रामपुर की रामकहानी

जद्दू पंडित का कुनबा

 

रामपुर की राम कहानी -6

हर साल फगुआ के दिन तिजहरिया होते-होते जद्दू पंडित, कुमार कोइरी के ओसारे में परमानेंट पड़े रहने वाले तख्ते पर पत्रा लिए हुए विराजमान हो जाते थे। बाद में दुक्खी काका बड़े आग्रह से उन्हें उठाते और चद्दर बिछाते ताकि वे आराम से बैठ सकें और आने वाले साल के बारे में पत्रा देखकर भविष्य बाँच सकें। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ जमा होने लगती। जाड़े के अलावा और किसी मौसम में जद्दू पंडित के शरीर पर मैने कपड़ा नहीं देखा। वे सिर्फ सफेद चमकती हुई महीन मरदानी किनारी धोती पहनते और आवश्यक होने पर उसी का एक हिस्सा अपने कंधे पर डाल लेते बिल्कुल गाँधी जी की तरह, किन्तु वे गाँधीवादी नहीं थे। गेहुँआ गोरे रंग के मँझले कद वाले जद्दू पंडित खड़ाऊँ पहनते थे। उनकी छाती पर घुघराले बालों के गुच्छ और उनके ऊपर से मोटे धागों वाला जनेऊ, जिनमें सदा चाभी का एक गुच्छा लटका रहता था, जद्दू पंडित की पहचान बन चुका था। गाँव में शायद अकले वही थे जिनकी पीठ पर भी भेंड़ों जैसे सफेद बाल उगे हुए थे। हाँ, सिर के बाल जरूर गायब थे; कनपटी तक। लोग कहा करते कि जद्दू पंडित की चाल बिलकुल जवाहरलाल नेहरू जैसी है। बड़े फुर्तीले थे वे। उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला गाँव में कोई नहीं था। इसीलिए कहीं भी जाना हो, जद्दू पंडित अकेले ही जाते।

जहाँ पूरा गाँव भोजपुरी बोलता था जद्दू पंडित सदा खड़ी बोली में बात करते। उनके रहते दूसरों को बोलने का मौका कम ही मिलता। वैसे तो गाँव में ब्राह्मणों के कई घर थे और उनमें से कई पढ़े लिखे भी थे किन्तु गाँव में एक मात्र वही पहुँचे हुए ज्योतिषी थे। घर के शुद्धीकरण में भी उन्हें महारत हासिल थी। घर बनाने से पहले गाँव के लोग घर के लिए चिह्नित की हुई जमीन की शुद्दता के बारे में निश्चिंत हो जाना चाहते थे और उसकी शुद्धता की गारंटी जद्दू पंडित ही दे सकते थे। लोगों के बने हुए घरों में से मैने जद्दू पंडित को हड्डियों के टुकड़े निकालते देखा है। जिन लोगों के परिवार में कोई लाइलाज बीमारी होती, गरीबी पिंड न छोड़ती या कोई असामयिक विपत्ति पड़ती तो लोग जद्दू पंडित के पास जाते। जद्दू पंडित उनकी भविष्यवाणी करते, कारण बताते और साथ में मुक्ति के उपाय भी सुझाते। मसलन् हवन पूजा कराते, थोड़ा खरचा पड़ता किन्तु लोगों की समस्याएं अमूमन दूर हो जातीं। यही कारण था कि जद्दू पंडित की पंडिताई आस-पास के गाँवों तक फैल चुकी थी। दूसरे गाँवों में भी उनका आना-जाना लगा रहता था। उन्हें फुर्सत बहुत कम मिलती थी। जद्दू पंडित का पूरा नाम था पंडित यदुनाथ शर्मा।

थोड़ी देर बाद घर की मालकिन यानी, काकी एक लोटे में भेली (गुड़) का रस बनाकर ले आतीं। रस में भरपूर मात्रा में दही फेट कर मिलाया गया होता। दही-दूध की कमी उनके यहाँ कभी नहीं रही। एक जोड़ी बैल, टायर (बैलगाड़ी) और कम से कम एक दुधारू भैंस मैने उनके घर हमेशा देखा। कुमार कोइरी खेतिहर थे। उनके बेटे यानी, दुक्खी काका के जवान होने पर खेती में अच्छी पैदावार होने लगी थी। पंडित जी के बार-बार मना करने के बावजूद फूल के बड़े गिलास में काकी रस उड़ेल देतीं और देखते-देखते जद्दू पंडित तीन चार गिलास गटक जाते। फिर पेट पर हाथ फेरते और बनारस वाला लम्बा पंचांग पलटने लगते।

