सिनेमा

‘क्या दर्शक आम जनता में तब्दील होगा’ जवान की ललकार

 

1996 में कमल हसन के डबल रोल साथ तमिल फिल्म आई थी इंडियन’ हिन्दी में ‘हिन्दुस्तानी’। एक स्वतंत्रता जो सेनानी भ्रष्टाचार को जड़ से ख़त्म करना चाहता है लेकिन उसका अपना बेटा भ्रष्टाचार में लिप्त है। 1998 अनिल कपूर की ‘नायक’  जो तमिल की हिट फिल्म ‘मधुलवन’ का रीमेक है पर हिन्दी में फ्लॉप रही। 2005 में मनोवैज्ञानिक एक्शन थ्रिलर ‘अन्नियन’ हिन्दी में ‘अपरीचित’ ने भी खूब धूम मचाई जिसका सीधा-सादा नायक भ्रष्टाचार से त्रस्त है, आम जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘अपरिचित’ नामक व्यक्तित्व गढ़ता है और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अपने तरीके से जंग लड़ता है। 2007 में आई ‘शिवाजी द बॉस’ जिसका नायक जब शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नि:स्वार्थ सेवाएं देना चाहता है तो पूँजीपतियों और नेताओं का भ्रष्टाचार अवरोध बनता है तब नायक  रजनीकांत अपने स्टाइल में जंग लड़ता है।

इसी सप्ताह हिन्दी, तमिल और तेलगु में एक ‘जवान’ फिल्म रिलीज़ हुई है जिसका नायक भी व्यवस्था से जंग लड़ रहा है लेकिन इस बार उसके साथ है पाँच कैदी लडकियाँ जबकि नायक जेलर है जिसे बेस्ट जेल का अवार्ड भी मिला है इस फ़िल्म के निर्देशक है एटली, जिन्होंने उपरोक्त फिल्मों के निर्देशक एस शंकर के साथ सहायक के रूप में काम किया। कोरोना का प्रकोप फिर ओटीटी  की लोक्रियता साथ साथ बड़े-बड़े निर्माता कलाकार बॉयकाट बॉलीवुड से त्रस्त प्रोपेगैंडा के दबाब में दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सफल फ़ॉर्मूला को तरसती निगाहों से देख रहे थे। संभवत: अब आप जवान फिल्म के बनने की पृष्ठभूमि और लोकप्रियता के तोड़ते प्रतिमानों को समझ जायेंगे। स्पष्ट है शाहरुख़ खान ने दक्षिण की ओर रुख कर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। बॉलीवुड यह कहने ही लगा है हिन्दी फ़िल्में अब मुख्यधारा नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा ही है।   

जवान देखने के दौरान अमिताभ कई बार याद आये “अँधेरी रातों में…जब एक ‘शहंशाह’ निकलता है’… जो रूप बदल कर निकलता है, इसमें शाहरुख ने ‘अग्निपथ’ के अमिताभ की तरह अपनी आवाज़ के साथ भी प्रयोग किये हैं जो रोमांटिक नहीं लगता, तो क्या एंग्री यंग मैन (जवान) रूप बदल कर आया है? खैर जवान फिल्म अपने 13 साल के बेटे के साथ देखी वो खूब एन्जॉय कर रहा था मुझे भी देखने में खूब मज़ा आया। सच कहूँ तो ‘जवान’ बच्चों की फिल्म है,यानी बच्चों के लिए फिल्म है, भरपूर-विशुद्ध मनोरंजन, कोई लॉजिक नहीं, कोई तर्क नहीं, लेकिन…लेकिन…लेकिन…यह जवान पूरी व्यवस्था से टक्कर ले रहा है और जनता से अपील करता है कि आपके पास सरकार चुनने का अधिकार है, ताकत है तो उसका उपयोग अपने विवेक से करो।

कहा जा सकता है पिछले 10 साल में जो बच्चे वोटर बने हैं और बनने जा रहें हैं, उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े सवाल एकबार को आकर्षित कर सकतें हैं, फ़िल्म नये-नये वोटर नवयुवकों के सन्देश देती प्रतीत होती है पर इसमें दो राय नहीं कि किसी भी कला में सन्देश छिपा हुआ होना चाहिए न कि विज्ञापित ‘जवान’ का मोनोलॉग अमिताभ के ‘दो बूँद पोलियो’ के अंदाज़ में विज्ञापन अधिक प्रतीत हो रहा है जो आपको ललकार रहा है। ‘बेटे को उठाने से पहले बाप से बात कर’ ये संवाद न होता तो भी  शायद इतना बनावटीपन न लगता पर दर्शक इसी संवाद पर फ़िदा हुए हैं जो शाहरूख़ की लोकप्रियता का चरम है। ‘डर’ और ‘बाजीगर’ के साथ ग्रे शेड वाले खलनायक की शुरुआत शाहरुख खान ने ही की थी। आज एंटी हीरो, एंग्री यंग मैन, रॉबिन हुड टाइप हीरो का पुनर्जन्म हो रहा रहा है।

