मुद्दा

भारतीय समाज में जाति का ‘अनिवार्य’ बोझ

 

भारत तब परतन्त्र था और समय था उन्नीसवीं सदी का अन्तिम दशक। तमाम बाधाओं को पार करते हुए स्वामी विवेकानंद अमेरिका के शिकागो शहर पहुँचे और वहाँ आयोजित धर्मसंसद में भारतीय संस्कृति के विशिष्ट ही मानवतावादी चरित्र तथा आध्यात्मिकता की इसकी अद्भुत अवधारणा के बारे में सप्रमाण वक्तव्य देकर विदेशियों को अभिभूत कर दिया। वे उसके बाद विदेशी धरती पर अपने व्याख्यानों से सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत के अनेक विशिष्ट पहलुओं पर विदेशियों को ज्ञानसमृद्ध करते रहे और एक अविस्मरणीय सांस्कृतिक-आध्यात्मिक दूत के रूप में समादृत हुए। भारत लौटने पर उनकी भूमिका की व्यापक रूप से सराहना हुई, तमाम शहरों में उनका सम्मान किया गया इत्यादि इत्यादि। ऐसे ही एक आयोजन में तत्कालीन मद्रास शहर के विक्टोरिया हाल में व्याख्यान देते हुए वे यह भी कहने को बाध्य हुए-

“एक बात और : समाज-सुधारकों के एक मुखपत्र में मैंने पढ़ा कि मैं शूद्र हूँ और शूद्र के रूप में मेरे संन्यासी होने के अधिकार को चुनौती दी गयी है। इसका उत्तर मैं ये देता हूँ कि मैं अपना वंश उस चित्रगुप्त से मानता हूँ जिसके चरणों में हर ब्राह्मण “यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः” कहते हुए पुष्प अर्पित करता है और जिसके वंशज विशुद्ध क्षत्रिय हैं। अगर आपलोग अपने मिथकों और पौराणिक ग्रंथों में विश्वास रखते हों तो इन तथाकथित सुधारकों को अवगत करायें कि मेरी जाति ने, पूर्व में किए गये अनेक कार्यों के अलावा, सदियों तक आधे भारतवर्ष पर राज किया था। अगर मेरी जाति को निगाह से बाहर रख दिया जाए तो वर्तमान भारतीय सभ्यता में बचेगा ही क्या?”

कितनी विचित्र विडम्बना से आप्लावित है विवेकानंद का यह वक्तव्य! अपने ज्ञान, मेधा, सांस्कृतिक-आध्यात्मिक समझ के बूते पर विदेशी धरती पर विदेशियों को भी एकत्व का सूत्र प्रतिपादित करनेवाले वेदांत के अद्भुत भारतीय दर्शन को समझा सकने में समर्थ संन्यासी भारतभूमि पर लौटते ही अपनी ‘जाति’ के बचाव में ‘जाति’ से ही उदाहरण देने को बाध्य हो जाता है। यही है भारतीय समाज में जाति का ‘अनिवार्य’ बोझ!

क्या आज यानी इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह ‘अनिवार्य’ सामाजिक बोझ कुछ कम हुआ है या होता दिख रहा है? ‘नये भारत’ की पताका देश-विदेश में फहराने में लगे हर भारतीय को इस प्रश्न पर गम्भीरता से चिंतन-मनन करना आवश्यक है क्योंकि ऐसा सामाजिक बोझ हमारी प्रगति की अच्छी-खासी उड़ान को किसी भी समय टारपीडो करने में समर्थ है। इसके मद्देनजर हम ‘जाति’ नामक सामाजिक बोझ के मुख्य-मुख्य पहलुओं पर विचार करेंगे।

