शख्सियत

अम्बेडकर यानी उल्टी हवाओं में हौसला

 

अम्बेडकर पिछड़े हुए समाजों में भी अति पिछड़े हाशिए के लोगों यानी महार जाति से थे। ये समाज अभी भी बेहद गम्भीर स्थिति में हैं। आज़ादी और इतने विकास के बाद भी सामाजिक सरोकार, न्याय अब भी एक तरह से हवा हवाई ही हैं। सामाजिक समरसता, न्याय की बातें बराबर की जाती हैं लेकिन असमानता की अँधेरी सुरंगे अब भी हाशिए के लोगों के जीवन में हैं। जाति संरचना के व्यूह ने सभी को उलझा दिया है। मेरे मन में अनेक प्रश्न आसन जमाए हैं। जयन्तियों और पुण्यतिथियों में महापुरुषों की पूछ-परख ज़्यादा बढ़ जाती है। लाभार्थी फूलमालाएँ चढ़ाने के लिए, उन पर अहसान जताने के लिए तरह-तरह के आयोजन करते हैं। ये सब वोट बैंक साधने के काम आते हैं। भारतीय जीवन, समाज और राजनीति की विडम्बनाएँ, विसंगतियाँ अकूत हैं।

कुछ लोग भूल जाते हैं कि अम्बेडकर ने अपने प्रारम्भिक जीवन से लेकर अन्य समयों में जितना अन्याय, अत्याचार और उत्पीड़न सहा, वह अकल्पनीय था। जैसे जिस प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं वहाँ के तमाम महापुरुषों को गुणगान से इस्तेमाल कर लिया जाता है।  अम्बेडकर केवल राष्ट्र निर्माण भर नहीं करना चाहते थे बल्कि वे सामाजिक अन्याय और जाति के दंश को समाप्त करना चाहते थे। उनके पास भारत का एक ठोस और जीवन्त सपना था। छल-छद्म-कपट-प्रपंच की काट के लिए उनके पास एक सकारात्मक सोच था। अनेक लोग हैं जो अम्बेडकर के मूल उत्सों और लक्ष्यों का निरन्तर विस्तार करना चाहते हैं। अम्बेडकर जाति प्रथा के आत्मघाती परिणामों के गहरे जानकार थे। हिन्दु  समाज के जाप के चलते भी उन्होंने उस हिन्दु अवधारणा को एक मिथक बताया था; जैसे “एक हिन्दु  के लिए उनकी जाति ही अवाम है। वह मात्र अपनी जाति के प्रति उत्तरदायी होता है, उसकी निष्ठा भी उसकी जाति तक ही सीमित है। उसके गुण और नैतिकता भी उसकी जाति द्वारा अनुशासित है।”

डॉ. अम्बेडकर एक डरावने, जानलेवा एवं उत्तेजक अनुभव संसार से गुज़रे जिसमें अनन्त यातनाएँ, उत्पीड़न और त्रास था। उनको तथाकथित सभ्य समाज में एक छोटी चीज़ के लिए तरसाया गया। उनका अनुभव है कि “व्यक्ति वही महान होता है, जो समाज में अपना लक्ष्य रखने के लिए एक हाथ में चाबुक रखे; कुरीतियों पर चोट करने को और दूसरे हाथ में गन्दगी को बुहारने वाली झाड़ू हमेशा लिए रहे।” हम डॉ..अम्बेडकरको अक्सर याद कर रहे हैं।हमनें उन्हें धीरे-धीरे जाना-पहचाना।

स्मरण आता है कि जब मेरे कुछ करने का अवसर आया तो मैंने समूचे प्रदेश के उन छात्रों के लिए कुछ किताबों का चयन किया और कराया; जो छात्रों के मन:संसार की संरचना करते हैं। उनमें किताबें थीं- ‘महात्मा गाँधी की आत्मकथा’, ‘विवेकानन्द-साहित्य संचयन’, अम्बेडकर की तीन-चार किताबों को मिलाकर एक संचयन तथा भारत का संविधान। अम्बेडकर की वास्तविकता और संघर्षशीलता को अक्सर स्मरण किया जाता है। यह कहावत भी सच है कि “जाने बिन न होई परतिती।“ जो उन्हें जानने का प्रयास करेगा, वही उनकी विषमता की आग को जान सकता है, उनके ताप को अनुभव कर सकता है, उनके जीवन की संघर्षशीलता, परायेपन को महसूस कर सकता है। इस दौर में जितना सम्मान दिया जा रहा है उसमें वैचारिक उत्तेजना की तेजस्विता कम, स्वार्थ साधना के अनेक पक्ष और रूप ज्यादा हैं।

