द कश्मीर फाइल्स
सिनेमा

किताबों में बेहतर पढ़ी समझी जा सकती है ‘द कश्मीर फाइल्स’

 

फिल्म के शुरुआती 20 मिनट ही कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों की याद दिला देते हैं। फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों पर हुए वह ज़ुल्म दिखते हैं जिन्हें देखने की हिम्मत अक्सर कमज़ोर दिल वाले नही करते, जैसे एक दृश्य में कुछ शव पेड़ों पर लटके दिखाए गए हैं। इंटरवल के बाद बंद कमरे की बहस बनावटी लगती है और फ़िल्म का अंतिम दृश्य ही वह वज़ह है जिससे दर्शकों की पिक्चर हॉल से बाहर निकलने पर रोने वाली खबरें सामने आ रही हैं।

द कश्मीर फाइल्स यह दिखाने में सफल हुई है कि जब भी समाज ऐसे काले अध्यायों से गुजरता है तब महिलाओं को ही सबसे ज्यादा सहना पड़ता है, उन पर अत्याचार बढ़ जाते हैं। उक्रेन में विस्थापित हो रही महिलाओं का ताजा उदाहरण हमारे सामने है, जिसमें गर्भवती महिलाओं के सामने खुद को ज़िंदा रखने का सवाल तो है ही साथ में अन्य महिलाओं पर भी वेश्यावृत्ति में धकेले जाने का खतरा बढ़ गया है।

फ़िल्म में एक संवाद है ‘झूठी खबर दिखाना उतना बड़ा गुनाह नहीं है जितनी सच्ची खबर छुपाना है’। जिन फैक्ट्स को लेकर यह फ़िल्म बनाई गई है, उन पर आंख मूंद कर विश्वास करना ठीक नही है क्योंकि सिनेमा इतिहास से छेड़छाड़ कर उन लोगों को बहकाने का आसान ज़रिया है जो कभी इतिहास समझने के लिए सही तथ्य वाली किताबों के पन्ने पलटना गंवारा नही समझते।

इतिहास के सही तथ्य लिखने वाले लेखक को कैसे पहचानें यह अपने आप में अलग मुद्दा है क्योंकि इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना सबसे आसान काम है। रिफ्रेंस देकर लिखने वाले लेखकों पर अधिक भरोसा किया जा सकता है।

अनुपम खेर ने अपने बेटे और घर को खोए इंसान का किरदार निभाते अवार्ड विनिंग अभिनय किया है, शायद यह उनका अब तक का बेस्ट है। अनुपम खेर का अस्पताल में दर्शन कुमार से ये कहना कि कश्मीर वाले घर की खिड़की सही कराना , कश्मीरी पंडितों ने जो खोया उसकी याद दिलाता है।

मिथुन चक्रवर्ती निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के पसंदीदा अभिनेताओं में से एक हैं, फ़िल्म में उनका अभिनय ठीक है लेकिन वह अपना सर्वश्रेष्ठ नही देते। पहले हाफ में उनकी आंखें ही बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन दूसरे हाफ में उनका अभिनय उस स्तर का नही लगता। भाषा सुम्बली ने अपने अभिनय से प्रभावित किया है अपने पति के मरने पर उनके द्वारा किया गया विलाप फिल्म के बेहतरीन दृश्य में से एक है। मराठी सिनेमा में अपनी खास पहचान रखने वाले चिन्मय मंडलेकर ने इस फ़िल्म के ज़रिए बॉलीवुड में अपना डंका पिटवा दिया है।

अपने पति विवेक अग्निहोत्री की अधिकतर फिल्मों में शामिल रहने वाली पल्लवी जोशी एक दमदार भाषण के साथ शुरुआत करती है। एक प्रोफेसर के रूप में उनका मेकअप ज्यादा प्रभावित करता है, ऐसा ही कुछ अनुपम खेर के साथ भी किया गया है। नीले रंग से पुता हुआ उनका चेहरा फ़िल्म का पोस्टर सीन बन चुका है। इससे साबित होता है कि बॉलीवुड में अभी भी मेकअप की महत्वता समाप्त नहीं हुई है।

फ़िल्म में घटनाक्रमों की क्रोनोलॉजी आगे पीछे है लेकिन पटकथा लिखते उन्हें इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि दर्शक भ्रमित ना हों। फिल्म में मीडिया जगत पर बड़ी गहराई से चर्चा हुई है और कश्मीर की कवरेज पर भी सवाल उठाया गया है। जिसमें विदेशी मीडिया की कवरेज को गलत साबित करने की कोशिश की गई है, अब सवाल यह बनता है कि क्या दर्शक किसी एक फिल्म के द्वारा दिए गए संदेश के जरिए ही कश्मीर पर अपनी सोच बनाएंगे।

कश्मीर में 19 पत्रकारों के मारे जाने की बात भी कही गई है जो कश्मीर में पत्रकारिता के वास्तविक हालात बयां करने के लिए काफी है। ‘पॉलिटिक्स समझ में आती है कश्मीर क्यों नहीं, क्या फर्क है दोनों में’  संवाद के जरिए कश्मीर की सच्चाई बयां करने की कोशिश की गई है। ‘अपने ही देश में पिछले तीस साल से रिफ्यूजी बने घूम रहे हैं’ संवाद के जरिए कश्मीरी पंडितों के दर्द को बड़े पर्दे के जरिए पूरे देश के सामने रख दिया गया है।

