सृजनलोक

चार कविताएँ : पूजा यादव

  • पूजा यादव

 

पूजा यादव, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी,के हिन्दी विभाग की शोधार्थी हैं। प्रकृति और प्रकृति के समानधर्मी स्त्री के प्रति विशेष लगाव रखने वाली पूजा को कहानी लिखने,संगीत सुनने और स्केचिंग में दिलचस्पी है।
py014886@gmail.com

pooja yadav
 पूजा यादव ने अभी कविता के घर में प्रवेश किया है। भाषा को छूते उनके कवि – हाथ कोमल हैं। मानवीय विश्वास और आकांक्षाएं उनकी भाषा को गीली मिट्टी सा बना देते हैं, जो कविता के चाक पर सुंदर रूप ले लेती है। पूजा की कविताओं में युवा स्वप्न भी जगह पाते हैं और संघर्ष भी । उनके सपनों में एक ऐसी दुनिया है जहां स्वतंत्रता वास्तविक हो और बेहिचक प्रेम के गीत गाए जा सकें। उनकी कविताओं में अनेक पूर्वज और समकालीन कवियों की लोकप्रिय कविताओं की अनुगूंजें मौजूद हैं । परंतु अनेक जगहों पर पूजा पूर्ववर्ती कवियों के भावों और विचारों के समानांतर खड़े होने का साहस करती हैं । एक कविता में वे बद्रीनारायण की ‘प्रेम पत्र’ कविता में मौजूद बेबसी का प्रत्याख्यान करती हैं – ‘ आग की लपटों से /प्रेमपत्र और भी निखर जाएगा / प्रलय के दिनों में / नाव बन जाएगा प्रेमपत्र ।’ कविता की दुनिया में सपनीले विश्वासों वाली पूजा यादव का स्वागत है ! – आशीष त्रिपाठी

sketch by pratima vats

स्केच : प्रीतिमा वत्स

1.कविताएं लिखी जाएंगी

कविताएं लिखी जाएंगी
हर ज़माने में
क्रूर तानाशाहों के ख़िलाफ़

वे पढ़ी जाएंगी,
गाई जाएंगी
सदियों तक

और ज़ुल्म की मुख़ालिफ़त करती हुई
इंकलाब के नारों में गढ़ी जाएंगी

इस तरह पूरी आवाम की आवाज़ बन
हुक्मरानों की जड़ों को हिला देंगी

कविताएं लिखी जाएंगी
हर ज़माने में
क्रूर तानाशाहों के ख़िलाफ़

यह भी पढ़ें- सात कविताएँ : जसवीर त्यागी

2.मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर

मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर
जो अपनी मुठ्ठियों को हवा में ताने हुए खड़ा है
जिसकी आंखों में ज़िद है हक़ की लड़ाई लड़ने की

मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर
जिसकी ज़ुबां पर आज़ादी के नारे गूंजते हैं
जो जम्हूरियत के लिए लड़ रहे पूरी आवाम से मोहब्बत करता है

मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर
जो अपनी पीड़ा को भी अपनी हिम्मत बना लेता है
जिसके हौसलों को तूफान भी डिगा नहीं पाता है

मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर
जिसके विचारों में भगत सिंह,पेरियार,बिरसा,अंबेडकर बसते हैं जिसे प्रिय है फ़ैज़,पाश और विद्रोही की कविताएं

मुझे फख़्र है उस प्रेमी पर
जो एक मासूम सा बच्चा बन जाता है अपनी प्रेमिका से लिपट कर जिसका स्वाभिमान से भरा सिर मां की गोदी में झुक जाता है

मुझे फख़्र है दुनिया के उन तमाम प्रेमियों पर
जो बेबाक,निडर और आत्मविश्वास से भरे होते हैं
जिनके दिलों में बसता है उनका मुल्क।

यह भी पढ़ें- छः कविताएँ : मिथिलेश कुमार राय

3.मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी

मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी
तुम उतरते जाओगे मुझमें और भी गहराई से
तुम्हारे दर्द को मैं कतरा-कतरा संजो लूंगी

मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी
मेरे कलम की रोशनाई
तुम्हें उजालों से भरती जायेगी
मेरे रंगों से भरे चित्र
तुम्हें नई उम्मीदों से भरते जाएंगे
कुछ इस तरह मैं अपने शब्दों को तुम से भर दूंगी

मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी
जब तुम थक जाओगे
अपने अकेलेपन से निराश हो जाओगे कभी
तब मैं कैनवास सी तुम्हें अपनी बाहों में भर लूंगी

मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी
इस कायनात के आख़िर तक
तुम पढ़े जाओगे मेरे लिखे में
तुम्हें कुछ इस तरह मैं अपने गीतों में रचूंगी

मैं तुम्हें बार-बार लिखूंगी।

4.प्रेमपत्र

आती रहेगी प्रेमपत्र की खुशबू

किताबों के पन्नों से

उस खुशबू को कैसे निकाल पाएगा प्रेत

पहाड़ों की दरकनों में भर जाएगा

प्रेमपत्र का एक-एक अक्षर

उन पहाड़ों को कैसे नोच खाएगा गिद्ध

बारिश से गला हुआ प्रेमपत्र

समुद्र की गहराइयों तक पहुंच जाएगा

आग की लपटों से

प्रेमपत्र और भी निखर जाएगा

प्रलय के दिनों में

नाव बन जाएगा प्रेमपत्र

वे लगाते रहेंगे बंदिशें प्रेमपत्र पर

फिर भी लिखा जाता रहेगा प्रेमपत्र

और इस तरह

सृष्टि के अंत तक बचा रहेगा प्रेमपत्र।

.

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लोक चेतना का राष्ट्रीय मासिक सम्पादक- किशन कालजयी

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