मुद्दा

किसानों की मेहनत और बर्बाद होता आनाज

 

देश भर में इस साल 3 करोड 36 लाख हैक्टेयर में गेहूँ की बुआई हुई थी। मध्यप्रदेश में इस साल 55 लाख हैक्टेयर से अधिक भूमि पर गेहूँ बोया गया था। गेहूँ उत्पादन के क्षेत्र में मध्यप्रदेश ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और पंजाब को भी पीछे छोड़ दिया है। 1 करोड़ 29 लाख 34 हजार 588  मेट्रिक टन गेहूँ 4529 खरीदी केंद्रों के माध्यम से खरीदी किया गया है। सरकार का दावा है कि 15 लाख 93 हज़ार 793 किसानों के खाते में 24 हजार 899 करोङ  जमा भी कर दिया है। परन्तु विगत 5 जुलाई को समाचार आया कि450 करोड़ का 2.25 लाख टन गेहूँ खरीदी केंद्रों और गोदामों के बाहर रखे – रखे भीग गया है। गेहूँ भीगने को लेकर खरीद करने वाली सहकारी समितियाँ और गोदाम संचालक आमने- सामने आ गए हैं। दोनों संस्थाएँ इसकी जिम्मेदारी एक दूसरे पर थोप रहे हैं। ये पूरी समस्या परिवहन में देरी के चलते उपजी है। सबा दो लाख टन से ज्यादा गेहूँ गोदामों में भंडारण के लिए स्वीकार नहीं किया गया है।

इसकी मुख्य वजह खराब गुणवत्ता और गेहूँ में अनुपात से कई गुना नमी बताई गई है। खरीदा गया गेहूँ गोदामों में स्वीकृत नहीं होने से अभी 400 करोड़ से अधिक की राशि किसानों के खाते में ट्रांसफर नहीं किया गया है। जबतक गोदामों में पूरा गेहूँ स्वीकृत नहीं होता तबतक किसानों का भुगतान होना मुश्किल है। अब इसके लिए जिम्मेदार कौन है? एक खबर इंदौर से है कि 85 लाख टन गेहूँ उत्पादन की तुलना में भंडारण क्षमता लगभग 22 लाख टन ही है। इस कारण 25 करोड़ से ज्यादा कीमत का गेहूँ जून की बरसात में भीगकर खराब हो गया है। इसके बाद भी ओपन कैंप में रखा 6 करोड़ रूपये से ज्यादा का लगभग 65 हजार टन गेहूँ और खराब हुआ है।Only Politics On Farmers - किसानों पर मात्र ...

किसानों के लिये तो यह साल जैसे काल बन कर आया है। करोना ने उन्हे फसल को खेत से निकाल कर मंडी तक ले जाने में काफी परेशान किया है। महा लेखा नियंत्रक (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि नियोजन नहीं होने के कारण 2011-12 से 2014 -15 के बीच में 5060.63 मेट्रिक टन अनाज सड़ गया। जिसमें 4557 मेट्रिक टन गेहूँ था। एक समाचार पत्र के अनुसार 21 मार्च 2017 को केन्द्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने संसद में दिये जबाब में बताया  है कि मध्यप्रदेश के सरकारी गोदामों में 2013-14 और 2014-15 में करीब 157 लाख टन सड़ गया है जिकी अनुमानित कीमत 3 हजार 800 करोड़ रुपए है। जिसमें 103 लाख टन चावल और 54 लाख टन गेहूँ शामिल है। जबलपुर जिले में पिछले तीन साल के दौरान जिले में लगभग 15 हजार से ज्यादा धान और गेहूँ केप स्टोर (तिरपाल से ढका) में सड़ गया है। इस साल केप स्टोर में धान बङी मात्रा में सड़ चुका है।  

दस साल पहले जबलपुर में 30-35 वेयर हाउस हुआ करते थे। इस बीच केन्द्र व राज्य की योजनाओं का लाभ उठाते हुए लोगों और किसानों ने वेयर हाउस की संख्या 230 तक पहुंचा दी है। आज साढे सात लाख मेट्रिक टन खाद्यान्न रखने की क्षमता जिले में हो चुकी है। फिर भी केप स्टोर में रखकर अनाज को सङाने का औचित्य क्या है?  बताया जाता है कि मिली भगत के चलते अनाज को जान बुझकर सड़ने दिया जाता है ताकि शराब कम्पनियाँ बीयर व अन्य मादक पेय बनाने के लिए सङे हुए अनाज खासकर गेहूँ को औने – पौने दाम पर खरीद सके। जबकि भंडारण के लिये वेयर हाउस को सरकार करोङो रूपये भुगतान करती है। निजी वेयर हाउस को बनाने के लिए  सरकारी अनुदान भी मिलता है। परन्तु इसका अधिकतर व्यापारी इस्तेमाल करते हैं जबकि किसानों को जरूरत होने पर वेयरहाउस वाले जगह खाली नहीं होने का हवाला देते हैं।

        भारत में जनसंख्या के लिए प्रयाप्त खाद्यान्न उत्पादन होता है। इसके बावजूद लाखों लोगों को दो वक्त का भोजन नहीं मिल पाता है। भूख से मौत के समाचार भी सुनने को मिलता है। इसके विपरीत भारत में लगभग 60 हजार करोड़ रूपये का खाद्यान्न प्रतिवर्ष बर्बाद हो जाता है जो कुल खाद्यान्न उत्पादन का सात प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण देश में अनाज, फल व सब्जियों के भंडारण की सुविधाओं का घोर अभाव है। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ की भूख सम्बन्धी सलाना रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार भारतीय हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) ने अपनी रिपोर्ट “द स्टेट आफ फूड इनसिक्यूरीटी इन द वर्ल्ड 2015” में यह बात कही है।

यह विचारणीय और चिन्तनीय है कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्म निर्भर होकर भी हमारे देश में भूख से जुझ रहे लोगों की संख्या चीन से भी ज्यादा है। वजह हर स्तर पर होने वाली अन्न की बर्बादी है। इसका बङा खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पङेगा। अगले 35 वर्षों में में जब हमारी आबादी 200 करोड़ बढने वाली है। तब हम सबको अन्न कैसे उपलब्ध करा पाएँगे? कृषि मंत्रालय का कहना है कि पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि की तुलना में देश में अन्न की माँग कम बढी है। यह माँग उत्पादन से कम है। यानी भारत अब अन्न की कमी से उढकर सरप्लस देश बन गया है। देश में इस समय विश्व के कुल खाद्यान्न का करीब पन्द्रह फीसद खपत करता है। लेकिन आज भी हमारे देश में अनाज का  प्रति वयक्ति वितरण बहुत कम है। यह विडम्बना नहीं, उसकी पराकाष्ठा है कि सरकार किसानों से खरीदे गए अनाज को खुले में छोड़कर अपना कर्तव्य पूरा समझ लेती है

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लेखक बरगी बाँध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से जुड़े हैं तथा विस्थापन, आदिवासी अधिकार और ऊर्जा एवं पानी के विषयों पर कार्य करते हैं। सम्पर्क-+9194243 85139, rajkumarbargi@gmail.com

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जब समाज चौतरफा संकट से घिरा है, अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया चैनलों की या तो बोलती बन्द है या वे सत्ता के स्वर से अपना सुर मिला रहे हैं। केन्द्रीय परिदृश्य से जनपक्षीय और ईमानदार पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित है; ऐसे समय में ‘सबलोग’ देश के जागरूक पाठकों के लिए वैचारिक और बौद्धिक विकल्प के तौर पर मौजूद है।
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