
धर्म की नैतिकता और सत्ता का वर्चस्व
मानव सभ्यता के विकासक्रम में धर्म ने केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका ही नहीं निभायी, बल्कि उसने समाज के नैतिक और सांस्कृतिक ढाँचे को गढ़ने में भी केन्द्रीय स्थान प्राप्त किया है। जीवन के अर्थ, उद्देश्य और आचरण के मानकों को निर्धारित करने में धर्म की भूमिका अत्यन्त प्रभावशाली रही है।
लगभग सभी धर्म अपने अनुयायियों के लिए एक आचरण-संहिता निर्मित करते हैं, जिसका उद्देश्य मनुष्य को नैतिक पथ पर अग्रसर करना होता है। परोपकार, दया, करुणा, ईमानदारी और अहिंसा जैसे मूल्य धर्म के माध्यम से व्यक्ति के जीवन में स्थापित किए जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से धर्म मूल्यों की खोज और उनके धारण का नाम है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहा है—“परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई”, अर्थात दूसरों का उपकार सर्वोच्च धर्म है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना सबसे बड़ा अधर्म। महाभारत में धर्म को उस सिद्धान्त के रूप में परिभाषित किया गया है जो नैतिक और आध्यात्मिक आधार पर समाज को स्थिर बनाए रखता है, वहीं “अहिंसा परमो धर्मः” का उद्घोष इसे और पुष्ट करता है। वैदिक काल में धर्म को ‘ऋत’—अर्थात नैतिक व्यवस्था—का प्रतीक माना गया।
यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और सांस्कृतिक निरन्तरता का आधार भी रहा है। यह व्यक्ति को आत्मिक शान्ति प्रदान करने के साथ-साथ उसे समुदाय से जोड़ता है और एक साझा नैतिक ढाँचे का निर्माण करता है। यही कारण है कि धर्म का प्रभाव निजी जीवन तक सीमित न रहकर सामाजिक संरचनाओं और मानवीय सम्बन्धों को भी गहराई से प्रभावित करता है।
धर्म और नैतिकता को सामान्यतः परस्पर पूरक माना जाता है, किन्तु जब धर्म का राजनीतिक उपयोग आरम्भ होता है, तो यह सम्बन्ध विच्छिन्न होने लगता है। कबीले से राज्य तक की विकास-यात्रा में धर्म की भूमिका निरन्तर बनी रही है। शासक को वैधता प्रदान करने का एक महत्त्वपूर्ण आधार धर्म भी रहा है। आधुनिक काल से पूर्व शासन-व्यवस्थाएँ और उनके नियम धर्म से गहरे प्रभावित थे। समय के साथ राज्यसत्ता और धर्मसत्ता के बीच समीकरण बदलते रहे, परन्तु उनका अन्तर्सम्बन्ध कभी पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ।
प्रारम्भ में धर्म के मूर्त रूप—पूजा, अनुष्ठान और संस्कार—व्यक्ति के निजी विषय थे, किन्तु धीरे-धीरे धर्म का सांगठनिक स्वरूप विकसित हुआ। सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं को व्यवस्थित करने के साथ-साथ धर्म ने संस्थागत रूप ग्रहण किया। इसके साथ ही मनुष्य में असुरक्षा और अनिश्चितता की भावना भी बढ़ी, जिसने संगठित धर्म को और अधिक सुदृढ़ किया। धार्मिक संस्थाओं ने एक ओर विचारों का प्रसार किया, वहीं दूसरी ओर कई बार उन्हें विकृत भी किया। इस प्रक्रिया में धर्म का नैतिक पक्ष कई बार पीछे छूटता गया और उसका बाह्य, औपचारिक स्वरूप अधिक प्रभावी होता गया।
