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युद्ध और जलवायु संकट

 

आज के समाचार परिदृश्य में एक विचित्र विरोधाभास लगातार उभरता है—एक ओर मिसाइल हमलों और युद्धग्रस्त शहरों की भयावहता, दूसरी ओर जलवायु सम्मेलनों और बढ़ते समुद्री तापमान की चिंताएँ। हम इन दोनों को साथ-साथ देख तो लेते हैं, पर उनके बीच के गहरे सम्बन्ध को समझने से चूक जाते हैं। एक को भू-राजनीतिक संकट और दूसरे को वैज्ञानिक समस्या मानकर हम उन्हें अलग-अलग खाँचों में बाँट देते हैं, मानो उनके स्रोत भिन्न हों।

यह विभाजन आकस्मिक नहीं, बल्कि आधुनिक सोच की एक गम्भीर त्रुटि है। इसके परिणाम केवल बौद्धिक भ्रम तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कार्बन उत्सर्जन और मानवीय जीवन की हानि के रूप में सामने आते हैं। दरअसल, इन संकटों को अलग-अलग मानना मनुष्य के उस पुराने अहंकार का विस्तार है, जो समस्याओं को विभाजित करके उनके मूल कारण से बचना चाहता है।

सच्चाई यह है कि ये दो समानान्तर नहीं, बल्कि एक ही आपदा के भिन्न रूप हैं। पहला रूप प्रत्यक्ष और तीखा है—सीमाई विवाद, वैचारिक टकराव और सत्ता के लिए संघर्ष, जिसमें सेनाएँ, हथियार और विनाश स्पष्ट दिखते हैं। दूसरा रूप धीमा और कम दृश्य है—वायुमंडल में बढ़ता कार्बन, तापमान में क्रमिक वृद्धि, ग्लेशियरों का पिघलना, जलस्रोतों का सूखना और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण।

इन दोनों के मूल में एक ही प्रक्रिया काम करती है—राष्ट्रों और व्यवस्थाओं का अनियंत्रित अहंकार और विकास का अंधा आग्रह। यही कारण है कि सैन्य गतिविधियाँ भी जलवायु संकट में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं; वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सेनाओं की हिस्सेदारी लगभग 5.5 प्रतिशत है, जो नागरिक उड्डयन से भी अधिक है। अतः इन संकटों को अलग-अलग समझना न केवल अधूरी दृष्टि है, बल्कि समाधान की राह में सबसे बड़ी बाधा भी।

सैन्य गतिविधियाँ दुनिया की सभी वाणिज्यिक उड़ानों से लगभग तीन गुना अधिक उत्सर्जन करती हैं। यह आँकड़ा भी सम्भवतः कम आँका गया है, क्योंकि सैन्य उत्सर्जन को व्यवस्थित रूप से जलवायु गणना से बाहर रखा जाता है।

यदि दुनिया की सभी सेनाओं को एक देश माना जाए, तो वे उत्सर्जन के मामले में अमेरिका, चीन और भारत के बाद चौथे स्थान पर होंगी। 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के दौरान अमेरिका ने सैन्य गतिविधियों को उत्सर्जन लक्ष्यों से बाहर रखने का दबाव डाला और इसमें सफल रहा।

आज भी संयुक्त राष्ट्र की जलवायु व्यवस्था में सुधार बहुत सीमित है। बड़े देशों द्वारा सैन्य उत्सर्जन की रिपोर्टिंग अधूरी, असंगत और स्वैच्छिक है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के आँकड़े या तो उपलब्ध नहीं हैं या स्वतन्त्र रूप से सत्यापित नहीं किए जा सकते।

2025 के अन्त तक भी प्रमुख सैन्य शक्तियों द्वारा उत्सर्जन का खुलासा बहुत कमजोर बना हुआ है। यह केवल पुरानी नीति का अवशेष नहीं है, बल्कि जैसे-जैसे सैन्य गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, यह अन्तर और भी बड़ा होता जा रहा है।