फ़िल्म में अगर कुछ नया है तो वह है A। तकनीक, मेट्रो, ईवीएम मशीन, 2000 के नोटों का उड़ना जो आजकल गायब हो चुके हैं। अन्यथा आपको  इसमें 70-80 के दशक का सिनेमा याद आएगा जिसमें नायक आम जनता का मसीहा है जो नेताओं को भ्रष्टाचार सज़ा देता है आपको निज़ात दिलाता भ्रष्टाचार आज कई गुना बढ़ चुका से है।  90 के दशकों में विविध संस्थानों विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में होने वाली धांधलियाँ भी है जो घुन की तरह आम जनता को त्रस्त कर रहीं हैं। पिछले दो दशकों में बैंकों का घोटाला भी है जहाँ किसानों को 40,000 के लिए आत्महत्या करनी पड़ती है जबकि अरबों का कर्जा लेने वाला विदेश भाग जाता है, बैंक और सरकार कुछ नहीं कर पाते।

कहने को स्त्रीशक्ति पर केंद्रित यह फिल्म अंततः यही संदेश देती है कि बिना “जवान” के स्त्री अधूरी है जवान टीम की पाँचों लडकियाँ फीमेल पांडव है जिसे सारथी के रूप में एक जवान का दिशा निर्देशन चाहिए यहाँ  सिनेमा का परम्परागत पितृसत्तात्मक चेहरा साफ़ नज़र आता है, नायिका को भी अपनी बेटी के लिए एक पिता की जरूरत पड़ती है जब ‘जवान’ पूछता है कि ऐसा कौन सा काम है जो तुम्हारीं मम्मी नहीं कर सकती लेकिन पापा कर सकते हैं? फिर एक घिसा-पिटा चुटकुला नुमा जवाब कि ‘पापा टीचर को धमकी दे सकता है, उसके सिर पर टपकी दे सकता है और को लाड-प्यार में बिगाड़ भी सकता है’। यानी अभी भी स्त्री पुरुष के बराबर नहीं हो सकती  माँ गाजर का हलवा या खीर बनाने के अलावा भी क्या-क्या कर सकती है इस पर कोई संकेत नहीं? और एक सिंगल मदर का अस्तित्व संघर्ष झटके में हवा हो जाता है, खैर! बच्ची का  उत्तर सुनकर बच्चों को हँसी आ जाती है बच्चों की हँसी में हम बड़े भी शामिल हो जाते हैं।

सफलता ही फार्मूला है, फॉर्मूला हिन्दी सिनेमा की विशेषता है। इन सब के बीच क्या मान सकतें हैं कि “प्रोपेगेंडा फ़िल्में बनाने का तनाव या दबाव कुछ कम होगा अक्षय कुमार की OMG2 में भी कुछ ऐसा ही लगा था कि ‘एक खास मकसद’ को लेकर बनने वाली फिल्में संभवतः हाशिए पर चली जाएंगी” यह कोई भविष्यवाणी नहीं लेकिन फिल्में विशुद्ध मनोरंजन का साधन है जिसे आप नजरअंदाज नहीं कर सकते और जिसमें व्यवसायिकता सर्वोपरि है। भारतीय फिल्में इतनी तनाव पूर्ण जीवन में कुछ क्षण के लिए आपको सुकून देती हैं आप दूसरी दुनिया में चले जाते हैं बावजूद इसके फिल्मों में कुछ ना कुछ संदेश तो रहता ही है होना भी चाहिए। इस फिल्म में भी जो संदेश है वह यही है कि आम जनता अपने अधिकारों को समझे! अधिकारों का सदुपयोग करें!! बच्चों की फिल्में इसलिए कहा कि हमारी आज की नई पीढ़ी को, जनरेशन को यह जानना चाहिए कि आजादी के 75 साल में हमारे नेताओं ने देश को ‘ख़ाला का घर’ समझा हुआ है पूरी व्यवस्था ‘MESS’ कर डाली !! इसके पहले हमारे बच्चे राजनीति के रंग में रंगे चाहे वे सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक रूप में भी राजनीतिक बने, फिल्म ‘प्ले वे मेथड’ में संदेश देती है।