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डॉ. अम्बेडकर का समग्र जीवन इस बात का साक्ष्य है कि जन्म से लेकर पढ़ाई-लिखाई और नौकरी तक हर दर्जे की असमानता तक से उनका पीछा नहीं छूटा। उन्होंने जो हासिल किया, उसे अपने हौसले से अर्जित किया। उनकी संघर्ष-यात्रा में उनके साथ सताए हुए लोग, कुचले गए लोग, कुचक्र में जबरन फँसाए गए लोग शामिल थे। उन्होंने कई तरह के दंश झेले। वे दलित समाज में अस्पृश्यता की भयावहता के अँधेरे में पैदा हुए जिसमें दलन था। उन्होंने समाज की हालत, पीड़ा और छुआछूत की यन्त्रणा देखी। यह सब कुछ उनकी किताबों में और अनुभव-संसार में तीर की तरह बिंधा हुआ था। वे संविधान-निर्माता और कानून के धुरन्धर जानकर की तरह रहे हैं।

सोचिए, उस समय एक सवर्ण चपरासी भी दलित अफसरों से घृणा करता था। इतने वर्षों बाद भी बहुत परिवर्तन नहीं हुए। दलित तालाबों में स्नान नहीं कर सकते थे। प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ और ‘सवा सेर गेहूँ’ अचानक स्मरण आती हैं। अम्बेडकरके अनथक प्रयासों के बावजूद जाति-व्यवस्था ख़त्म नहीं हुई। उनकी एक किताब को याद रखना आवश्यक है- ‘जाति का ज़हर’। दलित समाज को अब भी उच्च जातियाँ भी उन्हें दिल से सही स्थान हासिल नहीं दे पायीं। वे समाज की मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सके। दिखावे की बात अलग हो सकती है। मन अभी भी साफ-सुथरे नहीं हैं।

आज़ादी के इतने लम्बे अरसे बाद भी एक तरह सहज उत्साह हम उनके प्रति पैदा नहीं कर पाये हैं। उनका कहा अब भी सच है कि न्याय हमेशा समानता के विचार को पैदा करता है।संविधान को लेकर क्यों अभी तक हम अपना मनोविज्ञान साफ़ नहीं कर पाये ? दक्षिणपन्थी मनोविज्ञान से निर्मित सत्ता उनकी अगुवाई में बने संविधान पर लगातार खोट या भयानक कमी निकालती है और उसे हर हालत में बदल देने की उसकी मंशा है। क्या जनतन्त्र अभी भी प्रश्नों के झंझावात में नहीं है? डॉ. अम्बेडकर के शब्द याद आते हैं- “मैं उसी धर्म को मानता हूँ; जो हमें समानता, स्वतन्त्रता और आपस में भाईचारा रखना सिखाता है।” 

लोगों के मन में प्रश्न उठ रहे हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। ज्योतिबा फुले, अम्बेडकर से शुरू हुई शोषितों, वंचितों, दलितों, आदिवासी समाज और छोटे-छोटे समूहों की यह यात्रा अपना विस्तार कांशीराम एवं मायावती में पाती हुई दिखती है। वह एक समय में राजनीतिक सत्ता के केंद्र में भी आई, उसकी विश्वसनीयता भी बनी और एक विराट परिवर्तन-सा बार-बार दिखा। धीरे-धीरे इसकी बिजली कड़की ज़रूर; लेकिन दु:खद पक्ष यह रहा कि अपने समूहों में भी यह कायदे से भरपूर पैठ नहीं बना पाई। सच तो यह है कि इस जुझारू आन्दोलन ने अपना दलन, उत्पीड़न देखा और अन्याय की पीड़ा भी सही, अस्पृश्यता के दंश भी झेले। संक्षेप में दलित, वंचित उपेक्षितों ने अनेक आत्मकथाएँ भी लिखीं और यही इनका स्पष्ट प्रमाण हैं।