फिल्म में साउंड का बहुत महत्व है हथियारों की आवाज दिल को दहलाती है तो बुलेट बाइक की आवाज भी एक धक सी पैदा कर देती है। बैकग्राउंड स्कोर यादों में डूबा और दर्द भरा अहसास देता है।फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कविता ‘हम देखेंगे’ को बड़े पर्दे पर सुनना अलग ही अनुभव है। कश्मीरी संगीत भी दिल पर असर करता है। छायांकन की बात की जाए तो फिल्म में डल झील की खूबसूरती देखते ही बनती है और एंगल ऐसी जगह से लिए गए हैं जो आपसी संवाद के दौरान प्रभावित करते हैं। फ़िल्म के वीएफएक्स दृश्य इतने प्रभावी नहीं लगे हैं जैसे एक जगह कश्मीर के घर जलते हुए दिखाए गए हैं तो वह पूरी तरह से बनावटी दृश्य लगता है।

निर्देशक ने फ़िल्म के सम्पादन की तरफ भी विशेष ध्यान दिया है, एयरफोर्स के जवानों पर हमले के बाद वहां दिखाए बिखरे हुए गुलाब वाला दृश्य इसका उदाहरण है। निर्देशक ने फिल्म में बैनर के जरिए भी संदेश देने की कोशिश करी है जैसे बैकग्राउंड में मार्क्स और भगत सिंह का पोस्टर दिखा उस विचारधारा की तरफ इशारा किया गया है जो कश्मीरियों को उनके मूल अधिकारों पाने की स्वतंत्रता देना चाहती है। निर्देशक का यह दिखाना कि उस स्वतंत्रता की मांग करने वाले सिर्फ हथियारों के भरोसे हैं और वह सिर्फ कश्मीरी हैं यह असंगत है।

फ़िल्म से हमें यह पता नही चलता कि कश्मीरियों की स्वतंत्रता पर जो बंदिश लगाई गई हैं उसका जिम्मेदार कौन है और दिल्ली से लेकर कश्मीर तक पूरा तंत्र कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा करने में क्यों असफ़ल रहा ये सवाल भी अधूरा ही रह जाता है। धारा 370 के ज़रिए सीधे तौर पर एक पॉलिटिकल पार्टी का सपोर्ट किया गया है।

कश्मीर में ‘इंडियन डॉग्स’ बैनर दिखाकर और कुछ पोस्टर जलाकर दर्शकों पर सीधे प्रभाव डालने की कोशिश की गई है। एक कमरे में कुछ लोगों द्वारा कश्मीर को लेकर की गई बहस के जरिए निर्देशक ने दर्शकों को भी फिल्म के विषय में शामिल कर लिया है, यह विवेक की निर्देशन कला का बेहतरीन नमूना है। साल 2014 के बाद से बॉलीवुड में राष्ट्रवादी फिल्मों का एक दौर आया है 2019 में आई ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ भी इसी का एक हिस्सा थी। प्रधानमंत्री मोदी ने साल 2019 में इसके संवाद ‘हाउज़ द जोश’ का जमकर प्रयोग किया था और गुजरात के अहमदाबाद में भी अपनी एक सभा के दौरान उन्होंने बोला था कि ‘हम घर में घुसकर मारेंगे’।

अगर निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की कुछ पुरानी फिल्मों की ओर ध्यान दें तो है पता चलता है कि वह एजेंडों को लेकर बनाई गई फिल्मों के लिए मशहूर हैं, जैसे साल 2016 में आई उनकी फिल्म ‘बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम’ और ‘द ताशकंद फाइल्स’ इसका उदाहरण हैं। यह फ़िल्म भी बॉलीवुड की राष्ट्रवादी फिल्मों का ही एक हिस्सा जान पड़ रही है, राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता को जन्म देता है।

यहां पर मुंशी प्रेमचंद की एक पंक्ति का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है, उन्होंने कहा था कि सांप्रदायिकता को सीधे सामने आने में लाज लगती है इसलिए वह राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर आती है। अनुपम खेर, दर्शन कुमार के कभी न भुलाने वाले अभिनय और कश्मीरी पंडितों के साथ हुई त्रासदी को देखने के लिए फ़िल्म देखी जा सकती है पर फ़िल्म देखने के बाद कश्मीर से जुड़ा कोई विश्वसनीय दस्तावेज पढ़ने की भी आवश्यकता है

कलाकार- मिथुन, अनुपम खेर, दर्शन कुमार, पल्लवी जोशी
निर्देशक- विवेक रंजन अग्निहोत्री
छायांकन- उदय सिंह मोहिते
कहानी- विवेक रंजन अग्निहोत्री, सौरभ एम पांडे

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लेखक उत्तराखण्ड से हैं और पत्रकारिता के शोध छात्र हैं। सम्पर्क +919720897941, himanshu28may@gmail.com

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