पटरी पर पढ़ाई
रामपुर की रामकहानी

पटरी पर पढ़ाई

रामपुर की रामकहानी-5

एकदिन बाऊजी गब्बू बढ़ई के यहाँ से काठ की पटरी गढ़वाकर ले आए और अगले दिन राम नयन भैया के साथ पटरी लेकर स्कूल जाने लगा। किन्तु मन नहीं लगता था। तीसरे दिन बीच रास्ते से ही लौट आया। बाऊजी दुआरे पर ही मौजूद थे। देखकर घबड़ा गए और उन्होंने पुचकार कर पूछा, “का भईल? काहें लवटि अइलS।” मैंने कह दिया, “हम स्कूले ना जाइब। मन ना करता।” मेरा इतना कहना था कि बाऊजी ने मेरा गलफड़ा पकड़ा, ऊपर उठाया और जमीन पर पटक दिया। इसके बाद भी ताबड़तोड़ कई झाँपड़ जड़ दिए। मेरी चीख सुनकर माई जबतक आती और उनके हाथ से मुझे छुड़ाती, मेरी इतनी पिटाई हो चुकी थी कि मैं बदहवास था। उस रात मुझे बुखार आ गया। बुखार के नाते अगले दो दिन मैं स्कूल नहीं जा सका था।

अब तो पढ़े बिना जिन्दा ही नहीं रह सकता। विश्वविद्यालय में अर्जित अवकाश मिलता है। यदि समय पर न लिया जाय तो वह स्वत: समाप्त होता जाता है। मैं ऐसा शिक्षक था जिसके अर्जित अवकाश लैप्स होते रहे किन्तु विश्वविद्यालय जाना और कक्षाएं लेना नहीं छूटा। 31 मार्च को रिटायर होना था। सेशन मई तक होता था। अतिरिक्त कक्षाएं लेकर अपने हिस्से का पाठ्यक्रम पढ़ाकर ही अवकाश लिया।

उन दिनों हमारे गाँव में कोई स्कूल नहीं था। लगभग दो किलोमीटर दूर सोनरा गाँव में प्राइमरी स्कूल था और दूसरी तरफ लखिमा में। दोनो गावों की दूरी हमारे गाँव से बराबर थी किन्तु ज्यादातर बच्चे सोनरा गाँव के स्कूल में ही पढ़ने जाते थे। एक हफ्ते के भीतर ही गाँव के तीन-चार और बच्चे मेरे साथ हो लिए, जिनमें बड़का टोले से सीताराम, अकबर अली, बंशीधर, शारदा देवी और हमारे टोले से राम मिलन प्रमुख थे। कुछ दिन बाद आरिफ अली भी साथी बन गए। उन दिनों पहली जुलाई को स्कूल खुलते थे और नए बच्चे जुलाई में ही स्कूल जाना शुरू करते थे।

बाऊजी ने जो पटरी गढ़वाई थी उसमें एक मुठिया भी थी जिसमें छेद था डोरी डालने के लिए। माई (माँ को हम ‘माई’ कहते थे) ने छेद में डोरी भी डाल दिया था। डोरी के सहारे पटरी कंधे में लटकाई जा सकती थी। स्कूल के पास ही गुमटी में एक दूकान थी जहाँ दुधिया बिकती थी। एक पैसे की दुधिया एक हफ्ते के लिए काफी होती थी। कुछ दिन तो दुधिया और पटरी ही काफी थी पढ़ने के लिए। आखिर गोला ही तो बनाना था और उसके बाद कखगघ। मैं गोला बनाने लगा।

तब स्कूल में शिक्षकों के लिये दो ही तरह के संबोधन प्रचलित थे। ‘पंडीजी’ या ‘मुंशीजी’। जो ब्राह्मण शिक्षक होते थे, उन्हें पंडीजी कहा जा जाता था। अमूमन ऐसे शिक्षक कुर्ता- धोती और गाँधी टोपी पहनते थे। गैर ब्राह्मण शिक्षकों को हम मुंशीजी कहते थे। हमारे हेडमास्टर साहब एक पंडीजी थे।

एक दिन पंडीजी ने अपनी छड़ी के इशारे से मुझे बुलाया और नाम पूछा भोजपुरी में, “तुहार का नाँव हS ?”