‘जूठन’, ‘मुर्दहिया’, ‘मणिकर्णिका’, ‘अपने-अपने पिंजरे’, ‘मेरा बचपन’, ‘दोहरा अभिशाप’, ‘सन्तप्त’, ‘तिरस्कृत’ जैसा साहित्य, जो अपमान मनुष्यताहीन होने की पीड़ा झेलता था, वह अचानक सामने नहीं आया। सदियों के सन्ताप उसमें प्रकट और घनीभूत हुए। सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा का यह अंश पढ़ें- “घर के नज़दीक ही एक गधी को बच्चा हुआ था। माँ मुझे उसका दूध निकालकर पिला देती थी। पर ऐसा हर रोज़ नहीं होता था। हमारे मुहल्ले में उसी समय कुछ महिलाओं ने भी बच्चों को जन्म दिया था। उनसे मेरा भूख से बिलखना देखा नहीं जाता था। वे अपने बच्चे के साथ-साथ मुझे भी दूध पिलाती थीं। इस प्रकार कई माताओं का दूध पीकर जीवित रह पाई।”(चेहरा अभिशप्त)  इसमें सामाजिक विभीषिकाओं के अनन्त रूप सहज ही दिख जाएँगे। अन्याय, अभिशाप और दलन-उत्पीड़न की घटनाओं का पूरा का पूरा पुंज है वहाँ।

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दुर्भाग्य यह है कि यह आन्दोलन समाज की मुख्य धारा नहीं बन सका।बद्रीनारायण की किताब ‘कांशीराम: बहुजनों के नायक’ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह सही है कि कांशीराम ने अम्बेडकर के विचारों को भिन्न दिशा दी है। यह कोणों और स्थापनाओं का संघर्ष है। कांशीराम ने जाति को दलित पहचान उभारने का आधार भी दिया और राजनीतिक सशक्तिकरण भी किया। दलित आन्दोलन को समाज का एक ताकतवर चेहरा भी बनाया। वह काफ़ी समय तक दलितों और पिछड़ों की महत्वपूर्ण आवाज़ थे। दलित आन्दोलन की अपनी ताक़त है लेकिन उसे अन्तर्विरोधों के कारण काफ़ी तोड़फोड़ दिया गया है। एक अन्धे हिन्दुत्व ने,लालच की फिसलपट्टियों ने उसे कमज़ोर कर दिया है। बद्रीनारायण की किताब में उसके तमाम सूत्र हैं; लेकिन इतना महत्त्वपूर्ण आन्दोलन राजनीतिक सीमाओं में बँधकर समझौते की भेंट चढ़ गया। इसका जिस तरह से सामाजिक-राजनीतिक विकास होना चाहिए था, वह संभव नहीं हो सका।

आवाज़ और पैठ तो कबीर की भी थी। भले ही इसे सामाजिक स्वीकृति मिलती दिखाई पड़ी थी; लेकिन अभिजन समाज और समूहों ने इसे किसी भी तरह समाज की मुख्यधारा में नहीं आने दिया। अन्तर्विरोध इस आन्दोलन में भी उभरते रहे।बार-बार सोशल इंजीनियरिंग के थपेड़े यह आन्दोलन झेल नहीं पाया और ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ।मुझे डॉ.. अम्बेडकर का एक कथन हथौड़े की तरह बजता सुनाई देता है- “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी अपना इतिहास नहीं बना सकती।” अम्बेडकर अपनी कक्षाओं में कई घंटे प्यासे रहते थे। बाद में इसके लिए उन्होंने आन्दोलन चलाया था। कक्षाओं में उन्हें बैठने की अनुमति नहीं थी। ‘मेरा एक सपना’ निबन्ध भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने ग़लत को ग़लत कहा और सच को सच। उन्होंने इसके परिणाम की कभी कल्पना नहीं की कि आगे क्या होगा।

