शख्सियत

गाँधीवाद और हिन्दी आलोचना

 

`      पिछली सदी के भारत के महानतम व्यक्ति के रूप में महात्मा गाँधी को याद किया जाता है। यद्यपि हमारे देश की आजादी की लड़ाई में असंख्य लोगों ने अपनी कुर्बानियाँ दीं, जिनमें से बहुत से लोग गाँधी की विचारधारा से सहमत भी नहीं थे फिर भी आजादी के आन्दोलन का नेतृत्व निर्विवाद रूप से गाँधी ने ही किया। आन्दोलन की बागडोर उन्हीं के हाथ में थी। गाँधी का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि उन्होंने आजादी के आन्दोलन का नेतृत्व किया था, बल्कि दुनिया में उनका महत्व इसलिए है कि इस इतने बड़े देश की आजादी के आन्दोलन में कम से कम रक्त बहे, कम से कम हत्याएं हुईं। गाँधी से ही प्रेरणा लेकर दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला जैसे नेता ने आजादी की लड़ाई का सफल नेतृत्व किया और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी गाँधी को ही अपना आदर्श मानते हैं। गाँधी के बारे में प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाले लोग मुश्किल से इस बात में विश्वास कर पाएंगे कि इस धरती पर हाड़ -मांस का एक ऐसा भी व्यक्ति रहता था।

       गाँधी ने इस देश के हर संवेदनशील व्यक्ति को प्रभावित किया था। उन्हें ‘महात्मा’ कहा गया और आजादी के बाद ‘राष्ट्रपिता’। गाँधी का जीवनदर्शन इस देश की पूरी एक पीढ़ी का संस्कार बन गया। ऐसी दशा में जाहिर है साहित्य पर भी गाँधी के व्यापक प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता।

      महात्मा गांधी की विचार पद्धति का व्यापक नाम गाँधीवाद है। समाज और शासन के संगठन तथा जीवन के अन्य अनेक पक्षों के बारे में गाँधी जी के अपने विचार थे जिनका प्रतिपादन उन्होंने अपनी दैनिक साधना के मध्य से गुजरते हुए किया था। मार्क्सवाद के समान कोई व्यवस्थित शास्त्रीय अध्ययन गाँधीवाद के पीछे नहीं है, इसी कारण उसमें किसी प्रकार की तर्कजन्य पद्धति का अभाव है। उसका आधार तर्क नहीं, स्वानुभूति है। इस विचारधारा का प्रत्येक खंड आत्मशक्ति को लेकर चलता है। इसी कारण उसमें एक प्रकार की आध्यात्मिकता और विचार-स्वातंत्र्य है। गाँधीवाद में लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सत्य, अहिंसा और सेवा इन विशिष्ट साधनों का उपयोग आवश्यक माना गया है। गाँधीवाद की सबसे बड़ी देन उसकी यह विचारधारा है कि हमको साध्य के साथ-साथ साधन की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए।

       सर्वोदय गाँधी का सामाजिक आदर्श है। सर्वोदय का अर्थ है सबकी उन्नति और उसका ध्येय है, ह्रदय- परिर्वतन। हृदय- परिर्वतन अन्यायी, शोषक और अत्याचारी का। गाँधीवाद के मूल स्तंभ दो हैं, सत्य और अहिंसा। सत्य का ही दूसरा नाम उन्होंने परमेश्वर माना है तथा समस्त सृष्टि में एक ही तत्व की व्याप्ति स्वीकार कर ईश्वर और मनुष्य तथा मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों की एकता स्वीकार की है। इस अंतर्भूत एकत्व के कारण ही उन्होंने माना है कि जो घटना एक शरीरधारी पर घटती है उसका प्रभाव समग्र जड़ पदार्थ पर और उसकी आत्मा पर पड़ता है। इस प्रकार सत्य के साक्षात्कार से समबुद्धि प्राप्त होती है और समबुद्धि से सबके प्रति अहिंसा का भाव उत्पन्न हो जाता है। इसीलिए उन्होंने अहिंसा को सत्य का दूसरा पहलू कहा है। अहिंसा में केवल द्वेष का अभाव ही नहीं, प्रेम की संप्राप्ति भी है। यह प्रेम स्वार्थ, मोह, आसक्ति आदि से भिन्न होता है। इस अहिंसा में वैर-त्याग, चराचर-प्रेम और पूर्ण निष्काम भाव का समन्वय है। इस समन्वय का पहला तत्व जैन व बौद्ध अहिंसा का है, दूसरा वैष्णव भावना का प्रसाद है और तीसरा तो स्पष्टत: गीता का प्रभाव है। ऐसी अहिंसा की प्राप्ति के लिए गाँधी ने आत्मशुद्धि को आवश्यक माना है और आत्मशुद्धि के लिए अन्य संतों की भाँति अहं के त्याग को अनिवार्य माना है। अहंकार का त्याग, तप और भगवद्भक्ति से ही संभव है। तप के लिए राग-भोग का त्याग और आत्म-पीड़न करना होता है तथा उसके लिए शक्ति, भगवान पर अटल विश्वास होने से प्राप्त होती है। यह तप या आत्मशुद्धि केवल उस व्यक्ति का ही कल्याण नहीं करती, आत्मा की अखंडता के कारण सारे समाज को उन्नत बनाती है।

