सिनेमा

‘जुबली… पर्दे के पीछे की कहानी’

 

बॉलीवुड के बायकाट के समय वेब सीरीज़ ‘जुबली’ याद दिलाती है कि एक समय था जब फिल्में सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली हुआ करती थी। अमेजॉन प्राइम की ‘जुबली’ वेब सीरीज एक पीरियड ड्रामा है जो फिल्मों के स्टार कलाकारों की पृष्ठभूमि को बहुत बारीकी से हमारे सामने रखती है। 1947 आजादी के जुनून, विभाजन की त्रासदी, चारों ओर सांप्रदायिक दंगों की लपटों में भारत झुलस रहा हैं, त्राहिमाम त्राहिमाम मचा हुआ है लेकिन लगता है रॉय टॉकीज के मालिक और फ़िल्मकार को संभवतः इस आग से कोई मतलब नहीं बल्कि यहाँ आने वाले नए चेहरे और स्टार ‘मदन कुमार’ को लेकर गरमा- गर्मी है।

रॉय को कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश में क्या क्रांति या बवाल मचा हुआ है अपने काम में ‘परफेक्ट और वोर्कोहालिक’ स्पष्ट कहता है कि ‘बीवियां और औरतें आती जाती रहती हैं स्टार बार-बार नहीं मिलते, बीवी और स्टूडियो में मुझे एक को चुनना पड़ेगा तो मैं स्टूडियो चुनूंगा। उसकी पत्नी जो पहली लोकप्रिय महिला फिल्म स्टार है, स्टूडियो की आधी मालकिन है, अपने पति के इस तटस्थ और पितृसत्तात्मक रवैए से क्षुब्ध होकर भविष्य के स्टार मदन कुमार के साथ कराची भागने वाली है। उसका कहना है कि मेरा पति मेरे ‘भागने पर’ गुस्सा तो तब होगा जब उसे अपनी रखैलों और दूसरों की बीवियों से फुर्सत मिले शायद पति के प्रति विद्रोह अथवा बदले की भावना लिए ही वह पति को लगभग चुनौती देते हुए जमशेद खान उर्फ़ मदन कुमार को कराची भागने के लिए तैयार कर रही है। उस पर भी देश विभाजन की त्रासदी से कोई फर्क नही दिखाया गया, रेडियो पर आने वाली खबरें उसे विचलित नहीं करती।

रॉय टॉकीज का एक टेक्नीशियन ‘बादशाह का वफादार सिपाही’ जो स्टार मदन कुमार बनना चाहता है उसे वन टेक नहीं ‘हंड्रेड टेक आर्टिस्ट’ बनना है विभाजन की त्रासदी का सबसे बड़ा लाभ उठाता है और भविष्य के मदन कुमार को दंगों की आग में झोंक कर शांति से आगे बढ़ जाता है। उसका कहना है, ‘यहाँ सबको बड़ा बड़ा बोलने में बहुत मज़ा आता है लेकिन जो चुप रहता है वह लम्बा चलता है।‘ अपने गुपचुप खेल के साथ आगे बढ़ता है हालांकि उसकी अंतरात्मा उसे शांत नहीं रहने देती।

इस प्रकार अलग-अलग चरित्रों के माध्यम से ‘जुबली’ फिल्मी दुनिया में निहित असुरक्षा, अहंकार, महत्वकांक्षा, प्रतिस्पर्द्धा और सपनों की दुनियां को ख़ूबसूरती से उजागर करती है। रॉय के लिए फिल्म बनाना जूनून है पर यह उद्योग भी है। थिएटर कलाकार जय खन्ना कहता है ‘नाक में दम कर रखा है इन फिल्मों ने’ उसका थिएटर फिल्मों की तकनीक और स्टार की लोकप्रियता से संघर्ष करते-करते फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरता है। लखनऊ की प्रसिद्ध तवायफ बिंदास नीलोफर जिसे विभाजन ने इस तवायफ को ‘जिस्म के बाजार’ में पहुंचा दिया।

भले ही वह कहे कि ‘यहां हाथ लगाने के भी पैसे लगते हैं जनाब! वह अपने पेशे के प्रति ईमानदार है लेकिन उस की गाथा में आपको रोना धोना नज़र नहीं आएगा, आप यह संवाद सुनेंगे कि ‘रं****डी को घमंडी नहीं होना चाहिए’ पर निलोफर को अपने हुस्न और प्रतिभा दोनों पर न केवल गुमान है बल्कि पूरा विश्वास भी है और इसी के बल पर फिल्मी दुनिया में आकर संघर्ष कर रही है उसका कहना है कि फिल्मों में काम करने के लिए तो किसी न किसी के साथ सोना पड़ता है चाहे शरीर से या ईमान से । जय खन्ना और निलोफर का संघर्ष (फ़िल्मी स्ट्रगलर्स) कितना सफल होता है यह तो सीरीज के दूसरे भाग पता चलेगा।

