्बन्ध सावरकर की राष्ट्रवाद पर प्रमुख लेख  ‘राष्ट्र मीमांसा’ से है।

प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपने लेख ‘फासीवाद और हिन्दुत्व’ (‘सबाल्टर्न’ 6, जुलाई 2003) में विनायक चतुर्वेदी की पुस्तक ‘वी.डी. सावरकर ऐंड द पॉलिटिक्स ऑफ हिस्ट्री’ (2022) की भूमिका से ये पंक्तियाँ उद्धृत की हैं — “1938 के आसपास सावरकर नाजी जर्मनी में भी नोटिस किये जाने लगे थे। 3 नवम्बर 1938 को ‘इण्डिया फॉरेन पॉलिसी’ शीर्षक लेख में सावरकर ने चेकोस्लोवाकिया के जर्मन-बहुल सूडेटेनलैण्ड पर जर्मनी के कब्ज़े का स्वागत किया था और नाजीवाद की प्रशंसा की थी। जवाब में नाजियों के आधिकारिक समाचार-पत्र में सावरकर की प्रशंसा स्वरूप उनका एक परिचय प्रकाशित हुआ था। जर्मन विदेश विभाग की खुफिया रिपोर्टों में उनके नाम, उनके लेखों तथा भाषणों और उनकी गतिविधियों का उल्लेख होने लगा था।”

आरएसएस की स्थापना के एक वर्ष के भीतर ही मई 1926 में इसकी प्रतिदिन की शाखाएँ आरम्भ की गयीं। हेडगेवार ने अपने स्वयंसेवकों को अखाड़ों (व्यायामशाला, जिम्नेजियम) में जाने के लिए प्रोत्साहित किया। 1920 के दशक के मध्य में नागपुर जिले में अखाड़ों की संख्या 230 से बढ़कर 570 हो गयी थी। मुंजे ने हिन्दू धर्मशास्त्रों पर आधारित एक योजना बनायी थी,  “जो पूरे भारत में हिन्दू धर्म के मानकीकरण का प्रावधान करती है। इस आदर्श को तब तक साकार नहीं किया जा सकता, जब तक हमारे पास शिवाजी या मुसोलिनी या हिटलर जैसे तानाशाह के साथ अपना स्वराज्य न हो। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, जब तक कि भारत में ऐसा कोई तानाशाह न आ जाए। हमें एक वैज्ञानिक योजना बनानी चाहिए और उसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए।” (31 मार्च 1934, मुंजे पेपर्स, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी, नई दिल्ली)

आरएसएस से जुड़े ढाई हजार से अधिक सम्बद्ध संगठन हैं। आरएसएस अब भारत के सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में कार्यरत है। मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर में इसकी 88,449 से अधिक दैनिक शाखाएँ हैं और 1 लाख 34 हजार से अधिक गतिविधि केन्द्र हैं। ये अण्डमान से लद्दाख तक फैले हुए हैं। जम्मू-कश्मीर में भी अब इसका सुदृढ़ आधार है। 2014 के बाद से पीर पंजाल और चेनाब घाटी में भी इसका विस्तार हुआ है। दक्षिण भारत में केरल में इसकी 5 हजार से अधिक, सर्वाधिक शाखाएँ हैं।

उत्तर-पूर्व भारत में संघ ने पहली बार 1946 में प्रवेश किया। अक्टूबर 1946 में वहाँ दादाराव परमार्थ, वसंतराव ओक और कृष्ण परांजपे पहली बार संघ-प्रचारक के रूप में गये। इन्होंने गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में पहली शाखाएँ खोलीं। 1949 में संघ से प्रतिबन्ध हटने के बाद गोलवलकर ने ठाकुर राम सिंह को असम में संगठन के काम के निरीक्षण के लिए भेजा था। 1975 तक असम के प्रत्येक जिले में शाखा स्थापित हो चुकी थी। असम में अभी 813 शाखाएँ हैं, त्रिपुरा में 275 हैं। केवल मिज़ोरम में अभी तक एक भी शाखा नहीं है। सम्भावना है कि संघ के शताब्दी वर्ष में वहाँ भी शाखा स्थापित हो जाए।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतन्त्रता दिवस के अपने भाषण में आरएसएस को ‘दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन’ (एनजीओ) कहा। दूसरी ओर बेंजामिन जकारिया और अन्य कई विद्वान इसे ‘दुनिया का सबसे बड़ा फासिस्ट संगठन’ कहते हैं। आरएसएस पंजीकृत संस्था नहीं है — न तो एनजीओ के रूप में, न धार्मिक ट्रस्ट के रूप में और न ही किसी अन्य वैध इकाई के रूप में। इसकी आय का स्रोत अज्ञात है, इसकी सदस्य-सूची भी उपलब्ध नहीं है। अब दिल्ली में इसका नया मुख्यालय ‘केशव कुंज’  झण्डेवालान  एक्सटेंशन में है । 19 हजार वर्गगज में फैले इस परिसर की तीन इमारतों में सभागार, हिन्दू मन्दिर, सम्मेलन-कक्ष, संघ से जुड़े लोगों के कार्यालय, आवास, पुस्तकालय और एक अस्पताल भी है। इसके निर्माण में 150 करोड़ रुपये लगे हैं, जो संघ के अनुसार स्वयंसेवकों ने जुटाये हैं। 12 मंजिली इस इमारत के तीन टावरों के नाम — ‘साधना’, ‘प्रेरणा’ और ‘अर्चना’ हैं। इन तीन टावरों में कुल 300 कमरे हैं और 135 कारों की पार्किंग व्यवस्था है।