अमेरिकी सैन्य तन्त्र का प्रभाव अमेरिकी सैन्य तन्त्र दुनिया में हाइड्रोकार्बन का सबसे बड़ा संस्थागत उपभोक्ता है। यदि इसे एक देश माना जाए, तो इसके उत्सर्जन का स्थान दुनिया में 47वाँ होगा—पुर्तगाल, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों से भी ऊपर। 2001 से 2018 के बीच पेंटागन का कुल उत्सर्जन लगभग 1.3 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य था।

इनमें से लगभग 44 करोड़ टन उत्सर्जन अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान और सीरिया के युद्धों से आया, जिसमें केवल इराक युद्ध का योगदान 25 करोड़ टन था। तुलना के लिए, दुनिया के 180 देशों का वार्षिक उत्सर्जन 25 करोड़ टन से कम है। इसका अर्थ है कि एक अकेले युद्ध ने कई देशों के कुल वार्षिक उत्सर्जन से अधिक कार्बन वातावरण में छोड़ा।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुल अमेरिकी सैन्य उत्सर्जन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा युद्ध से नहीं, बल्कि शान्ति-काल की गतिविधियों से आता है—जैसे सैन्य अड्डे, प्रशिक्षण अभ्यास, ईंधन आपूर्ति और विशाल लॉजिस्टिक नेटवर्क। यानी जलवायु पर प्रभाव युद्ध शुरू होने से पहले ही जारी रहता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के तीन वर्षों में लगभग 23 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुआ—जो स्पेन के वार्षिक उत्सर्जन से अधिक है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा स्वयं युद्ध गतिविधियों का था—टैंकों, लड़ाकू विमानों, गोला-बारूद और किलेबंदी निर्माण से लगभग 36 प्रतिशत उत्सर्जन हुआ। दूसरा बड़ा हिस्सा पुनर्निर्माण का था—लगभग 27 प्रतिशत। सीमेंट और स्टील, जो पुनर्निर्माण में सबसे अधिक उपयोग होते हैं, दुनिया के सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जित करने वाले उद्योगों में शामिल हैं। हर नष्ट हुई इमारत अपने निर्माण में संचित कार्बन को छोड़ती है और उसे फिर से बनाने में उतना ही कार्बन दोबारा उत्सर्जित होता है।

दुनिया के सबसे समृद्ध देश जलवायु संकट से जूझ रहे कमजोर देशों की मदद के लिए जितना धन जलवायु वित्त के रूप में देते हैं, उसके मुकाबले वे अपनी सैन्य क्षमताओं पर लगभग तीस गुना अधिक खर्च करते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, 2030 तक विकासशील देशों को केवल पहले से हो चुके जलवायु प्रभावों के अनुकूलन के लिए हर वर्ष करीब 387 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। यह राशि 2024 में वैश्विक सैन्य खर्च के कुल बजट का 15 प्रतिशत से भी कम है।

दूसरे शब्दों में, यदि दुनिया अपने सैन्य खर्च का अपेक्षाकृत छोटा-सा हिस्सा भी पुनः आवंटित कर दे, तो सबसे अधिक प्रभावित और कमजोर देशों की अनुकूलन सम्बन्धी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। संसाधनों की कमी नहीं है—कमी है तो सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की, जो अब भी उन आर्थिक हितों में उलझी हुई है, जिन्होंने इस जलवायु संकट को जन्म दिया है।