कुछ लोगों में कमाल की बात होती है अगर लोग उन्हें हक की जगह न दें तो वे छीनकर अपनी जगह बना लेते है संवाद के साथ फिल्म शुरू होती है सभी संवाद और संवाद अदायगी दिलकश है। मदन कुमार का ब्लैक एंड वाइट संवाद ‘मैंने अपनी जिन्दगी में जो कुछ किया शायद सब गलत किया लेकिन अपने किये पर पछताना और गलती के लिए माफ़ी माँगना मेरे उसूलों के खिलाफ है’ बार बार दोहराया जाता है लेकिन हर बार नया लगता है आप बोर नहीं होते। हमारे आजादी के दीवानों को हम भले ही बिसरा दें लेकिन “सिनेमा से पब्लिक का हीरो बनना” शायद ज्यादा आसान है और फैन्स का कहना है ‘आप जैसे एक्टर्स की वजह से हम जैसे मामूली लोगों के सपने जिंदा रहते हैं’।

फ़िल्मी दुनियाँ में सियासत का दखल भी आज से नहीं पहले भी था यहाँ आपको कला में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप नज़र आता है रूस में फ़िल्में कैसे लोकप्रिय हुई उसका अंदाजा होता हैं ‘मास हीरो को सरकार का माउथपीस होना ही चाहिए फॉर नेशनल कॉज’ हालाँकि रॉय बाबू इसके लिए तैयार नहीं ‘तुम स्टार हो स्टूडियो के आधी मालकिन, मैं ठहरा मामूली मजदूर एक्टर’ संवाद से पता चलता है पुराने समय में कलाकारों को तनख्वाह मिला करती थी, आज की तरह वे निर्माता का सर्वाधिक हिस्सा नहीं लेते। लेकिन जुबली की स्टार-कास्ट जबरदस्त है जो इस बात को ख़ारिज करती है कि बड़े स्टार ही फिल्म चला सकतें हैं। जो दर्शक बॉम्बे टॉकीज, हिमांशु रॉय, देविका रानी, अशोक कुमार जैसे दिग्गजों से परिचित होंगे वे समझ जायेंगे कि 40 -50 के दशक की कहानी का गोल्डन एरा में कल्पना सस्पेंस-थ्रिलर, सेट और मधुर संगीत, परदे का रंग आदि को चित्रित करने के लिए निर्देशक कहानीकार विक्रमादित्य मोटवानी, सौमिक सेन और अतुल सभरवाल ने अच्छा रिसर्च किया है।

अभिनय की बात करें तो अपारशक्ति खुराना ने अपनी छुपी हुई अपार शक्ति का परिचय देकर साबित कर दिया कि उन्होंने अपने लिए दर्शकों के दिल में जगह बना ली है वे लंबी पारी खेलने वाले हैं। सिद्धांत गुप्ता ने जय खन्ना के किरदार को बहुत शानदार, जानदार और यादगार बना दिया। उसके चरित्र में जीवंतता और सहजता अभिनय में मिश्री की तरह घुल मिल गई है जो अद्भुत है।रॉय में निहित फ़िल्मी जूनून को प्रसन्नजीत मानो जी रहें हैं और अदिति राव भी ठीक है सुमित्रा देवी के कहने पर कि ‘मैं भी बड़ी स्टार हूँ’ तो उसे पितृसत्तात्मक टिप्पणी सुनने को मिलती है जो हमारे समाज का भी यथार्थ है लोगों को मेल हीरो चाहिए’ लेकिन वामिका गब्बी के रूप में निलोफर की नजाकत और बिंदास उसके मस्ताने अंदाज पर आप मन्त्र मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। अरुण गोविल और राम कपूर श्वेता बासु प्रसाद ने भी अपनी छाप छोड़ी है। अमित त्रिवेदी का संगीत और उनका फिल्मांकन पुराने समय की याद दिलाता है और रोमांचित करता है।

सीरीज़ का दूसरा भाग भी है जिसमें कई राज खुलने वाले हैं। जय खन्ना व निलोफर इस फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश करने वाले है, फिनेंसर वालिया कहता है तोड़ दे दरवाज़े घुस जा अन्दरफ़िल्म पूरी तरह से फ़िल्मी है और अगर आप फिल्मों के दीवाने है कला के प्रशंसक और कुछ बेहतर ढंग से समय गुजारना चाहते हैं तो यह मनोरंजन का खजाना। सीरिज़ को आप एक सिटींग में देख सकते हैं अगर स्टार देना चाहे तो 4.5 दे सकते हैं

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रक्षा गीता

लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com
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