शिक्षा

विद्यालयों में असमानता के बीज

 

जब मैंने सत्तर के दशक में होश सम्भाला तो अपने आसपास स्थित पूर्व में अविभाजित मध्यप्रदेश का एक प्रमुख शहर और वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के राजकुमार कालेज का नाम सुना था. यह भी सुना था कि यहाँ किसी पूर्व रियासत के राजाओं के /मंत्रियों के/रईसों के बच्चे स्कूल की पहली क्लास से ही पढ़ा करते हैं. यहाँ की फीस वगेरह इतना अधिक है कि सामान्य घरों के बच्चों के लिए यहाँ कोई गुन्जाईस ही नहीं. कालान्तर में दिल्ली पब्लिक स्कूल वगेरह भी आये, वहाँ भी यही धारणा है कि धनी-मानी अच्छे आय वाले घरों के बच्चे ही वहाँ पढ़ पाते हैं, पर राजकुमार कालेज जैसी महँगी परिस्थितियाँ शायद वहाँ नहीं हैं. हमारे देश में ऐसे भी टॉप छः स्कूल हैं जहाँ कि सालाना फीस औसत दस लाख के आसपास है.

सोचिये एक बच्चा अगर पाँच साल भी यहाँ पढ़ा तो उसका खर्च पचास लाख रूपये होता है. दस साल पढ़ा तो एक करोड़. इन स्कूलों में सबसे अधिक चर्चा उत्तराखंड देहरादून स्थित दून स्कूल की होती है जिसका सालाना फीस 9 लाख 70 हजार रुपये है. यह एक बोर्डिंग स्कूल है और इसमें केवल लड़के पढ़ते हैं। इसमें आर्ट और मीडिया स्कूल भी हैं। ऑडिटोरियम, फिल्म स्टूडियो आदि फैसिलिटीज इसमें हैं। इसमें 13 से 18 साल तक के तकरीबन 500 बच्चे पढ़ते हैं। यह स्कूल ब्रिटिश पब्लिक स्कूल के आधार पर बना है। मर्सेडीज बेंज इंटरनैशनल स्कूल, पुणे भी एक ऐसा स्कूल है, जहाँ कक्षा के हिसाब से सालाना फीस छः से लेकर सोलह लाख रूपये तक  है एक तरफ थोड़ी खुशी भी होती है कि चलो हमारे देश में भी इस तरह के महंगे स्कूल हैं. पर यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिकती जब मन में विचार आते हैं कि सिर्फ और सिर्फ अमीरों के बच्चे ही जहाँ पढ़ते होंगे वे किस तरह का समाज गढ़े जाने की सोच के साथ वहाँ से बाहर निकलते होंगे.

जिस देश में हजारों लाखों भूखे नंगे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जिनके लिए शिक्षा की बुनियादी जरूरतें भी ठीक से पूरी नहीं हो पा रही हैं वहाँ इस तरह के महंगे स्कूल मन में भय जरूर पैदा करते हैं. हम लाख समानता की बात करते रहें, पर असमानता के बीज तो वर्षों पहले हमने देश में ही बो दिए थे| ये बीज अब पेड़ बन चुके हैं जो आराम से फलफूल रहे हैं. इन पेड़ों का जंगल अब घना हो रहा है जहाँ गरीबों के बच्चों को प्रवेश की पात्रता ही नहीं है| इस देश में शिक्षा का अधिकार कानून भी लाया गया पर वह भी लगभग निष्प्रभावी है| इस कानून के तहत विभिन्न राज्यों के कुछ निजी स्कूलों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए कक्षा पहली में 25 फीसदी बच्चों को प्रवेश दिए जाने का नियम है जिनकी ट्यूशन फीस सरकार भरती है| क्या यह नियम इन निजी स्कूलों की व्यवस्था को एक तरह से बढ़ावा देना ही नहीं है?  

क्या ऐसे नियमों के जरिये हम उसी व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दे रहे जहाँ समानता की बुनियादी व्यवस्था बाधित होती है? क्या यहाँ प्रवेश लेकर वे 25 फीसदी गरीब बच्चे उसी संस्कृति को आत्मसात नहीं करते होंगे जो समानता की बुनियादी व्यवस्था को छिन्न भिन्न करता है| होना तो यह चाहिए था कि यह व्यवस्था यहाँ पनपने नहीं दी जाती और अगर यह व्यवस्था स्थापित हुई भी तो इसे बढ़ावा न दिया जाता | इससे सरकारी स्कूलों की व्यवस्था भी जरूर सुधरती| ये सरकारी स्कूल मात्र सरकारी स्कूल ही नहीं हैं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समानता की बुनियादी व्यवस्था को पोषित करने के केंद्र के रूप में भी इनकी मान्यता है | दुखद है कि इस मान्यता पर ही हमारा विश्वास अब नहीं रहा| समाज में समानता की बुनियादी व्यवस्था को स्थापित करने वाली सरकारी संस्थाओं का पतन कभी भी समाज हित में नहीं है| इनके पतन से ही समाज धीरे धीरे तिरोहित हो रहा है जिसकी खबर होते हुए भी हम सब चुप हैं|  सच तो यह है कि अपने ही देश में हमने कई कई देश गढ़ लिया है |

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रमेश शर्मा

लेखक व्याख्याता और साहित्यकार हैं। सम्पर्क +917722975017, rameshbaba.2010@gmail.com
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