आरएसएस का अपना प्रकाशन है, पत्रिकाएँ हैं, उस पर लिखी गयी और लिखी जा रही किताबें हैं। आरएसएस ने अपने उद्देश्यों को सही ढंग से कभी प्रकट नहीं किया है। इस संगठन पर प्रभुत्व अब भी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों का है। जवाहरलाल नेहरू ने आरम्भ से ऐसे संगठनों को ‘साम्प्रदायिक’ और ‘फासिस्ट’ कहा था। संघ की आकांक्षा ब्रिटिशों के जाने के बाद भारत को ‘पेशवा राज’ के रूप में देखने की थी। इसका ध्वज – महाराष्ट्र के पूर्व शासकों – पेशवाओं का  भगवा ध्वज है।

‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ (एबीपीएस) आरएसएस का नीति-निर्धारक निकाय है। यह संघ के  सम्बन्ध में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली सभा है, जो संगठन की वार्षिक गतिविधियों की समीक्षा करने के साथ भविष्य की कार्य-योजना निश्चित करती है और तीन वर्ष में सरकार्यवाह (महासचिव) का चुनाव करती है। इसका वार्षिक आयोजन प्रत्येक वर्ष मार्च महीने में होता है। 21–22 जनवरी 1950 को आरएसएस की केन्द्रीय कार्यकारिणी मण्डल की बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा गठित की गयी थी।

अब कोई ऐसा क्षेत्र या इलाका नहीं है, जहाँ आरएसएस मौजूद न हो। 1936 में ‘राष्ट्रीय सेविका समिति’ की स्थापना हुई। स्त्री संगठन में ‘दुर्गावाहिनी’ प्रमुख है, जो विहिप की महिला शाखा है। संघ  के धार्मिक संगठनों में विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, भारतीय गौ रक्षा दल, हिन्दू जागरण वेदिके, धर्म जागरण समिति, राष्ट्रीय सिख संगत, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और हिन्दू राष्ट्र सेना हैं। इसके छः  आर्थिक और व्यावसायिक संगठन हैं — भारतीय जनता युवा मोर्चा, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और स्वदेशी जागरण मंच।

सामाजिक सेवा के अन्तर्गत दीनदयाल शोध संस्थान, सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम आदि हैं। कई शैक्षणिक संस्थाएँ हैं। शैक्षिक संस्थानों में सरस्वती शिशु मन्दिर, एकल विद्यालय, विद्या भारती, अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान है। संघ के  प्रचारक दीनानाथ बत्रा (3.3.1930- 7.11.2014 ) ने शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास जैसे संगठनों की स्थापना की थी। विद्या भारती की स्थापना 1977 में की गयी थी। बत्रा ने कहा था कि वे एक सैद्धांतिक लड़ाई लड़ रहे हैं- मैकाले, मार्क्स और मदरसावादियों के खिलाफ। संघ के ‘थिंक टैंक’ के अन्तर्गत विवेकानन्द केन्द्र, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना आदि हैं। विदेशों में हिन्दू स्वयंसेवक संघ, हिन्दू स्टूडेंट्स काउंसिल, हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन, नेशनल हिन्दू स्टूडेंट फोरम और अमेरिका आधारित इण्डिया डेवलपमेंट एण्ड रिलीफ फण्ड (आईडीआरएफ) जैसे संगठन हैं। संघ से संबद्ध संगठनों का एक बड़ा व्यापक संसार है। इसका बहुसंगठनात्मक ढाँचा इसकी स्वतन्त्रता और स्वायत्तता का भ्रम उत्पन्न करता है।आरएसएस ने कई पद और मुहावरे गढ़े हैं। इसने ‘राष्ट्रीय’ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि) और ‘भारतीय’ (भारतीय जनता पार्टी) के अर्थ को सीमित किया है। देश को संघ ने साम्प्रदायिक घृणा और ध्रुवीकरण से  जरिए मानसिक-सांस्कृतिक स्तर पर विभाजित किया है। अभी तक कोई दलित और आदिवासी इसके शीर्ष पद तक नहीं पहुँचा है।