दलित आन्दोलन का हमारे देश और समाज में व्यापक प्रभाव पड़ा है। विपुल साहित्य लिखा गया है। उसे क्रमशः पढ़ा भी जा रहा है। इससे कौन प्रभावित नहीं हुआ। अम्बेडकर का विचार दर्शन अनेकायामी है। उनका लेखन बहुत तीव्रता से प्रसारित किए जाने की ज़रूरत है। दलित आन्दोलन ने जो सन्दर्भ और कद पाया है उससे किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है। अम्बेडकर गौतम बुद्ध के सक्षम व्याख्याकार रहे हैं। उनका प्रभाव उनके निर्वाण के बाद भी जारी है। अन्तर्विरोध तो समय परिस्थितियों की कोख से उपजते हैं। हमारी गलत कार्रवाइयों से भी। उनको लिए बैठे रहें, यह ठीक नहीं। उनका निरन्तर परिष्‍कार भी होते रहना चाहिए। यही विकास का रूप है। किसी भी बड़े आन्दोलन को कठमुल्लापन बहुत बड़ी क्षति पहुँचाता है।

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यह सही है कि दलित आन्दोलन समाज की मुख्यधारा में नहीं आ पाया लेकिन वह अपनी सम्पूर्ण इयत्ता, शक्ति और सम्भावना के साथ उपस्थित हुआ। उसे चाहते हुए भी नकारा नहीं जा सका। एक बहुत बड़ी चीज़ यह है कि वह जीवन्त ताक़त बना, जिसका लोहा मुख्यधारा ने भी माना और महसूस किया और समय के अनुसार अपने आप को भी बदलने की कोशिश की। लेकिन यह कोशिश दिल से नहीं, दिखावे के रूप में ही रही। यह छोटी बात नहीं है और न कोई छोटी परिघटना। यह स्वाभाविक सच है। दलित आन्दोलन को असफलता के रूप में न देखकर समय के सुलगते सरोकार और घमासान के रूप में देखें। हमें यह अनुभव करना चाहिए कि सदियों के सन्ताप के बाद एक स्थिति तो बनी। दलितों के अन्यान्य रूप भी सशक्त हुए।

कभी-कभार सीधी-सादी बातें भी शब्दजाल लगने लगती हैं और जो शब्दों की लीला करते हैं, उन्हें हम मनभावन अन्दाज़ में अनुभव करते हैं। आदिवासियों का संघर्ष और उनके जीवन जीने का अन्दाज़ अलग होता है। मुझे लगता है कि डॉ. अम्बेडकर के दलित आन्दोलन से एक धारा बनती है जो आदिवासी और वंचित समूहों की समस्याओं तक जाती है। आज के दौर में आदिवासियों भर का शोषण, उत्पीड़न बहुत तेज़ नहीं है बल्कि सामान्य वर्ग तक भी पहुँच चुका है। इसकी आदिवासी साहित्य और संस्कृति तथा जीवन में बार-बार शिनाख्त हो रही है। डॉ. अम्बेडकर ने खुलकर अनेक मुद्दे उठाए और गुत्थियाँ सुलझाने का प्रयास भी किया। इसके लिए वे बुद्ध तक पहुँचते हैं और हमारी सामाजिक विषमता के अनेक भोगे गए रूपों को पहचानते हैं और उनपर बार-बार प्रश्न-प्रतिप्रश्न उठाते हैं। इस दौर में झूठ ने ईमानदारी और अन्य मूल्यों को लगभग विस्थापित कर दिया है। सबके तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जबकि जो हो रहा है वह परिदृश्य समूची समाज संरचना और भारतीय जीवन प्रणाली के बारे में किसी भी संवेदनशील आदमी को अन्दर तक हिला देता है।

सच को यदि विस्तार से कहा जाता है तो वह हमारी आत्मा की अस्मिता जगाता है। सामाजिक न्याय हमारे जीवन मूल्यों से, सांस्कृतिक धरोहर और अस्मिताओं से कतई अलग-थलग नहीं है। वह किसी भी सामाजिक संरचना की आधारभूमि होती है। हाँ, समय के साथ-साथ उसकी रेखाएँ और प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। गरीबी, अस्पृश्यता, अशिक्षा, दिशाहीनता, राजनैतिक अवसरवादिता आसमान से उतरकर धरती पर नहीं आए। उनका अस्तित्व हमारे सामाजिक यथार्थ के अन्दरूनी हालातों, स्वार्थपरता और नैतिकताओं के श्रीहीन होने से उपजा है। हमने ग़लत या मनुष्यविरोधी मनोविज्ञान के द्वारा काम करने वालों पर कम ध्यान दिया है। धीरे-धीरे सद्मूल्यों को अपाहिज होने दिया। इन्हीं वास्तविकताओं की कोख से यह दुर्घटना घटी है।

