मुद्दा

आपातकाल पर पुनर्विचार: राज्यसत्ता का दमन बनाम जनता का प्रतिरोध

 

जब हम भारत के स्वातन्त्र्योत्तर इतिहास का अवलोकन करते हैं तो उसमें सर्वसत्तावादी शासन का एक काला अध्याय भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है और इसप्रकार के भावी खतरों के प्रति सचेत करता है। दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का ‘ब्लैक होल’ है। यह युग लोकतंत्र के निलंबन, नागरिक स्वतंत्रता के ह्रास और आम लोगों पर अकल्पनीय अत्याचारों के लिए जाना जाता है। आज, हम आपातकाल के दौरान राज्यसत्ता द्वारा किये गये दमन और उत्पीड़न के बरक्स भारतीय जनता द्वारा किये गये प्रतिरोध और संघर्ष को याद करके लोकतंत्र में अपनी आस्था का प्रकटीकरण कर सकते हैं।

आपातकाल का भारत के राजनीतिक संस्थानों पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा क्योंकि इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ विधायिका और न्यायपालिका के अधिकारों का अतिक्रमण कर लिया था। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक नियंत्रण और संतुलन के संवैधानिक प्रावधानों और संस्थाओं को पंगु बना दिया था। अनेक राज्य सरकारों को भंग कर दिया गया, और स्थानीय चुनावों को देश भर में निलंबित कर दिया गया। केंद्र सरकार ने इन सबको अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेकर अपनी शक्ति को बढ़ाया और जमीनी स्तर पर लोगों की आवाज और प्रतिनिधित्व को समाप्तप्राय कर दिया। शक्ति के इस संकेंद्रण ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को निष्प्रभावी कर दिया और विधायिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बाधित किया। आज्ञाकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति, असुविधाजनक न्यायाधीशों के स्थानांतरण, और न्यायिक स्वायत्तता के दमन ने संवैधानिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की भूमिका को अत्यंत सीमित और संदेहास्पद कर दिया। न्यायपालिका को भय और प्रलोभन से प्रभावित करते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बरकरार रखने वाले कई ऐतिहासिक निर्णयों को या तो उलटवा दिया गया या कमजोर करवा दिया गया, जिससे न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास खत्म सा-हो गया।

आपातकाल के दौरान, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में राज्यसत्ता ने जनता पर असीम अत्याचार किये। 140,000 से अधिक व्यक्तियों, जिनमें राजनीतिक विरोधी, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, लेखक और असहमति व्यक्त करने वाले आम नागरिक शामिल थे, को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया। नियत प्रक्रिया का उल्लंघन और बंदी प्रत्यक्षीकरण से इनकार रोजनामचा हो गया। सरकार की नीतियों के विरोध को निर्ममता से कुचलने के लिए आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA)  की आड़ में बिना मुकदमे के अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने का रास्ता निकाला गया। आपातकाल के समय के हिरासत केंद्रों से यातना और दुर्व्यवहार के रौंगटे खड़े करने वाले किस्से सामने आए। शासन को चुनौती देने वालों को शारीरिक हिंसा, यौन उत्पीड़न और मनोवैज्ञानिक यातना झेलनी पड़ी। क्रूरता के इन कृत्यों का उद्देश्य डर पैदा करना और प्रतिरोध की भावना को कुचलना था।

मीडिया सेंसरशिप को आपातकाल के दौरान असंतोष को दबाने के लिए एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को बंद होने या सेंसरशिप के लिए मजबूर किया गया। असंख्य पत्रकारों को उत्पीड़न, गिरफ्तारी और धमकी का सामना करना पड़ा। सेंसरशिप की सीमा इतनी ज्यादा थी कि उस अवधि के दौरान एक महत्वपूर्ण सूचना निर्वात पैदा करते हुए बुनियादी समाचार कवरेज भी प्रभावित हुआ। सरकार ने प्रसारण मीडिया पर अपना नियंत्रण बढ़ाया, अखिल भारतीय रेडियो (AIR) और दूरदर्शन, राष्ट्रीय टेलीविजन नेटवर्क को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया, और अपने प्रोपेगैंडा का प्रसार करने और असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए माध्यम के रूप में उनका उपयोग किया गया। इन प्लेटफार्मों पर प्रसारित होने वाली सामग्री को कड़ाई से नियंत्रित किया गया था, जिससे स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता के लिए कोई जगह नहीं बची थी। लोकतंत्र की आधारशिला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राज्य नियंत्रण से कुचल दी गई, जनता को निष्पक्ष जानकारी और वैकल्पिक दृष्टिकोण से वंचित कर दिया गया। इसके अलावा, इसने भारत में मीडिया की विश्वसनीयता के लिए लंबे समय तक चलने वाले परिणामों के साथ, सूचना के एक निष्पक्ष स्रोत के रूप में मीडिया में सार्वजनिक विश्वास को मिटा दिया।