मैंने डरते-डरते उन्हें बताया, ‘अमरनाथ।’ पंडीजी ने पिता का नाम भी पूछा था। बाकी कुछ पूछने की जरूरत नहीं थी। गाँव का नाम राम नयन बता चुके थे। अब मेरा नाम स्कूल के रजिस्टर में दर्ज हो चुका था। जन्मतिथि पंडीजी ने अपनी मर्जी से लिख लिया। उन्हें क्या पता था कि एक अप्रैल को दुनिया ‘मूर्ख दिवस’ के रूप में मनाने लगेगी। एक तारीख को ही अगर लिखना था तो एक मार्च या एक मई भी लिखा जा सकता था। असली जन्मतिथि, जन्मपत्री में ही दर्ज रह गई। मैंने भी इसे शिरोधार्य कर लिया। इसे बदलने की शक्ति सरकार के पास भी नहीं है।  

पंडीजी कक्षा पाँच के बच्चों को पढ़ाते थे, जो स्कूल की सबसे ऊँची कक्षा थी। हम लोग दर्जा एक में थे। उन दिनों केजी, प्री-केजी जैसे विभाजन नहीं थे। कक्षा एक से ही शुरुआत होती थी। कक्षा एक वालों को मुंशीजी पढ़ाते थे। उनके हाथ में भी छड़ी हमेशा रहती थी। यद्यपि वे मारते कम, कान अधिक उमेठते थे। छोटी-छोटी गलतियों पर जब वे बच्चों के कान उमेठते थे तो बच्चों की चीख निकल आती थी। बच्चे उनसे थर-थर काँपते थे। मैं भी डरता था। यद्यपि उन्होंने मेरे कान कभी नहीं उमेठे और न कभी छड़ी से मारा।

मैं पटरी कंधे में लटकाकर स्कूल चला जाता था। दुधिया कमीज के पॉकेट में रहती थी। अन्य किसी चीज की जरूरत थी नहीं। दोपहर में खाने की छुट्टी होती थी तो मौसी के यहाँ चला जाता था। मेरी रिश्ते की मौसी उसी गाँव में रहती थीं। मौसी तो सिर्फ प्यार करती थी, भोजन भउजी बनाती थीं- उनकी बड़ी बहू। मौसेरे भाई काशीनाथ शर्मा की पत्नी। वे भी उतने ही प्यार से खिलाती थीं। काशीनाथ भैया कहीं दूर पुलिस में सिपाही थे। भउजी परिवार के साथ रहती थीं। संयुक्त परिवार था। मौसा- मौसी के अलावा पाँच बेटे, भउजी के भी बेटे। रिश्तेदार आते रहते। उनके यहाँ हमेशा एक व्यक्ति के खाने भर का भोजन पड़ा ही रहता था।  

        कुछ दिन बाद ‘सलाखा’ की जरूरत पड़ने लगी। सलाखा यानी, एक मोटा धागा, जिसे घुली हुई दुधिया में डुबोकर पटरी को सलाखा जाता था और उससे बनी हुई सीधी रेखा पर नरकट (सरकंडे) की कलम से दुधिया में डुबोकर लिखा जाता था। इसके लिए नियमित रूप से पटरी की पॉलिश भी करनी पड़ती थी। पटरी पर काली चढ़ानी पड़ती थी। काली हम ढेबरी के ऊपर कोसा रखकर या लालटेन के ऊपरी हिस्से पर जमे कालिख को इकट्ठा करके तैयार करते थे। सर्वोत्तम काली यही होती थी। अत्यंत मुलायम और पानी में डालते ही घुल जाने वाली।

 मेरे घर में एक बड़ा ही शानदार लालटेन था। उसपर “मेड इन जर्मनी” लिखा था। सोचता हूँ कि क्या उन दिनों भारत में लालटेन भी नहीं बनता था? बड़ी अच्छी रोशनी होती थी उसकी। बड़ा और गोल सा उसका सीसा था। हमारे खपड़ैल के मकान के ओसारे में उस लालटेन को जलाकर लटका दिया जाता था तो उसकी रोशनी दूर सड़क तक जाती थी। मैं उसी की रोशनी में पढ़ता था। लोगों को उसे दिखाने में हमें गर्व की अनुभूति होती थी। मेरे लिए जरूरत भर की काली उसी से मिल जाया करती थी। एक बार उसका सीसा टूट गया था। कई महीने तक उसे जलाया नहीं जा सका। उसका सीसा कहीं मिलता ही नहीं था। कई महीने बाद मेरे ममेरे भाई गोरखपुर से ढूँढकर सीसा लाए थे। किन्तु वह भी पहले जैसा नहीं था। डुप्लीकेट था। तबसे हम उसके इस्तेमाल में अतिरिक्त सावधानी बरतते थे। उस लालटेन से हम दोनो भाई पढ़कर गाँव छोड़ चुके थे तबतक वह लालटेन हमारे घर को रौशन करता रहा।