       इस तरह गाँधी के जीवन-दर्शन में त्याग और तप का प्राधान्य है तथा भोग और आनंद का तिरस्कार। कला में भी उन्होंने शिव और सत्य पर ही बल दिया, सुंदर को उन्होंने इन दोनों से या तो अभिन्न माना या अस्वीकार किया। गाँधीवादी विचारधारा में कलाओं के साथ नैतिक संबंध अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इस संबंध में उनके ऊपर रस्किन एवं टाल्सटॉय के विचारों की स्पष्ट छाप है। इसी कारण ‘कला कला के लिए’ जैसे सिद्धांतों के प्रति गाँधी-दर्शन में कोई सहानुभूति नहीं मिलती। कला कुछ लोगों के आधिपत्य में ही न रहे, उसकी पहुँच सार्वभौम हो, तभी वह प्रकृति के सन्निकट पहुँच सकेगी, यह गाँधी जी का आग्रह था। गाँधी जी के अनुसार कलाकार जनता के प्रति अपने कर्तव्यों के विषय में सदैव जागरूक रहें, तभी कला अपनी सार्थकता प्रमाणित कर सकती है। कला की श्रेष्ठता की कसौटी गाँधी ने उसकी उपयोगिता को स्वीकार किया है। कला का संबंध नीति, हित और उपयोगिता से है, केवल सौंदर्य से नहीं। गाँधी के अनुसार संगीत इसलिए श्रेष्ठ है कि वह प्रार्थना और नैतिक उन्नति में सहायक है। उनका विश्वास है कि चित्र, गायन आदि बाह्य आकारों की अपेक्षा शुद्ध आचरण में अभिव्यक्त मनुष्य की नैतिक पवित्रता कला का उच्चतर प्रकाशन है।

गाँधी जी भी समानता के पक्षधर हैं, परंतु उनकी समानता रामराज्य की समानता है और यह रामराज्य तुलसी का रामराज्य है। भक्ति आन्दोलन से उनका गहरा लगाव था और उनमें तुलसी उनके सर्वाधिक प्रिय कवि हैं। तुलसी के अलावा नरसी मेहता, अखा भगत, मीराबाई, कबीर आदि भी उनके प्रिय कवियों में से हैं। समकालीन साहित्यकारों में रूसी उपन्यासकार टॉलस्टाय से उनका गहरा परिचय था। फ्रांस के रोम्यां रोला से भी उनका आत्मीय लगाव था। कुछ मुद्दों पर मतभेद के बावजूद रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी उनका घनिष्ठ संबंध था। वे ऐसी कला के पक्षधर थे जो मनुष्य को ऊंचा उठाए। उनकी दृष्टि में साहित्य जनता के नैतिक, आध्यात्मिक उत्थान के लिखा जाना चाहिए। वे जनसाधारण की समस्याओं की तरफ ध्यान देना भी साहित्यकारों का महत्वपूर्ण कार्य मानते थे। मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है कि गाँधी की राजनीति में सत्याग्रह, रामराज्य और चरखा का क्या महत्व है यह सब जानते हैं लेकिन इन तीनों का भक्तिकाल से क्या संबंध है यह बहुत लोग नहीं जानते। गाँधीजी को सत्याग्रह की प्रेरणा मीराबाई से मिली और रामराज्य की कल्पना तुलसीदास से। उनका चरखा कबीर का है और ‘पराई पीर’ अनुभव करने वाली संवेदनशीलता नरसी मेहता की।