भगवद्गीता में सीधे कृष्ण के मुँह से दी गयी स्थापना (चातुरवर्यं मया सृष्टम् गुणकर्मविभागशः) और (विवादास्पद पर बेहद महत्त्वपूर्ण स्मृति) मनुस्मृति में निहित अन्तरविरोधों जैसे पुष्ट प्रमाणों के बावजूद, कलिकाल के चरित्र के अनुरूप ही, भ्रामक और द्वेष से भरे बयानों से समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों का नये भारत में भी जातिवादी दुराग्रह कायम रखने का ‘अभियान’ जारी है। समाज में जब सिरे से ही अवैज्ञानिक और अतार्किक व्यवस्था (जातिव्यवस्था) को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के एकमात्र आधार के रूप में आधिकारिक मान्यता मिल जाती है तो न्याय के बजाय अन्याय, समानता के बजाय असमानता, सामाजिक समरसता के बजाय सामाजिक द्वेष के लिए रास्ते खुलने ही खुलने हैं।

गांव के लोग

स्वतन्त्रता से पहले भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का जहाँ तथाकथित निम्न जातियाँ बोझ ढोने को अभिशप्त थीं वहाँ तथाकथित उच्च जातियाँ इसी के बूते पर समाज में स्वतः कई प्रकार का घोषित-अघोषित लाभ उठाती रहती थीं। हिन्दी-साहित्य में प्रेमचंद ने, विशेष रूप से, इस व्यवस्था के चलते हो रहे सामाजिक अन्याय और शोषण को उजागर किया। गाँवों में इस व्यवस्था की जड़ ज्यादा थी क्योंकि उस समय के भारत की बहुसंख्यक जनता गाँवों में निवास करती थी। और, ग्राम्य जीवन की बेहद प्रामाणिक समझ के चलते प्रेमचंद अपनी कहानियों में इस ‘सामाजिक बोझ’ को इसके विभिन्न स्वरूपों में उस तरह चित्रित कर गये कि उनकी ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘मंदिर’, ‘सद्गति’ जैसी कहानियों को पढ़ना मात्र उस काल की जाति-उत्प्रेरित समाजशास्त्रीय विसंगतियों को समझ लेने के लिए काफी है। शहरों का विकास, गाँवों में रोजगार के अवसरों की कमी, नये किस्म के ज्यादा लाभदायक रोजगारों का शहरों में केंद्रित होते चले जाना तथा तेजी से बढ़ती जा रही जनसंख्या जैसे कारण जातिव्यवस्था में नये आयाम जोड़ते चले गये।

यहाँ जातिव्यवस्था की अवैज्ञानिकता और निरर्थकता पर हम उन महान संत-कवियों की पंक्तियों का स्मरण करना चाहेंगे जो उन्होंने मध्यकाल में जातिगत भेदभाव से उत्प्रेरित सामाजिक अन्याय के खिलाफ भारतीय समाज को जगाने के लिए बेहद सम्प्रेषणीय और स्पष्ट बोली-बानीमें कही थीं। और , सबसे पहले इस मुहिम में अग्रणी कबीर की पंक्तियाँ देखें –

  • “ जे तू बाभन-बभनी जाया

तौ आन बाट होई काहे न आया।”

  • “ एक रुधिर एकै मल मूतर, एक चाम एक गूदा

एक बूंद तै सृष्टि रची, को बाभन को सूदा।”

फिर रैदास की –

  • “ बाह्मन अरु चंडाल मंहि रविदास न अन्तर जान

सभ माहि एक ही जोति है सभी घट एक भगवान।”

  • “ जात-पाँत के फेर मेहि, अरुझि रह्यो सभ लोग

मानुषता कूँ खाइ रह्यो, रविदास जात कउ रोग।”

  • “ जन्म जात कूं छाड़ि करि, करनी जान परधान

इह्यो वेद को धरम है, करै रैदास बखान।”

फिर नानक की –

“ खत्री बाहमन सूद्र बैस की

जाति पूछ नहीं देता दाता।”

फिर गुरु अमरदास की –

“ जाति का गरब करहु मूरख गंवारा

एहि गरब तु उपजे बहुत विकारा।”

मध्यकाल में अपनी समाज-सुधारक रचनाओं से व्यापक समाज में प्रभाव डालनेवाले और आधुनिक काल में भी खासे मान्य और लोकप्रिय उन महान संत कवियों की जातिव्यवस्था की अवैज्ञानिकता और निरर्थकता पर जागरूक करने की सारी कोशिशों पर आख़िरकार पानी क्यों फिर गया, क्यों ‘जाति’ एक सामाजिक बोझ के रूप में बदस्तूर मौजूद है ‘नये भारत’ में भी?