धीरे-धीरे तख्ते के आस पास लोगों की अच्छी खासी भीड़ जम जाती। बगल से शंकर भैया (शंकर कंहार) और भउजी, तिरबेनी भगत, बदरी काका, गयादीन भगत, राम सूरत, छब्बे काका और काकी, कोइराना के ज्यादातर मरद, स्त्रियाँ और लरिकोर युवतियाँ भी आस- पास घेर कर बैठ जातीं। सबको भविष्य के बारे में जानने की उत्सुकता रहती। अपनी धोती के एक कोने को हाथ में पकड़े बड़कू भइया भी ‘पंडित बाबा पा लागी’ कहते हुए आकर उनके बगल में ही तख्ते पर विराजमान हो जाते। बड़कू भैया यानी, देवेन्द्र मणि। उम्र में जद्दू पंडित से वे काफी छोटे थे किन्तु उस महफिल में वही एक पढ़े लिखे थे, ब्राह्मण थे और पत्रा बाँचना भी जानते थे। इसलिए उनको देखते ही जद्दू पंडित की निगाहें चौकन्नी हो जातीं, क्योंकि बड़कू भैया क्रास क्वेश्चन करने में माहिर थे। सबसे अन्त में बाऊजी आते। कभी-कभी बाऊजी को ढूँढते हुए उपधिया के टोले से झिंगुरी काका भी। झिंगुरी काका, बाऊजी के सबसे घनिष्ट मित्र थे और काकी, यानी झिंगुरी काका की पत्नी मेरी माँ की प्रिय ‘सखी’। दोनो की दोस्ती आजीवन यथावत बनी रही।

बहरहाल, लोग यथायोग्य अपने-अपने आसन ग्रहण कर लेते। बड़कू भैया सहित अन्य ब्राह्मणों के अलावा बाकी लोग नीचे बिछी हुई चटाईयों और दरियों पर जगह बनाकर बैठ जाते। नई उमर की महिलाएं भी जद्दू पंडित से कोई लाज नहीं करतीं और घूँघट डाले उनके इर्द गिर्द बैठ जातीं -अपना अपना भविष्य जानने। जद्दू पंडित सबसे पहले आने वाले साल में होने वाली वर्षा और फसल के बारे में बताते, फिर लगन और साइत, इसके बाद राशि नाम पूछकर सबका भविष्य, और अंत में सबके हाथ की रेखाएं देखकर उनका भविष्य। ज्योंही, जद्दू पंडित बताते कि इस साल रोहिन में अच्छी बारिस का जोग है त्योंही, लोगों के चेहरों पर खुशी की चमक नजर आने लगती। बाऊजी घाघ की कई कहावतें बोल जाते जैसे कि-

 “रोहिन बरसे मृग तवे अद्रा कछु-कछु जाय, कहें घाघ सुनु घाघिनी श्वान भात नहिं खाय।” यानी खूब अच्छी फसल होगी। इसी तरह
“रात निबद्दर दिन में बद्दर, पुरुआ बहे लब्बर- झब्बर। कहें घाघ हम होइबें जोगी, कुँआ के पानी से धोइहें धोबी।” यानी, सूखा पड़ेगा।

 फल यह होता कि दूसरे लोग भी कहावतें कहने लगते। जद्दू पंडित को रोकना पड़ता। क्योंकि उनको दूसरे टोलों पर भी जाना होता। डेढ से दो घंटे में जद्दू पंडित सबको निपटा देते और इसी के साथ लोग अपने-अपने घरों से सीधा लाने लगते। सीधा यानी, अरवा चावल, अरहर की दाल, सब्जी के नाम पर आलू- प्याज और साथ में नमक भी। उस समय खड़ा (रोड़ा) नमक चलता था, मानो सीधे समुद्र से लाया गया हो। बाजार में नमक के पैकेट बिकने का चलन नहीं था। कुछ लोग दच्छिना मात्र से काम चला लेते। दच्छिना बीस आना का होता था।