19वीं शताब्दी में भारत में धर्म का नैतिक स्वरूप सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण आन्दोलनों के रूप में पुनः उभरा, जिसने विभिन्न धर्मों की अन्तर्निहित एकता पर बल दिया। फिर भी इतिहास यह दर्शाता है कि धर्मों और सम्प्रदायों के बीच टकराव निरन्तर बना रहा। भारत का इतिहास अनेक स्तरों पर धार्मिक संघर्षों का साक्षी रहा है—कभी विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों के बीच, तो कभी हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों के रूप में। वैश्विक स्तर पर भी स्थिति भिन्न नहीं रही, विशेषकर ईसाई धर्म के भीतर और बाहर।
ईसा से लगभग सात-आठ सौ वर्ष पूर्व यूनानी कवि हेसियड ने कहा था—“मानवजाति का स्वर्णिम और रजत युग बीत चुका है; अब कठोर लौह युग है, जहाँ शक्ति, बुराई और अन्याय का विस्तार होगा।” उनका यह कथन आज के समय में अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है। समकालीन विश्व में सत्ता और वर्चस्व की अन्धी दौड़ ने मनुष्य को हिंसा, क्रूरता और जघन्य अपराधों की ओर धकेल दिया है। यह स्थिति विशेष रूप से तब चिन्ताजनक हो जाती है जब धर्म, जो मूलतः नैतिकता का स्रोत था, सत्ता के औजार के रूप में प्रयुक्त होने लगता है।
विडम्बना यह है कि जिन देशों ने प्रबोधन के दौर में धर्मसत्ता से राज्यसत्ता को अलग करने के लिए लम्बा संघर्ष किया और धर्मनिरपेक्षता को लोकतन्त्र की आधारशिला बनाया, वहीं आज पुनः धर्म और सत्ता का खतरनाक गठजोड़ उभरता दिखाई देता है। इससे लोकतान्त्रिक मूल्यों पर संकट गहराता है। दूसरी ओर, कई इस्लामी देशों में भी आन्तरिक कट्टरपन्थी ताकतें सामाजिक सन्तुलन को चुनौती दे रही हैं।
भारत में भी स्थिति इससे भिन्न नहीं है। यहाँ कुछ राजनीतिक रूप से प्रेरित कट्टर शक्तियाँ ‘अन्य’ के प्रति अपने विरोध को एक विशेष समुदाय पर केन्द्रित कर रही हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द और बहुलतावादी परम्परा पर गम्भीर आघात पड़ रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतान्त्रिक मूल्यों को कमजोर करती है, बल्कि समाज में अविश्वास और विभाजन को भी गहरा करती है।
विश्व स्तर पर धर्म के स्वरूप को प्रायः दो भागों—प्रोफेटिक और पैगन—में विभाजित किया जाता है। प्रोफेटिक धर्मों में एक पैगम्बर और अपेक्षाकृत कठोर संरचना होती है, जबकि पैगन धर्मों में बहुदेववाद और लचीलापन देखा जाता है। किन्तु व्यवहार में यह विभाजन भी संघर्षों को रोकने में सफल नहीं रहा। इतिहास साक्षी है कि धर्म कई बार युद्धों का कारण बना है।
1095 से 1291 के बीच हुए धर्मयुद्ध इसका प्रमुख उदाहरण हैं। पश्चिमी यूरोप के ईसाइयों ने पूर्वी भूमध्यसागर के क्षेत्रों में मुस्लिम सत्ता के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़े। प्रथम धर्मयुद्ध में यरुशलम पर कब्जा किया गया और बड़े पैमाने पर नरसंहार हुए। बाद के धर्मयुद्धों में भी राजनीतिक और साम्राज्यवादी हित धार्मिक उद्देश्यों के साथ गुँथे रहे।
इसी सन्दर्भ में ‘जिहाद’ की अवधारणा का उल्लेख आवश्यक है, जिसका मूल अर्थ आत्मिक और सामाजिक संघर्ष है। किन्तु समय के साथ यह कई बार राज्य-प्रेरित सैन्य प्रतिक्रिया के रूप में भी सामने आया। सलाउद्दीन अय्यूबी ने मुस्लिम शक्तियों को संगठित कर यरुशलम को पुनः प्राप्त किया, जो यह दर्शाता है कि धर्म और राजनीति का सम्बन्ध अत्यन्त जटिल और परस्पर निर्भर रहा है।