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जातिव्यवस्था की जड़ें मनुष्य की दूसरे मनुष्य को अपने से ऊँचा या नीचा देखने की प्रवृत्ति में है। धार्मिक समूहों की बात करें तो ‘जाति’ तो बहुसंख्यक हिन्दुओं का ही ‘बोझ’ होनी चाहिए पर व्यावहारिक रूप से हम पाएँगे कि जन्म पर आधारित भेदभाव का यह ‘बोझ’ किसी न किसी नाम से अन्य धार्मिक समूहों में भी मौजूद है। राही मासूम रज़ा के बेहद प्रामाणिक और प्रभावी उपन्यास ‘आधा गाँव’ को पढ़ना इस सन्दर्भ में आँखें खोलनेवाला सिद्ध होगा कि कैसे समतावादी इस्लाम को माननेवालों में सैयद और जुलाहे बराबर नहीं हैं, ‘हड्डी’ (यानी वंश पर आधारित ऊँच-नीच का पैमाना) वहाँ ख़ासा महत्त्व रखता है किसी मुसलमान का सामाजिक ‘मुकाम’ तय करने में। जहाँ तक भारतीय ईसाइयों का सवाल है, इन पंक्तियों के लेखक को वह प्रकरण भूले नहीं भूलता है जब 1980 में पहली नौकरी पर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर में रहते हुए अख़बार पर नज़र मारने के दौरान वैवाहिक विज्ञापनों के पृष्ठ पर ‘ब्राह्मण क्रिश्चियन’ के विज्ञापन पर नज़र पड़ गयी और आश्चर्यचकित होकर एक तमिल सहकर्मी से पूछने पर उत्तर मिला कि इससे उस वर या वधू चाहनेवाले को वरीयता मिलेगी क्योंकि वह ऐसा-वैसा नहीं बल्कि ‘ब्राह्मण’ से कन्वर्ट हुआ क्रिश्चियन परिवार है! यानी भारतभूमि पर ‘जाति’ या इसके समानार्थक किसी न किसी सामाजिक ‘बोझ’ को ढोना ही ढोना है, सिद्धांत-विद्धांत झाड़े जाओ पर व्यावहारिक सत्य यही रहेगा!

भारत का स्वाधीनता संग्राम

आज़ाद भारत का संविधान बनाते समय सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े या वंचित समूहों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के ध्येय से आरक्षण को एक न्याय-प्रदायक प्रावधान के रूप में शामिल किया गया। जहाँ ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्दों का प्रयोग इसलिए हुआ कि किन्हीं-किन्हीं जातियों और जनजातियों को लगभग पूरा का पूरा ही पिछड़ा मान लिया गया, वहीं शब्द ‘पिछड़े वर्गों’ के प्रयोग के पीछे यह भावना देखी जा सकती है कि प्रावधान मूलतः ‘वर्ग’ का आधार लिए हुआ था, जन्मना निर्धारित होनेवाली जाति का नहीं। अगर हम भारत का इतिहास ध्यान से पढ़ें तो ऐसे तमाम उदाहरण पाएँगे जहाँ अपनी प्रतिभा और गुणों के बूते पर सामाजिक सीढ़ी के निचले पायदान के जन्मना होने के बावजूद ऐसे लोग सर्वमान्य और पूज्य माने गये, राजघराने से आनेवाली मीराबाई का संत रैदास को गुरु मानना एक ज्वलन्त उदाहरण है।

