शख्सियत

तो क्या कला विरोधी थे महात्मा गांधी

 

गांधी पर प्रशंसकों की जितनी पुष्प वर्षा होती है उतनी ही आलाचकों के कांटे चुभोए जाते हैं। गांधी की अगर इस बात के लिए तारीफ की जाती है कि वे उपनिवेशवाद से न सिर्फ राजनीतिक स्तर पर लड़े बल्कि उससे ज्ञान और चिंतन के स्तर पर लड़ने की भी एक दृष्टि पेश की। लेकिन उसी के साथ ऐसे लोग भी हैं जो गांधी की कलादृष्टि को एक खड़ूस आदमी की कला विरोधी दृष्टि बताने से भी नहीं झिझकते। ऐसा आरोप लगाने वालों की भी बड़ी संख्या है कि उन पर विक्टोरयाई नैतिकता का गहरा प्रभाव था और इसी के कारण वे एक बार भारतीय मूर्तिकला के सर्वेश्रेष्ठ और निर्मीक नमूने खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में उकेरी गई काम मुद्राओं को तुड़वाने की तैयारी कर बैठे थे। इन आरोपों को कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया गया है जैसे कि गांधी ने देश पर कोई तालिबानी शासन कायम कर रखा हो और मुल्ला उमर की तरह से बामियान बुद्ध की मूर्तियां तोड़ने का आदेश दे रखा हो।

इंटरनेट पर इस तरह की सामग्री भरी पड़ी है कि गांधी खजुराहो की काम क्रीडा की मूर्तियों से इतने नाराज थे कि उन्होंने उसे तोड़े जाने का आदेश दे दिया था। गांधी के आलोचकों ने आरोप को इसी तरह गढ़ा है जिस तरह से मुसलमानों ने खजुराहो के दर्जनों चंदेल मंदिरों को तोड़ा था। इन मंदिरों को तुड़वा कर गांधी पूरी दुनिया को यह दिखाना चाहते थे कि हम नैतिक और शुद्धतावादी लोग हैं। न कि हम अनैतिक और कामुक लोग हैं जैसा कि मदर इंडिया में कैथरीन मेओ दिखाती हैं। इस पोस्ट में यहां तक लिखा गया है कि महात्मा को ऐंद्रिकता से भरी उन मूर्तियों को लेकर ऐसी सनक सवार थी कि जब भारत आजाद हुआ तब भी वे उसे नष्ट करवाना चाहते थे। या अगर न भी नष्ट किया जाए तो उन्हें मिट्टी से ढक दिया जाए। यह तो कहो कि बीच में रवींद्रनाथ टैगोर आ गए और गांधी ने अपनी योजना छोड़ दी। अब इस झूठ को कौन नहीं पकड़ सकता कि टैगोर का निधन 1941 में यानी आजादी से छह साल पहले ही हो गया था।

इस तरह की टिप्पणी तो कथित राष्ट्रवादी लोग करते रहते हैं लेकिन जब ऐसी टिप्पणी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नमन आहूजा जैसे लोग करते हैं या दूसरे प्रतिष्ठित प्रोफेसर करते हैं तब बात और चौंकाने वाली हो जाती है। नमन आहूजा ने रवींद्रनाथ टैगोर और गांधी जी के सहयोगी व देश के मशहूर चित्रकार नंदलाल बसु के जीवनीकार पंचानन मंडल के हवाले से कहा है कि गांधी ने खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियों को सीमेंट की चादर से ढकने का आदेश दे दिया था और उनके सहयोगी जमनालाल बजाज ने सीमेंट और बजड़ी का ट्रक वर्धा की ओर रवाना कर दिया था। लेकिन नंदलाल बसु के समझाने पर मान गए।

गाँधी मार्ग

जबकि तथ्य गांधी की इस छवि के ठीक उलट हैं। गांधी पर गहन शोध करने वाले अरविंद मोहन अपनी पुस्तक गांधी और कला में लिखते हैं कि वास्तव में जब 1939 में त्रिपुरी में कांग्रेस अधिवेशन की चर्चा चल रही थी तो घनश्याम दास बिड़ला उस इलाके का दौरा करके आए। वे उस समय खजुराहो की मूर्तियां देखते हुए आए थे और उससे विचलित थे। उन्होंने गांधी जी को पत्र लिखा कि कांग्रेस अधिवेशन के लिए जो प्रतिनिधि आएंगे वे उन मूर्तियों को देखने जाएंगे और उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए आप आदेश दें तो उन मूर्तियों को सीमेंट की चादर से ढकवा दिया जाए। गांधी ने इस पर क्या कहा इसका कोई रिकार्ड तो नहीं है लेकिन इसका रिकार्ड जरूर है कि उन्होंने इस बारे में नंदलाल बसु से राय पूछी। नंदलाल बसु की बेहद परिपक्व सलाह थी। उन्होंने कहा, —