रोजगार से सम्बन्धित शोध लगातार यह दिखाते हैं कि सैन्य खर्च के तहत प्रति मिलियन डॉलर निवेश पर औसतन लगभग पाँच नौकरियाँ पैदा होती हैं, जबकि शिक्षा में यह संख्या लगभग 13, स्वास्थ्य सेवाओं में करीब नौ और स्वच्छ ऊर्जा एवं बुनियादी ढाँचे में छह से आठ के बीच होती है। यही खर्च यदि ऊर्जा परिवर्तन (एनर्जी ट्रांज़िशन) की ओर मोड़ दिया जाए, तो यह दोगुने से अधिक रोजगार पैदा कर सकता है, साथ ही उन उत्सर्जनों को भी कम करेगा, जिन्हें सैन्य तन्त्र स्वयं उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार, सैन्य प्राथमिकता के पक्ष में दिया जाने वाला सुरक्षा का तर्क, गहराई से देखने पर, उस विकल्प की तुलना में कम सुरक्षा प्रदान करता है, जिसे वह पीछे धकेल देता है—चाहे उसे स्थिर रोजगार, जलवायु अनुकूलन क्षमता या बचाए गए कार्बन उत्सर्जन (मेगाटन) के रूप में मापा जाए।

यह कोई प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि अहंकार की सबसे पुरानी और लगातार दोहराई जाने वाली चाल है: खुद को अपनी ही जाँच का विषय बनाने से इनकार। हर लेखा-प्रणाली उस व्यक्ति या व्यवस्था की प्राथमिकताओं को दर्शाती है, जो यह हिसाब कर रही है। एक ऐसी प्रणाली, जो लंदन की एक वापसी उड़ान के कार्बन का हिसाब रखती है, लेकिन किसी संघर्ष क्षेत्र में की गयी सैन्य उड़ान के कार्बन का नहीं, वह ऐसी प्रणाली है, जो कुछ मानवीय गतिविधियों को उनके अपने खर्चों के परिणामों से बचाने के लिए बनाई गयी है। यही वह इनकार है, जो व्यक्ति के अहंकार को अपनी ही प्रेरणाओं को ईमानदारी से देखने से रोकता है—बस इसे अन्तरराष्ट्रीय कानून के स्तर तक बढ़ा दिया गया है।

युद्ध के बाद जो शान्ति आती है, वह वास्तव में शान्ति नहीं होती। वह केवल एक अन्तराल होता है, जिसमें नुकसान विभिन्न रूपों में जमा होता रहता है—यथा वायुमण्डल के हिस्सों में, पारिस्थितिक तन्त्रों में और उन लोगों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के रूप में, जो उन विषैले अवशेषों के सम्पर्क में आये हैं। यह सब तब तक चलता रहता है, जब तक अगला संघर्ष शुरू होने का अवसर नहीं आ जाता।

जिस जलवायु लेखा-जोखा से बचा जाता है, वह केवल एक सांख्यिकीय कमी नहीं है। वह एक दर्पण है, जिसे यदि ईमानदारी से सामने रखा जाए, तो वह उस जीवन की पूरी कीमत दिखा देगा, जिसे एक सभ्यता ने चुना है। सवाल उठता है कि आखिर हम किसकी रक्षा कर रहे हैं, किससे, किस कीमत पर और किसके लिए?

जो सरकारें सैन्य उत्सर्जनों का हिसाब देने से इनकार करती हैं, वे कहीं से अचानक नहीं आयीं; बल्कि वे दुनिया को जलवायु परिवर्तन से बचने का रास्ता तो बताती हैं, लेकिन खुद की बारी आने पर ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ के बरक्स कार्बन उत्सर्जन की कटौती के लिए कोई जरूरी प्रयास नहीं करतीं या अपने हिस्से के उत्सर्जन की भरपाई के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के अपने वादे से मुकर जाती हैं।

युद्ध न केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए भयावह दृश्य और परिणाम पेश करता है, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के लिए ऐसी स्थिति पैदा करता है, जिसे अनन्तकाल तक सुधारना सम्भव नहीं हो सकता। अहंकार और वर्चस्व के युद्ध की आग जलवायु परिवर्तन के तौर पर भी भावी पीढ़ी को झुलसाने के लिए तैयार है।

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सुरेश कुमार तिवारी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क +91 98109 06859 suresh.tiwary@gmail.com
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