दरअसल, व्यापक समाज के एक-एक व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति आँककर सामाजिक न्याय एक-एक व्यक्ति के मामले में पूर्णतः सुनिश्चित कर पाना लगभग असम्भव है बावजूद सारे नेक इरादों के। अतः आरक्षण का प्रावधान एक तात्कालिक व्यवस्था थी सम्बन्धित वर्गों के सामाजिक-आर्थिक रूप से सन्तोषजनक रूप से आगे बढ़ जाने तक ही। पर देखते-देखते ही आरक्षण लेना या दिलवाना राजनीति में एक वोटकमाऊ हथियार बनता गया, न्याय की मूल अवधारणा को ही अंगूठा दिखाते हुए। शुरू में राजनेता अपने काम से चुने गये, अपनी ‘जाति’ की क्षेत्र-विशेष में अल्प उपस्थिति के बावजूद जीतते रहे पर बाद में अपनी ‘जाति’ के लोगों का उस क्षेत्र-विशेष में अच्छी संख्या में होना न सिर्फ उनके टिकट पाने का आधार बनता गया बल्कि जीतने का भी। कुछ राजनेताओं ने धारा के विपरीत जाकर जातिविहीन राजनीति की, कुछ हद तक सफल भी हुए। इस सन्दर्भ में भारतीय राजनीति के, कई मायनों में अनोखे चरित्र, डाक्टर राममनोहर लोहिया का स्मरण होता है जिन्होंने ‘जाति’ तोड़ने का नारा दिया। एक समय आचार्य नरेंद्रदेव, लोहिया, मधु लिमये जैसे नेता खालिस समाजवादी राजनीति करने में अग्रणी थे, जातिव्यवस्था जैसी अवैज्ञानिक व्यवस्था के खिलाफ सही मायनों में सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों को न्याय दिलाने के लिए सतत प्रयासरत। आज हालत यह है कि अपने नाम के आगे-पीछे ‘समाजवादी’ चस्पां किए हुए तमाम राजनीतिक दल किस ‘जाति’ के लोगों के बल पर ही सत्ता साध रहे हैं, किस ‘जाति’ को ही सत्ता में आकर लाभान्वित कर रहे हैं ; राजनीतिशास्त्र के पंडितों से लेकर बच्चा-बच्चा तक जानता है। ‘नये भारत’ में ‘समाजवादी’ के प्रच्छन्न ‘जातिवादी’ होने की सामाजिक-राजनीतिक हक़ीक़त में न कोई अन्तर आया है और न आता दिख रहा है। जहाँ तक अपवादों का सवाल है, वे पहले भी ‘अपवाद’ थे और आज भी ‘अपवाद’ ही बने हुए हैं।

समाज के वंचित समूहों को न्याय दिलवाने के लिए लागू आरक्षण की व्यवस्था समय बीतने के साथ तमाम तरह की पेचीदगियों की शिकार होती गयी और समाज के कुछ एक तबकों की निगाह में ‘न्याय’ के बजाय ‘अन्याय’ की वाहक हो गयी। आरक्षण का लाभ पानेवाले तबकों में आर्थिक रूप से सारे व्यक्ति एक समान नहीं हैं और न हो सकते हैं पर सिर्फ ‘जाति’ का आधार लेने की वजह से कुछ मामलों में पूरा का पूरा जाति-समूह आरक्षण से लाभान्वित हो गया और यह आरक्षण से वंचित पर वास्तव में आर्थिक रूप से पिछड़े जाति-समूहों की स्थायी ईर्ष्या का कारण बन गया। दूसरी तरफ, आरक्षण से लाभान्वित जाति-समूहों में से कुछ जातियाँ ही सारी ‘मलाई’ ले जा रही हैं, यह उन लाभान्वित समूहों में पारस्परिक द्वेष का कारण बन गया और आरक्षण के अन्दर भी आरक्षण की मांग उठने लगी। यहाँ यह ध्यान देने लायक है कि आरक्षण के बूते पर सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की नौकरी में ही कोई लाभ पा सकता है, निजी क्षेत्रों की नौकरी में नहीं। और, इन नौकरियों के ‘प्रतिष्ठित’ मान लिए जाने की ‘सामाजिक मनोवृत्ति’ के चलते यह सामाजिक आकांक्षाओं के मामले में क्लेश का बड़ा कारण बनता गया। आरक्षण की बदौलत नौकरी पानेवालों में तमाम ऐसे मामले भी पकड़े गये जहाँ जातिविशेष का प्रमाणपत्र ही फर्जी पाया गया, एक कालखण्ड में एक प्रांत विशेष में कुछ सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों में बड़ी संख्या में ऐसी फर्जी आधार वाली नियुक्तियाँ पकड़ी गयी थीं।