बहुत से बच्चे कोयले को बारीक पीसकर भी काली बनाते थे। उस काली को एक सीसी में पानी डालकर गीला करते थे और उसे कपड़े के टुकड़े में भिगोकर पटरी पर लगाया जाता था। सूख जाने पर उसे चूड़ी के टुकड़े से रगड़कर चमकाना प़ड़ता था। चूड़ी से रगड़ने और चमकाने में बड़ा मजा आता था। हम स्कूल जाने से पहले घर में ही अपनी पटरी चमका लेते थे। स्कूल में तो सिर्फ सलाखना और लिखना होता था। 

मेरी जरूरत को देखते हुए माई ने एक पुरानी गोल-मटोल सीसी और साथ में एक मोटा धागे का टुकड़ा भी दे दिया। चूड़ी के टुकड़े की भी रोज ही जरूरत पड़ती थी। मेरी जरूरतों को देखते हुए बाऊजी से कहकर माई ने साबित दर्जी के यहाँ से एक झोला सिलवाकर मँगा लिया। झोला बड़ा था। उसमें पटरी, दुधिया, दावात आदि सबकुछ आ जाता था। सलाखा को तो दावात के भीतर ही रखना पड़ता था। कभी-कभी दोपहर की छुट्टी में खाने के लिए माई भूजा दे देती थी। उस दिन मैं मौसी के यहाँ नहीं जाता था। कपड़े की गठरी में बँधा हुआ भूजा भी झोले में आ जाता था।

भूत और चुड़ैल से मुझे बचपन में बहुत डर लगता था। कभी भी अँधेरा होने पर या एकान्त होने पर लगता था कि भूत मेरा पीछा कर रहा है। ऐसी दशा में मैं जोर-जोर से ‘हनूमान चालीसा’ पढ़ने लगता था। मुझे पूरा ‘हनूमान चालीसा’ याद था और गायत्री मंत्र भी। माई बताती थी कि हनूमान चालीसा पढ़ने से भूत भाग जाते हैं। उसमें तो साफ लिखा है कि “भूत पिशाच निकट नहिं आवैं, महाबीर जब नाम सुनावैं।” इसपर अविश्वास का कोई कारण न था। परन्तु पराई विचार के लोगों पर धौंस जमाने के लिए, सड़क पर, वयस्कों द्वारा सामूहिक रूप से हनूमान चालीसा का पाठ करते मैंने पहली बार पिछले दिनों देखा। यह हमारी विकसित हो रही वैज्ञानिक चेतना का लक्षण है। फिलहाल, स्कूल में जब ऊँची कक्षाओं के विद्यार्थियों को पता चला कि मुझे पूरा हनूमान चालीसा याद है तो उन्हें आश्चर्य हुआ था। वे सुनाने का आग्रह करते थे और बदले में दुधिया, सरकंडे की कलम आदि वस्तुएं ईनाम के रूप में देते थे। मैं दुधिया की लालच में उन्हें बार- बार हनूमान चालीसा सुनाता था। पूरे एक वर्ष तक मैंने काठ की पटरी पर पढ़ाई की थी।