मार्क्स के साम्यवाद के प्रति गाँधी जी का दृष्टिकोण सकारात्मक था किन्तु इसका कारण था वर्गहीन समाज का आदर्श। वे मानते हैं कि यह बेशक एक उत्तम आदर्श है और उसके लिए अवश्य कोशिश होनी चाहिए लेकिन जब इस आदर्श को हासिल करने के लिए हिंसा का प्रयोग हो तब गाँधी का रास्ता उससे अलग हो जाता है। हम सब जन्म से ही समान हैं। असमानता या ऊँच-नीच की भावना एक बुराई है। परंतु गाँधी इस बुराई को मनुष्य और मनुष्य के बीच तलवार के बल पर भगाने में विश्वास नहीं करते।

       गाँधी जी के अनुसार सच्चा प्रजातंत्र कभी भी हिंसा और दंड-विधान के बल पर कायम नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के पूर्ण और स्वतंत्र विकास के लिए जनतांत्रिक समाज को परस्पर सहयोग और सद्भाव, प्रेम और विश्वास पर आधारित रहना चाहिए। मानवता का विकास इन्हीं के सिद्धांतों के आधार पर आज तक हुआ है और आगे भी होगा। प्रजातंत्र हिंसा के आधार पर टिक नहीं सकता, इसलिए इस पर किसी प्रकार का बाहरी दबाव हरगिज नहीं हो, यह तो स्वयं स्फूर्त होना चाहिए।

अच्छा गाँधी मार्गी अच्छा हिंदू भी है और अच्छा मुसलमान भी। ईसाई धर्म प्रचारकों को लक्ष्य करके एक बार गाँधी जी ने कहा था, ”तुम हमें नया धर्म सिखाने को इतने आतुर क्यों हो? हमें अच्छा हिंदू बनाओ अच्छे नर-नारी बनाओ, यही यथेष्ट है। नाम के परिवर्तन से हृदय तो परिवर्तित नहीं होगा।” रामविलास शर्मा के अनुसार, “उनका (गाँधी) धर्म वास्तव में उपनिषदों का धर्म है जो वर्तमान धर्म से भिन्न है। वह कर्मकाण्ड से मुक्त है। गाँधीजी जवानी में नास्तिक थे। उनका नास्तिकपन कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। वह वेदान्त की भूमि से धर्म और दर्शन की समस्याएँ हल करते थे। वेदान्ती किसी व्यक्ति-ईश्वर में विश्वास नहीं करता। इसी तरह गाँधीजी दशरथ-पुत्र राम में भी विश्वास न करते थे। राम उनके लिए एक व्यापक अर्थ देने वाला शब्द था। गाँधीजी के समय में तुलसीदास पर बहुत लोग आक्षेप करने लगे थे। उन आक्षेपों का उत्तर भी गाँधीजी ने दिया। उनकी बड़ी देन यह है कि उन्होंने राष्ट्र की धारणा को एक नई अंतर्वस्तु दी। यह अंतर्वस्तु जातीयता थी।” (गांधी, अंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं, भूमिका, पृष्ठ–x)