मूर्तियों का प्लास्टर से ढकना धर्म विरोधी कार्य होगा। जीवन में यौन भावना अंतिम मुक्ति अर्थात मोक्ष के सोपान में एक पग है। दूसरे पग हैं धर्म और अर्थ। शिशु का जन्म कभी अश्लील नहीं हो सकता। जो क्रिया जन्म की हेतु है वह सदाचार निरपेक्ष है। और इसे धर्म का समर्थन हासिल है। प्रत्येक व्यक्ति संतानोत्पत्ति के नैतिक पक्ष को जानता है लेकिन इस ज्ञान को नजरंदाज कर दिया जाता है। कला में ऐसा नहीं होना चाहिए। कला की सृजनात्मक अग्नि में यौन भावना पवित्र हो जाती है। इसे मंदिर की पवित्रता प्राप्त हो जाती है। नवजात शिशु की तरह यह नई सृष्टि का चमत्कार है। यह कला के क्षेत्र में जाकर अमरता प्राप्त कर लेता है। यह क्षेत्र न तो निकृष्ट का अपवर्जन करता है और न उत्कृष्ट का। जो भी है अथवा विद्यमान है वह इसका विषय हो सकता है।

इस विवाद में नंदलाल बसु के यह शब्द गांधी के लिए अंतिम थे। उसके बाद इस प्रसंग का कहीं जिक्र नहीं है। लेकिन गांधी के आलोचकों ने उनके जीवन के प्रसंगों में कुछ छिद्र ढूंढकर उन्हें मुल्ला उमर जैसा प्रस्तुत करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। गांधी खजुराहो कभी नहीं गए। जिस व्यक्ति ने जीवन भर कहीं अतिरेक पूर्ण हिंसक प्रतिक्रिया न की हो खासकर दूसरों के बारे में भला वह ऐसा आदेश कैसे दे सकता है। ऐसा आदेश देने का आरोप वही लोग लगा सकते हैं जो गांधी के प्रति हिंसक दृष्टि रखते हैं और कला के प्रति अहिंसक।

यह बात सही है कि गांधी कला के लिए कला के समर्थक नहीं थे। वे इस बारे में तालस्ताय के विचार से सहमत थे। वे सत्य और नैतिकता में यकीन करते थे और कला को इसी सिद्धांत पर कसते थे। उन्हें गरीबी ज्यादा परेशान करती थी। गुलामी और परेशान करती थी इसलिए उनका जोर इन स्थितियों को दूर करने पर था। इसीलिए वे टैगोर से भी तीखी बहसें कर चुके थे। इसीलिए उन्होंने बाइबल की तर्ज पर कहा था कि आज हमें जीवन की जरूरी चीजें प्रदान कर दो उसके बाद जीवन की सभी मर्यादाएं और श्रृंगार हो सकेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि गांधी ने नग्र मूर्तियों के दर्शन नहीं किए थे और उन पर टिप्पणियां नहीं की थीं। गांधी ने मैसूर में एक स्त्री की नग्न मूर्ति देखी थी जिसे कलाकार ने कुछ कपड़ों से ढकने की कोशिश की थी और वह स्त्री अपने कपड़ों से बिच्छू को झटक रही है। गांधी ने बिच्छू को काम का प्रतीक समझा और कहा कि आखिरकार उस स्त्री ने काम पर विजय पा ली।

वे जब 1931 में गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए यूरोप गए तो रोम के दौरे पर गए। वहां उन्होंने बैटिकन की कला बीथिका में एक घंटा बिताया। फिर एक मित्र को लिखा बहुत कम समय मिला मैं तो तीन घंटे बिताना चाहता था। वहां। उन्हें ईसा मसीह के सलीब पर चढ़ाए जाने वाले चित्र ने बहुत प्रभावित किया। वे उसे देखकर फूट फूटकर रोए भी। लेकिन अपनी कला विरोधी और यौनिकता विरोधी छवि का निर्माण गांधी ने स्वयं किया था। उन्होंने 1924 में एक बयान दिया था कि उनकी कला और सौंदर्य में कोई रुचि नहीं है। लोगों ने इसी बयान के आधार पर गांधी को कला विरोधी बना दिया और बाद के उनके वक्तव्यों और जीवन के प्रति विचार ही नहीं किया। गांधी एक गृहस्थ थे चार पुत्रों के पिता थे। इसलिए जीवन में काम के महत्त्व को समझते थे।

 

तमाम स्त्रियां थीं जिनके प्रति वे आशक्त भी दिखाई देते हैं। लेकिन वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध तीस कोटि जनता को जगा रहे थे। इसलिए चाहते थे कि लोगों की मनोभावना संघर्ष और त्याग की ओर प्रवृत्त हो न कि काम की ओर। पर हरिपुरा, फैजपुर और दूसरे स्थलों पर आयोजित कांग्रेस के अधिवेशनों के पंडाल को जिस तरह से सजाने के लिए नंदलाल बसु को प्रेरित किया और जिस प्रकार पूरे देश के दस्तकारों और हस्तशिल्प के लोगों की कलाकृतियों की प्रदर्शनियां आयोजित कराईं वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि उनके भीतर गहरी कला दृष्टि थी। ऐसी दृष्टि जिसका आर्थिक और नैतिक पक्ष भी था। संगीत, चित्रकला और भजनों के चयन के बारे में तो विलक्षण दृष्टि थी ही। वे मीरा बेन और रोम्यां रोला के प्रभाव में बीथोवन संगीत में भी रुचि रखते थे। लेकिन गांधी एक महायुद्ध में महारथी की तरह से थे। इसीलिए उन्होंने स्वयं कहा है कि मेरे भीतर कला के प्रति रुचि है लेकिन मेरे पास समय नहीं है। ऐसे में गांधी के किसी एक बयान से या जीवन की किसी एक घटना से उनका मूल्यांकन करना उनके साथ अन्याय होगा

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अरुण कुमार त्रिपाठी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भकार हैं। सम्पर्क +919818801766, tripathiarunk@gmail.com
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