प्रतिभा न किसी जाति विशेष की बपौती है और न ही हो सकती है। झारखण्ड की आदिवासी लड़कियों को जब सही अवसर और प्रशिक्षण मिला तो उन्हीं लड़कियों ने भारत की महिला हाकी टीम की हाकी-जगत में सशक्त उपस्थिति की रीढ़ बनकर दिखा दिया। यह सिर्फ एक मूर्खतापूर्ण पूर्वाग्रह है कि फलाँ काम तो फलाँ जाति वाले ही कर सकते हैं। भारत की सर्वोच्च प्रतियोगी परीक्षाओं में आरक्षण से लाभान्वित जातियों से आनेवाले प्रतियोगियों ने कई-कई बार ऊँचे पायदानों पर अधिकार जमाया है जहाँ वे बिना आरक्षण के भी पहुँच सकते थे। पर सामाजिक पूर्वाग्रह की हालत यह है कि उन जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तियों को भी जातिवादी हिकारत झेलना पड़ता है। ऊपर से आरक्षण से लाभान्वित होकर सामाजिक रूप से आगे बढ़े लोगों में कई ऐसे भी पाए गये हैं जो अपनी सद्यःअर्जित ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ के मद में अपनी ही जाति के वंचित ही बने रहे जातिभाइयों से दूरी बना लेते हैं। कहानीकार ओमप्रकाश बाल्मीकि की एक बेहतरीन कहानी है ही इस कथा-पृष्ठभूमि पर।

आरक्षण का प्रावधान जाति के आधार के सन्दर्भ में एक और चिन्ताजनक आयाम ग्रहण कर लिया है। कई जातियों में ऐसे नेता रातोरात उभर आये हैं जो अपनी जाति के वैसे अच्छी-खासी समृद्धि और ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ के बावजूद जाति के लोगों की संख्या और उस संख्या के वोट की राजनीति में ‘महत्त्वपूर्ण’ होने के हथियार के बूते पर पात्रता न होने पर भी आरक्षण ‘दिलवा देने’ का बीड़ा उठा लिए हैं और इसी हथियार के बूते पर अपनी ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ पूरी करने में लगे हैं। कभी ऐसे ‘नेताओं’ के चलते हज़ारों करोड़ रुपयों का मूल्य रखनेवाली ट्रेनें,बसें तथा अन्य सार्वजनिक उपयोग की चीज़ें नष्ट कर दी जाती हैं तो कभी अपना कामकाज करने में लगे सामान्य नागरिकों को अकल्पनीय असुविधाएँ पहुँचाई जाती हैं। दबंगई , हिंसा और सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पर आरक्षण हथियाने का यह खेल कितना समाजविरोधी, न्यायविरोधी और राष्ट्रविरोधी है यह सारे देशभक्तों के लिए बेहद चिन्ता का विषय होना चाहिए। वैसे ही भारतवर्ष चारो ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है, विदेशी कर्ज के बोझ के अतीत से उबरकर आर्थिक वृद्धिदर के उल्लेखनीय हो जाने की उपलब्धि हासिल कर चुका है; ऐसे समय जाति नामक सामाजिक बोझ का ऐसा ख़तरनाक आयाम वह किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकता।

सैकडों वर्ष पूर्व भारत के कुछ महान सपूतों ने जाति नामक सामाजिक बोझ को देश के लिए घातक मानकर इससे मुक्ति पाने के लिए बहुमूल्य सुझाव भी दिये थे जिनमें महान राष्ट्रभक्त और तमिल कवि सुब्रह्मण्यम भारती अग्रणी थे और उनके लेख ‘द क्राइम आफ कास्ट’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं –

“एकमात्र उपाय है (विभिन्न जातियों के लोगों का) सहभोज और आपस में विवाह-सम्बन्ध। बाकी सारे उपाय मात्र तुरंता और एनीस्थीसिया देने जैसी प्रकृति के हैं। इस उपाय को व्यापक रूप से लागू करने में ढेर सारी दिक़्क़तें हैं।”