गाँधी के व्यक्तित्व का हिन्दी साहित्य पर गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ा। कवियों ने उन्हें ‘दिव्यात्मा’ और ‘युगावतार’ तक कहा है। उनके व्यक्तित्व पर असंख्य कविताएँ तो लिखी ही गईं, कई महाकाव्य तक लिखे गए। गोपालशरण सिंह ने बीस सर्गों का ‘जगदालोक’ नामक महाकाव्य लिखा। ठाकुरप्रसाद सिंह ने ‘मृत्युंजय’ तथा नटवरलाल स्नेही ने ‘गाँधीचरितमानस’ लिखा। भवानीप्रसाद मिश्र ने ‘गाँधी पंचशती’ और सोहनलाल द्विवेदी ने ‘गाँधी शतदल’ लिखा। सियारामशरण गुप्त ने ‘बापू’ लिखा जिसमें उन्हें ‘कालातीत’, ‘आत्मालोक’, ‘कालजयी’ आदि कहकर संबोधित किया। सुमित्रानंदन पंत ने अपने ‘लोकायतन’ में उन्हें इष्टदेव के रूप में देखा और लिखा कि “देखा न चरित्र धरा ने तुमसा समग्र संयोजित”। सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा, “तुम बोल उठे, युग बोल उठा। तुम मौन बने युग मौन बना।” सुकवि ज्योतिषी ने लिखा, “कौन तुम युग देवता साकार”। मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ और ‘साकेत’ में गांधीवादी विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी और बच्चन जैसे कवियों के साहित्य में भी गाँधी के व्यक्तित्व और उनके दर्शन का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।

प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में सत्याग्रह, ह्रदय-परिवर्तन, स्वाधीनता-संगाम में सत्य-अहिंसा के शस्त्रों का प्रयोग, आश्रमों की स्थापना द्वारा सुधार आदि गाँधीवाद के अनेक पक्ष अभिव्यक्त हुए है। ’प्रेमाश्रम’, ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’ जैसे उपन्यासों तथा ‘नमक का दारोगा’, ’समरयात्रा’ एवं अन्य कहानियों में गाँधीवाद का व्यवहारपक्ष व्यापक रूप से उभरकर आया है। विश्वंभरनाथ शर्मा “कौशिक’, सुदर्शन, भगवतीचरण वर्मा एवं जैनेंद्र आदि ऐसे कथाकार हैं जिनके साहित्य में गाँधी-दर्शन की अनेकश: और विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति हुई है।

एक बात और, जिस दौर की कविता के एक पक्ष को छायावाद के नाम से, कविता की मुख्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, उसी दौर में कविता की मुख्य और स्वाभाविक धारा राष्ट्रीय चेतना की कविता की रही जिसे मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामेश्वर शुक्ल अंचल, नरेन्द्र शर्मा, भगवतीचरण वर्मा, सियारामशरण गुप्त, रांगेय राघव, जानकीवल्लभ शास्त्री जैसे कवियों ने समृद्ध किया। किन्तु हिन्दी के आलोचकों ने उसे हिन्दी कविता के विकास की ऐतिहासिक परंपरा में स्थान नहीं दिया और छायावाद के बाद प्रगतिवाद और फिर प्रयोगवाद तथा नयी कविता के रूप में रेखांकित किया। इस दौर के राष्ट्रीय चेतना धारा के कवियों पर गाँधी का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ और ‘साकेत’ में गाँधीवादी विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बच्चन एवं सुमित्रानंदन पंत जैसे कवियों ने भी गाँधीवाद को वाणी दी है। सियारामशरण गुप्त और जैनेद्र पर गाँधीवाद का सर्वाधिक प्रभाव है।

 जब साहित्य की अन्य विधाओं पर गाँधीजी का गहरा प्रभाव दिखाई देता है तो भला आलोचना उसके प्रभाव से वंचित कैसे रह सकती है? हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हिन्दी में मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी आदि विविध दर्शनों से परिचालित आलोचना पद्धतियों की चर्चा तो विस्तार से की गई है किन्तु गाँधीवादी आलोचना पद्धति का उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि इस दौर के अधिकांश आलोचकों पर गाँधी का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।

डॉ। मैनेजर पाण्डेय के अनुसार, “ गाँधी जी ने लेखकों को लोक जीवन से जुड़ने, समाज के दबे- कुचले लोगों के बारे में सोचने, उपनिवेशवाद की दिमागी गुलामी से मुक्त होने, अपनी परंपरा की शक्ति को पहचानने, भारतीय समाज के रूढिवाद को जानने और जीवन के सभी प्रसंगों में साहसी आलोचनात्मक चेतना विकसित करने का जो आह्वान किया था, उसका व्यापक प्रभाव हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पर है। “ ( गाँधी विचार और साहित्य, सुमन जैन, पृष्ठ-459)