जिस बरस जद्दू पंडित का निधन हुआ था, उस साल भी उन्होंने दुक्खी काका के ओसारे में तख्ते पर बैठकर देश-काल के बारे में भविश्यवाणी की थी। सबका भविष्य बाँचा था। हाथ देखा था, अगले बरस होने वाली बरसात के बारे में भी भविष्यवाणी की थी और बताया कि किस नक्षत्र में कितना पानी बरसेगा, फसल कैसी होगी। इसके अलावा लगन किस- किस महीने में है -जब शादियाँ हो सकेंगी। गवना, नए घर की नींव तथा दूसरे मांगलिक कार्य के लिए भी शुभ- साइत देखा था और लोगों ने मन ही मन अपनी योजनाएं बनायीं थी। हर बार की तरह इस बार भी यह सब वे लोगों को बिना पूछे बताते गए। अन्त में राशिनाम के अनुसार व्यक्तिगत रूप से सबका भविष्य बाँचा, हाथ की रेखाएं देखीं, पूरे ब्योरे के साथ। जिनका भाग्य अच्छा नहीं है, जिनकी राशि में राहु- केतु या सनीचर सवार है उससे मुक्ति के उपाय भी उन्होंने बताए थे। फिर कुछ ही दिन बाद उन्हें मियादी बुखार हुआ और देखते- देखते जद्दू पंडित खुदा को प्यारे हो गए।

अपने बारे में उन्होंने कोई भविष्यवाणी नहीं की थी। उनके निधन के बाद मेरे बाऊजी भी उनकी शवयात्रा में राम घाट तक गए थे और लौटकर दुखी मन से बताया था कि उनके दोनो बेटों की जन्म पत्री जद्दू पंडित ने ही बनाई थी, उन्होंने यह भी बताया था कि जब मेरे छोटे भाई यानी, विश्वंभरनाथ शर्मा का जन्म हुआ तो बाऊजी जद्दू पंडित को अपने घर बुला लाए थे। विश्वंभर के धरती गिरते समय ओसारे में जद्दू पंडित मौजूद थे। विश्वंभर के धरती गिरने से पहले एक लड़की पैदा हुई थी। लड़की के जन्म लेने की खबर जैसे ही गँवहिन ने दिया, जद्दू पंडित ने ओसारे में बैठे- बैठे तुरंत कहा कि अभी एक बच्चा और होगा और वह लड़का होगा और वही हुआ। विश्वंभर उल्टा पैदा हुए थे। जद्दू पंडित ने ही लड़की का नाम उर्मिला रखा जो पाँच साल की होकर मरी। “अब उनके जैसा पंडित कोई नहीं है।”- कहते-कहते बाऊजी की आँखें डबडबा गईं थीं।

जद्दू पंडित दो भाई थे। उनके छोटे भाई का नाम फागू पंडित था। जद्दू पंडित की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। अपने छोटे भाई के बच्चों को ही वे अपनी सन्तान मान चुके थे। पंडिताइन भी इसी में संतुष्ट थीं। फागू इतना ही पढ़े-लिखे थे कि अपना हस्ताक्षर कर लेते थे। वे रामपुर में रहते भी कम थे उनका मूल घर तो खजनी थाने के पास के बसडीला गाँव में था, जहाँ से आकर रामपुर में उनके पूर्वजों ने जमींदारी खरीदी थी।

जद्दू और फागू दोनो भाइयों के बीच में दो सन्तानें थी राम मिलन शर्मा और श्यामधर शर्मा। राम मिलन अपने रूप-रंग और चाल-ढाल में अपने पिता पर गए थे। उनमें वह व्यवहार कुशलता न थी जो जद्दू पंडित में थी। बहुत प्रयास के बावजूद वे दर्जा दस नहीं पास कर सके। श्यामधर छोटे थे। दर्जा दस में एक बार फेल हुए थे, किन्तु परिश्रमी बहुत थे। टोले के बिलकुल दक्षिण तरफ उनका घर था और उत्तर तरफ मेरा। श्यामधर भोजन के बाद रोज शाम को लालटेन लेकर मेरे घर आ जाते थे साथ में पढ़ने। मैं जल्दी सो जाता था। वे देर तक पढ़ते थे और जल्दी जग भी जाते थे। अपने परिश्रम के बलपर श्यामधर हाई स्कूल पास हो गए। फिर आई।टी।आई। किया और रेल की नौकरी पा गए। किन्तु जद्दू पंडित के निधन के बाद दोनो भाई संगठित नहीं रह सके और उनमें बँटवारा हो गया।