सुब्रह्मण्यम भारती बहुत कम उम्र में दुनिया छोड़ गये पर उतनी उम्र में ही उन्होंने देश की भलाई के लिए कितनी दूरदर्शिता से सोचा, यह लेख एक उदाहरण है। जहाँ तक साथ बैठकर खाने का सवाल है, आज सार्वजनिक रूप से किसी की हिम्मत नहीं कि किसी को नीची जाति का कहकर उसके साथ बैठकर खाने से मना कर दे, कानूनी प्रावधानों के चलते। हाँ, अन्तर्जातीय विवाहों का मामला थोड़ा पेचीदा है। जाति के बजाय वर-वधू के गुण-स्वभाव पर आधारित विवाहों की बढ़ती संख्या एक सकारात्मक बदलाव है। पर, जैसा सुब्रह्मण्यम भारती ने सैकड़ों वर्षों पूर्व ही देख लिया था, अन्तर्जातीय विवाह होना इतना आसान नहीं है। पहली बात तो यह कि किससे विवाह करना है, यह किसी भी लड़के या लड़की के लिए नितान्त व्यक्तिगत मामला है। किसी भी जाति में लाखों-करोड़ों लोग हैं और किसी लड़का-लड़की को अपनी ही जाति में अपनी पसन्द का (भले वह जाति को महत्त्व देता/ देती न हो) जीवनसाथी मिल जाए तो कोई बुराई नहीं। दिक़्क़त तब आती है अन्तर्जातीय विवाहों में जब जातिगत दुराग्रह या जाति के महंतों का डर, लड़का-लड़की के गुण और स्वभाव के सन्तोषजनक रूप से मिलने के बावजूद बड़ी बाधाएं बनकर खड़े हो जाते हैं। खाप-पंचायतों के फ़तवे और उनके चलते हुई हिंसा तथा सामाजिक विद्वेष पर्याप्त रूप से कुख्यात हो ही चुके हैं। मजे की बात यह है कि खाप एक ही जाति के अन्तर्गत आनेवाले विभाजन दर विभाजन , संकीर्णता दर संकीर्णता का प्रतिनिधित्व करते हैं वोटजुटाऊ क्षमता के कारण खाप-पंचायतों की मनमानी के आगे राजनीतिक दलों की बोलती बंद रहती है, प्रशासन भी कुछ ख़ास कानूनी उपाय नहीं कर पाता। मात्र जातिगत दुराग्रह कई मामलों में अमानवीय आचरण को उत्प्रेरित करता है, मासूम जिंदगियों को उनकी उठान में ही ख़त्म तक कर देने का कारण बन जाता है।

दरअसल, भारत अद्भुत विविधताओं से परिपूर्ण देश है और एक तरफ जहाँ सुखद रूप से आश्चर्यचकित कर देनेवाली ढेर सारी सकारात्मक चीजें मौजूद हैं वहीं जातिव्यवस्था जैसी हैरान-परेशान करनेवाली चीज़ें भी कम नहीं हैं। जातिगत विद्वेष के चलते हिंसा और जीवनहानि पूरे विश्व में देश के उपहास के कारण बन जाते हैं और देश के दुश्मनों के लिए खाद-पानी। और, जातिगत दुराग्रह मी पूरे देश या पूरे किसी प्रदेश में भी एकसमान रूप से नहीं मौजूद है, कुछ प्रदेश इसके लिए कुख्यात हैं तो कुछ प्रदेशों में यह कोई मुद्दा ही नहीं। फिर, एक और पेचीदगी आती है अन्तर्जातीय विवाहों में कि विवाह के बाद वर-वधू किसी द्वीप में तो नहीं, इसी समाज में रहते हैं। विवाह करते समय बाधा नहीं आई तो विवाह के बाद नाते-रिश्तेदारी में उल्टी-सीधी टिप्पणियाँ और हरकतें क्लेश का कारण बन जाती हैं। इसका एक विचित्र परिणाम, कुछ मामलों में, यह देखने में आया है कि अन्तर्जातीय विवाह कर चुके लड़का-लड़की जब विवाहयोग्य लड़के या लड़की के पिता-माता होने की अवस्था में आते हैं तो जाति को लेकर खुद ही दुराग्रही बन जाते हैं। सुब्रह्मण्य भारती नै सैकड़ों साल पहले जिन व्यावहारिक दिक़्क़तों का ज़िक्र किया था, वे काफी हद तक अब भी बनी हुई हैं अन्तर्जातीय विवाह के सन्दर्भ में।