कहने वाले तो यह भी कह रहें हैं कि जो काम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ न कर सकी उसे शाहरुख की जवान ने कर दिखाया  लेकिन यह भी अति वादी टिप्पणी है क्योंकि लोकप्रिय फ़िल्मों के सन्देश आपको उत्तेजित तो कर सकतें हैं लेकिन विषय के प्रति संवेदनशील नहीं बना पाते क्योंकि त्वरित प्रतिक्रिया से वैचारिकता काम नहीं करती और सन्देश रात गई बात गई होकर रह जाता है। कहने को इसे स्त्री सशक्तिकरण से भी जोड़ा जा रहा है जब मैंने थिएटर में ट्रेलर देखा तो पहला कैमरा “नारी-शक्ति” के बोर्ड पर जाता है लेकिन यह भी एक भुलावा ही है बल्कि दो हीरोइन और पाँच साथियों के बाद भी नायिकाओं के लिए कोई स्थान नहीं स्त्री शक्ति का आश्रय पर भी हीरो का विकेन्द्रीकरण  बना हुआ है जबकि पिछले वर्ष हुए किसान आन्दोलन में हमें किसानों की मजबूत छवि देख चुके थे और इसके पूर्व  किसानों की आत्महत्या पर अधिक संवेदनशील फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ भी देख चुके थे इसलिए जवान में जब वही किसान यानी कलाकार ओंकार दास मानिकपुर ड्रामेटिक अंदाज़ में दिखाई दिया तो अधिक भावुक न कर पाया।

फिल्म में खलनायक का गेटअप अरबों रुपये लेकर भागने वाला विजय माल्या जैसा है तो ऑक्सीजन काण्ड के  माध्यम से स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खोली गई है, पर्यावरण संरक्षण से बेपरवाह कॉर्पोरेट जगत पर भी एक दृष्टि डाल दी, घटिया कारतूसों के कारण आर्मी सैनिकों की शहादत है जिसके केंद्र में भ्रष्टाचार ही है। आपका वोट ही आपको अच्छी सरकार दे सकता है एक उपदेशात्मक भाषण से सुसज्जित कई गंभीर मुद्दों को फिल्म में एक ‘सेम्पल पैकेज’ की तरह इस्तेमाल किया गया है, हमारी फिल्मों में यथार्थ इसी तरह मनोरंजक ढंग से हमेशा की परोसा जाता रहा है, आपको ‘उड़ता पंजाब’ याद होगी जिसने कोई सन्देश पैच वर्क की तरह नहीं दिया कहीं कोई मनोरंजन नहीं गीत भी कर्णप्रिय और पंजाब की राजनीति में तब बदलाव आये भी थे।  जवान के सफल फ़ॉर्मूला पैकेज के आस्वाद से हर्षाया, बौराया हमारा दर्शक ‘आम जनता’ में तब्दील हो पाए तो फ़िल्म सही मायने में सफल है।

यह समझना भी ज़रूरी है कि दर्शक इस महंगाई में मसाला और मनोरंजन के लिए ही थिएटर जा रहा है वह अपने पसंदीदा लोकप्रिय सितारों की डायलॉगबाजी पर तालियाँ बजाता है उसके एक्शन पर रोमांचित होता है,तो रोमांस और गीतों पर आनंदित होता है थिरकने लगता है यानी पैसा वसूल ‘पुष्पा’ जैसी पॉपुलर फ़ॉर्मूला फिल्म हिट रही तब भी मैंने तब लिखा था कि हिन्दी सिनेमा का यह बुरा दौर है अन्यथा हिन्दी में ऐसी फिल्मे खूब बनती रही है लेकिन जब दक्षिण भारतीय शैली में रजनीकांत के अंदाज़ में हमें शाहरुख़ मिले तो जायका अपने पसंदीदा तेल में डोसा बनने जैसा आएगा यानी किंग खान ने दक्षिण के फ़ॉर्मूला को बढ़िया से भुनाया है इसमें एक्शन, कॉमेडी, मिलने बिछड़ने का चिर परिचित ड्रामा है सन्देश भी है धर्म के नाम पर फूट डालने की सियासी चाल या साम्प्रदायिकता नहीं लेकिन दक्षिण का फ़ॉर्मूला अधिक दिन चल पायेगा? क्योंकि हमारे सामने मराठी फिल्म सैराट का रीमेक रीमाके धड़क इसी तरह का फ्लॉप उदाहरण है जब गंभीर मुद्दों को मसालों के साथ बार बार एक ही तेल में तला  जाता है तो मूल तत्व नष्ट हो जाते हैं और हाजमा भी ख़राब करतें है। फ़िल्म में AI तकनीक का और भी बेहतर प्रयोग किया जा सकता था जबकि पुराने गीत बजाकर गीत संगीत के साथ समझौता कर लिया पर हाँ यह एक सफल फिल्म की श्रेणी में याद की जाएगी

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रक्षा गीता

लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com
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