जद्दू पंडित का खपड़ैल का बड़ा सा बखरी घर था। संपन्नता तो थी ही। उनके एक रिश्तेदार के सुपुत्र भी उनके घर रहकर ही महाराजगंज में पढ़ते थे। नाम था रामचंदर। मैने सुन रखा था कि वह गुंडई भी करते हैं, किन्तु कभी देखा नही था। महाराजगंज पढ़ने जाते हुए वे रास्ते में यदा- कदा मुझसे मिल जाते थे। मैं दर्जा दस में पढ़ता था और वे इंटर में। तब महाराजगंज को जोड़ने वाली सड़क कच्ची थी और पढ़ने हम पैदल ही जाते थे- पगडंडी पकड़ कर। मउपाकड़ के कुछ पहले से ही एक ट्यूबेल की नाली थी जिससे होकर हमें मुख्य सड़क तक जाना पड़ता था। एक दिन हम दोनो बातें करते हुए ट्यूबेल की नाली पकड़े जा रहे थे कि मैने देखा कि सात-आठ नौजवान हाथों में हाकी की स्टिक लिए तेजी से दौड़ते हुए हमारी ओर आ रहे हैं। मैने रामचंदर का ध्यान उस ओर आकृष्ट किया और पूछा, “भैया, वे लोग इधर ही क्यों आ रहे हैं ?” उनपर निगाह पड़ते ही रामचंदर “वे मुझे ही मारने आ रहे हैं।” कहते हुए कुछ दूर स्थित महाराजगंज इंटर कालेज की ओर भागने लगे। वे ताकतवर और लंबे कद के थे, तेजी से भाग रहे थे। मेरे पास उतना दम नहीं था। मैं थोड़ी दूर भाग कर रुक गया। एक-दो नौजवान हाकी का स्टिक लिए मुझे मारने दौड़े तो उनके बीच से एक ने चिल्लाकर कहा, “उन्हें न मारो। वे बाबा के लड़के हैं।” और मैं पिटते पिटते बच गया।

दूसरी ओर रामचंदर दौड़कर कालेज के प्रिंसिपल महेन्द्रनाथ द्विवेदी के कक्ष में घुस गये। महेन्द्रनाथ द्विवेदी बड़े प्रतिष्ठित प्रिंसिपल थे। उनके कक्ष में घुसने की हिम्मत मारने वालों में नहीं थी। मजबूर होकर उन्हें वापस लौटना पड़ा। इधर मैं डर के मारे थर- थर काँप रहा था। लौटते समय उन लोगों ने मुझे हिदायत दी कि आज बँच गए, उसके साथ फिर आए तो हड्डी-पसली नहीं बचेगी। हमलावरों की पूरी टोली मऊपाकड़ के जयहिन्द की धनकुट्टी के कर्मचारियों की थी। जयहिन्द काफी सम्पन्न व्यवसायी थे। अब उनकी धनकुट्टी कहाँ है, नहीं पता। किन कारणों से जयहिन्द के आदमियों ने रामचंदर को मारने के लिए दौड़ाया था यह न तो मुझे पता चला और न मेरा उनसे पूछने का साहस ही हुआ। हाँ उसके बाद से रामचंदर के साथ आना-जाना जरूर छोड़ दिया। इंटर पास करने के बाद उन्होंने खुद महाराजगंज छोड़ दिया। बाद में पता चला कि उन्होंने पॉलिटेक्निक कर लिया था और बिजली विभाग में जूनियर इंजीनियर हो गए थे।

श्यामधर की नौकरी रेलवे की थी। स्वाभाविक रूप से उनकी माली हालत बेहतर बनी रही किन्तु उन्होंने अपनी पत्नी को गाँव में ही रहने दिया। खेती के प्रति उनका मोंह उनके बच्चों के लिए मुफीद नहीं हुआ। बचपन गाँव पर बीतने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा ठीक नहीं हुई और जब बुनियाद ही कमजोर हो तो भवन मजबूत कैसे हो सकता है?। श्यामधर शर्मा का अपने गाँव और जमीन के प्रति मोह ने उनके बच्चों के भविष्य को खुलकर खिलने का अवसर नहीं दिया। राम मिलन और श्यामधर दोनो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