दर्जा एक पास होने के बाद पटरी छूट गई और हमें रोशनाई से कागज पर लिखने का अधिकार मिल गया। इससे मुझे गौरवबोध हुआ। मुझे एहसास हुआ कि मुझसे भी निचली कक्षा में कुछ विद्यार्थी हैं। उन दिनों सादा कागज जिस्ते में मिलता था। कागज को मोड़कर उसे सूई धागे से सिलाई करके हम खुद कॉपी बनाते थे। उसे अब दुधिया से नहीं, कागज की पेंसिल से और स्केल की सहायता से सलाखा जाता था। स्केल काठ के भी होते थे और थोड़ा ज्यादा पैसा लगाने पर प्लास्टिक के मिलते थे जो पारदर्शी होते थे। लिखने का काम अब रोशनाई से होने लगा किन्तु कलम सरकंडे की ही होती थी, जिसे गढ़कर और पत्ती (ब्लेड) से खत काटकर हम सुंदर लिखावट के लिए अपने अनुकूल आकार का बना लेते थे। अब हमारी अध्ययन सामग्री में ब्लेड भी जुड़ गया। इमला और सुलेख दो ही तरह का लेखन होता था। इसके अलावा 100 अंक तक गिनती, दस तक पहाड़ा और जोड़ -घटाना दर्जा दो के पाठ्यक्रम का हिस्सा था। गिनती, पहाड़ा और जोड़-घटाना के लिए हम स्लेट का प्रयोग करने लगे थे। पटरी की जगह स्लेट ने ले लिया था। स्लेट एक खास तरह के पत्थर का होता था जिसपर लिखने के लिए स्लेट वाली पेंसिल आती थी। उसकी लिखावट को मिटाना आसान होता था। एक ही पुस्तक में सबकुछ था दर्जा दो के लिए। इसी तरह दर्जा एक में भी एक ही किताब कोर्स में थी। अंग्रेजी की शिक्षा प्राथमिक विद्यालयों में नहीं दी जाती थी। मैंने कक्षा छ: से एबीसीडी पढ़ना शुरू किया था।

पढ़ाई के साधन अर्थात् कलम, दावात, रोशनाई, कागज आदि हमारे लिए बहुत मूल्यवान थे। प्राणों से भी प्रिय। कागज के संचय की आदत का परिणाम है कि आज अपनी पोतियों द्वारा लक लक करते सादे कागजों से खेलते और उन्हें व्यर्थ में बर्बाद करते देखता हूँ तो बड़ी पीड़ा होती है।  मुझे अपने वे दिन याद आने लगते हैं। अपने विद्यार्थी जीवन में ही नहीं, अध्यापन काल में भी मैं कागज पर दो बार लिखता था। एक बार कागज वाली पेंसिल से और जब कापी भर जाती थी तो दुबारा उसपर कलम से। 

स्कूल में बैठने के लिए टाट मिलता था जो जूट का बना होता था। किन्तु सभी बच्चों के लिए टाट सुलभ न होने के कारण कुछ कक्षाओं के बच्चों को अपने बैठने के लिए अपने-अपने घरों से जूट का बैग या ऐसी ही कोई वस्तु लानी पड़ती थी। सभी बच्चे पैदल ही स्कूल जाते थे। स्कूल में पहुँचाने के लिए किसी तरह के वाहन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। साइकिल भी कुछ प्रतिष्ठित और संपन्न घरों में ही उपलब्ध थी-बड़ों के लिए।

राजकीय प्राइमरी पाठशाला सोनरा में विद्यार्थियों की संख्या 100 से ऊपर थी। सोनरा, सिसवनिया, रामपुर और बजन्थापुर (बैजनाथ पुर) आदि गाँवों को मिलाकर यही एक प्राइमरी स्कूल था। विद्यार्थियों की संख्या ज्यादा होनी ही थी। पाँचो कक्षाओं को पढ़ाने के लिये अमूमन पाँच अध्यापक रहते थे। प्रधानाध्यापक आम तौर पर विद्यालय में ही रहते भी थे। विद्यालय में एक बड़ा सा हॉल नुमा कमरा था और उसके अलावा तीन ओर से खुला हुआ वरामदा। कक्षा पाँच की कक्षाएं कमरे में चलती थीं। प्रधानाध्यापक ही उन्हें पढ़ाते थे। बाकी कक्षाओं के लिए कोई निश्चित जगह नहीं रहती थी। अध्यापक अपनी इच्छानुसार स्कूल के बाहर बाग में भी कक्षाएं लेते रहते थे। हमारा स्कूल आम के विशाल बाग के पश्चिमी छोर पर था। बाग में सौ से भी अधिक देशी आम के बड़े- बड़े पेड़ थे।