महात्मा गाँधी के निधन के बाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा, “ वह जिधर मुड़ा जीवन लहरा उठा, वह जिधर झुका, प्रेम बरस पड़ा, वह जिधर चला, जमाना ढरक पड़ा। वह शक्ति का भंडार था, क्योंकि वह सच्चे अर्थ में भक्त था।”( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ-403)

आचार्य द्विवेदी ने सच्चे मन से महात्मा गाँधी के चरित्र का अनुसरण करना चाहा था, किन्तु वह संभव नहीं हो सका। उन्होंने स्वीकार किया है, “ मैने महात्मा जी के अनेक गुणों को अपने भीतर ले जाने का संकल्प कई बार किया है। संकल्पों की सच्चाई में मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं है।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 408) उन्होंने लिखा है, “महात्मा गाँधी के सिवा और कोई दूसरा नेता नहीं है जिसने देश में आत्म-गरिमा का संचार किया हो।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 271) महात्मा गाँधी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने कहा है, “ महात्मा जी ने केवल वाणी से नहीं, अपने संपूर्ण जीवन से यह दिखा दिया है कि मनुष्य के छोटे स्वार्थों का द्वंद्व बड़े सत्य का विरोधी नही है। इन छोटे स्वार्थों को व्याप्त करके अपना अंग बनाकर ही हृदयस्थित महा सत्य विराज रहा है। इनके भीतर से वह सेतु तैयार किया जा सकता है जो मनुष्य को मनुष्य से विच्छिन्न होने से बचाए।” ( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ- 412)

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने पूरे विश्वास के साथ घोषित किया था कि मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। जनपक्षधरता द्विवेदी जी के समस्त सृजन के मूल में है। उन्होंने लिखा है, “ मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य की दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।” ( ग्रंथावली, खंड-10, पृष्ठ-24) मानवतावाद संबंधी अपनी अवधारणा को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, “ मानवतावाद ठीक है, पर मुक्ति किसकी? क्या व्यक्ति–मानव की? सामाजिक मानवतावाद ही उत्तम समाधान है। मनुष्य को, व्यक्ति मनुष्य को नहीं, बल्कि समष्टि–मनुष्य को, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शोषण से मुक्त करना होगा– नान्य: पन्था विद्यते अयनाय।” ( ग्रंथावली, खंड-10, पृष्ठ-8) क्या गाँधीवाद का लक्ष्य इससे कुछ अलग है?

       सन् 1931 में ‘भारत’ का संपादन करते हुए आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी ने निराला, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मूल्यांकन किया था। इसी वर्ष भगतसिंह की शहादत हुई थी। तबसे 1967 ई. तक वे निरंतर आलोचना-कर्म में रत रहे। इसी बीच देश में आजादी की लड़ाई लड़ी गई जिसमें महात्मा गाँधी की नेतृत्वकारी भूमिका रही, द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ, देश भर में साम्प्रदायिक दंगे हुए, देश को आजादी मिली, हमारा अपना संविधान लागू हुआ। इस बीच हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थकों, सशस्त्र क्रान्ति में विश्वास करने वाले हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएसन के युवा नेताओं तथा वामपंथियों द्वारा गाँधी के नेतृत्व का निरंतर विरोध होता रहा किन्तु गाँधी जी अपने पथ से कभी भी विचलित नहीं हुए। वाजपेयी जी के चिन्तन पर गाँधी जी के इस विराट व्यक्तित्व और विचारधारा का गहरा प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

       डॉ नगेन्द्र ने तो अपने स्फुट निबंधों में प्राय: उन्हीं कवियों की समीक्षा की है जो गाँधीवाद से प्रभावित हैं। सुमित्रानंदन पंत, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंशराय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल अंचल, गिरिजाकुमार माथुर आदि की समीक्षाएं इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। इसी तरह साकेत के सांस्कृतिक आधार का विवेचन करते हुए उन्होंने ‘धार्मिक’, ‘सामाजिक–राजनीतिक आदर्श’, ‘भौतिक जीवन’ के साथ ही ‘गाँधीवाद का प्रभाव’ की चर्चा की है और निष्कर्ष के रूप में कहा है, “ अपनी संस्कृति का प्रभाव तो सभी कवियों पर थोड़ा–बहुत पड़ता है। परन्तु जिन मनस्वियों की कविता लोक–मंगल से प्रेरित होकर अपने देश और जाति की संस्कृति की प्रतिष्ठा एवं संरक्षा करती है वे अनेक नहीं होते। हमारे तुलसी, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त ऐसे ही कवि हैं “ ( साकेत एक अध्ययन, पृष्ठ- 90)