राम मिलन पढ़-लिख नहीं सके थे। ब्राह्मण होने के नाते हल चला नहीं सकते थे। प्रतिष्ठित बाप के बेटे होने के कारण शारीरिक श्रम की आदत नहीं थी। खर्चीला स्वभाव था। विवश होकर वे अपनी पुस्तैनी खेती बेंचकर खाने लगे। आम तौर पर आजाद भारत में पुराने जमींदारों और मध्यम श्रेणी के सवर्ण कास्तकारों की दशा ऐसी ही रही। जिन लोगों के परिवार के सदस्य व्यवसाय करने लगे या राजनीति का प्रोफेशन अपना लिया, उनकी हालत ठीक रही अन्यथा उनकी बुरी आदतों ने धीरे- धीरे उन्हें बर्बादी की ओर जाने पर मजबूर कर दिया। राम मिलन की जिन्दगी तो जमीन बेचते खाते बीत गई किन्तु मरने के समय उन्होंने अपने बच्चों के लिए सब्जी उगाने भर की जमीन छोड़ी थी। हाँ, जिस जमीन में उनका घर था वह जमीन जरूर बँची रही यद्यपि अब उनका वह बखरी घर नहीं है। गनीमत है कि उनके बच्चों के पास अब भी छत नसीब है। राम मिलन के बेटों में प्रतिभा तो है किन्तु सही मार्ग दर्शन और उपयुक्त शिक्षा के अभाव में सबकी दशा दयनीय है। कोई अखबार बेचकर पेट पाल रहा है कोई मजूरी करके।

 हमारे गाँव के दूसरे सबसे प्रतिष्ठित ब्राह्मण सुकुल बाबा के दोनो पोतों में से एक गाँव में ही रहकर खेती-बारी देखता है और दूसरा अपने हिस्से की ज्यादातर खेती बेंच कर महाराजगंज में रहता है और टेम्पो चलाता है। दोनो भाइयों में संबंध मधुर नहीं है। इसी तरह मेरे गाँव के लगभग सभी ब्राह्मणों की दशा एक जैसी है। कभी वे यहाँ के जमींदार जरूर थे किन्तु जिन्होंने शहर की ओर रुख नहीं किया उनमें से ज्यादातर आज मजदूर बन चुके हैं। उनके बच्चों की हालत किसी दूसरी बिरादरी के लोगों के बच्चों से अधिक दयनीय है। कई तो दारू अथवा अन्य दूसरी नशे की आदतों में पड़कर बर्बाद हो चुके हैं। गाँव के सबसे खेतिहर लोगों में से एक राम नयन शर्मा के बेटे फेरी लगाते अथवा मजदूरी करते हैं। काम के दौरान उन्हें भिन्न-भिन्न जाति के मजदूरों के साथ रहना पड़ता है और मिलकर खाना बनाना और खाना पड़ता है। उपाध्याय परिवार की भी ज्यादातर जमीन बिक चुकी है या बंधक है। हमारे गाँव में सबसे सम्पन्न वे हैं जिनके पिता तीस चालीस साल पहले बोरा लेकर घर-घर से अनाज तौलकर लाते और बाजार में ले जाकर बेचते या किराने की छोटी-मोटी दूकान चलाते थे। अपनी मेहनत, सूझ-बूझ और पारिवारिक संगठन के बलपर आज उनके पास चावल और चिउड़ा की मिलें है, ईंट के भट्ठे हैं, ट्रकें है, कार है और गाँव में प्रतिष्ठा है। ब्राह्मण परिवारों की तुलना में तथाकथित दलित कहे जाने वाले परिवार ज्यादा सुखी और संपन्न हैं। मायावती का मनुवादी समाज कम से कम मुझे अपने गाँव में दिखायी नहीं देता। जाति की राजनीति यदि बंद हो जाय तो आने वाले कुछ दशकों में सदियों पुरानी यह जाति प्रथा सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएगी। किन्तु क्या हमारे राजनेता ऐसा होने देंगे?

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लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं। +919433009898, amarnath.cu@gmail.com

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