आरएसएस पर प्रकाशित पुस्तकें कम नहीं हैं। अनेक पुस्तकों में गुप्त जानकारियाँ हैं। संघ पर पहली प्रकाशित पुस्तक जे. ए. कुरन की ‘मिलिटेंट हिन्दुइज्म इन इण्डियन पॉलिटिक्स : ए स्टडी ऑफ द आरएसएस’ (1951) है। इस पुस्तक में यह गलत सूचना है कि गोडसे आरएसएस में कुछ समय तक ही था। आरएसएस का देशप्रेम और राष्ट्रवाद हिन्दूवाद तथा हिन्दू प्रभुत्व के अलावा और कुछ नहीं है। इसका राजनीतिक संगठन भाजपा है। देवरस के समय में इसकी राजनीतिक शाखा का अधिक विस्तार हुआ। संघ से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू राष्ट्र का समर्थक है।

संघ को लोकतन्त्र और संविधान में विश्वास नहीं है। आपातकाल में गिरफ्तार होने के बाद देवरस ने इंदिरा गाँधी को पत्र लिखकर संघ पर से प्रतिबन्ध हटाने का अनुरोध किया था और यह कहा था कि संघ सरकार के विरोध में नहीं है। देवरस ने संघ को सभी क्षेत्रों में काम करने को कहा था। उनके समय में कई संगठन सक्रिय हुए। देवरस ने नानाजी देशमुख को राजनीति से जोड़ा।

लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने संघ को समझने में गलती की। संघ के संबन्ध में लोहिया और मधु लिमये में मतभेद था। मधु लिमये ने आरएसएस से अपने मतभेद के चार-पाँच कारण बताए थे — जाति और संस्कृति की विशुद्धता, तीन आन्तरिक खतरे, वर्ण-व्यवस्था का समर्थन, लोकभाषा के स्थान पर संस्कृत को महत्त्व देना आदि। संघ ने ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ (राज्यों का संघ) की कल्पना का सदैव उपहास उड़ाया। दीनदयाल उपाध्याय की ‘एकात्मक प्रणाली’ का अर्थ ‘केन्द्रानुगामी शासन’ है। गोलवलकर को न लोकतन्त्र में विश्वास था, न समाजवाद में। उनके लिए यह पश्चिम से आयातित अवधारणाएँ थीं।

मधुलिमये ने बार-बार लोहिया से कहा था — “आरएसएस  और जनसंघ से  हमारा तालमेल नहीं बैठेगा”, पर लोहिया ने बात नहीं मानी। उस समय लोहिया ने कॉंग्रेस जैसे बड़े प्रतिद्वन्द्वी को हराने के लिए आरएसएस और जनसंघ का सहयोग जरूरी समझा। चौथे लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ की बड़ी जीत का यह एक बड़ा कारण था। आरएसएस ने सरदार पटेल के समय राजनीति में कभी हिस्सा न लेने की बात कही थी, जिसका पालन नहीं किया। पटेल ने आरएसएस से प्रतिबन्ध हटाने के पहले तीन शर्तें रखी थीं — वह संविधान और तिरंगे का सम्मान करेगा, राजनीतिक गतिविधियों से अलग रहेगा और हिंसा तथा गोपनीयता का मार्ग छोड़ेगा। आश्वस्त करने के बाद ही 4 फरवरी 1948 को लगाया गया प्रतिबन्ध 11 जुलाई 1949 में हटाया गया।

कुछ शब्दों में आरएसएस की पूरी कथा नहीं कही जा सकती। नरेन्द्र मोदी  के प्रधानमन्त्री बनने के बाद पिछले बारह वर्षों में देश में जो कुछ हुआ है, वह सब हमारे सामने है। लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने उसका साथ दिया; लोहिया का दीनदयाल उपाध्याय के साथ 1963 के उपचुनाव में किया गया तालमेल, जेपी आन्दोलन में उसकी भूमिका, अटल बिहारी वाजपेयी  के समय अन्य दलों का भाजपा के साथ जाना और अब 2014 के बाद का दृश्य सामने है। आरएसएस और भाजपा की विचारधारा एक है। भारत घोषित रूप से हिन्दू राष्ट्र नहीं है, पर वह उस मार्ग पर आगे बढ़ रहा है ।  देश का भविष्य अंधकारमय है। आरएसएस एक फासिस्ट संगठन है। हिन्दी प्रदेश उसका गढ़ है, जहाँ लोक सभा की सबसे अधिक सीट (225) है।

 

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रविभूषण

लेखक वरिष्ठ आलोचक और जन संस्कृति मंच के पूर्व अध्यक्ष हैं। सम्पर्क +919431103960, ravibhushan1408@gmail.com
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