      इसी तरह रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अपने अन्तिम दिनों में ‘माध्यम’ ( अक्टूबर-दिसंबर,2003 ) के अंक में ‘हिन्द स्वराज’ और ‘कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो’ : 21वी शती में पर्यालोचन’ शीर्षक से एक विस्तृत तुलनात्मक लेख लिखा था। इस लेख को समाप्त करते हुए उन्होंने लिखा है, “ यंत्र ने जन- जन को जीवन यापन की जितनी सुविधाएं सुलभ करायी हैं, उससे कुछ अधिक ही उनके हाथ में मारक–क्षमता भी दे दी है, जिसका चरम बिन्दु 11 सितंबर 2001 को न्यूयार्क–वाशिंगटन में आतंकवादी आक्रमण के समय, यंत्र के ही सौजन्य से–सीधे टेलीविजन प्रसारण में समूचे संसार ने दया और भय–यूनानी ट्रेजेडी के कारक द्वय– की मुद्रा में स्तब्ध होकर देखा। दया उन निर्दोष व्यक्तियों के लिए जो उन सौमंजिला इमारतों में बंद मौत की घड़ियाँ असहाय होकर गिन रहे थे, और भय अपने लिए कि कहीं ऐसी परिस्थिति में हमें न फँसना पड़े। यहीं यंत्र के परावर्तन और ‘हिन्द स्वराज’ की चरितार्थता की संभावना निहित है।” ( ‘माध्यम’, अक्टूबर-दिसंबर, 2003)

      शान्तिप्रिय द्विवेदी, विजयदेवनारायण साही, नलिनविलोचन शर्मा, देवराज, प्रभाकर माचवे, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कृष्णदत्त पालीवाल, श्रीभगवान सिंह आदि आलोचकों की आलोचना-दृष्टि पर गाँधी का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। आलोचकों की इसी परंपरा में रघुवंश, विजयबहादुर सिंह, शंभुनाथ, गोपेश्वर सिंह जैसे आलोचकों को भी रखा जा सकता है यद्यपि इनपर गाँधी की तुलना में डॉ। राम मनोहर लोहिया का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। मैंने इन्हें भी गाँधीवादी आलोचकों की श्रेणी में ही शामिल किया है। इसका कारण यह है कि लोहिया का दर्शन गाँधी के दर्शन से नाभिनाल बद्ध है। दोनो का आदर्श राम- राज्य एक ही है जिसे तुलसी ने मानस में सृजित किया है। एक ऐसा राज्य जिसमें अमीर और गरीब के बीच कम से कम अन्तर हो, जहाँ ऊँच- नीच के भेद न हों, जहाँ गाँव और शहर के बीच दूरी कम हो, जहाँ बेतहाशा मशीनीकरण नहीं, ग्रामीण उद्योगों का विकास हो, शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं, मातृभाषाएं हों। हाँ, गाँधी की जीवन शैली कठिन थी, गाँधी ब्रह्मचर्य में विश्वास करते थे। आचरण की पवित्रता के पक्के समर्थक थे। इसीलिए गाँधी को ‘महात्मा’ कहा जाता था। गाँधी की इस जीवन शैली को अपने जीवन में उतार पाना लोहियावादियों के लिए कठिन था। धर्म में, प्रार्थना में गाँधी की गहरी आस्था थी जबकि लोहियावादियों में इस तरह की आस्था के प्रति उदासीनता दिखाई देती है। इन भेदों के अलावा गाँधी और लोहिया के दर्शन में पर्याप्त समानता है। यदि गाँधी न होते तो लोहिया भी न होते। लोहिया ने स्वयं अपने को ‘कुजात गाँधीवादी’ कहा है। इसीलिए मुझे लोहियावादियों को भी गाँधीवादी आलोचकों की श्रेणी में ही रखना उचित प्रतीत होता है

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अमरनाथ

लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com
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