आपातकाल में जबरन नसबंदी का एक राज्य प्रायोजित दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण कार्यक्रम भी शुरू किया गया। जनसंख्या नियंत्रण के लिए गरीब और हाशिए के समुदायों के स्त्री-पुरुषों की उनकी सहमति या उचित चिकित्सा देखभाल के बिना ही जबरदस्ती नसबंदी की गयी। इस अमानवीय अभियान ने प्रजनन अधिकारों का घोर उल्लंघन किया। उत्तर प्रदेश राज्य में बड़े पैमाने पर जारी नसबंदी अभियान का एक कुख्यात मामला, जहां एक ही दिन में 6,000 से अधिक नसबंदी की गई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक अक्षुण्णता की अवहेलना का एक भयावह उदाहरण है। इस नीति ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को क्षतिग्रस्त करते हुए जनता को गहरे घाव दिए।

आपातकाल लगाने का भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। नागरिक स्वतंत्रता और मीडिया सेंसरशिप के दमन के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भारत की व्यापक आलोचना की गयी, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, मीडिया माध्यमों और सरकारों ने आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की। नतीजतन, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को इस घटना ने गहरा आघात पहुँचाया। इसके अलावा, आपातकाल द्वारा पैदा की गई अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेश में भी गिरावट आई और आर्थिक विकास धीमा हो गया। विदेशी निवेशक और व्यवसायी राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को लेकर आशंकित हो गये। इससे विदेशी निवेश और व्यापार संबंध प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप,  भारत के राजनयिक संबंध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी सिमट गये।

इस उथल-पुथल भरे दौर में संविधान और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का गंभीर क्षरण हुआ, क्योंकि सत्ता का बेरहमी से दुरुपयोग किया जा रहा था। सत्ता की भूख ने हमारे लोकतंत्र को बनाए रखने वाले स्तंभों की घोर अवहेलना की। इसके अलावा, एक नई संस्कृति का उदय हुआ- जिसकी विशेषता चापलूसी और चाटुकारिता थी। “इंदिरा इज इंडिया” जैसे नारे लगवाए गए, जो दरबारी संस्कृति के प्रतीक और पोषक थे। यह दरबारी संस्कृति आपातकाल की अभूतपूर्व उपलब्धि थी। सत्ता में बैठे लोगों को खुश करने की इच्छा से प्रेरित इस संस्कृति में लोकतंत्र की आत्मा ‘असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार’ के लिए कोई स्थान नहीं होता।

आपातकाल के खिलाफ लड़ाई धार्मिक, क्षेत्रीय, सामाजिक और वैचारिक विभाजनों का अतिक्रमण करते हुए विविध समुदायों  और समूहों  को एक मंच पर लायी। इसने भारतीयों के बीच एकता और एकजुटता की भावना को बढ़ावा दिया, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता को साझा मूल्यों के रूप में संरक्षित करने के लिए संघर्ष को प्रेरित किया। इस व्यापक आधार वाले आंदोलन में सरकार के सर्वसत्तावादी शासन को चुनौती देने की ताकत थी। मीडिया सेंसरशिप के बावजूद, साहसी पत्रकारों और भूमिगत प्रकाशनों ने सूचनाओं के प्रसार और निरंकुश शासन के खिलाफ जनमत जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रकाशनों ने प्रतिबंधित साहित्य को गुप्त रूप से प्रसारित किया, सरकारी ज्यादतियों को उजागर किया और समाज को वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान किया। अपनी जान जोखिम में डालकर ये पत्रकार,लेखक और प्रकाशन प्रतिरोध की भावना को जीवित रखते हुए जनता की जीवन रेखा बन गए।

1977 में हुए आम चुनावों में निरंकुश शासन के खिलाफ लोगों के आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी गठबंधन सत्ता में आया। यह परिणाम भारतीयों के सामूहिक प्रतिरोध की शक्ति और लोकतंत्र के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का  प्रमाण-पत्र था।

आपातकाल के दौरान आम लोगों द्वारा झेले गए अत्याचारों के साथ-साथ भारतीय जनता द्वारा प्रदर्शित किए गए अटूट प्रतिरोध ने राष्ट्र की सामूहिक स्मृति को गहराई से प्रभावित किया है। वर्तमान में, भारत एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में खड़ा है। फिर भी, यह हमारी प्रमुख जिम्मेदारी है कि हम कड़ी मेहनत से प्राप्त की गई स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव सतर्क और दृढ़ रहें। यह उन सभी लोगों के बलिदान का परिणाम है जिन्होंने आपातकाल का बहादुरी से विरोध किया था। अतीत से सीखे गए मूल्यवान पाठों को संरक्षित करें और यह सुनिश्चित1 करें कि ऐसे काले दिनों की छाया हमारे देश के भविष्य पर कभी न पड़े।

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रसाल सिंह

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैं। सम्पर्क- +918800886847, rasal_singh@yahoo.co.in
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