फिलहाल मनुष्यता के पतन की आँधियों में और राजनीतिक विद्रूपताओं की छाया तले सामाजिक-सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों को किनारे लगाया जाता रहा। झूठ के भयानक रूप उभरते रहे। सत्य की लगातार अवहेलना की जाती रही। और हम सब तमाशबीन बने रहे। दुनिया के दृश्यपट पर आए स्वतन्त्रता, समानता, भाईचारे को ही नहीं संवैधानिक व्यवस्था और जनतन्त्र के परखच्चे उड़ते रहे और हम गलतियों का सक्षम प्रतिकार नहीं कर सके। इससे काम नहीं चलेगा कि ‘अब पछताए होत क्या जबचिड़िया चुग गई खेत’। जो समाज अपना अन्तरावलोकन नहीं करता उसे हमेशा मुँह की खानी पड़ती है।

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डॉ. अम्बेडकर के विचार दर्शन, जीवन, आर्थिक सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए कई बातें कही जा सकती हैं। यही बातें हमारी आत्मा में संवाद की प्यास जागृत करती हैं। अम्बेडकर का जीवन संघर्ष ही उनका उच्च शिक्षा संस्थान माना जाना चाहिए। लोग ऊपर के आवरण से ही चीज़ें देखने के आदी होते जा रहे हैं। जिस यथार्थ को उन्होंने भोगा, जिसे उन्होंने कहा और लिखा- उसके ताप को समझने की जरूरत है। बस फूल मालाओं से, अलंकरण से, पदक देकर ही हम उनसे बरी हो जाना चाहते हैं।आज के दौर में अम्बेडकर किसी बड़े संबोधन और पद से भी बड़े हैं।

भारतीय जनजीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं है जिस पर उनकी निगाह न गई हो। उनका कहा, सुना, लिखा सब अनुभव के आधार पर निर्मित है। वे मनुष्य को पशु बनाए जाने के विरुद्ध थे। इसलिए वे कहते थे “जीवन लम्बा नहीं बल्कि बड़ा और महान होना चाहिए।” उन्होंने जीवन के विविध रूपों को अभिव्यक्त किया है। आपसे एक और बात साझा करने का मन हो आया- “विद्या एक तलवार है। एक शिक्षित मनुष्य में यदि नम्रता और सदाचार न हो तो वह एक जंगली और दरिन्दे से भी भयानक है। यदि एक पढ़े लिखे मनुष्य की शिक्षा गरीब जनता की भलाई के लिए रुकावट बने तो ऐसा शिक्षित व्यक्ति समाज के लिए कलंक है। धिक्कार है ऐसे पढ़े लिखे मनुष्य को।”

हमारे समाज में अन्तर्विरोधों का लम्बा इतिहास है। हमारी कथनी करनी में बहुत अन्तर है। अम्बेडकर के संघर्षों के साथ यात्रा करें तो बदलाव सम्भव है। अम्बेडकर ने बहुत खराब स्थितियों से संघर्ष करते हुए रास्ता बनाया और दिखाया था। मुझे लगता है यदि हमारे भीतर प्रेरणा, उत्साह और उल्लास हो तो विपरीत परिस्थितियों में भी कामयाब हो सकते हैं। उल्टी हवाओं के बावजूद हौसला ही हमें राह दिखाता है और डॉ. अम्बेडकर यकीनन वो हौसला हैं। स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व के बिना हम न तो मानवीय विकास की परिकल्पना कर सकते, न जनतान्त्रिक मूल्यों की सुरक्षा। इस सन्दर्भ में अम्बेडकर का बहुत सुचिन्तित विचार है- “एक कड़वी चीज़ को मीठा नहीं बनाया जा सकता। किसी भी चीज़ का स्वाद बदला जा सकता है लेकिन ज़हर को अमृत में नहीं बदला जा सकता है।”

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लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। सम्पर्क +919425185272, sevaramtripathi@gmail.com

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