हूदी, ईसाई और इस्लाम—तीनों धर्म एक ही परम्परा से जुड़े होने के बावजूद सदियों से संघर्षरत हैं, जिसका केन्द्र यरुशलम और फिलिस्तीन-इजरायल विवाद रहा है। 1948 में इजरायल के गठन के बाद यह संघर्ष और तीव्र हुआ और हजारों फिलिस्तीनियों को विस्थापन झेलना पड़ा। यह केवल भौतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृति का विखण्डन भी है। जो फिलिस्तीन में रहे, उनका बसा-बसाया संसार शक्ति की होड़ में उजड़ गया और वे अपनी ही भूमि से बेदखल होकर शरणार्थी बन गये। इसी पीड़ा के कारण ईरान ने मतभेद भुलाकर उनका साथ दिया, जबकि सुन्नी देशों ने प्रायः चुप्पी साधे रखी।
पश्चिम एशिया के ये संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के केन्द्र में हैं। महाशक्तियों की भूमिका इन्हें और जटिल बनाती है। अमेरिका और इजरायल के घनिष्ठ सम्बन्ध तथा ईरान जैसे देशों के साथ टकराव इस क्षेत्र को निरन्तर अस्थिर बनाए रखते हैं। 2003 के इराक युद्ध से लेकर हाल के वर्षों में ईरान को लेकर बढ़ते तनाव तक, इन घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों और भू-राजनीतिक सन्तुलन को गहराई से प्रभावित किया है।
धर्म और सत्ता का यह गठजोड़ इतिहास में निरन्तर शक्ति-संघर्ष के रूप में उपस्थित रहा है। क्रूसेड और धर्म सुधार आन्दोलन के दौरान ईसाइयों के भीतर ही गहरे टकराव देखने को मिले। आगे चलकर यही धार्मिक श्रेष्ठताबोध उपनिवेशवाद, नस्लवाद और विभिन्न प्रकार के साम्प्रदायिक द्वेष के रूप में विकसित हुआ। यह स्पष्ट करता है कि जब धर्म सत्ता के साथ जुड़ता है, तो उसका नैतिक स्वरूप अक्सर कमजोर पड़ जाता है और वह वर्चस्व स्थापित करने का साधन बन जाता है।
अन्ततः यह स्पष्ट होता है कि धर्म, जो मूलतः नैतिकता और सहअस्तित्व का आधार था, आज कई सन्दर्भों में सत्ता विस्तार का माध्यम बनता जा रहा है। धर्म आधारित नैतिकता तब तक प्रभावी नहीं हो सकती जब तक उसे सत्ता के प्रभाव से मुक्त कर मानवीय मूल्यों के साथ पुनर्स्थापित न किया जाए।
आज विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही है कि धर्म की आड़ में होने वाले सत्ता-दुरुपयोग को पहचाना जाए और एक अधिक न्यायपूर्ण, सहिष्णु तथा मानवीय समाज की दिशा में प्रयास किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि धर्म को उसके मूल मानवीय और नैतिक स्वरूप में समझा जाए, न कि उसे राजनीतिक हितों के उपकरण के रूप में प्रयुक्त होने दिया जाए।
जब तक धर्म का पुनर्पाठ मानवीय संवेदना, तर्कशीलता और सहअस्तित्व के आधार पर नहीं किया जाएगा, तब तक वह संघर्षों को कम करने के बजाय उन्हें और जटिल बनाता रहेगा। अतः आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को विभाजन का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद और सहजीवन का आधार बनाया जाए। इसी मार्ग पर चलते हुए ही एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जहाँ विविधता के बीच सन्तुलन और असहमति के बीच सहअस्तित्व सम्भव हो सके, और यही किसी भी लोकतान्त्रिक समाज की वास्तविक कसौटी है।