‘जाति’ नामक हथियार को वोट ‘कमाने’ के लिए ख़तरनाक रूप से भाँजने का ताजा उदाहरण जातिवार जनगणना की माँग है जो बिहार प्रदेश में कराई भी जा चुकी है। इसकी माँग करनेवाले भी जानते हैं कि समाज को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बाँटने का कितना बड़ा ख़तरा ऐसे ‘राजनीतिक हथियार’ समेटे रहते हैं पर सत्ता को तात्कालिक रूप से साधने की हवस हावी हो जाती है। लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेताओं का नाम भुनानेवाले और ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ आन्दोलन के चलते राजनीति में आगे बढ़े ऐसे तत्त्व ‘जाति’ को ही हर भारतीय की एकमात्र पहचान बनाना चाहते हैं, ‘भारतीय’ पहचान को आच्छादित करते हुए। भारत का इतिहास जो भी ढंग से जानता है वह यह भलीभाँति जानता है कि मुट्ठीभर अँग्रेज हज़ारों मील से आकर जाति जैसी कुप्रथाओं के चलते बुरी तरह से विभाजित भारतीय समाज की आपसी फूट के चलते ही दो सौ वर्षो तक कब्जा जमाए रहे। स्वतन्त्रता के बाद भी ये सरदार पटेल जैसे महान देशभक्त और दूरदर्शी राजनेता का ही दम था कि छोटी-बड़ी सैकड़ों रियासतों को मिलाकर भारत को, मात्र एक चलताऊ और विभाजित किस्म का संघ बने रहने के बजाय, सार्वभौम देश का स्वरूप दिया गया।

क्या हम जाति व्यवस्था को येन-केन-प्रकारेण बनाये रखकर, तमाम तरह के राजनीतिक हथकण्डों से हवा-पानी देते रहकर वापस वैसा ही विभाजित किस्म का भारत बनाने की दिशा में जा रहे हैं, ‘नया भारत’ बनाने के सारे संकल्प और सामर्थ्य के बावजूद?

क्या ‘नये भारत’ में हर भारतवासी अपने गुण-स्वभाव के बूते पर भारत के विकास में योगदान करेगा या अपनी-अपनी ‘जाति’ का ठप्पा माथे पर लगाए हुए अपनी ‘भारतीय’ अस्मिता को उससे आच्छादित होते रहने देगा?

क्या ‘नये भारत’ के निर्माण के लिए भारतवासी अपनी तकनीकी योग्यता, प्रशासनिक क्षमता, सांस्कृतिक दूरदर्शिता, आर्थिक मुद्दों की समझ जैसे गुणों के आधार पर चुने जाएँगे या अपनी-अपनी जाति के ‘बोझ’ के तले किनारे किए जाते रहेंगे और अपने-अपने महत्त्वपूर्ण और देश के लिए लाभदायक उपक्रमों- जिम्मेदार पदों से बीचोंबीच ही कुण्ठित होकर बाहर चले जाते रहेंगे?

ये प्रश्न और इसी कोटि के तमाम और प्रश्न उन सारे देशाभिमानी संकल्पों वाले भारतवासियों की ओर मुँह किए हुए हैं जो ‘जाति’ जैसे ‘अनिवार्य’ सामाजिक बोझ को हल्के में लेने की गलती कर रहे हैं या कर सकते हैं

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राकेश भारतीय

लेखक कवि, कथाकार और विचारक हैं। +91 9968334756, bhartiyar@ymail.com
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