स्कूल में दो राष्ट्रीय पर्व धूमधाम से मनाए जाते थे। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस। इस दिन सभी विद्यार्थियों को सुबह सात बजे स्कूल में आना अनिवार्य था। सभी लोग अपने- अपने घरों से डंडों में लगा हुआ तिरंगा झंडा लेकर आते थे। तिरंगा सभी बच्चे खुद बनाते थे। इसमें सभी लोग सादा कागज इस्तेमाल करते थे। पूरे गाँव में प्रभातफेरी होती थी। प्रभात फेरी के दौरान हम “झंडा ऊँचा रहे हमारा- बिजयी विश्व तिरंगा प्यारा।” गीत गाते थे। बीच -बीच में नारे लगाते रहते थे। तीन नारे खास तौर पर लगाए जाते थे। “भारत माता की जय”, “महात्मा गाँधी की जय” तथा “सादा जीवन-उच्च विचार”। गाँव की महिलाएं अपने- अपने घरों से बाहर आकर हमें देखने के लिए खड़ी रहती थीं। उन्हें देखकर हमारा उत्साह और भी बढ़ जाता था। हम और जोर-जोर से गाने लगते थे। प्रभातफेरी से स्कूल लौटने के बाद हम पंक्तिबद्ध खड़े हो जाते थे। प्रधानाध्यापक हमें उस राष्ट्रीय पर्व का महत्व बताते थे। कभी- कभी इस अवसर पर कोई विशिष्ट अतिथि भी शामिल होते थे। अंत में हमें दो- दो लड्डू मिलते थे। इसके बाद हम अपने घर जाते थे।

बाग के दूसरे छोर पर विशाल तालाब था। गंगाजल की तरह साफ पानी रहता था उसका। गर्मी के दिनों में जब दोपहर की छुट्टी होती थी तो बहुत से विद्यार्थी इस तालाब में नहाते और तैरते थे। मैंने भी कई बार उस तालाब में स्नान किया है। कई बार उसके किनारे जाकर सिर्फ बैठना ही अच्छा लगता था। अनेक विद्यार्थी इस विशाल तालाब को तैरकर पार कर लेते थे। तालाब के बीचोबीच एक काठ का स्तंभ था जिससे तालाब की गहराई का पता चलता था। नहाने वालों में सोनरा गाँव के विद्यार्थी ही अधिक रहते थे।

दर्जा चार में पहुँचने पर झोला पीछे छूट गया और हमने बस्ता अपना लिया। बस्ता यानी, मोटे मारकीन के कपड़े का एक चौकोर टुकड़ा जिसमें कुछ काँपियाँ और पुस्तकें बाँधी जा सकें। हम बहुत ही सुरुचि के साथ उसमें अपनी काँपियाँ और अन्य पुस्तकें रखकर बाँधते थे। सबसे नीचे दफ्ती रखी जाती थी, ताकि काँपियाँ मुड़ने न पावें। दफ्तियाँ कपड़े की दूकानों पर मिलती थीं। जब कभी कपड़ा खरीदने घर के लोग जाते थे तो दूकानदार से दफ्ती जरूर माँगते थे। वैसे एक दफ्ती वर्षों चलती थी। बस्ता बाँधने का एक खास तरीका होता था। बाँधने के बाद हम अपने बस्ते को अपने-अपने कंधों से लटकाकर चलते थे।

दर्जा पाँच तक हम जोड़, घटाना, गुणा, भाग में पारंगत हो चुके थे। बीस तक पहाड़ा, सवैया, और डेढ़ा भी अधिकाँश बच्चों को याद हो गया था। सुलेख, इमला तथा व्याकरण पर विशेष ध्यान दिया जाता था। स्कूल के प्रांगण में थोड़ी सी भूमि भी थी। उसमें से एक-एक क्यारियाँ दर्जा पाँच के बच्चों को दे दी जाती थीं जिनमें शिक्षकों के निर्देशन में हम अपनी रुचि की फसलें उगाते थे। यही कृषि से संबंधित प्रयोगात्मक कार्य थे। स्कूल में चरखे भी उपलब्ध थे, जिनपर हम सूत कातते थे। सूत गाँधी आश्रम में बेचने पर कुछ पैसे भी मिल जाते थे।

स्कूल में फीस एक या दो आना ही लगती थी जिसे हर महीने देना होता था, किन्तु हर महीने कोई नहीं देता था। शिक्षकों का दबाव पड़ने पर बीच-बीच में अपनी सुविधानुसार हम देते थे। परीक्षा के समय तक सबको फीस दे देनी होती थी। कह सकते हैं कि पढ़ाई लगभग मुफ्त थी और सबके लिये एक जैसी। शिक्षा का व्यापार अभी शुरू नहीं हुआ था। सभी विद्यालय और कॉलेज वित्त पोषित थे। इंटर तक एक ही तरह की पुस्तकें पूरे प्रदेश के सभी स्कूलों में समान रूप से चलती थीं। उन दिनों सरकार का इरादा सुदूर गाँवों में छिपी प्रतिभाओं को भी शिक्षित करके उन्हें मुख्य धारा में लाने का था।

दर्जा पाँच पास करने के बाद मैंने गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक इंटर कॉलेज महाराजगंज में प्रवेश लिया जो महाराजगंज तहसील का एक मात्र इंटर कॉलेज था। वहाँ से जवाहरलाल नेहरू स्मारक डिग्री कॉलेज, महाराजगंज और फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय। सारी शिक्षा लगभग मुफ्त। एम.ए. के दौरान तो इतनी छात्रवृति मिल जाती थी कि छात्रावास में रहने के बावजूद कुछ पैसे बचाकर बाऊजी को भेज भी देता था। क्या आज के समय में जन्म लिया होता तो मैं इतना पढ़ पाता? “आजादी का अमृत महोत्सव” किनके लिए ‘महोत्सव’ है? शिक्षा चंद लोगों के साहबजादों और साहबजादियों के लिए सुरक्षित कर ली गई है। यह आजादी उन्हीं के लिए है। डॉक्टर और इंजीनियर छोड़िए, आज किसी स्कूल में शिक्षक बनने के लिए भी बी.एड. चाहिए और एक लाख से कम खर्च करके कोई बी.एड. की डिग्री भी हासिल नहीं कर सकता। यानी, अब शिक्षा की ऐसी व्यवस्था बनाई जा चुकी है जिसमें मजदूर और किसान के बच्चे, चाहे जितने भी प्रतिभाशाली हों, पढ़ नहीं सकते। वे मजदूर बनने को अभिशप्त हैं।

मैंने कभी ट्यूशन या कोचिंग नहीं किया। उन दिनों विरले बच्चे ही ट्यूशन पढ़ते थे। ट्यूशन पढ़ने वालों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। उनके प्रति एक सामान्य धारणा बनी रहती थी कि वे मंदबुद्धि के है। आज देखकर चकित हूँ कि ऐसे घरों के बच्चे भी ट्यूशन पढ़ते हैं जिनके माँ-बाप मजदूर हैं और जैसे-तैसे दो रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। ट्यूशन अब एक फैशन का रूप ले चुका है।   

आज सोनरा का हमारा प्राथमिक विद्यालय अंग्रेजी माध्यम में तब्दील हो चुका है। वहाँ जरूरत भर के शिक्षक भी हैं और शिक्षण के साधन भी। दूसरी ओर मेरे गाँव में भी एक प्राथमिक विद्यालय है जो हिन्दी माध्यम में ही चल रहा है। यहाँ शिक्षक भी कम हैं और पर्याप्त साधन भी नहीं। सरकार द्वारा अपनाई गई अपने ही स्कूलों में यह दोहरी नीति मेरी समझ से परे है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को देखकर हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों में जो हीनताबोध पैदा हो रहा है उसके दूरगामी प्रभाव से आँखें बंद कर लेना क्या सरकार के लिए उचित है?

सरकारी विद्यालयों के अलावा हमारे गाँव के अगल-बगल आधा दर्जन से अधिक निजी स्कूल खुल चुके हैं। मुनाफा कमाने के लिए खोले गए इन स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक नहीं मिलेंगे किन्तु विद्यार्थियों के ड्रेस कोड का सख्ती से पालन होता है। पाठ्य-सामग्री स्कूलों से मिलती है और अंग्रेजी माध्यम के नाम पर उनके अभिभावकों का बेरहमी से शोषण किया जाता है। बच्चे अंग्रेजी की शब्दावली और व्याकरण रटने में ही अपना बचपन गवाँ रहे हैं

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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